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साहित्य बनाम लोक साहित्य

श्रीभगवान सिंह
हमारे यहो पहले काव्य की चर्चा होती रही, फिर ९२० ई. के बाद राजशेखर के ’काव्यमीमांसा‘ से ’काव्य‘ की जगह पर ’साहित्य‘ की अवट्टाारणा ज्यादा प्रचार-प्रसार पाती गई। फिर भी काव्य हो या साहित्य या ’काव्यशास्त्र‘ हो या ’साहित्यशास्त्र‘, इसके अन्तर्गत साहित्य के रूप-पक्ष, वस्तु-पक्ष, गुण-दोष आदि समस्त काव्यांगों का विषद विवेचन होता रहा। लेकिन बीसवीं शताब्दी में ’लोक साहित्य‘ की एक ऐसी अवट्टाारणा चल पडी जिसके फलस्वरूपव यह एक आम ट्टाारणा लोगों के मन में घर करती गई कि जो नागर जीवन से दूर, ग्राम्य जीवन या प्रकृत जीवन के नाना पक्षों से सम्ब= हो, वह ’लोक साहित्य‘ है और जो इससे पृथक होकर केवल विशिष्ट, शिक्षित या नागर जीवन से सम्ब= हो, वह ’साहित्य‘ है। इसका नतीजा यह हुआ कि ’लोक साहित्य‘ को ’साहित्य‘ के बरक्स देखते हुए उसे अट्टिाक जन व्यापक माना जाने लगा। हिन्दी आलोचना ने तो शास्त्र बनाम लोक की चर्चा चलाकर इसे और पुष्ट किया जिसके फलस्वरूप कबीर जैसे कवि को लोक सापेक्ष सि= कर उनका कद ेचा किया जाने लगा, तो तुलसी को शास्त्र सापेक्ष सि= कर उनका कद छोटा किया जाने लगा, किन्तु ऐसी अवट्टाारणा का प्रचलन न केवल दुर्भाग्यपूर्ण था, बल्कि वह भारतीय काव्यशास्त्रीय चिंतन परम्परा के सर्वथा विपरीत भी था और है। यह कहने में तनिक असंगति है। सचमुच देखा जाए तो भरत मुनि के नाट्यशास्त्र से लेकर भामह, वामन, कुंतक, अभिनव गुप्त, मम्मट आदि तक काव्य या साहित्य को देखने-समझने की जो चिंतन परम्परा रही है, लोक साहित्य उसका अतिर्मनण कर साहित्य के क्षेत्र में भी एक नया ’पाकिस्तान‘ स्थापित करने वाला रहा है, जिसने साहित्य की समग्रता, व्यापकता में दो फांक पैदा कर दिये। इसे समझने के लिए विस्तार में न सही, संक्षेप में भी भारतीय साहित्य शास्त्र की चिंतन-परम्परा का अवलोकन अपेक्षित है।
उल्लेखनीय है और स्मरणीय भी कि भरत मुनि का जो ’नाट्यशास्त्र‘ भारतीय काव्यशास्त्र या साहित्यशास्त्र का आदिग्रंथ माना जाता है, उसमें नाट्य कर्म के केन्ध् में लोक को रखकर ही विवेचन किया गया। भरतमुनि द्वारा नाट्यवेद की उत्पा के सम्बन्ट्टा में इस किंवदन्ती का उल्लेख ध्ष्टव्य है - ’’यह नाट्यवेद भरतमुनि को ब्र॰ा जी ने प्रदान किया। जब भरत ने नाट्य का प्रयोग किया तब दानवों ने उसका प्रतिरोट्टा किया, क्योंकि उसकी कथावस्तु का आशय था कि देवताओं ने दानवों पर विजय प्राप्त की। दानवों ने जब ब्र॰ा जी से यह शिकायत की कि आपको दोनों पर समान दृष्टि रखनी चाहिए, तब ब्र॰ा जी ने उार दिया कि ’दैत्यों, तुम्हें र्‍ोट्टा भी नहीं करना चाहिए और विषाद भी नहीं करना चाहिए। नाट्यवेद मैंने किस प्रकार निर्माण किया, इस पर ट्टयान दो‘‘ -
भवतां देवतानां च शुभाशुभ-विकल्यकैः।
कर्मभावान्वयापेक्षी नाट्यवेदो मया कृतः।।
नैकान्ततो*त्र भवतां देवानां चा*पि भावनम्।
त्रैलोक्यस्यास्य सर्वस्य नाटयं भावानुकीर्तनम्।।
क्वचिद् ट्टार्मः क्वचित र्‍ीडा क्वचिदर्थः क्वचित् शमः।
क्वचिद् हास्यं, क्वचिद् यु=ं,
क्वचिद् कामः, क्वचिद् वट्टाः।।
ट्टार्मो ट्टार्मप्रवृाानां कामः कामार्थसेविनाम्।
निग्रहो दुर्विनीतानां माानां दमनर्याः।।
नाना भावोपसंपन्नं नाना*वस्थान्तरात्मकम्।
