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गृह प्रवेश

मीनू त्रिपाठी
’’बृंदा भाभी, आप यहीं रुककर सारी व्यवस्था संभालना। एक रात की बात है, सुबह छः-सात बजे तक हम बहू को बिदा करा लाऐगे।‘‘
’’जैसा आप कहें जीजी, पर एक बात पूछनी है। बहू का स्वागत गेस्ट हाउस से करें या घर में...‘‘
बृंदा के कहते ही उसकी ननद रमोला खीज के साथ बोली, ’’उफ भाभी, आप भी न... रही निरी बेवकूफ-बौडम... अरे, गेस्टहाउस की बुकिंग परसों सुबह तक है। सारे मेहमान यहीं रुके हैं तो जाहिर है बहू का स्वागत यहीं पर करोगी। यहो कल शाम तक हम यहो से बहू को लेकर घर जाऐगे... घर पूरा फैला है, तुम सुबह घर चली जाना... साफ-सफाई करके रखना, सब व्यवस्था देख लेना... अब चलो कुआं पूजने की रस्म शुरू करो...‘‘ रमोला के आदेश के साथ ही रस्म आरम्भ हो गयी।
कुआं पूजन उारप्रदेश की अहम रस्म है। यह रस्म बरात की रवानगी से ठीक पहले होती है। इस रस्म में बेटा मो के ओचल को पकडकर दिलासा देता है कि वह इस ओचल का मान रखेगा। सांकेतिक रूप से वह अपनी नवविवाहिता के आने के बाद भी अपनी मो का ख्याल रखने का वचन देता है। यह एक भावुक पल होता है... ऐसे में अक्सर मो-बेटे एक-दूसरे के गले लगते हैं। शांतनु से भी अपनी मो के गले लगने को बोला गया तो वह असहज हो गया.. और बृंदा भी सकुचा गयी... तो रवीश बोले, ’’गले लगेगा तो सूट खराब हो जाएगा...‘‘ यह सुनकर बेटे को गले लगाने को उत्सुक बृंदा ठिठक गयी... चारों ओर देखा तो लोगों की उपहास भरी नजरें नजरअंदाज करते हुए मुस्करा पडी। उसका मन आज बौडम, झल्ली, बेवकूफ जैसे शब्दों पर टिक नहीं पा रहा था। आज तो उमंग-उल्लास का दिन था। इकलौते बेटे की शादी के दिन वह उडी-उडी फिर रही थी, तभी तो उसका ट्टयान फूल कर कुप्पा हो गए पोवों पर नहीं जा रहा है।
’’क्या सोच रहे हो भाई, जल्दी करो, अपनी मो का आशीर्वाद लो...‘‘ बृंदा की चचेरी बहन अंजना शांतनु से बोली तो वह बृंदा के पैरों की ओर झुका। बृंदा का जी किया उसे सीने से चिपका ले, पर उसकी पोशाक और पगडी बिगड न जाए, उसके गोरे दमकते चेहरे पर उसकी छाप न लग जाए, इस भय से वह हिम्मत न कर पाई।
तभी अंजना ने शांतनु के पिता की ओर देखते हुए ट्टाीमे से कहा, ’’अरे जीजा जी, क्या बृंदा दीदी अकेली रहेगी... बारात में वह भी चलती तो...‘‘ यह सुनकर रवीश हेसकर बोले, ’’हुलिया देख रही हो अपनी दीदी का... आज बेटे की शादी में भी ऐसी दाग-ट्टाब्बों भरी साडी पहनी है। वैसे अच्छा ही है, हम इन्हें बनारसी साडी पहना भी देते तो काम के चलते उसका भी सत्यानाश ये कर देती। अब बहू के आने पर जरा ढंग से तैयार हो जाना... वहो बारात के साथ जाकर ये क्या करेगी... वहो बेटे की ससुराल में कोई बौडमपना कर दी तो हम कहे बिना रह नहीं पाऐगे, फिर आप सब हमें दोष देंगे... अरे चल बेटा, तू क्या सोच रहा है... गाडी में बैठ...‘‘ पिता की बात खत्म होने से पहले ही शांतनु गाडी म जा बैठा। रवीश अपनी बहन रमोला के साथ उसके बगल में बैठ गए, एक-एक करके सब निकल गए।
