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चिनार ने कहा था / यात्रा वृतांत

मुरारी गुप्ता
चिनार जब आपको आमंत्रित करता है तो वह आपको ईरान नहीं बुलाएगा, क्योंकि उसका वंश ईरान से समाप्त हो चुका है। वह आपको कश्मीर की वादियों में आमंत्रित करेगा। सदियों पहले कश्मीर आए चिनार ने अब यहीं की आबो-हवा में अपना डेरा जमा लिया है। य मूल रूप से चिनार ईरान का बाशिंदा था। अपने अस्तित्व की हिफाजत के लिए जिस तरह अन्य सभ्यताओं से लोगों ने हिन्दुस्तान में पनाह ली, फले-फूले और यहो का हिस्सा बने, उसी तरह सैकडों मीलों दूर ईरान से आकर चिनार कश्मीर की वादियों का सरताज, साक्षी और शोभा बन गया। उसकी कई पीढयो इन घाटियों की जडों में रच-बस गई हैं। वह भी कश्मीरियत की पहचान बन गया है। प्राकृतिक रूप से देखें तो, वादियों की पहचान अब उसी से है। उसकी विशाल देह, कद काठी, उसके खूबसूरत झरते पो, उसकी लम्बी उम्र। उसके झरते फ पो जब घाटी की ट्टारती पर बिछ जाते हैं तो लगता है मानो घाटी अग्नि सिंदूर से नहा ली हो। हमने भी हवाओं में चिनार के संदेशों को महसूसा और एक ढलती शाम को वादी के आकाश का इस्तकबाल किया।
सैकडों सालों की उम्र लिए चिनार महसूसते हैं घाटी की सोसों को। उसकी कई पीढयों ने कश्मीरियत को महसूस किया है। पंडितों, डोगरों, सिखों, सूफियों, अब्दुल्लाओं, मुय्तियों, गिलानियों की सैकडों पीढयों के बचपन से लेकर बुढापे का वह गवाह रहा है। दहशत के साये में भी चिनार हवाओं के जरिये दूर-दूर बैठे सैलानियों को संदेश भेजता है ’इस दहशतगर्दी से खौफ खाने की जरूरत नहीं है, बंदूकों की गोलियो कभी इतनी ताकतवर नहीं होती कि वह इंसानों के जज्बे को छील भर सके। आइए, इन वादियों के साक्षी बनिये, जिनमें तुम्हारे आदिपुरुषों और महादेव ने अपनी आट्टयात्मिक शक्तियों को निखारा है और इनमें एक शांति कायम की है। दहशतगर्दीवादी की नियत नहीं है, इसकी नियत शांति और अमन है। इसका शिव है, यहो का शैव है, यहो सूफी मत है। विश्वास कीजिए, यह शिव फिर स्थापित होगा और ट्टाीरे-ट्टाीरे हो रहा है।‘
तेरहवीं सदी में कश्मीर में शैव परम्परा को नई ेचाइयों पर ले जाने वाली गुरु लल्लेश्वरी या लाल देद की वाखें अभी भी वादियों में गजती हैं - हम ही थे, हम ही होंगे/हम ही न चिरकाल से दौर किये/ सूर्योदय और अस्त का कभी अन्त नहीं होगा/शिव की उपासना कभी समाप्त नहीं होगी।
यह सच है कि कश्मीर में शिव की उपासना सदियों से है। घाटी शिव की तपस्यास्थली महाभारत के काल से भी पहले की है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, राजतरंगिणी, आईए-ए-अकबरी, नीलमत पुराण समेत कई ऐतिहासिक स्रोत इसकी पुष्टि करते हैं। मगर शिव की खोज में पंथनिरपेक्षता का तव डालने के मकसद से कुछ अलंबरदार इतिहासकारों ने रच दिया, अमरनाथ की गुफा की खोज कुछ भेड चराने वाले गुज्जर बकरवालों ने की। तब से यही इतिहास बार-बार पढाया जा रहा है। मानो, असल इतिहास बता दिया तो कोई मजहबी तनाव हो जाएगा। य इतिहास कभी छिपा नहीं रह सकता। वक्त और पूर्वाग्रहों की खुरचन हटाते ही वह खुद ब खुद प्रकट हो जाता है।