लोकवृाानुकरणं नाट्यमेतन्मया कृतम्।।
’’दैत्यो, यह नाट्यवेद जिसमें तुम्हारे एवं देवताओं के शुभ तथा अशुभ कर्मफल दर्शाये हैं, तुम्हारे ही कर्म, भाव एवं अन्वय के अनुसार मैंने निर्माण किया है। इसमें तुम्हारा या देवों का एकान्ततः या तत्वतः भाव नहीं है। नाट्य में सम्पूर्ण त्रैलोक्य के भावों का अनुकीर्तन होता है। अतएव, इसमें कहीं ट्टार्म देखने को मिलेगा तो कहीं र्‍ीडा, कहीं अर्थ होगा तो कहीं शम। ट्टार्म में प्रवृत लोग का ट्टार्म, काम सेवियों का काम, दुर्विनीत लोगों का निग्रह, माों का दमन-इस प्रकार त्रैलोक्य में जिसका जिस प्रकार का वृा देखा जाता है, वैसा ही नाट्य में प्रस्तुत किया जाता है। अनेक प्रकार के भावों से सम्पन्न एवं नाना अवस्थाओं से युक्त लोकवृाानुकरण नाट्य में मिलेगा। अतएव -
यो*यं स्वभावो लोकस्य सुखदुःखसमन्वितः।
सो**ाद्यभिनयोपेतः नाट्यमित्यभिट्टाीयते।।
अर्थात् इस संसार में लोकस्वभाव सुख एवं दुख से अन्वित पाया जाता है और वह जब अंग आदि अभिनयों से उपेत अर्थात् अभिसंर्‍ान्त होता है, तब उसे नाट्य कहते हैं।‘‘ ;भारतीय साहित्य शास्त्र, लेखक, गणेश *यंबक देशपांडे, पृ. २९ से उद्ट्टाृत, प्र. राजपाल एंड संज, दिल्ली, संस्करण १९५८द्ध
भरतमुनि द्वारा ब्र॰ा जी के हवाले नाट्यवेद की उत्पा के सम्बन्ट्टा में दी गई किंवदन्ती की व्याख्या करते हुए गणेश *यंबक देशपांडे कहते हैं - ’’नाट्य तो देवताओं का महव भी नहीं बढाता है और दैत्यों का अविक्षेप भी नहीं करता। त्रैलोक्य में जो लोकचरित देखा जाता है उसी का वह अनुकरण ;अनुव्यवसायद्ध है। नाट्य में अनेक प्रकार के भाव तथा अनेक प्रकार की अवस्थाऐ अंकित की जाती हैं। ये भाव तथा ये अवस्थाऐ लोक में जिस प्रकार प्रसि= हैं, उसी रूप में नाट्य में दर्शायी जाती है। लोक में प्रसि= अवस्था दर्शाने के लिए व्यक्ति केवल प्रतीक रूप में लिये जाते हैं, क्योंकि बिना प्रतीक के लोकजीवन के भाव एवं अवस्थाऐ अभिव्यक्त ही नहीं हो सकती। ’नाट्य‘ व्यक्ति की अनुकृति न होकर अवस्था की अनुकृति है। इसी हेतु नाट्य को अनुव्यवसाय कहा गया है। व्यक्ति के द्वारा प्रतीत होने पर भी नाट्यगत अवस्थाओं की प्रतीति व्यक्ति से निरपेक्ष होनी चाहिए। ऐसी व्यक्ति से निरपेक्ष अवस्थाओं का ही काव्य में आस्वादन होता है। जो यह नहीं कर पाता वह काव्य या नाटक का रसिक नहीं हो सकता। ; वही, पृ. ३१द्ध
गौर करने की बात है कि देशपांडे ने नाटक के साथ काव्य को भी शामिल कर उसके लोकाश्रित स्वभाव को चिहि्नत कर दिया है। अर्थात् नाटक या काव्य शुरू से ही लोकचरित या लोकस्वभाव को अपने केन्ध् में रखकर चला है। नाटक या काव्य में उभरने वाले सौंदर्य व्यापार को लोक सापेक्ष ही माना गया। भरतमुनि ने स्वयं इस बात को स्वीकार किया कि लोकस्वभाव जब सौंदर्य व्यापार के द्वारा अभिव्यक्त होता है तब वह नाट्य होता है। लोकस्वभाव में भाव तथा अवस्था का अन्तर्भाव होता है और सौंदर्य व्यापार अभिनय से सम्पन्न होता है। मतलब यह कि नाट्य का फल लोक स्वभाव का दर्शन तो है ही, किन्तु उसका एकमात्र साट्टान अभिनय ही है। स्पष्ट है कि अभिनय द्वारा सम्पन्न होने वाले सौंदर्य व्यापार की भिा लोकस्वभाव ही है। बहुत बाद में ;९९० ई.द्ध लोकट्टार्मी तथा नाट्यट्टार्मी का विवेचन करते हुए अभिनव गुप्त ने भी ’अभिनव भारती‘ में दोनों के अन्योन्याश्रित सम्बन्ट्टा को स्वीकार किया। इन दोनों की चर्चा करते हुए उन्होंने स्पष्टतः यह कहा कि ’’लोकट्टार्मी तथा नाट्यट्टार्मी दोन ही लोकस्वभाव का अनुवर्तन करते हैं। लोक का अर्थ है जनपदनिवासी जन समुदाय। उनका स्वभाव उनकी वृा-प्रवृायों से प्रकट होता है।‘‘ ;वही, पृ. ३३द्ध
