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परछाई

ममता पानेरी
रेखा का मन आज फिर अनमना सा हो रहा है। आज इस रात्रिकालीन वेला में फिर उसका उदास मन उन्हीं स्मृतियों की ओर लौट गया था। उसे याद आई मोहित से उसकी वो मुलाकात, जब उसने उनके प्यार के बंट्टान को शादी के खूबसूरत रिश्ते में बोट्टाने की बात कही थी और कहा था, ’’रेखा आज जब हम शादी के बंट्टान में बेट्टाने वाले हैं तो मैं तुमसे सिर्फ एक ही बात कहना चाहता ह कि मैं अपने माता-पिता की इकलौती संतान ह और उनसे भी उतना ही प्यार करता ह जितना तुमसे करता ह और वे भी मुझे उतना ही प्यार करते हैं और इसीलिए तुम्हारे बारे में सब कछ जानते हुए भी सिर्फ इसलिए कि मैं तुमसे प्यार करता ह, उन्होंने शादी के लिए हो कर दी, इसलिए तुमसे भी मैं केवल इतना ही चाहता ह कि तुम भी मेरे माता-पिता को उतना ही प्यार दो।‘‘
मुझे आज भी याद है, ’’मैंने कहा था, मोहित कल हमारी शादी हो जाएगी और मुझे वो सारी खुशियो मिल जाएगी, जिनसे मैं आज तक वंचित रही ह। मोहित तुम इतनी बडी फैक्टत्री के मालिक हो, तुम्हारे पापा मि. वर्मा का बैंकिंग सेक्टर में, एज-अे-मैनेजर शहर में बडा नाम है। इतने सम्पन्न परिवार के होते हुए भी तुमने और तुम्हारे परिवार ने मुझ अनाथ को अपनाया है। जिन माता-पिता के प्यार के लिए मैं जीवनभर तरसी ह वो प्यार मुझे तुम्हारे परिवार से मिलने वाला है, तो मैं भी तुम्हें यह विश्वास दिलाती ह कि मैं उनके सम्मान में कभी कोई कमी नहीं करूेगी और जिसमें तुम्हारी खुशी होगी उसी को अपनी खुशी मानगी। मोहित आज तो मुझे एक और बात सोचकर बडी खुशी हो रही है कि अब तो तुम मेरे जीवन की दूसरी बडी ख्वाहिश भी पूरी करवाओगे, क्योंकि तुमने कहा था न कि रेखा एक बार अपनी शादी हो जाने दो, फिर तुम अपनी वकालत की प्रेक्टिस भी शुरू कर देना, फिर तो मेरा भी शहर के बडे वकीलों में नाम होगा।‘‘
मैं आज नहीं भूली ह मोहित के वे प्यार भरे शब्द, जब उसने कहा था, ’’हो, हो रेखा तुम्हारी ये ख्वाहिश भी जरूर पूरी होगी। आखिर तुममें वकालत के सारे गुर भी तो हैं और तुमने भी अपने जीवन में दो ही तो सपने देखे हैं, एक मुझसे शादी करने का और दूसरा वकील बनने का, तुम्हारा ये सपना भी जरूर पूरा होगा।‘‘
पहर-दर-पहर रेखा की स्मृतियों के झरोखे से यादें ताजा होकर उभर रही थीं। शादी के बाद के वो सुनहरे पल वह कभी भी कैसे भूल सकती है। सास-ससुर के रूप में उसे माता-पिता का अथाह प्यार मिला, पति ने भी उसकी झोली को खुशियों से भर दिया। आज तक वह अपने जिस जीवन को कोसती आ रही थी, आज वह उसी में तल्लीन हुए जा रही थी और उसे लगने लगा था कि अब उसके जीवन को ढलने के लिए एक सांचा मिल गया है।
खुशियों की इस रय्तार में शादी का एक साल कहो गुजर गया, उसे पता ही न चला। आज उनकी शादी की सालगिरह के अवसर पर उसके सास-ससुर ने अच्छी-खासी पार्टी का आयोजन किया। शहर के नामी-गिरानी लोग इसमें आए थे। ससुर जी ने सभी मेहमानों से बडे ही स्नेह और दुलारपूर्वक अपनी बहू का परिचय करवाया था और अपनी बहू की तारीफों के पुल बोट्टाते नहीं थक रहे थे। सभी बहुत खुश थे।