बरात को बिदा होते देख बृंदा के मन में एक कसक सी उठी... काश! उसकी तरह से शांतनु ही बोल देता कि शादी में मो की उपस्थिति अपरिहार्य है... पर अगले ही पल मन की कसक निकाल फेंकी।
शांतनु वैसे भी कहो ज्यादा बोलता है, उसका संकोची बेटा अक्सर तटस्थ रहता है... बेटे होते ही ऐसे हैं। वो सहसा मुस्कुराती हुई बुदबुदाई, ’’सही भी तो है, शादी की तैयारियों में वह ऐसा डूबी कि कपडे-लो बदलने का होश ही नहीं रहा... दिन के प्रत्येक पहर में चलने वाले रीति-रिवाज-रस्मों की तैयारियों में इट्टार से उट्टार भागती ही रही... रह-रहकर बृंदा-बृंदा की गुहार हर तरफ से आई। ये तो सौभाग्य है, मेरे बेटे की शादी का सौभाग्य... बेटे की शादी में मो काम न करेगी तो कौन काम करेगा... बारात बिदा हो गयी... कल बहू आ जाएगी... जो मैं बारात के लिए चल पडती, तो बहू के स्वागत की तैयारी कौन करता...‘‘
’’अरे तुम अकेले क्या बडबडा रही हो बहुरिया‘‘, सहसा घर की पुरानी नौकरानी ने टोका तो वह हेसकर ट्टारा-उठाई में जुट गयी। ट्टानिया चिंतित सी बोली, ’’बहुरिया, नई बहू के आने पर भी तुम ऐसे ही डांटी जाओगी। काहे नहीं थोडा बन-ठनकर रहती हो... शादी का घर है, पर देखो कैसी सादी सूती साडी पहने टहल रही हो...‘‘
तो क्या करती ट्टानिया काकी, जो पहन ओढ लेती तो घरभर का काज कौन देखता...‘‘ अपनी बात के जवाब में यह सुनकर ट्टानिया काकी मह बिसूरती हुई बोली, ’’अरे जाओ बहुरिया, ऐसा भी क्या काज की चिंता की। अपना जरा सा बनाव सिंगार पर भी ट्टयान न ट्टारा... भगवान ने जो रंग रूप दिया सो दिया, कम से कम ओढे पहने तो सबके मन भाओ...‘‘
सरल-सहज काकी सहजता से कटु सत्य कह गई। तो वह मुस्करा पडी, अपने रूप-रंग पर ऐसी टिप्पणियो वह अकसर सुनती है। शांतनु की सगाई के दिन रमोला जीजी बोली थी, ’’चलो, शांतनु की बहू गोरी और सुंदर है, कम से कम पीढी तो बदलेगी... ये तो कहो शांतनु ने पिता का रूप पाया है जो अपनी मो को पड जाता तो...‘‘
’तो‘ जैसी संभावना पर हेसी के छींटे बिखर गए... उस दिन उसकी सूखी ओखें और सूख गई। रूप-रंग पर हुए कटाक्ष सदा ही उसके हृदय को बींट्टाते रहे हैं। अक्सर दर्पण निहारते वह सोचती, जो उसकी मो के पास पुश्तैनी मकान जमीन-जायदाद न होती तो उसका क्या होता। बिन ब्याही रह जाती तो कंटीले रिश्तों के बीच गुलाब से शांतनु को कैसे सहलाती... शांतनु को कैसे पाती... कौन अपनी तोतली भाषा में पूछता, ’’मो, परी क्या होती है।‘‘ और वह पुचकर कर किससे कहती, ’’न रे लल्ला, ये परी-वरी कुछ नहीं होती। परी-सा सुंदर होना... मतलब बहुत सुंदर...‘‘