लोकट्टार्मिता को महव देते हुए अभिनव गुप्त ने दृढतापूर्वक यह अभिमत व्यक्त किया कि नाट्य स्थित अभिनय लोकप्रवृायों से सम्ब= होना ही चाहिए। साथ ही उसका सौंदर्य से ओतप्रोत होना भी आवश्यक है। लोकट्टार्मी तथा नाट्यट्टार्मी के बीच उसी प्रकार का सम्बन्ट्टा माना गया, जिस प्रकार का संबंट्टा भिा तथा उस पर उकेरे गये चित्र और रंग के बीच होता है। इन दोनों क बीच आट्टाार और अट्टिारचना जैसा संबंट्टा होता है। यह ठीक है कि चित्र और रंग भिा को सुन्दरता प्रदान करते हैं, लेकिन भिा के बगैर इनका भी मूार् हो पाना असम्भव है। ठीक इसी प्रकार लोकट्टार्मी रूपी भिा पर ही नाट्यट्टार्मी रूपी चित्र या रंग अपनी सुन्दरता संचित कर पाता है। वैसे अभिनय होता तो कृत्रिम है, किन्तु वह लौकिक ट्टार्म या लोक स्वभाव पर आट्टाारित संकेतों का ही अनुवर्तन करता है।
संक्षेप में कहें, तो भरतमुनि से लेकर अभिनव गुप्त तक नाट्य विवेचन में लोक को ;लोकट्टार्म कहें या लोकचरित या लोकस्वभावद्ध आट्टाार रूप में मान्यता रही, इस लोक को ग्राम्य नागर के बीच बोट कर नहीं देखा गया। नगर, पुर, गोव, नदी, पहाड, वनस्पति, पशु-पक्षी आदि सभी लोक में ही जड-चेतन स्वरूप विद्यमान है।
नाट्शास्त्र लिखे जाने के करीब छः-सात वषोङ के बाद ;७०० ई.द्ध भामह आदि द्वारा पृथक, स्वतंत्र रूप से जिस काव्यशास्त्र को प्रतिष्ठित किया गया, वह भी काव्य के आट्टाार स्वरूप लोक को ही मान्य करके चला। उल्लेखनीय है कि भामह ने शास्त्रों के समानान्तर काव्यशास्त्र की स्वाया साा को स्थापित करते हुए शास्त्रों द्वारा मान्य सत्य से अलग हटकर काव्यगत सत्य को लोकव्यवहार और लोकानुभव के संदर्भ में स्वीकार किया। उदाहरणार्थ काव्य में ऐसा वर्णन किया जाता है, ’’आकाश खड्ग के समान नीलवर्ण है, शब्द दूर से सुनाई दे रहा है, नदियों का जल भी वही जल है, आकाश में महाज्योतियो भी स्थिर हैं। लेकिन इस वर्णन को शास्त्र सत्य नहीं मानता, क्योंकि उसके अनुसार आकाश का कोई रंग रूप नहीं है। उसका नीलवर्ण तो आभास मात्र है, शब्द भी दूर से सुनाई नहीं देता, वह तो कर्ण शष्कुली में ही होता है। नदियों का जल भी प्रतिक्षण बदलता रहता है और आकाश में ग्रहगोल तो क्षणभर के लिए भी स्थिर नहीं होते। लेकिन भामह के मतानुसार उपर्युक्त वर्णन लोकव्यवहार और लोकानुभव से सत्य प्रमाणित होते हैं। शास्त्र के अनुसार जो ’आभास‘ निट्टाार्रित हैं वह कई बार लोक व्यवहार तथा लोकानुभव की दृष्टि से सत्य सि= होता है। काव्य का आट्टाार लोकानुभव है। चकि काव्य लोकानुभव का अनुवाद करता है। इसलिए काव्यगत वर्णन भी लोकानुभव की दृष्टि में सत्य होते हैं। यही काव्यन्याय में प्रत्यक्ष है।