पार्टी खत्म हो जाने के बाद जब मैं अपने कमरे में जा रही थी, तब मेरा मन यह सोचकर अत्यन्त प्रफुल्लित हो रहा था कि अगले साल आने वाली सालगिरह के अवसर पर पापा को मुझे सबसे मिलवाने में आज से भी ज्यादा खुशी होगी, क्योंकि तब मेरा भी शहर में एक वकील के रूप में बडा नाम होगा। पर इसके लिए मुझे आज ही मोहित से कहना पडेगा कि वे पापा से मेरी वकालत को शुरू करने की बात करे और उस दिन मुझे लगा कि मेरे लिए अब अपने दिल की इस तमन्ना को पूरा करने का समय आ गया है तो मैंने मोहित से ये बात कही थी और मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है कि मोहित ने भी दिल से इस बात को स्वीकार कर सुबह के नाश्ते पर मम्मी-पापा के समक्ष यह प्रस्ताव रखा था। पर फिर क्या था, पापा का जो जवाब आया, उसने मेरे जीवन के सबसे बडे ख्वाब को सिरे पर ही ट्टाराशायी कर दिया। उनका यह कहना कि मोहित तुम अपनी हद पार कर रहे हो, तुम्हें कुल की मर्यादा का कुछ भी ख्याल है या नहीं। बस उनका इतना कहना था कि उस दिन से मैंने अपने इस सपने को वहीं दफन कर दिया। आखिर उस परिवार से मुझे जो अपनापन और प्यार मिला था, उसके समक्ष मेरा ये ख्वाब मुझे काफी बौना लगा।
मैंने सब कुछ भूलकर अपने आप को पूर्णतया परिवार के प्रति समर्पित कर दिया। मुझे दिनोंदिन उनसे खूब प्यार, दुलार मिला। समय इसी रय्तार से आगे बढ रहा था। तभी समय ने एकदम पलटा खाया। समय के वे कटु पल भुलाए नहीं भूलते हैं। कहते हैं जीवन के अच्छे पल जहो कभी-कभी याद आते हैं, वहीं कटु पल जीवनभर साये की तरह साथ लगे रहते हैं।
उस दिन मेरे साथ जो हुआ, उसे भला कोई भी कैसे भूल सकता है। जब हमारे घर में नये मेहमान के आने की तैयारी चल रही थी। घर में चारों तरफ खुशी छा गई थी, लेकिन चौथे महीने में मुझे कुछ परेशानी हो गई। तब डॉक्टर को मेरी सोनोग्राफी करनी पडी, लेकिन उस वक्त मुझे इस बात की भनक भी नहीं लगी कि कब पापा ने डॉक्टर को कहकर भ्रूण परीक्षण करवा लिया। आखिर डॉक्टर पापा के मित्र जो ठहरे। लेकिन जैसे ही पापा को पता लगा कि लडकी है, मुझे कुछ भी बताए बिना वे चुपचाप मोहित को एक तरफ ले गए और कहा, ’बेटा लडकी का जन्म हमारे घर में कभी नहीं हो सकता, हम ऐसा करते हैं, अभी भी डॉक्टर से बात कर लेते हैं, वे मेरी भावनाओं को समझते हैं। किसी को कानों-कान खबर भी नहीं होगी और हाथों-हाथ काम भी हो जाएगा।‘ तब मोहित ने कहा, ’पर पापा रेखा‘। पापा ने बीच में ही बात को काटकर कहा, ’रेखा को तो पता भी नहीं चलेगा। उसे कह देंगे, बेटा बहुत कॉम्पलिकेशंस थे और हमारे लिए तुम्हें बचाना जरूरी था। इसलिए हमने ऐसा फैसला लिया। तुम स्वस्थ रहोगी तो बच्चे तो और भी हो जाऐगे।‘ लेकिन उन्हें क्या पता था कि मैंने उनकी सारी बात सुन ली थी, सुनते ही मेरे पिर आसमान टूट पडा, पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। पर मुझे आश्चर्य तो इस बात पर हुआ कि इतना सम्पन्न परिवार और इतनी घटिया सोच।
अब की बार मुझे निर्णय लेने में एक पल भी नहीं लगा। मैंने सब कुछ भूलकर अपने अनाथपन को याद किया और मोहित के पास जाकर कहा, ’मोहित आज से मेरी बेटी को माता-पिता का प्यार मैं ही दगी, अब हमारी राहें अलग हैं। मैं तुम्हें अपने साथ चलने के लिए कहगी भी नहीं, क्योंकि मैंने कसम खाई थी कि मैं आप लोगों की राह का कांटा कभी नहीं बनगी। ये कहकर मैं वहो से चली आई। मुझे कुछ पता नहीं था कि अब मुझे क्या करना है, लेकिन तभी मुझे मेरी एक सहेली की याद आई और मैंने उसकी सहायता से वकालत शुरू की, क्योंकि मेरे पास डिग्री थी और रोजी-रोटी का इसके अलावा कोई साट्टान भी नहीं था।