छठी सदी में मीलों दूर समंदर किनारे केरल से आद्यगुरु शंकराचार्य भी यहो शिव की खोज में ही आए होंगे। शंकराचार्य ने यहो आकर ट्टाूनी रमाई थी। इसी विशाल देह को समेटे डल के किनारे से सैकडों फीट पिर एक रमणीय पहाडी पर उनकी वह छोटी सी गफा अभी भी मौजूद है, जहो वे शिवमय हुए थे। उसके पास ही मौजूद है भव्य और ऐतिहासिक शिवलिंग मंदिर। नीचे से पिर तक पूरा परिसर सुरक्षा बालों के आत्मबल से सुरक्षित है। पहाडी पर चढकर गाडी रुकने के बाद लगभग डेढ-दो सौ सीढयो चढकर मंदिर पहचते हैं। मंदिर के घंट निनाद की ट्टवनि तरंगे सैलानियों के साथ-साथ डल के जिस्म को तरंगित करती हैं। यहो से पूरे श्रीनगर और वादी को महसूस कर सकते हैं, जिसे कुछ शायरों ने जन्नत का दर्जा दिया है। घंट निनाद को महसूस कर चिनार के पो शिवो*हं बुदबुदाते हुए मुस्कुराते हैं। उसे याद आता है अपना पैतृक घर ईरान यानी ऐतिहासिक पारस। पारस पर अरब, सिकंदर का आर्माण। अरब आर्मनण के बाद तो जैसे ईरान की संस्कृति ही खत्म हो गई। उस संस्कृति के बचे-खुचे अंश ईरान की इस्लामिक र्‍ांति ने समाप्त कर दिए, अपने प्राचीन मंदिर, स्मारक और मूर्तियों को तोडकर। चिनार को अफसोस होता है, कोई अपनी संस्कृति को खुद अपने ही हाथों कैसे खुरच-खुरच कर खत्म कर सकता है।
वह आमंत्रित करता है हर साल श्र=ालुओं को। महादेव की इस पवित्र तपस्थली में। हजारेां फीट ेचे पर्वतों पर। महादेव ने भी इसी ट्टारा को अपनी तपस्थली के लिए चुना। कोई तो उड्ढेश्य रहा होगा महादेव का। सैकडों-हजारों वषोङ से देश के हर हिस्से से श्र=ालु महादेव की तपस्थली का पवित्र दर्शन करने आते रहे हैं और चिनार की शाखाऐ, पाा-पाा उनका इस्तकबाल करता रहा है, सदियों से। चाहे वह बालटाल का रास्ता हो या फिर पहलगाम का। कितनी खुशकिस्मत है चिनार की पीढयो। सैकडों सालों से श्र=ालुओं को अपने साये में सुस्ताने का सौभाग्य उन्हें मिलता रहा है।
इस बार यह सौभाग्य हमें भी मिला। श्रीनगर पहचने के बाद मित्र सुनील कौल के सानिट्टय से आकाशवाणी परिसर में मौजूद संन्यासी से विशाल चिनार के पेड तले कुछ पल रहने का सुख मिला। इससे पहले चिनार को सिर्फ फिल्मों से पहचाना करते थे। वह भी उनके झरते लाल पाों में घुले कथित इश्क से, जो फिल्म वालों ने घोल रखा है, फिल्म स्र्ीिन को खूबसूरत दिखाने के लिए।
महान वैज्ञानिक जगदीशचन्ध् वसु ने पेडों की जीवंतता मापने के लिए अगर चिनारों पर प्रयोग किए होते तो यकीनन, उन्हें अलग तरह के नतीजे प्राप्त होते। अगर उन्होंने चिनारों की ट्टाडकनों पर अपना र्‍ेस्कोग्राफ लगाया होता, तो उन्हें घाटी के इतिहास की ेची-नीची, पथरीली-रपटीली घाटियों के ग्राफ बने नजर आते। घाटियो दिखने में खूबसूरत हैं। इतनी कि किसी भी सैलानी का दिल इन पर आ जाए। अखरोट, बादाम, केसर, ट्टाान की खेती किसी भी सैलानी को लुभा सकती है। चिनाब, सिंट्टाु, लीथर जैसी नदियो, जीरो प्वाइंट पर बर्फ के खेलों का आनंद, ेची-ेची पहाडयो, सडकों के दोनों ओर घने हरे-भरे पेड, ट्टाान के खेत, झरने और नदियो घाटी को प्राकृतिक सौंदर्य से सेवारती हैं। मगर, इन वादियों में उतना ही दर्द भी पसरा है। चिनार की टहनियों के पास जुबान होती तो, वे बतातीं।