जाहिर है जिस लोकवृाानुकरण को भरत मुनि ने नाट्यवेद का आट्टाारस्तम्भ माना था, उसी को भामह काव्य में स्थान देते हुए काव्यगत सत्य को शास्त्रगत सत्य की तुलना में तनिक भी असत्य नहीं मानते। इसी र्म में भामह ने अपने ग्रंथ ’काव्यालंकार‘ में काव्यगत प्रत्यक्ष और काव्यगत अनुमान का स्वरूप लोकानुभव के आश्रय से विषद् करते हुए यह दर्शाया है कि वह शास्त्रीय न्याय से कैसे भिन्न है और उससे वर्‍ोक्ति की सत्यता सि= की है। इसलिए भामह के मतानुसार कवित्व का अर्थ केवल पद रचना मात्र नहीं है। कवित्व तो एक तपस्या है जिसके लिए व्याकरण, छंद, अभिट्टाान कोष, लोक व्यवहार, युक्ति, कला आदि से परिचय आवश्यक है। जाहिर है कि भामह ने अलंकार के नाम से जो काव्यशास्त्रीय विवेचन किया, वह मात्र शब्दालंकार एवं अर्थालंकार तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें व्याकरण, छंद, युक्ति, कला के साथ-साथ लोकव्यवहार को भी महवपूर्ण स्थान प्राप्त है। भामह भी मानते हैं कि नाट्यट्टार्मी के द्वारा लोकट्टार्मी प्रतीत होना नाट्य है तो वर्‍ोक्ति के द्वारा लोकानुभव प्रतीत होना काव्य है। नाट्यट्टार्मी का आट्टाार लोकट्टार्मी है तो वर्‍ोक्ति भी लोकाश्रित ही है।
इस प्रकार भामह ने भी काव्य के केन्ध् में ’लोकट्टार्मी‘ के महव को स्वीकार किया। भामह के बाद वामन ;८०० ई.द्ध भी अपने ग्रंथ ’काव्यालंकारसूत्रवृति‘ में काव्य के संदर्भ में लोक के महव को स्वीकार करते हैं। वैसे उनकी छवि रीतिवादी आचार्य के रूप में यानी काव्य लिखने को विशेष युक्ति के प्रतिपादक के रूप में बनकर रह गई है। लेकिन यह युक्ति भी लौकिक बातों को ही अभिव्यक्त करने का विशेष ढंग है। मसलन वे अलंकार के अन्तर्गत उपमा को महव देते हैं, लेकिन उनके अनुसार उपमान की भी लोक में प्रसि=ता होनी चाहिए। मसलन, कुमुद और कमल दोनों ही सुंदर है, लेकिन ’मुख कमल‘ वाली उपमा जितनी लोकप्रिय या लोकपसंद है उतनी ’मुखकुमुद‘ वाली उपमा नहीं है। मतलब कि विशिष्ट पद रचना पर बल देने वाले वामन भी लोकाभिरुचि को महवपूर्ण मानते हैं।
वामन के बाद आने वाले आचार्य रूध्ट ;लगभग ८५० ई.द्ध अपने ग्रंथ ’काव्यालंकार‘ में काव्य-सौंदर्य की वृ= में वर्‍ोक्ति, रीति को महव देते हुए भी यह स्वीकार करते रहते हैं कि वर्‍ोक्ति लोकमर्यादा से आब= होनी चाहिए। रस विवेचन के संदर्भ में उन्होंने स्पष्टतः यह कहा कि रस के निर्माण में संसार की ओर से ओखे मूंद लेने से कवि का काम नहीं चल सकता। उनके अभिमत में ’महाकवियों ने अपनी विवेक-दृष्टि से जीवन के सि=ान्त खोज निकाले हैं तथा त्रिभुवन की जनता का चित्र काव्य में निब= किया है। उनका भलीभोति अट्टययन करना चाहिए एवं उन्हीं के मार्ग का अनुसरण हमें करना चाहिए। ऐसी बातें काव्य में निब= करने में कवि का उड्ढेश्य उस बात का उपदेश करने का नहीं होता या उसके कहने का अर्थ यह भी नहीं होता कि काव्य में दर्शित उपाय हमें भी अपनाने चाहिए। केवल काव्य के अंग के नाते रसिकों के मनोविनोद के लिए ऐसी कोई बात काव्य में आती है एवं वह लोकवृा के अनुकूल ही होती है। ;वही, पृ.११४द्ध जाहिर है काव्य की सौंदर्य- निर्मिति में रीति, वर्‍ोक्ति, अलंकार आदि की भूमिका को महवपूर्ण मानते हुए भी रूध्ट उन सबको लोकवृा के अनुकूल होना आवश्यक मानते हैं।