कुछ समय बाद रक्षा का जन्म हुआ, मैंने उसे मो का प्यार दिया और पिता की कमी कभी महसूस नहीं होने दी। उसे खूब अच्छी तालीम दी। वो जब भी पापा के बारे में पूछती तो मैं कह देती, हममें कुछ चीजों को लेकर गलतफहमियो हो गई थीं और इसीलिए हमने अपनी राहें बदल लीं, लेकिन उसमें भी शायद गलती मेरी ही ज्यादा थी। ऐसा मैं उसे इसलिए कहती थी जिससे उसके मन में अपने पापा के प्रति सम्मान कम न हो। मैं उसे कभी-कभी उसके दादा-दादी के बारे में भी बताती। उनके साथ बीते समय की सुनहरी यादों का भी जिर्‍ उसके सामने करती थी।
अब मेरे जीवन का बडा सपना पूरा हुआ। शहर में एक नामी वकील के रूप में मेरी पहचान बन गई। इतना नाम कमाया कि मेरे पास केस आते ही मुवक्किल आश्वस्त हो जाते कि अब तो जैसे उन्होंने केस जीत ही लिया है और अब मेरी दूसरी तपस्या भी पूरी हो गई थी। रक्षा जज बन चुकी थी।
रक्षा ने अपने पसन्द के लडके से शादी कर ली थी। राज भी बैंक मैनेजर था। रक्षा मेरी परछाइङ बनकर हमेशा मेरे साथ रहती थी। वो चाहती थी कि मैं उसी के साथ उसके घर में रह पर मुझे अपनी सीमाऐ पता थीं। मैंने उसी के घर के पास अपना एक अलग य्लैट ले लिया था।
समय की रय्तार वही थी, पर उसमें फिर एक मोड आया। जब रक्षा ने उस दिन आकर मुझे कहा, ’मो, आपने मुझसे इतनी बडी बात क्यों छिपायी?‘ मैंने पूछा, कौनसी बात? तो उसने कहा, यही कि दादाजी मुझे मेरे जन्म से पहले ही मार देना चाहते थे। मैंने कहा नहीं बेटा, तुमसे किसी ने झूठ बोला है। उसने कहा, नहीं मो, आफ घर की लीलाबाई भला क्यों झूठ बोलेगी। आज मोनिङग वॉक पर वह मुझे मिल गई थी और आफ बारे में पूछ रही थी। तभी उसने मुझे सारी कहानी बताई और कहा, ’बेटा अपनी मो को कभी ठेस मत पहचाना। जो उस अनाथ ने तुम्हारे लिए किया है, अपनी सारी खुशियों को त्याग कर तुम्हें पाला है, ऐसी मोएं विरली ही होती है, कहते-कहते रक्षा उस दिन मेरे गले लगकर कितना रोई थी। उस वक्त मैंने उसके चेहरे पर अपने दादा के प्रति घृणा के भाव भी देखे थे, पर उसने मह से उनके बारे में कहा कुछ भी नहीं था और चली गई।
वक्त के भी क्या-क्या खेल होते हैं। उन्हीं दिनों अखबार में खबर आई कि मोहित के पिता यानि मि. वर्मा जिनके रिटायरमेंट में केवल दो ही वर्ष बाकी हैं, उन पर बैंक घोटाले का आरोप लगा है। रक्षा ने आकर मुझे खबर बताई और कहा, आप तो इनकी तारीफों के पुल बोट्टाते नहीं थकती थीं। मो अब ये सब क्या है? मैंने उस वक्त उसके चेहरे के भावों को भोपते हुए चुप रहना ही मुनासिब समझा।
दूसरे दिन रक्षा ने आकर मुझे कहा कि मो जिस पार्टी ने मि. वर्मा पर आरोप लगाया है, वे मेरी खास सहेली के पिता हैं और वह चाहती हैं कि ये केस उनकी तरफ से आप लडें। मेरे पास ना करने का कोई कारण नहीं था। मैंने केस अपने हाथ में ले लिया। मोहित और उसके परिवार को जब ये बात पता चली थी, उन सभी के मन में भय व्याप्त हो गया। उन्हें अपनी गलती का अहसास तो मेरे वहो से चले आने के बाद ही हो गया था, लेकिन आज वह और व्यापक हो गया।
