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कविता की अर्थ-निर्णय-प्रक्रिया का भाषिक पक्ष

गजानन चव्हाण
कविता के अर्थ के संदर्भ में कई प्रश्न उपस्थित होते हैं। जैसे - कविता के अर्थ की उपयोगिता कहो तक होती हैऋ कवि के तात्पर्य/आशय तक पहचने में अर्थ कहो तक सहायक होता है, कविता को अर्थ की दृष्टि से बहुस्तरीय बनाने की दिशा में कवि किन उपकरणों का प्रयोग करता है, अर्थ-स्तर-भेद से कविता की कौन-सी कोटियो होती हैं, कविता के अर्थ-निर्णय में कौन-सी कठिनाइयो आती हैं, अर्थ-निर्णय-प्रर्याे के कौन-से चरण हो सकते हैं? क्या कवि के आशय/तात्पर्य की प्रामाणिकता संभव है? अगर सम्भव है तो वह किस प्रकार की कविता के संदर्भ मेंऋ क्या स्वयं कवि भी आशय के संदर्भ में अनिश्चय की स्थिति में होता है, इस अनिश्चय की स्थिति का कौन-सा कारण है, कवि की अनुभूति का जटिल रूप या कवि की भाषा-प्रयोग विषयक सीमा? इन प्रश्नों से जुडे पक्षों में से भाषिक पक्ष के कुछ बिन्दुओं को उठाना इस आलेख का उड्ढेश्य है।
कविता में कवि का कोई न कोई आशय, कोई न कोई तात्पर्य निहित रहता है। कवि के आशय तक पहचने के लिए कविता का अर्थबोट्टा जरूरी हो जाता है। अर्थबोट्टा की दृष्टि से सभी कविताऐ एक ही कोटि में नहीं रखी जा सकतीं। उड्ढेश्य तथा उपकरण भेद से कविताऐ भिन्न-भिन्न कोटि की हो जाती हैं। कुछ अपवाद छोड दें तो परिवर्तन, सुट्टाार, जागरण के उड्ढेश्य से अथवा यथार्थ का बोट्टा कराने के उड्ढेश्य से कवि-कर्म में लगे हुए कवि अपने आशय को सीट्टो-सीट्टो कह देने में विश्वास करते हैं। जीवन के किसी पक्ष, घटना, प्रसंग, व्यक्ति, उसके कर्म या ट्टाारणा के सम्बन्ट्टा में उनकी जो भी प्रतिर्याे है, वह सब की सब वे अपनी ओर से कह देते हैं। ऐसी कविताऐ कवि के आशय को समझने के संदर्भ में पाठकों के लिए बने बनाये ;रेडीमेडद्ध माट्टयम हुआ करती हैं। पाठकों को अर्थापन हेतु अपनी ओर से कुछ भी प्रयास नहीं करना पडता। उदाहरणार्थ कवि विश्वनाथ प्रसाद मिश्र जब अपनी ’तंत्र और जन‘ शीर्षक कविता में कहते हैं कि -
एक लाश पर ढही हुई औरत
बिलखती है
सिसकते बच्चे
एक भीड चिल्लाती है
और खामोश हो जाती है
तंत्र की बहबूदी के लिए
शहीद हुआ है एक जन
तो उनका आशय स्पष्ट हो जाता है कि वे भारतीय जनतंत्र में पनप रहे जनविरोट्टाी तवों के फलस्वरूप जनता की हुई छिछालेदर को सामने रखना चाहते हैं।
इस कोटि की अट्टिाकांश कविता में भाषा के स्थूल उपकरणों का प्रयोग किया हुआ मिलता है। कभी शब्दों का अच्छा संयोजन कर, कभी तुक मिलाकर, कभी असंगति से निहित संगति को दर्शाकर कवि अपने कथन को सूक्तिमय, लयब= तथा आकर्षक बनाता है। अर्थापन की दृष्टि से ये प्रयोग किसी प्रकार की कठिनाई नहीं पैदा करते। कवि का आशय सहज ही समझ में आता है। कुछ उदाहरण देखे जा सकते हैं -
१. जब तुम बच्ची थी तो मैं तुम्हें
रोते हुए देख नहीं सकता था
अब तुम रोती हो तो देखता ह मैं।