राजशेखर ;९२० ई.द्ध अपने ग्रंथ ’काव्यमीमांसा‘ में ’प्रतिभास निबंट्टान‘ की अवट्टाारणा उपस्थित करने में भी ’लोक‘ को आट्टाार रूप में रखते हैं। उनके मतानुसार ’प्रतिभास एक प्रतीति है तथा लक्षणा भी एक प्रतीति ही है। प्रतिभास रूप काव्यप्रत्यक्ष एवं लक्षणा दोनों की प्रतीतिनिष्ठ सत्यता की सीमाऐ भी समान हैं। काव्यप्रत्यक्ष लोकाश्रित अर्थात् लोकानुभव से संवादी होना चाहिए, लक्षणा भी लोकाश्रित ही होनी चाहिए। यह प्रतिभास निबंट्टानत्व ही अलंकारों का मूल है एवं शब्दों में उसका विलास लक्षणाशक्ति के द्वारा हुआ दिखाई देता है। वामन ने उपमा के लिए एक ओर लोकप्रसि=त्व का एवं दूसरी ओर असंभवदोष टालने का बंट्टान दिया है, इसका मूल लोकाश्रितता की कल्पना है। लोकाश्रितता एवं संभवनीयता की दो सीमाओं के मट्टय प्रतिभास स्फुरित होता है।‘‘ ;वही, पृ. १२४द्ध
गौरतलब है कि प्रतिभास हो या लक्षणा वे काव्य के सौंदर्योत्कर्ष म लोकाश्रित होकर ही सहायक होते हैं। इस मान्यता को पुष्ट करने हेतु वामन तथा मुकुल भड्ड ने अनेक उदाहरण दिये हैं, जिन सबका उल्लेख यहो सम्भव नहीं। रसप्रतीति के संबंट्टा में भी लोकव्यवहार की नियामक भूमिका को स्वीकार करते हुए अभिनव गुप्त कहते हैं - ’’लोकव्यवहार में व्यक्ति कारण, कार्य तथा अन्य सहचर अर्थ देखता है। तब इन चिह्नों ;लिंगोंद्ध पर से वह अपने तथा दूसरों की भी स्थायी चिावृायों का अनुमान करता है। पटुत्व प्राप्त हो जाता है। यह है लोक व्यवहार।‘‘ ;वही, पृ. ३०६द्ध
वस्तुतः भरत मुनि से लेकर पंडितराज जगन्नाथ तक संस्कृत साहित्यशास्त्र की जो चिंतन परम्परा रही है, वह इतनी सवाङगीण, विस्तृत, विषद और सूक्ष्मातिसूक्ष्म विश्लेषण विवेचन से भरपूर है कि उस पर अब तक अनेक ग्रंथ लिखे जा चुके हैं। उन सबका विवेचन इस लघु काव्य लेख में सम्भव नहीं, न ही ऐसा करना मेरा अभीष्ट रहा है। मेरा प्रयोजन इस काव्यशास्त्रीय चिंतन-परम्परा में ’लोक‘ को आट्टाार रूप में दिये गये महव को उजागर करना मात्र है ताकि हम समझ सके कि आट्टाुनिकता की ओट्टाी में आई ’लोकसाहित्य‘ की अवट्टाारणा हमारे पारम्परिक साहित्य-चिंतन से कितना पृथक द्वीप के रूप में आसन जमा चुकी है। वास्तव में, रस, अलंकार, रीति, वर्‍ोक्ति, ट्टवनि आदि काव्यांगों के काव्यशास्त्रीय विवेचन का सतही ढंग से सरलीकरण करते हुए हिन्दी पाठकों के मानस में यह ट्टाारणा बैठा दी गई है कि हमारा काव्यशास्त्रीय चिंतन केवल अलंकार, रीति, वर्‍ोक्ति आदि के रूप में काव्य के रूप-पक्ष, कला-पक्ष को ही सर्वोपरि मानने वाला रहा है, जिसमं० लोक, समाज या संसार को उपेक्षणीय समझा गया, लेकिन ये समस्त काव्यांग किस कदर लोकाश्रित रहे हैं, इसका जिर्‍ पश्चिमी वादों से प्रभावित साहित्य की समाज-सापेक्षता या लोक-सापेक्षता का कोलाहल मचाने वाले आलोचक भूल कर भी नहीं करते।
दरअसल, काव्य को शास्त्र., न्याय तथा अन्य अनुशासनों से पृथक स्वतंत्र स्वरूप प्रदान करने हेतु उसमें प्रयुक्त होने वाली भाषा के लिए अलंकार, रीति, वर्‍ोक्ति, रसादि का विट्टाान किया गया। अभिट्टाा, लक्षणा और व्यंजना के रूप में शब्द शक्ति का विस्तार किया गया, लेकिन भरत मुनि ने आरम्भ में ही नाट्यवेद के संदर्भ में जिस ’लोकवृाानुकरण‘ को आट्टाार स्वरूप रखा, उसका निर्वाह लगभग सभी परवर्ती आचायोङ के मतों में होता रहा। काव्य में अभिव्यक्ति के नाना ढंगों, शैलियों का सूक्ष्मातिसूक्ष्म विवेचन करते हुए भी उन्होंने लोक व्यवहार, लोकानुभव, लोकचरित को ओझल नहीं होने दिया। काव्य-भाषा के गुण-दोष का विवेचन भी लोकाश्रित होकर ही किया गया। अभिव्यक्ति के ढंग को लेकर जरूर उन्होंने निर्दोष एवं सदोष की रेखाऐ खींची, किन्तु उसका आट्टाार भी लोकाश्रित ही रहा। उदाहरणार्थ हम दण्डी की ग्राम्यता को दोष तथा अग्राम्यता को गुण मानने वाली मान्यता को देख सकते हैं।