पेशियों-पर-पेशियो होती रहीं, कभी मि. वर्मा के वकील का पक्ष मजबूत होता, तो कभी मेरा। लेकिन आज की पेशी में मि. वर्मा का पक्ष काफी कमजोर रहा। मैं जो सबूत इकद्दे कर पाई थी, उनसे तो मि. वर्मा पर आरोप सि= होना तय था, पर मुझे तो ईमानदारी से केस की पैरवी करनी ही थी। कल जज की कुर्सी पर बैठी रक्षा न जाने क्या फैसला सुनाएगी, यही सब सोचते-सोचते कब सुबह के पोच बज गए पता ही नहीं चला।
आज कोर्ट की तरफ जाते हुए पहली बार मेरे पैर डगमगाए और मन में फिर वे जीवन के सुनहरे पल आते व जाते रहे।
केस पर अंतिम बहस शुरू हुई। जज साहिबा ने कहा आपको कुछ पेश करना है एडवोकेट रेखा जी! मैंने कहा, नहीं मैं अपना पक्ष रख चुकी ह। फिर जज साहिबा ने मि. वर्मा के वकील से भी यही सवाल किया, तो उन्होंने कहा हो, मैं सबूत के तौर पर एक वीडियो दिखाना चाहता ह। जज साहिबा ने कहा, परमिशन गा्रंटेड। उस वीडियो में वो घटना कैद थी, जिसमें जानबूझकर मि. वर्मा को इस घोटाले में फंसाया गया था। उसे देखकर जज साहिबा ने एडवोकेट रेखा से फिर पूछा, अब आप कुछ कहना चाहेंगी? मैंने मना किया, तब जज साहिबा ने फैसला सुनाया कि मि. वर्मा निर्दोष हैं। उन्हें जानबूझकर इस घोटाले में फेसाया गया है। अतः कोर्ट से इन्हें बाइज्जत बरी किया जाता है और असली गुनहगार को सजा के लिए पाबन्द किया जाता है। मेरी ओखें छलछला आइङ और मुझे अपनी परछाइङ रक्षा बिटिया पर नाज हुआ। आज मुझे अपने वकालत के इतिहास की इस पहली हार ने जो खुशी दी थी, उसको शब्दों में बयां कर पाना मेरे लिए सम्भव नहीं है। मैंने मेरे विपक्षी वकील को केस जीतने पर बट्टााई दी, तब मोहित और मि. वर्मा वहीं खडे थे। तभी मि. वर्मा के वकील ने रेखा को कहा, मैडम, बट्टााई की हकदार तो आपकी बेटी है। हम तो आफ सामने केस हार ही चुके थे। आज सुबह ही आपकी बेटी ने ये वीडियो मुझे लाकर दिया, ये सारी बात चल ही रही थी कि रक्षा वहो आ गयी और अपनी मो की ओखों के प्रश्न को पढकर उसने कहा, मो, ये बात तो मैंने उसी दिन आपकी ओखों में पढ ली थी कि मि. वर्मा निर्दोष थे, जब मैं आफ पास अखबार की खबर लेकर आई थी, लेकिन आपको मैं कमजोर नहीं देख सकती थी इसलिए ये केस विपक्षी की ओर से ही सही पर, जानबूझकर मैंने आफ हाथों में दिया ताकि आप इससे जुडी रहें। साथ ही मैं आपकी मानसिक स्थिति से भी परिचित थी। इसलिए मैंने उसी दिन सोच लिया था कि जिन दादाजी के सम्मान को बनाए रखने के लिए मो मुझसे जिंदगी भर झूठ बोलती रही, उनकी इज्जत को बचाने का कार्य मुझे ही करना है और उन्हें निर्दोष साबित करना है। तभी से मैंने राज को इस कार्य में लगा दिया था और मैं ये भी जानती थी कि इस हार में ही आफ जीवन की सबसे बडी जीत है। ये सारी बातें सुनकर मोहित व मि. वर्मा ने आकर रेखा से माफी मोगनी चाही पर उसने उन्हें रोकते हुए पिताजी के चरण छुए और मोहित से कहा, ’’ये तो मेरा फर्ज था मोहित, पर मुझे खुशी इस बात की है कि मेरी बेटी ने आज मेरी परछाइङ होने का फर्ज अदा किया है। आज मेरे जीने का मकसद सफल हुआ। रक्षा ने अपने पापा और दादाजी के चरण छूकर उनसे आशीर्वाद लिया और उन्होंने रक्षा को गले लगाकर अपनी गलती का प्रायश्चित किया।
२-बालाजी कॉलोनी, पानेरियों की मादडी, गायरियावास लिंक रोड, उदयपुर ;राज.द्ध-३१३००१, मो.९४१३४ ७४७०४