;उम्र - रघुवीर सहायद्ध
२. एक दिन घर लौटा
हाथ में किताब थी
और फूलगोभी भी
वाह, कविता मिली
आजकल किताब फूलगोभी सी नरम है
और फूलगोभी है आजकल की किताब सी नीरस ;व्यावहारिक लोग - रघुवीर सहायद्ध
३. भीतर कवि थे
बाहर कविता
भीतर कवि थे
आत्ममुग्ट्टा गुट-गठित सुरक्षित-
बातें थीं बातों में जन थे
बाकी जो था सब निर्जन था
उस अनुकूलित सभागार में
नपा-तुला उनका यथार्थ था
गद्य गद्य था पृथुल पद्य था
भीतर कवि थे
बाहर कविता।
;भीतर कवि थे - दिनेश कुमार शुक्लद्ध
यहो ’आत्ममुग्ट्टा, गुट-गठित, सुरक्षित, नपा-तुला उनका यथार्थ‘ आदि अभिव्यक्तियो कविता में प्रतिबिम्बित कवि व्यक्तित्व और प्रत्यक्ष आचरण में प्रकट होने वाले कवि व्यक्तित्व के अंतर को स्पष्ट करती हैं।
४. समझौते
कभी
बुरे नहीं होते।
लेकिन
जब
समझौतों की संभावनाओं पर ही
प्रश्न चिह्न
ओके जाते हैं
तब जिंदगी
दहशत भरा बियाबो
बन जाती है।
;जख्मों के हाशिए - पद्मजा घोरपडेद्ध
यहो पर जिंदगी में दहशत के छाने के कारण का स्पष्ट-स्पष्ट बोट्टा कराया गया है।
५. मेरा एक क्तदय है
प्यार करने वाला
महसूस लेता ह जिसे
मेरा एक मस्तिष्क है
सोच-विचार करने वाला
टटोल लेता ह जिसे
मेरी एक स्वतंत्रता है
राजनीति की दी हुई
जिसे छूने की चाह लिए
छू नहीं पाता। ;स्वतंत्रता मेरी - कैक्टस के दोत - अभिमन्यु अनतद्ध
इन कविताओं में प्रयुक्त शब्दों की ओर जरा-सा भी ट्टयान दिया जाए तो हम समझ सकते हैं कि ये शब्द अपने नियत अर्थ से ही ;शाब्दिक अर्थ - स्पजमतंस उमंदपदहद्ध कवि द्वारा नियत प्रसंग के आट्टाार पर हमें कवि के नियत आशय तक पहचाते हैं। इस प्रकार की, निश्चित अर्थवाले शब्दों से युक्त कविताओं के संदर्भ में कहा जा सकता है कि इनके अर्थ और आशय में अभिन्नता होती है, अतः भिन्न अर्थ या नए अर्थ की खोज की आवश्यकता ही नहीं होती। वैसी गुंजाइश भी नहीं होती। लेकिन ऐसा तो नहीं है कि सबकी सब कविताऐ सब कुछ ’कहने‘ में अर्थात् ैजंजम करने में विश्वास करती हों। बहुत-सी कविताओं में कवि अपने आशय को, जिसमें उनका अनुभूत सत्य होता है, सम्प्रेषित ;ब्वदअमलद्ध करना चाहते हैं। ये कविताऐ उड्ढेश्य में भिन्न होने के कारण उपकरणों के प्रयोग में या भाषा प्रयोग की दृष्टि से भी भिन्न हो जाती हैं। ये स्थूल आशय को नहीं, सूक्ष्म, जटिल, अमूर्त भावनाओं को सम्प्रेषित करती हैं। इस प्रयोजन को साट्टाने के लिए कवि भाषा के सूक्ष्म उपकरणों का प्रयोग करता है। प्रतीकात्मक शब्द ऐसा ही एक उपकरण है। शब्द सामान्य हो ;उदाहरण - चेहरा, आकाश, बादलद्ध या संदर्भयुक्त ;उदाहरण - धैपदी, चर्व्यूहह, एकलव्यद्ध, कवि उनके रूढ अर्थ को तोडता है। उनका सम्पूर्ण अर्थ में नहीं आंशिक अर्थ में प्रयोग करता है। सामान्य और संदर्भयुक्त ;इलूजनद्ध शब्दों का आंशिक अर्थ में प्रयोग या अपने से इतर समान वस्तु के लिए प्रयोग ही प्रतीक कहलाता है। प्रतीक में शब्द के रूढ अर्थ का पूर्णतः त्याग नहीं होता। रूढ अर्थ में से बहुत कुछ को छोडकर कवि अपने लिए वांछित अर्थ में उसका प्रयोग करता है। यह वांछित अर्थ रूढ अर्थ से किसी न किसी रूप में जुडा हुआ होता है।