दण्डी ने अपने ग्रंथ ’काव्यादर्श‘ में ग्राम्यता को दोष तथा अग्राम्यता को गुण मानते हुए काव्यभाषा के लिए अग्राम्यता को वांछनीय माना है। इस सम्बन्ट्टा में दण्डी उदाहरणस्वरूप यह कथन प्रस्तुत करते हैं - ’’किसी युवक ने युवती से पूछा - हे युवती, मैं तुम्हारे लिए इतनी अभिलाषा रखता ह, फिर भी तुम मुझे चाहती नहीं हो, ऐसा क्यों? उसी समय, अन्यत्र कोई दूसरा प्रेमी अपनी प्रेमिका से कह रहा था - ’हे वामाक्षि, यह दुर्जन मदन मुझसे निर्दयता का व्यवहार भले ही करे, परन्तु भाग्य की बात है कि वह अभी तक तुम्हारा मत्सर नहीं कर रहा है।‘ इन दोनों कथनों के सम्बन्ट्टा में दण्डी का कहना है कि ’पहले अर्थ का स्वरूप ग्राम्य है, दूसरा अर्थ अग्राम्य है। पहले अर्थ से वैरस्य आता है, दूसरा अर्थ रसावह है। काव्य में अन्य विशेष कितने ही अच्छे क्यों न हों, यदि उसमें ग्राम्यता है तो निश्चय ही रसहानि होती है। इसके विपरीत काव्य में अन्य कुछ भी न हों और केवल अर्थ अग्राम्य हों तो भी काव्य रसवत होता है। सभी प्रकार के अलंकार अर्थ को रसयुक्त बनाते तो हैं ही, किन्तु सरसता का अट्टिाकांश भार अग्राम्यता पर ही होता है।‘‘ ;वही, पृ. ८०द्ध
जरूरी नहीं कि दण्डी के इस विचार से सहमत हुआ जाए, लेकिन दण्डी जिस ग्राम्यता को दोष और अग्राम्यता को गुण मानते हैं, उसका उत्स लोक ही तो है। ग्राम्यता को इसलिए दोष माना गया कि उसमें कहने का ढंग रूखा, सपाट होता है। जब वही कथन परिष्कृत, लाक्षणिक या व्यंग्य शैली में प्रस्तुत होता है, तो वह अग्राम्य बनकर काव्य का शोभाकारक बन जाता है। किन्तु दोष के रूप में ग्राम्यता और शोभाकारक के रूप में अग्राम्यता दोनों ही लोक सापेक्ष ही हैं, दोनों का अस्तित्व लोकाश्रित ही हैं। इस प्रसंग में तुलसीदास का यह दोहा बरबस याद आ जाता है -
’’जड चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार।‘‘
अर्थात् विश्व का निर्माण करने वाले कर्ता ने जड-चेतन दोनों को ही गुण दोष से युक्त बनाया है, किन्तु ये दोनों ही इस विश्व में, लोक में ही अस्तित्वमान हैं और दूट्टा रूपी गुण को ग्रहण करने वाले तथा दूट्टा में मिले जल रूपी विकार का त्याग करने वाले संत और हंस भी इसी लोक के प्राणी है। ठीक इसी प्रकार ग्राम्यता दोष के रूप में और अग्राम्यता गुण के रूप में लोकाश्रित ही है, लोक से परे नहीं है।
कहने का आशय यह कि काव्य के संदर्भ में अनेक गुणों-दोषों का विवेचन करने वाले आचायोङ की दृष्टि में सदैव लोक-लोकव्यवहार, लोकानुभव, लोकचरित ही काव्य-सृजन के आट्टाार स्वरूप रहें। यही कारण रहा कि उन्होंने पृथक रूप से ’लोक साहित्य‘ की चर्चा नहीं चलाई। लोक तो साहित्य का प्राणतत्व था और है। इसलिए अलग से ’लोक‘ का प्रयोग कर साहित्य की बात करना उन्हें निस्संदेह अनावश्यक फालतू ही लगा होगा। आजकल गवेषणा के नाम पर अमुक-अमुक के काव्य में लोक तत्व के अनुशीलन का जैसा फैशन चल पडा है, वैसे फैशन को पूर्व आचायोङ ने अपने पास फटकने भी नहीं दिया।