’’तुम झूठी हो... एक तरफ कहती हो परी जैसा सुंदर.. फिर बोलती हो परी होती ही नहीं है... परी होती है मो, उसके पास एक जादू की छडी होती है। मुझे मिलेगी तो मैं तुम्हें शीतल आंटी जैसा सुंदर बना दगा।‘‘ शांतनु कहता तो वह चिढ जाती... फिर उसे सीने से लगाकर रुलाई जब्त करती तो नन्हा शांतनु सहमता उसे लगता मो ’झूठी‘ शब्द से आहत हो गई है। उस वक्त शांतनु कुछ देर के लिए चुप हो जाता, परी के अस्तित्व पर उसका विश्वास न डगमगाता। रमोला बुआ, पापा, दादी सब शीतल आंटी को परी मानते हैं, बस एक उसकी मो ही उसे परी नहीं कहती।
’’भाभी, ये लो आरती की थाली...‘‘ ट्टानिया के स्वर ने मानो उसे तंध से खींचा... आरती की थाली में हल्दी-कुंकुम के साथ दीया रख दिया और क्या रखना चाहिए। कुछ छूट गया तो कहीं बेवजह वह बौडम- बेवकूफ से नवाजी न जाए... यह सोचकर वह अपनी तैयारी का अवलोकन करने लगी... मिठाई हो, मीठे में क्या रख... सब वर-वट्टाू को मिठाई खिलाऐगे तो मीठा उनकी पसंद का होना चाहिए। वह मिठाई के डिब्बे में लगी रंग-बिरंगी मिठाइयो देखकर फिर अतीत में खो गयी। ’’मम्मी, परी खाने को अच्छा-अच्छा देती है न...‘‘ शांतनु शीरा की कटोरी को उंगलियों से चाटते कहता... तो वो समझानी, ’’न बेटा, ये सब कहानियो हैं। वास्तव में परी नहीं होती है... बृंदा उसे महापुरुषों की कहानियो सुनाती पर उसे तो दादी-रमोला बुआ द्वारा सुनाई परियों का तिलस्म लुभाता...।
बृंदा के मुख पर कोमल स्नेहसिक्त हेसी आई। नन्हा शांतनु अब बडा हो गया है। परियों को खोजने वाला बेटा कल सचमुच परी लेकर आएगा... उसके हाथ तेजी से ट्टारा-उठाई म लग गए... ’’भाभी तुम थोडा सो लो...‘‘ ट्टानिया काकी कह रही थी, पर वह उन्हें कैसे समझाए कि आज तो नींद कोसो दूर है... उसका बेटा दूल्हा बना क्या कर रहा होगा, शायद जयमाल का समय हो, उसकी बहू कैसी लग रही होगी, गुलाबी जोडा होगा या फिर लाल जोडे में सजी होगी, कितनी सुंदर दिखती होगी...।
शांतनु बचपन में जितना मुखर था, बडे होते-होते उतना ही अन्तर्मुखी हो गया। सुना है उसकी दुल्हन बडी मुखर है, उसकी निश्छल मुस्कराहट और बातों ने शांतनु का दिल जीत लिया था। रूप की भी वह ट्टानी है, उसका संकोची बेटा अपनी दुल्हन को सबके बीच चोरी-चोरी देखता होगा।
’’मो तुम ब्यूटी पार्लर जाया करो... सुनते हैं पार्लर जाने से लोग सुंदर होते हैं।‘‘ उसे शांतनु का बचपन फिर याद आया। साथ ही याद आए अपने पति के व्यंग्य बाण, ’’तुम्हारी मम्मी को कोई पार्लर सुंदर नहीं बना पाएगा... जैसी है वैसी रहने दे... पार्लर की जिद छोड दे बेटा...