जून महीने के आखिर में घाटी में पर्यटन उतार पर होता है। इसलिए होटल, रेस्तरां, शिकारा की बहुत मारामारी नहीं होती। आप इत्मीनान से श्रीनगर में इनका लुत्फ ले सकते हैं। २३ जून की शाम को लाल चौक पार करते हुए अपने पूर्व नियोजित रहवास में पहचे। डल हमें अपने नजदीक पाकर मचल रही थी, या हम उसे अपने करीब पाकर खुश थे। ये या तो वह जानती है या हम। हो, लाल चौक एकदम सफेद था, उस दिन। किसी जिलानी ने कोई कॉल नहीं किया था उस दिन। लोगों का जीवन बडी शांति और अमन से गुजर रहा था। देर रात तक दुकानें खुली थी। सडक पर टत्र्ैफिक किसी आम महानगर की तरह सरक-सरक कर रेंग रहा था। झेलम श्रीनगर के बीचों- बीच से गुजरती है। उसके पिर बने पुल पर सैकडों वाहन अक्सर निकलने की जड्ढोजहद में एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करते हैं। खैर, इस पुल से कई बार गुजरने का मौका मिला और हर बार जाम में अटकना पडा।
पहले दिन मुगलई बगीचों निशात बाग, शालीमार बाग, चश्मेशाही बगीचे से रू-ब-रू हुए। तीनों में एक बात जो कॉमन थी, वह वे झरने जो घाटियों से निकलते हुए बाग को गुलजार करते हुए डल में अपना अस्तित्व खो देते हैं। मुगलई अंदाज में बने ये बगीचे मुगलकाल में दिल्ली की तपती मुगालफत और सुलगते आर्‍ोश से छुटकारा पाने के लिए मुगल बादशाहों की ऐशगाह हुआ करते थे। हालांकि दूसरी किस्म के कई पेड-पौट्टो और घास यहो लगी हैं, मगर इन बगीचों की खूबसूरती चिनार से है, जैसे घर में बुजुर्ग के होने से। अगर चिनार इन बगीचों से हटा दिए जाऐ, तो बगीचे विट्टावा हो जाऐगे। मुगलों ने भले अपनी अह्याशियों को आरामदेह बनाने के लिए इन बगीचों का निर्माण करवाया हो, मगर फिलहाल बच्चों के लिए ये किसी खुशनुमा पार्क से कम नहीं है। बच्चे इनमें बहने वाले झरनों में अपना बचपन जीते हैं।
जितना रोजगार सरकारों ने यहो के लोगों को नहीं दिया, उससे कई गुना श्रीनगर में शांत भाव से पसरी खूबसूरत डल झील ने लोगों को दिया है। शांत झील कितना रोजगार पैदा करती है और दहाडते समन्दर दो वक्त की रोटी भी नहीं दे सकते। कितने वषोङ से ये खोखले समन्दर वादियों में महज खोखले चिंघाड रहे हैं। जिनमें अक्सर सरहद पार के खारे समन्दर भी मिल जाते हैं। कभी-कभी इनकी आवाजें दिल्ली दरबार और हैदराबाद हाउस तक सुनाई देती थी और उनके इस्तकबाल में सियासत बिछ जाती थी। अब हालात बदल रहे हैं। महादेव करें ये और तेजी से बदलें।
हमारे शिकारा के केवट मंजूर अहमद के मुताबिक डल उनकी जिंदगी है। पोच साल का बच्चा भी सबसे पहले दोस्ती चप्पुओं से करता है, क्योंकि उनकी जिंदगी के ताउम्र दोस्त ये चप्पू ही होते हैं। मंजूद अहमद बताते हैं कि सियासत की सारी ताकत तो कश्मीर में अलगाव के मुड्ढे को जिंदा रखने में लग जाती है। यहो के नागरिकों को रोजगार और घाटी के विकास के बारे में चिंतन करने की किसको फुर्सत है। आम नागरिकों से उनका ज्यादा वास्ता नहीं है। वे कहते हैं, बेटे ने ग्रेजुएशन किया है। तीन लाख रुपये देने के वादे पर भी नौकरी नहीं मिली। अब डल में ही शिकारा चला कर अपनी जिंदगी गुजार रहा है।