यह बात विशेष रूप से ट्टयान में रखने लायक है कि हमारे भारतीय काव्यशास्त्रीय विवेचन में लोक को काव्य-सृजन में आट्टाार स्वरूप स्वीकार करने के पीछे हमारे यहो के तमाम प्राचीन काल से लेकर मट्टयकाल तक के सृजित साहित्य की महवपूर्ण पीठिका रही है। यहो पर अपने ही एक आलेख ’साहित्य की भारतीय परम्परा‘ से यह अंश उद्ट्टाृत करना प्रासंगिक प्रतीत होता है - ’’भारतीय चिा एवं मानस में समन्वयात्मक प्रवृा की प्रट्टाानता रहने के कारण हमारे यहो शिष्ट या नागर साहित्य और लोक साहित्य जैसे विभाजन की परम्परा नहीं रही। पिछली सदी से लोक साहित्य की जो चर्चा बलवती हुई वह भी पश्चिम की नगर प्रट्टाान सभ्यता से सम्फ की देन है। हमारे यहो ’लोक‘ को उपसर्ग स्वरूप प्रयुक्त करते हुए कोई साहित्यिक कृति नहीं रखी गई। महाभारत, रामायण से लेकर पुराण, वृहत्कथा, जातक कथाऐ, पंचतंत्र, हितोपदेश आदि किसी के साथ ’लोक‘ उपसर्ग स्वरूप नहीं जोडा गया इसलिए कि इन सब में समस्त लौकिक जगत को ही जिसमें नगर-गोव, राजा-प्रजा, स्त्री-पुरुष, विद्वान-गेवार, पशु-पक्षी, पेड-पौट्टो, जंगल-पहाड, नदी-समुध् सब शामिल हैं, विषय बनाया गया है। अलौकिकता का भी लौकिककरण कर दिया गया। स्त्री-पुरुष के स्वच्छंद सम्बन्ट्टाों से उपजी अराजकता से ही त्रस्त होकर एकनिष्ठ पति-पत्नी के सम्बन्ट्टा का पाठ पढाने के लिए सावित्री-सत्यवान, शिव-पार्वती या राम-सीता जैसे दम्पतियों का आदर्श रचा गया। अतिशय कामुकता से होने वाले अनिष्ट को ट्टयान में रखते हुए शिव द्वारा मदन-दहन की कथा रची गई, अहिल्या-इन्ध् को शापित किया गया। इन कृतियों की कथाऐ समान रूप से नगर से लेकर सुदूर जनपदों, गोवों तथा राजभवनों से लेकर झोंपडों तक रहने वाले अभिजन से लेकर सामान्यजन के बीच प्रचलित रहीं, उनके जीवन की हर सोस में स्पंदित होती रहीं। यही कारण है कि जिस रीति काव्य के सृजन में केवल सामंतों की अभिरुचि को केन्धीय तत्व मान लिया गया, वह लोक में बसे जीवन के नाना र्याोकलापों, रीति-रिवाजों के चित्रों से भरपूर है, जिस पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।‘‘ ;चिंतन-सृजन, अक्टूबर- दिसम्बर, २०१०द्ध
जाहिर है कि हमारे काव्यशास्त्रीय आचायोङ द्वारा काव्य या साहित्य को लोकाश्रित मानने के पीछे बहुत बडा कारण था हमारे यहो साहित्य-सृजन में लोकाश्रित प्रवृति का होना। भारतीय साहित्य की लोकाश्रितता की यह प्रवहमान रही ट्टाारा ही मट्टयकाल के संत कवि तुलसीदास को यह कहने को प्रेरित कर सकी - ’’कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहे हित होई।‘‘ और इसी लोकाश्रितता से प्रेरित होकर भारतेन्दु युग के निबन्ट्टाकार बालकृष्ण भड्ड ’साहित्य को जनसमूह के हृदय का विकास‘ कह गये और बीसवीं सदी के हमारे महान काव्य-मर्मज्ञ आचार्य रामचन्ध् शुक्ल श्रेष्ठ काव्य के लिए ’लोकमंगल की सि=ावस्था‘ तो श्रेष्ठतर काव्य के लिए ’लोकमंगल की साट्टानावस्था‘ को काव्य-मूल्यांकन का निकष प्र्रतिपादित कर गये और लोक क्तदय में लीन होने की दशा को ही रस दशा कह गये। इस सबके बावजूद हमारे साहित्य-प्रांगण में ’लोक साहित्य‘ की अवट्टाारणा टपक पडी और हमारे आलोचकगण पूर्व परम्परा को ट्टयान में रखे बगैर लोक साहित्य की व्याख्या- मीमांसा में पिल पडे, उसे पठन-पाठन का विषय बनाने लगे। यह सब पश्चिमी प्रभाव के अन्तर्गत हुआ, यह कहने में तनिक अत्युक्ति नहीं है।