‘‘ रवीश हेसते और उनका कहा खंजर बनकर सीने में ट्टांसा चुभता और देर तक रिसता, पर जवाब देने का उसे समय नहीं रहता। प्रतिर्याद देने को वह खाली कब रहती, ढेर सारी जिम्मेदारियों के बीच घिरी वह अपने रूप-रंग पर किए आक्षेप सुनकर मौन ट्टाारण किये रहती। शांतनु की रमोला बुआ यदा- कदा आती तो शुरू होती उसकी फैंटसी... जिसमें परियो बढया-बढया खाने को देती, पहनने को देती। वह कहानियों में उन परियों के साथ सुंदर नगरी की सैर करता... वह कल्पना के परों में बैठकर कभी जादू की छडी घुमाता, तो कभी परी सर हिलाकर उसके सामने सब हाजिर करती। इस आत्मसुख को बृंदा उससे हमेशा परी नहीं होती, यह कहकर छीनती आई है।
फिर समय आया जब लाख छिपाने के बावजूद कुछ दबी-ढकी बातें शांतनु के सामने आई। उसे पता चला कि उसके पापा परी से रोजाना रू-ब-रू होते हैं, उसके साथ समय बिताते हैं, कभी-कभार तो एक-दो रातें भी। वह यह भी समझने लगा कि पापा जब पारी के पास होते तो मम्मी छिप-छिपकर रोती... आखिरकार बचपन जाते-जाते शांतनु को सिखा गया कि वाकई परी नहीं होती... तभी शायद वह जरूरत से ज्यादा गंभीर हो गया। अपने काम से काम रखने वाला शांतनु सदा शांत रहा। यह सही है कि वह कभी अपनी मो के पक्ष में नहीं बोला, पर यह भी सच है कि वह अपने पापा-बुआ-दादी की तरह असंवेदनशील न बना... उसके रूप-रंग को कभी निशाना न बनाया... यह बात क्या कम राहत की थी।
’’भाभी अभी क्या हो रहा होगा... बारात का नाच-गाना खत्म हो गया होगा। कहो खाना-पीना चल रहा हो... ब्याह का मुहूर्त हो गया है। अब तो दूल्हा-दुल्हन मंडप के नीचे आ गए होंगे क्यों...‘‘ ट्टानिया काकी के कौतुहल को देख बृंदा एक बार फिर वर्तमान में आई। कल्पना में ही मंडप के नीचे बेटे को फेरे लेते तो कभी कोहबर में देखती झपकियो लेने लगी कि तभी रमोला जीजी का फोन आया...’’बृंदा तुम मजे से सो रही हो और हम यहो जागकर सब संभाल रहे हैं... यहो तुम्हारे लाडले ने नई जिद शुरू की है... कहता है नई बहू सीट्टाा घर जाएगी...‘‘ यह सुनकर बृंदा हडबडा कर बोली, ’’पर जीजी अब घर कैसे...‘‘ ’’पर-वर छोडो, एक गाडी भेज रहे हैं, तुम उसी में बैठकर घर जाओ और सब तैयारी करो... हम घंटे डेढ घंटे में पहचेंगे...‘‘ बदन में पोर-पोर दर्द होने के बावजूद उसने किसी तरह दौड-दौडकर आरती की थाली, न्योछावर मंगल कलश कार में ट्टारवाया... घर पहची तो अस्त-व्यस्त बिखरा घर समेटा... बैठक से लेकर बेडरूम तक जितना हो सका संवारा... सारी व्यवस्था संभालने के बाद चौडे से मिड्डी के पात्र में गुलाब की पंखुडयो डालकर उसमें जल भरा फिर द्वार पर रख दीये लगाए।