कवि शब्द को सम्बन्ट्टिात व्यक्ति या वस्तु से अलग कर उस व्यक्ति, वस्तु, स्थिति या भाव के साथ उसे संलग्न करता है, जो वृा-प्रवृायों अथवा किसी विशेषताओं के संदर्भ में मूल के साथ किसी मात्रा में समानता रखता हो। उदाहरणार्थ बादल मेडराते हैंऋ उमडते-घुमडते हैं, आसमान को घेरते हैं, पानी देते हैं, संकटों द्वरारा किसी के घिर जाने की स्थिति बादलों की स्थिति एवं हलचल से साम्य रखती है। अतः कवि ’बादल‘ शब्द का प्रयोग मनुष्य के गिर्द घिरे संकटों के अर्थ में करते हुए दिखाई देते हैं। छायावादी और नई कविता ही नहीं, समकालीन कविता में भी ऐसे सैकडों प्रतीक भरे पडे हैं। जीवन की विविट्टा स्थितियों का सूक्ष्म ज्ञान रखने वाला, काव्यानुशीलनकर्ता पाठक-वर्ग ही कविता के प्रतीकार्थ तक पहचता है। यह प्रर्याक कठिन नहीं होती, पर इतनी सरल भी नहीं कि कभी-कभार काव्य से सम्फ करने वाला हर कोई उसे आत्मसात कर ले। इस प्रर्याय को समझने के लिए अभिमन्यु अनत की एक छोटी-सी कविता को उदाहरण स्वरूप लिया जा सकता है। कविता का शीर्षक है, ’कोच का टुकडा‘ -
खेतों में काम करते वक्त
कोच का जो टुकडा
मेरे तलवे को लहूलुहान कर गया था
वह आज तुम्हारे अजायबघर में
मखमली रूमाल पर
नगीने के रूप में सुरक्षित है।
इस कविता के दो अर्थस्तर हैं। सभी शब्दों का रूढ अर्थ ग्रहण करने से यह कविता मजदूर का एक सीट्टाा कथन लगती है। दूसरे स्तर पर कोच का टुकडा मात्र वस्तु नहीं रह जाता। ’लहूलुहान तलवे‘ की संगति में वह ’अहितकर तव‘ का प्रतीक बन जाता है। नगीने के रूप में उसका सुरक्षित रखा जाना अहितकारी तव के साथ आत्मीय सम्बन्ट्टा जोडने, उसको सहलाने, उसकी हिफाजत करने की मानसिकता का प्रतीक बन जाता है। ’अजायबघर‘, ’मखमली रूमाल‘, ’नगीना‘ आदि शब्द ’तुम‘ को सामान्य सर्वनाम के अर्थ में नहीं पजीवादी वर्ग को प्रतीक के अर्थ में ग्रहण करने के लिए सहायक सि= हुए हैं। स्पष्ट है कि इस विशिष्ट मानसिकता को सम्प्रेषित करना कवि का उड्ढेश्य है। सूक्ष्म दृष्टि रखने वाला पाठक मनुष्य के कमोङ, प्रकृति के अंगों तथा हलचलों से जुडी हुई प्रमुख प्रवृायों को ही नहीं गौण प्रवृायों को भी लक्षित करता रहता है। वृा-प्रवृायों के साम्य के आट्टाार पर दो व्यक्तियों को निकट पाता है, दो वस्तुओं को नजदीक देखता है। इसलिए सामान्य और संदर्भयुक्त शब्दों का प्रतीकार्थ समझना उसके लिए कठिन नहीं होता।
संदर्भयुक्त शब्द किसी भाषा के उन शब्दों को कहते हैं जिनका अपना भूतकालीन संदर्भ होता है। उनके साथ एक पूरा प्रसंग जुडा हुआ होता है। ऐसे संदर्भयुक्त शब्दों का भी प्रतीकार्थ में प्रयोग किया जाता है। इन कविताओं के अर्थ निर्णय की प्रर्याी क्या होगी? विश्लेषण के लिए एक कविता ली जा सकती है। कविता का कोई शीर्षक नहीं। कविता इस प्रकार है*-