वास्तव में देखा जाए तो पश्चिम से आये आट्टाुनिक- बोट्टा के दबाव तले हमारे देशी बु=जीवियों का एक बहुत बडा दोष यह रहा कि उन्होंने अंग्रेजी भाषा के कई शब्दों के लिए जो स्वदेशी अनुवाद चलाये, वे अपने मूल अर्थ में अंग्रेजी शब्दों से सर्वथा भिन्न प्रकृति के थे। मसलन, ’रिलीजन‘ के लिए ’ट्टार्म‘ शब्द का प्रयोग होने लगा बगैर यह समझे कि जो अर्थ ’रिलीजन‘ का है, वही ट्टार्म का नहीं है। ’रिलीजन‘ एक खास ग्रंथ-बाइबिल एक खास ईश्वर पुत्र - ईसा मसीह के विचारों के अनुपालन तक सीमित है जबकि ’ट्टार्म‘ न किसी ग्रंथ विशेष से, न किसी व्यक्ति विशेष से आब= रहा है। भारतीय वा*मय में तो ’ट्टार्म‘ का प्रयोग सदैव कर्तव्य और स्वभाव के अर्थ में होता रहा है। लेकिन ट्टार्म की इस मूलभूत संकल्पना को ताक पर रख कर हम ’रिलीजन‘ के लिए ट्टार्म तथा ’सेक्यूलर‘ के लिए ’ट्टार्मनिरपेक्ष‘ का प्रयोग करते चले जा रहे हैं। ठीक इसी तरह अंग्रेजी के ’फॉक लोर‘ शब्द से जब हमारे बु=जीवियों का परिचय हुआ, तो वे आनन-फानन इसके लिए ’लोक साहित्य‘ का प्रयोग करने लगे।
वस्तुतः इंग्लैण्ड या यूरोपीय शहर या नगर में रहने वाले अभिजनों तथा देहातों में रहने वाले जन समुदाय के बीच या फिर वहो के ’य्यूडलस‘ तथा ’कामन्स‘ के बीच जिस तरह का कठोर वर्ग-विभाजन था, उसी के अनुरूप उन्होंने जनसमुदाय या देहातों से सम्ब= भावात्मक अभिव्यक्तियों के लिए ’फॉक लोर‘ का नाम दिया। शिष्ट समाज के श्रेष्ठ साहित्य से अलगाने के लिए। लेकिन जैसा कि हम पूर्व विवेचन में देख चुके हैं कि हमारे यहो नगर एवं गोव के रूप में न लोक का बेटवारा किया गया न वहो पर रहने वालों के बीच संवेदना, भाव आदि के स्तर पर कोई विभेद किया गया। हमारे यहो की महाभारत, रामायण जैसी श्रेष्ठ काव्यकृतियो जो वनों में कुटिया बनाकर रहने वाले व्यास, वाल्मीकि जैसे रचनाकारों द्वारा लिखी गई, जिसे रवीन्ध्नाथ ठाकुर ’तपोवन युग‘ की संज्ञा से अभिहित करते हैं। सचमुच तपोवन युग से लेकर मट्टय युग तक के हमारे साहित्यकारों ने नगर, गोव, वन सबको ही ट्टयान में रखकर अपना साहित्य सृजन किया। इसलिए कि लोक के अन्तर्गत सब शामिल थे। फिर भी ऐसे तथ्यों को अनदेखा करते हुए ’साहित्य‘ के बरक्स ’लोक साहित्य‘ की चर्चा चल पडी और चलती ही जा रही है। अब तो इससे भी कई कदम आगे बढकर दलित साहित्य, स्त्रीवादी साहित्य, आदिवासी साहित्य आदि की चर्चा चल पडी है। भारतवर्ष के बेटवारे से एक ’पाकिस्तान‘ बना, लेकिन हमारे साहित्य में तो इन ’साहित्यों‘ के रूप में कई ’पाकिस्तान‘ बनते जा रहे हैं। यहो पर अन्य ’साहित्यों‘ की बहस में न पड कर इतना ही निवेदन करना चाहगा कि ’साहित्य‘ से लोक को अलग कर केवल ’लोक साहित्य‘ की बात करना वैसे ही है जैसे शरीर से प्राण को अलग कर उस पर चर्चा करना। हम सब जानते हैं कि प्राण के बिना शरीर का कोई मोल नहीं, कोई जीवन्तता नहीं, वैसे ही लोक के बिना भी साहित्य निर्जीव है, जीवन्तता विहीन है। लोक तो साहित्य का प्राण है, इसलिए ’साहित्य‘ और ’लोक साहित्य‘ के रूप में विभाजन तनिक भी उचित नहीं। साहित्य स्वभावतः प्रकृत रूप में लोकाश्रित रहकर ही प्राणवाा, जीवन्तता प्राप्त करता रहा है - इसी में दलित, स्त्री, आदिवासी, किन्नर, गंट्टार्व, देव-दानव, राजा-प्रजा, विद्वान-गेवार आदि सबका समायोजन होता रहा है। अतएव बात सिर्फ साहित्य की होनी चाहिए, पृथक रूप से ’लोक साहित्य‘ की चर्चा करना बौ=क विलास के सिवा कुछ नहीं।
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