fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

अज्ञेय के काव्य का अनुभूति संसार

राजेन्द्र परदेशी
सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय के काव्य का शुभारम्भ प्रणय की टीस, चुभन, कसक और छटपटाहट से हुआ है। इनकी दृष्टि में प्रणय का कोई साट्टानात्मक रूप नहीं है, अपितु वह वासनात्मक रूप को ही अट्टिाक महव देता है। इसीलिए अज्ञेय ने संयोग के क्षणों की उन्माद स्थिति तथा वियोग के क्षणों की तडपन एवं विरह कथा को अत्यन्त कुशलता के साथ अंकित किया है। कवि ने लिखा है - ’... और प्रेम! एक थका-मांदा पक्षी, जो सांझ घिरती देखकर आशंका से भी मरता है और साहस संचित करके लडता भी जा रहा है। निराशा और कुण्ठा से ट्टौर्यपूर्वक लडता हुआ, किन्तु विश्वास की निष्कम्प अवस्था से कुछ नीचे, आज के प्रेम का सर्वोाम सम्भव रूप यही है। अन्ट्टाकार और आलोक का अनुर्मट, ट्टाृति और गति का सामंजस्य, वासना और विरह का संयोग, उदासी और खंडन के बीच में विश्वास का मुक्त स्वर जो सबल कई बार हो उठता है। पर निष्कम्प कभी नहीं हो। इसीलिए कवि ने लिखा -
वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है, वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहनकारी हाला है,
मैंने विद्ग्ट्टा हो जान लिया, अंतिम रहस्य पहचान लिया,
मैंने आहुति बनकर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है।
अज्ञेय का विचार है कि प्रणय के कारण ही संयोग के क्षणों में प्रियतमा की देह कनक चम्पे की कली की तरह स्मरण करते ही सुगन्ट्टा देने लगती है और उसका लावण्य चेतना मोह लेता है -
तुम्हारी देह
मुझको कनक-चम्पे की कली है
दूर ही से
स्मरण में भी गंट्टा देती है
;रूप स्पर्शातीत वह जिसकी सुनाई
कुहासे-सी चेतना को मोह लेद्ध
साथ ही यह प्रणय विरह के आघात से दूना हो जाता है। इसी कारण वह विरह के क्षणों में पुकारता है -
पा न सकने पर तुझे संसार सूना हो गया है। विरह के आघात से प्रिय! प्यार दूना हो गया है।
अज्ञेय की कविताओं में सबसे अट्टिाक एक व्यक्ति निष्ठ कवि का रूप दिखाई देता है, वहो न वह र्‍ान्तिकारी है और न समाज-विधेही, अपितु संसार के आकर्षण में आब= एक व्यक्ति है, जो कभी प्रकृति की रमणीयता में शान्ति का अनुभव करता है, तो कभी समाज की विविट्टा समस्याओं में उलझा हुआ जान पडता है -
मैं कवि ह
ध्ष्टा, उन्मेष्टा
संट्टााता
अर्थवाद
मैं कृतव्यय
अपनी इसी व्यक्तिनिष्ठता के कारण अज्ञेय रात्रि के क्षणों में छिटकती हुई चोदनी में अपने अन्तः स्पंदन को क्षणभर जीने का आग्रह करते हैं -
जो प्रिय रहो साथ
भर-भर तक अेजुरी
पी लो
बरसी
शरद चांदनी
मेरा
अन्तः स्पंदन
तुम भी क्षण-क्षण जी लो।