टैक्सी के डत्रइवर बिलोल ने सियासत को अपने तरीके से समझाया। उसने कहा, घाटी में कोई पार्टी नहीं चाहती अमन हो। अगर एक पार्टी हार गई तो वह अलगाववाद को अपने तरीके से जिंदा रखती है। अलगाववादियों को सहलाती है। पत्थर को इकद्दा करके रखती है। यही चीजें उन्हें घाटी में जिंदा रखती है। सियासत का यही दुर्भाग्य है। जिन बातों से उन्हें जिंदा नहीं रहना चाहिए, वे ही उनके जीवनस्रोत हैं।
फिर से शिकारा के केवट की बात। डल में शहर की एक पूरी अर्थव्यवस्था चलती है। जैसे ही शिकारा झील में सौ डेढ सौ मीटर आगे बढता है, मक्का वाला अपनी नाव लेकर आफ शिकारे में सटा देता है। आगे एक फल वाला आता है। एक प्लेट में पेश है - तरबूज, आम, लीची, केला, सेव के कटे टुकडे। फिर आपकी डल यादों को अमर करने के लिए कुछ कश्मीरी पोशाकों के साथ एक नाव आती है। वह आफ शिकारा में ही आपको उन पोशाकों को पहनाकर आपकी तस्वीर ले लेगा। थोडा आगे बढयेगा तो नगीनशीं आफ मन मुताबिक अंगूठी तैयार कर देगा।
अगर श्रीनगर बन्द है और आपको शॉपिंग करनी है तो डल आफ लिए बेहतरीन मॉल है। झील के भीतर टापुओं पर हर तरह की दुकान बंद के दौरान भी खुली मिलेगी। यहो आप कश्मीर के शॉल और दूसरी चीजें खरीद सकते हैं। झील के भीतर कई टापू हैं, जहो जीवन भरपूर जिंदगी के साथ चलता है। यह झील अपने भीतर उगे कई टापुओं को जिंदा रखती हैं।
जून के आखिरी दिनों में अमरनाथ की यात्रा शुरू होने वाली थी। लिहाजा हर जगह फौज अनजाने खतरों के बीच श्र=ालुओं की हिफाजत के लिए मुस्तैद थी। सोनमर्ग के रास्ते में चढते ही एक बोर्ड आपका स्वागत करता है - फौज आपकी सेवा में - सचमुच कितनी तसल्ली मिलती है इसे देखकर, पढकर और महसूस कर। जवान स्थितप्रज्ञ की तरह अपने हथियारों के साथ मुस्तैद रहते हैं। अगर चलती गाडी में उनको सलाम किया तो मुस्कुराते हुए सिर हिला देते हैं। हर डेढ सौ-दो सौ मीटर की दूरी पर एक या दो जवान तैनात थे। अमरनाथ यात्रा का एक रास्ता बालटाल के रास्ते सोनमर्ग होते हुए जाता है। ये कम दूरी का है, मगर अनंतनाग से थोडा मुश्किल है। सोनमर्ग के रास्ते में सिंट्टाु नदी पूरे उफान से बहती हुई चलती है। इसके किनारे कई रेस्टोरेन्ट हैं। सोनमर्ग के रास्ते में ज्यादातर रेस्तरां पंजाब के नाम पर हैं। खास बात यह कि सामिष खाने वाले प्रदेश में शु= शाकाहारी खाने वालों के लिए सोनमर्ग से बेहतर कुछ नहीं है। उार भारतीय, दक्षिण भारतीय, पंजाबी, पहाडी हर तरह का शाकाहारी भोजन इस रास्ते में है।
सोनमर्ग से तीस किलोमीटर आगे है जीरो पॉइंट। यानी लाइन ऑफ कंटत्रेल से थोडा पहले। यहो पहाड के जिस्म से चिपकी बर्फ पर सैलानी बर्फ के खेलों का आनंद लेते दिख जाते हैं। इसी बर्फ के निचली तहों से बहता पानी आगे सिंट्टाु नदी में घुलकर पाकिस्तान के रास्ते समन्दर में विलीन हो जाता है। पानी भी कितना सफर करता है। जीरो पॉइंट से पहले बालटाल में अमरनाथ यात्रियों ने अपने डेरे जमा लिए थे। उनके रंग-बिरंगे टैंटों को पहाडों से देखते हैं तो लगता है घाटी किसी दुल्हन सी सजी बैठी है।
पहलगान यानी बैलगोव, अनंतनाग जिले का हिस्सा है। अमरनाथ यात्रा का यह मुख्य रास्ता है। यह रास्ता आगरा-बीकानेर राजमार्ग जैसा आरामदेह है। एकदम सपाट और चौडी सडक। आट्टाारभूत ढोचे के स्तर पर हुए काम का यह बेहतरीन प्रतीक है। अनंतनाग श्रीनगर से लगभग ६०-६५ किलोमीटर दूर है। इसी रास्ते से जम्मू का रास्ता निकलता है। वैसे अमरनाथ यात्रा के लिहाज से देखें तो यह ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व का रास्ता है, जहो से पोच हजार वर्ष पहले पांडवों ने महाप्रयाण किया था।