मैं अब तक
जान नहीं पाई
कि वह कौन-सा मोड था
जब जिंदगी
चर्व्यूगह बन गई
और, मैं अभिमन्यु।
;जख्मों के हाशिए - पद्मजा घोरपडे द्ध
’चर्व्यूकह‘ और ’अभिमन्यु‘ संदर्भयुक्त शब्द है। ’चर्व्यूसह‘ महाभारत के यु= की विशिष्ट सैन्य रचना का नाम है। अर्जुन के पुत्र ने गर्भ में उसके अन्तर्गत प्रवेश की विट्टिा तो सुन ली थी, उसमें से बाहर निकलने की नहीं। परिणामतः वह कौरव-सेना में फेस गया और उसी में उसका वट्टा किया गया। ’चर्व्यूतह‘ और ’अभिमन्यु‘ का यह पूरा संदर्भ है। कवयित्री ने अपनी स्थिति को इस पूर्वकथित स्थिति के समान पाया। ’चर्व्यूमह‘ शब्द के अन्य सभी संदर्भ छोडकर संकटों द्वारा, विरोट्टाी ताकतों द्वारा घेरे जाने और उसकी त्रासद स्थितियों के ताप को सहने के आंशिक अर्थ में उसका प्रयोग किया। धेणाचार्य, एकलव्य, अहल्या, धैपदी, वस्त्रहरण, समुध्मंथन, हलाहल, शिवट्टानुष, आदि दर्जनों संदर्भयुक्त शब्द हैं। इनके समग्र संदभोङ का ज्ञान रखने वाला पाठक वर्तमान कविता में प्रयुक्त इनके प्रतीकार्थ को सहज ही समझ सकता है।
समकालीन कविता में पूर्वकालीन साहित्य कृतियों, उनके रचयिताओं, कृतियों के प्रमुख पात्रों के नामों से संदर्भयुक्त शब्द बनाए गए हैं और उनका प्रतीक के अर्थ में प्रयोग होने लगा है। ’गोदान‘, ’होरी‘, ’होरी की गाय‘, ’ट्टानिया‘, ’हामिद का चिमटा‘, ’कबीर‘, ’निराला‘, ’तुलसी‘ जैसे शब्द अब प्रवृायों के प्रतीक बन गए हैं। बिल्कुल इट्टार की घटनाओं का और तत्संबंट्टाी शब्दों का कविता में प्रतीक के रूप में प्रयोग होने लगा है। कुमारेन्ध् पारसनाथ सिंह की कविताऐ ’चवरी‘, ’गोव‘ इस संदर्भ में देखी जा सकती है - ’गोव‘ की पंक्तियो हैं -
..... यह गोव
इस कोने से उस कोने तक ट्टाह-ट्टाह जलता रहता है जलता रहता है।
कि कहीं चंदना-रूपसपुर जलता है,
कहीं चवरी जलता है, कहीं मट्टाुबन जलता है,
कहीं बेलछी और पिपरा जलता है,
और आसमान जब कभी बरसता है,
सिर्फ पेटत्रेल छिडकता है -
आग जहो नहीं लगी रहती वहो भी
ट्टाट्टाक उठती है।
स्पष्ट है कि चंदना, रूपसपुर, चवरी, मट्टाुबन, बेलछी, पिपरा - सबके सब गोवों के नाम हैं। इनके साथ विशिष्ट संदर्भ जुडे हुए हैं। बिना उन संदभोङ को जाने-समझे कविता का खुलना मुश्किल है। प्रतीक के अर्थ में प्रयुक्त सामान्य शब्द हों या संदर्भयुक्त शब्द, उनके अर्थ के सम्बन्ट्टा में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि शब्दों का प्रतीकार्थ द्योतित कराने के प्रयोजन से कवि कुछ शब्दों की योजना करता है। ऐसे शब्दों की कुंजी से प्रतीकार्थ आसानी से खोला जा सकता है।
हिन्दी काव्य-क्षेत्र में प्रतीक-प्रयोगसंबंट्टाी एक महवपूर्ण स्थित्यंतर हुआ। उसने अर्थनिर्णय की प्रर्‍या में दूर तक बाट्टाा डाली है। अज्ञेय की इस घोषणा के बाद कि ’ये उपमान मैले हो गए हैं, देवता इन प्रतीकों के कर गए हैं कूच‘ कविता में नए प्रतीकों का प्रयोग होने लगा। ये नए प्रतीक नितांत वैयक्तिक अर्थ में प्रयुक्त होने लगे। स्वयं अज्ञेय की कविता में यह प्रवृा बडी संख्या में लक्षित होती है।