अज्ञेय ने एक क्षण की अनुभूति को अत्यन्त महत्व दिया है। इसी कारण अन्य प्रयोगवादी कवि भी क्षणानुभूति को अट्टिाक महत्वपूर्ण समझते हैं। अज्ञेय जीवन के प्रत्येक क्षण को अमोघ मानते हैं, अजय समझते हैं और स्वतंत्र एवं स्वच्छंद बताते हैं -
क्षण अमोघ है
इतना मैंने
पहले भी पहचाना है
इसीलिए सांझ को
नश्वरता से नहीं बोट्टाता
कवि की कविताओं में जीवित रहने की इच्छा भी अट्टिाक तीव्रता एवं तीक्ष्णता के साथ व्यक्त हुई है। आज मानव एक ऐसे चर्वाएत में फंसा हुआ है कि उसका जीवन दूभर हो रहा है। वह अगणित समस्याओं के घेरे में आब= है, उसे जीवन की अनेक उलझनों ने अत्यन्त जटिल जाल में फांस लिया है और इसी आकुलावस्था एवं इसी उलझन भरी स्थिति का चित्र अंकित करने के लिए तथा जिजीविषा की ट्टाारणा को अभिव्यक्ति प्रदान करने के लिए ’मछली‘ को प्रतीक बनाया है और ’बना दे चितेरे‘, ’सोन मछली‘ मछलियो, जीवन छाया, टेर रहा सागर‘, आदि कविताओं में इस जिजीविषा की भावना को इस प्रकार व्यक्त करते हैं*-
बना दे, चितेरे
मेरे लिए, एक चित्र बना दे
.............
पहले सागर आंक
.................
सागर आंक कर फिर आंक
एक उछली हुई मछली
.................
पिर अट्टार में
हवा का एक बुलबुला-भर पीने को
उछली हुई मछली
जिसकी मरोडी हुई देह-बल्ली में
उसकी जिजीविषा की उत्कृष्ट आतुरता मुखर है
आर्थिक असमानता एवं विषमताओं ने आज मानव के क्तदय में प्रतियोगिता की भावना जाग्रत की है और दुर्बल एवं असहाय व्यक्तियों के क्तदय में पजीपतियों एवं ट्टानाढ्यों के प्रति ऐसी तीव्र घृणा पैदा की है, जिसे अज्ञेय अपने शब्दों में इस तरह व्यक्त करते हैं -
तुम जो बडे-बडे गड्ढों पर, ेची दुकानों में उन्हें कोसते हो जो भूखे मरते हैं खानों में
तुम, जो रकत चूस ठठरी को देते हो जलदान सुनो तुम्हें ललकार रहा ह, सुनो घृणा का गान
अज्ञेय ने समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता एवं विषमताओं के प्रति आर्‍ोश एवं घृणा ही व्यक्त नहीं की है, अपितु इस असमानता को मिटाने एवं दूर करने के लिए संघर्ष की प्रेरणा भी प्रदान की है तथा इस भयंकर वैषम्य को हटाने के लिए ’अग्निट्टार्म‘ मानने के लिए प्रेरित किया है, ध्ष्टव्य है -
हमने न्याय नहीं पाया है,
हम ज्वाला से न्याय करेंगे।
ट्टार्म हमारा नष्ट हो गया,
अग्नि ट्टार्म हम क्तदय ट्टारेंगे।
यह अग्निट्टार्म और कुछ नहीं, सामाजिक र्‍ान्ति का आह्वान है। जन-आंदोलन को प्रेरणा है और उन कामगारों, मजदूरों एवं श्रमजीवियों को जाग्रत करने वाला ट्टार्म है, जो रात-दिन अपने शरीर का होम करके भरपेट भोजन नहीं पाते, जो गरीबी का शिकार बने हुए हैं, जिनको श्रम का मूल्य पूरा-पूरा नहीं मिलता, जिनकी कमाई पर ट्टानिक लोग गुलछर्रे उडा रहे हैं और जिनका रक्त चूस-चूस कर समाज के ठेकेदार कोठियों एवं हवेलियों में शान के साथ विलास-र्याक करते रहते हैं। इसीलिए अज्ञेय का कवि इस विषमता के अंट्टाकार को मिटाकर समानता का आलोक प्राप्त करने के लिए बेचैन है, ध्ष्टव्य है -