इसी से शोपियो का रास्ता निकलता है। अलगाव की चिंगारियो इस इलाके में ज्यादा सुलगाई जाती हैं, लिहाजा सेना के जवान और स्थानीय पुलिस के जवान हर सौ मीटर पर मौजूद हैं। इन जवानों पर हर वक्त किसी अनजान खतरे का साया रहता है। मगर मौत को ये अपनी मुद्दी में रखते हैं। सैलानियों को सेना के जवान बायपास रास्तों से नहीं जाने देते। सुरक्षा कारणों से। हमारे साथ हमारे मित्र और स्थानीय रहवासी सुनील कौल साब थे। उन्होंने कश्मीरी में उनसे बात की, मगर जब हमारे चेहरे देखे तो बाईपास रास्ते से जाने से एकदम मना कर दिया। इस रास्ते के दोनों ओर अखरोट के पेड और लीथर नाला साथ-साथ चलते हैं।
कश्मीर में आपने कहवा नहीं पिया, तो समझिए आपसे कुछ न कुछ छूट गया। स्थानीय कहवा तरोताजा करने के लिए काफी है। पहलगाम से लौटते वक्त सूखे मेवों की एक दुकान पर कुछ सूखे मेवे खरीदने के बाद दुकानवाले अब्दुल डार ने कहवा आफर किया। स्थानीय चाय और सूखे मेवे मिश्रित कहवा एक अलग तरह का बेहतर स्वाद जुबां पर चिपका देता है। य तो कश्मीर में वाजवान यानी बकरे के गोश्त से बना खास व्यंजन यहो की खासियत है, मगर निरामिष का संस्कार उस ओर जाने से रोकता है।
पहलगाम के रास्ते में मड्डन से आगे निकलने पर रास्ते में उज्जड से खडे कश्मीरी पंडितों के घर, जो अब भी खौफ, नफरत, अलगाव के इतिहास को समेटे हैं, मन को छिन्न-भिन्न कर देते हैं। सडक किनारे अभी भी बेखौफ खडे विशाल घरों के खोखले पिंजर, टूटी खिडकियो और दरवाजे, आंगनों में उग आए जंगली पौट्टो घरों की तात्कालिक विवशता, असहाय, बेसहारापन जैसी हालत बयां करते हैं। कितने मट्टू, कौल, सप्रुओं की यादें इन टूटी खिडकियों और दरवाजों से चिपकी हैं। दुर्भाग्य से, जिस पीढी की इन घरों में पैदाइश हुई, उन्हें इनमें मरना तक नसीब नहीं हुआ। नई पीढी जो दिल्ली, जम्मू और दूसरी जगहों पर जन्मी, पली और बढी हुई है। वक्त की ट्टाार के साथ-साथ उनका भावनात्मक लगाव इन टूटे घरों से कितना रहा है, कहना मुश्किल है। मगर, दिल्ली और श्रीनगर की सियासत के चेहरों पर ये बिखरे घर कई बदनुमा दाग छोड देते हैं। हमारे साथ, हमारे मार्गदर्शक सुनील कौल के परिवार को भी ९० के दशक में घाटी में अपने विशाल घर को छोडकर जम्मू का रुख करना पडा। तब उनकी उम्र १६-१७ की थी। उन्हें वो मंजर अब भी हूबहू याद है। मगर मैंने उन्हें कुरेदा नहीं। उन जख्मों को कुरेदने से बेहतर है, उनकी साफ सफाई कर उनमें मलहम भरा जाए। संभव है आने वाले दिनों में उनके उजडे घरों में फिर से गृह प्रवेश की शहनाई बजे। चार दिन बाद एक अलसाई सुबह में भीगी वादियों को छोड हम वापस लौट आए। लौटते-लौटते भीगते चिनार ने हमसे वापस आने का वादा लिया। उसके मौन शब्दों ने कहा, देखियेगा, जल्द ही घाटी में गृहप्रवेश की शहनाइयो गजेगी। तुम फिर लौटकर आना सैलानी।
उम्मीद है कश्मीर की अगली यात्रा किसी कश्मीरी पंडित मित्र के गृह प्रवेश के निमंत्रण पर होगी।
ई-३७-ए, शंकर विहार, एयरपोर्ट के सामने, जयपुर-३०२०१७, मो. ९४१४० ६१२१९