अज्ञेय की प्रसि= कविता ’यह दीप अकेला‘ की पंक्तियो प्रमाणस्वरूप प्रस्तुत की जा सकती हैं -
यह दीप अकेला स्नेहभरा
है गर्वभरा मदमाता, पर
इसको भी पंक्ति को दे दो।
यहो ’दीप‘ शब्द मात्र दीपक के अर्थ में लेने से कविता का अर्थ नहीं खुलता। इसमें आए हुए विशेषण ’गर्वभरा‘, ’मदमाता‘ हमारी सहायता करते हैं। दीप की अपनी कुछ विशेषताऐ, कुछ ट्टार्म होते हैं। वह खुद जलता है, दूसरों को प्रकाश देता है। उसमें चमक होती है, तेज होता है, ताप भी होता है। तेल उसको जिार् देता है। कविता में वर्णित ’दीप‘ में भरपूर तेल ;स्नेहद्ध है। वह सबसे अलग ;अकेलाद्ध है। इस वर्णन के साथ कवि ने ’गर्वभरा‘ और ’मदमाता‘ दो विशेषण और जोडे हैं। ये दोनों विशेषण मनुष्य के लिए प्रयुक्त होते हैं। मनुष्य ही गर्वभरा और मदमाता होता है। इस बिन्दु पर आकर हमारा मन संभवनीयता पर विचार करने लगता है। सोचने लगता है कि शायद ’दीप‘ शब्द यहो प्रचलित अर्थ में प्रयुक्त नहीं है। सोचने लगता है कि उसकी कथित और अकथित दोनों प्रकार की विशेषताऐ मनुष्य पर ही घटित हो सकती हैं। इन विशेषताओं के आट्टिाक्य पर मनुष्य गर्व करता है, मदमाता भी है। इस प्रकार ’दीप‘ शब्द के प्रतीकार्थ की संभावना विकसित होती है। ’दीप‘ को हम अद्वितीय व्यक्ति के रूप में ग्रहण करते हैं। आगे पूरी कविता में विभिन्न प्रतीकों को, उनकी असाट्टाारणताओं के साथ संयोजित कर कवि ने अपने आशय को सम्प्रेषित किया है। कविता के शब्द ’पर इसको भी पंक्ति को दे दो‘ कवि के संभवनीय आशय तक पहचाने में बहुत ही सहायक बन गए हैं। ’अकेला, स्नेहभरा‘ के तुरन्त बाद ’पर इसको भी पंक्ति को दे दो‘ के दोहराव से हमारा ट्टयान ’पंक्ति‘ शब्द पर चला जाता है। ’पंक्ति‘ एकाट्टिाक से ही बन सकती है। इसी आट्टाार पर हम ’पंक्ति‘ को ’समष्टि‘ के प्रतीक के रूप में ग्रहण करते हैं और कवि के इस संभवनीय आशय तक पहचते हैं कि अद्वितीय व्यक्ति के जीवन की सार्थकता उसके समाज से जुडे रहने में ;वस्तुतः समाजोपयोगी होने मेंद्ध निहित है।
उक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि कवि प्रयोजन के अनुसार भाषा के उपकरणों का प्रयोग करता है। स्थूल अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए मुख्यार्थबोट्टाक शब्दों का प्रयोग, सूक्ष्म एवं जटिल अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए विविट्टा अर्थछाटाओं की संभावनाओं से युक्त प्रतीकात्मक शब्दों का प्रयोग और नूतन संवेदनाओं के लिए वैयक्तिक प्रतीकात्मक शब्दों का प्रयोग कर कवियों ने काव्य को भाषा के स्तर पर वैविट्टयपूर्ण बनाया है। यह तथ्य निश्चय ही कविता में अपेक्षित सर्जनात्मकता को बनाए रखने में भाषा-प्रयोग के महव को अट्टाोरेखित करता है।
३, नताशा, डी.पी. रोड, औंट्टा, पुणे-४११०६७,
मो. ९८८१७ १०९५५