कवि एक बार फिर गा दो
एक बार इस अंट्टाकार में फिर आलोक दिखा दो
अज्ञेय जहो सामाजिक जीवन में व्याप्त कुण्ठा, निराशा, बेबसी, घुटन, विषमता आदि के गीत गाते हैं, वहो नूतन सौंदर्य-बोट्टा को भी अभिव्यक्ति प्रदान की है। वह परम्परावादी नहीं है। वह नवीनता के पुजारी हैं। इसी कारण सौंदर्य-चित्रण की प्राचीन प=ति, पुरातन शैली, परम्परागत प्रणाली आदि अच्छी नहीं लगती। पुराने उपमान मैले दिखाई देते हैं, पुराने प्रतीक निर्जीव जान पडते हैं और पुरानी प=ति व्यर्थ एवं निस्सार प्रतीत होती है। वह जब अपनी प्रेयसी के रूप-सौंदर्य की झोकी अंकित करना चाहते हैं, तब वह कह उठते हैं -
अगर मैं तुमको
लजाती सांझ के नभ की अकेली तारिका अब नहीं कहता,
या शरद के भोर की नीहार-न्हाई कुई
टटकी कली चम्पे की
वगैरह, तो
नहीं, कारण कि मेरा क्तदय उथला या कि सुना है या कि मेरा प्यार मैला है
बल्कि केवल यही
ये उपमान मैले हो गये हैं
देवता इन प्रतीकों के कर गये हैं कूच।
इसीलिए कवि जब सौंदर्य का चित्र अंकित करना चाहता है, तब वह प्राचीन उपमानों पुराने प्रतीकों एवं पुरानी प=ति का प्रयोग नहीं करता, अपितु एकदम नवीन प=ति को अपनाता हुआ सौंदर्य-चित्र इस प्रकार अंकित करता है -
तुम्हारे नैन
पहले भोर की दो ओस-बूंदे हैं
अछूती, ज्योतिमय
भीतर धिवत
;मानो विट्टााता के क्तदय में
जग गई हो भाप करुणा की अपरिमितद्ध
तुम्हारे ओठ
पर उस दहकते दाडम-पुहुप को
मूक तकता रह सक मैं -
;सह सक मैं ताप ष्मिा का,
मुझे जो लील लेती हैद्ध
अज्ञेय ने जहो मानव-जीवन के बारे में चिंतन-मनन करते हुए आट्टाुनिक जीवन में व्याप्त विषमता, कुंठा, निराशा, क्षोभ, जिजीविषा आदि का चित्रण किया है। वहो आत्मा एवं परमात्मा के बारे में चिंतन-मनन करते हुए आत्मा को परिणीता वट्टाू एवं परमात्मा को महाशून्य के रूप में स्वीकार किया है। महाशून्य को महामौन, अविभाज्य, अनाप्त, अधिवत, अप्रमेय एवं शब्दहीन माना है, मगर फिर भी वह सब कुछ गाने वाला है। अंट्टाकार में ज्योति जगाने वाला है, करुणा- ट्टााम होने के कारण सभी प्राणियों पर करुणा करता है। वह अरूप होकर भी संसार के सभी रूपों में खिलता है। अगोचर होकर भी संसार के पदाथोङ में गोचर होता है, अनुभव में अतीन्ध्यि है और पुरुषों के हर वैभव में ओझल अपौरुषेय है -
रूपों में एक अरूप सदा खिलता है
गोचर में एक अगोचर, अप्रमेय
अनुभव में एक अतीन्ध्यि
पुरुषों के हर वैभव में ओझल
अपौरुषेय मिलता है।
कवि अज्ञेय को प्रकृति-सुन्दरी से अगाट्टा प्रेम एवं अनन्य आस्था है। उन्हें प्रकृति के अन्तर्गत एक चेतना का आभास मिला है। जिसके कारण उसे कभी सागर मथियाता जान पडता है। पवन तरंग की पंखयुक्त वीणा पर उमग से गाती हुई जान पडती है तथा सागर का किनारा झूमता हुआ एवं डगमगाता जान पडता है। कवि ने प्रकृति के साथ तादात्म्य भी किया है। वह सोते के साथ बहता पसन्द करता है। पक्षिय के साथ गाना पसन्द करता है। वृक्षों और कोपलों के साथ थरथराना पसन्द करता है। कवि प्रकृति के साथ गलकर नया जीवन और नये प्राण पाता है -
मैं सोते के साथ बहता ह
पक्षी के साथ गाता ह
वृक्षों के, कोपलों के साथ थरथराता ह
झरे पाों के साथ गलता और जीर्ण होता रहता ह नये प्राण पाता ह।
अज्ञेय ने प्रकृति के अनिद्य सौंदर्य की रमणीय झोकियो भी अंकित की है। प्रकृति से प्रेरणा ली है और उसे सचेत एवं सावट्टाान करने वाली दैवी शक्ति के रूप में भी देखा है -
जागो, जागो
जागो, सखि, वसन्त आ गया, जागो
पीपल की सूखी खाल स्निग्ट्टा हो चली
सिरिस ने रेशम से बेणी बांट्टा ली
नीम के भी बौर में मिठास देख
हेस उठी कचनार की कली
टेसुओं की आरती सजा के
बन गई वट्टाू वनस्थली
अज्ञेय का क्तदय अपने देश के कण-कण में रमा हुआ है। उसे यहो की डगर-डगर से प्यार है। गोव-गोव में उसकी भावना रम रही है। शहर-शहर में उसके विचार मंडरा रहे हैं और झोपडी से लेकर हवेली तक वह अपने देश से परिचित हैं। वह जानते हैं कि यहो किस तरह छप्पर के नीचे दुबले-पतले लोग सिकुडकर अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं और वह यह भी जानते हैं कि किस तरह विषैली वासना के सांप का जहर मोटे-मोटे पजीपतियों की रग-रग में फैल रहा है जिसके फलस्वरूप वे हवेली में नहीं समाते और इट्टार-उट्टार टांग फैलाते हैं। कवि इसी स्वदेशानुराग से प्रेरित हो कटु व्यंग्य करता है -
इन्हीं तृण-फूस छप्पर से
टंके ढुलमुल गेवारू
झोपडों में ही हमारा देश बसता है
इन्हीं के ढोल-मादल बांसुरी के
उमगते सुर से
हमारी साट्टाना का रस सरसता है।
इन्हीं के मर्म को अनजान
शहरों की ढंकी लोलुप
विषैली वासना का सोप डसता है
इन्हीं में लहरती अल्हड
अयानी संस्कृति की दुर्दशा पर
सभ्यता का भूत हेसता है।
अतः अज्ञेय की भावानुभूति का अनुशीलन करने से स्पष्ट होता है कि वे प्रणयानुभूति से लेकर स्वदेशानुराग तक विविट्टा आयामों से गुजरे हैं, परन्तु उनकी भावानुभूति मुख्यतः आत्मोन्मुख है। जनजीवन से उन्हें विशेष प्यार है, किन्तु आत्मान्वेषण एवं आत्मानुभूति की ओर उनका विशेष झुकाव है। वे आंतरिक एकान्त से निकल कर प्रकृति के विराट क्षेत्र में विचरण करते नजर आते हैं तथा सर्वव्यापी चिरंतन, सम्पूर्ण रूपों में व्याप्त अरूप, अनाम, अगोचर एवं महाशून्य रूपी साा की ओर उन्मुख है - बौ= ट्टार्म से प्रभावित होने के कारण उनमें करुणा, मैत्री, मानवता, प्रेम आदि के साथ-साथ समर्पण की भावना का आट्टिाक्य होता चला गया है।
४४-शिव विहार, फरीदीनगर, लखन-२२६०१५ मो. ९४१५० ४५५८४