आते ही होंगे...सब आते ही होंगे, इस मंत्र उच्चारण के साथ जल्दी से शीरा बनाया। देशी घी की महक पूरे घर में फैल गयी थी। मिठाई के डिब्बे तो हडबडी में गेस्टहाउस में ही छूट गए सो नई बहू का मह मीठा कराने के लिए शीरा ही जल्दी में बन सकता था। शीरा शांतनु को पसन्द भी बहुत था। गाडयों के रुकने की आवाज आई। रमोला जीजी नवदम्पा को बाहर रुकने की हिदायत देकर भीतर आई तो देखा घर की व्यवस्था संभालने में व्यस्त बृंदा साडी बदलना ही भूल गई... बृंदा का हुलिया देखकर रवीश की त्योरियो चढ गयी। वह आरती की थाली लिए सकुचाती आई। दबे-ढके शब्दों में तंज कसती रमोला जीजी सहसा रुकी, शांतनु कह रहा था, ’’माही, मैंने तुमसे कहा था न कि मैं तुम्हे परी से मिलवाेगा... तो ये है मेरी मो...‘‘ बृंदा का जी हलक में अटक गया, जब उसने अपनी ओर इशारा करते हुए शांतनु को देखा... वह सिहर गयी और सब स्तब्ट्टा रह गए।
कभी न बोलने वाला बेटा आज बोल रहा था, ’’मो, कुओ पूजन के समय रस्म के मुताबिक मुझे आफ गले लगना था पर मैं गले नहीं लगा... जानती हो क्यों? ऐसा करता तो सब्र का बोट्टा टूट जाता।‘‘ ’’ये क्या कह रहा है बावले...‘‘ रमोला जीजी कुछ कहने को हुई पर उसने उन्हें इशारे से चुप करा दिया। बृंदा हैरान थी ऐसा तो उसने कभी नहीं किया...
शांतनु कह रहा था, ’’मो, तुमने बचपन से मुझसे झूठ बोला कि परी नहीं होती... जबकि तुम थी। मेरी हर खुशी का ट्टयान तुमने सबसे पहले रखा। मेरे बोलने से पहले तुम मेरी पसंद का खाना सामने रखती, मेरे कपडे ट्टाोती, प्रेस करती... मैं कब क्या पहनना पसंद करता ह, ये तुम जानती। मेरे स्कूल का होमवर्क, मेरी सारी जरूरतों पर तुम ट्टयान ट्टारती... ये सब तो एक परी ही कर सकती है, फिर भी तुम कहती रही कि परी नहीं होती...।‘‘
बृंदा की ओखों से ओसू झर-झर बह रहे थे। शब्द गले में फेसे थे, पर शांतनु अब भी बोल रहा था, ’’मैं नादां बडे होने पर समझा परी काल्पनिक होती है, पर ये समझने में वक्त लगा कि तुम तो प्रत्यक्षा थी।‘‘ उसने होठों पर मुस्कान और ओखों में नमी लिए असहज मो के हाथों को अपने हाथ में लिया... तब तो और भी अजीब स्थिति हुई जब नई बहू ने गले लगकर कहा, ’’मम्मी जी, आफ बारे में इनके मह से बहुत सुना... मैं तो बहुत खुश ह, आपको मो के रूप में पाकर।‘‘
यह सुनकर मंत्रमुग्ट्टा सा अपनी नवविवाहिता को ताकता शांतनु बोला, ’’थैंक्स... जो तुम मुझे हिम्मत न दिलाती तो मैं आज भी अपनी मो से ये सब न कह पाता।‘‘
यह सुनकर वह शरारत से बोली, ’’अच्छा है, देर आए दुरूस्त आए...‘‘
लोगों की सुगबुगाहट और उनके विस्मयजनित भावों से बेपरवाह वह इत्मीनान से रमोला-रवीश और बृंदा की उठती-गिरती पलकों को देख कहे जा रही थी, ’’मैं तो इनके कबसे कह रही ह कि आफ प्रति जो भावनाऐ हैं, वो जाहिर भी कर दें... पर ये कहते थे कि हिम्मत नहीं है‘‘ कहते हुए उसने मनमोहक अदा से शांतनु को देखा और शांतनु ने अपनी जान चुफ से अपनी दोनों पलकें झपकाकर नव विवाहिता पत्नी को कृतज्ञता ज्ञापित कर दी... वाकई एक परी ने उसके बेटे को बदल दिया, इस विचार के साथ बृंदा मुस्करा पडी। रमोला जीजी कुछ कहती, उससे पहले ही बृंदा की चचेरी बहन अंजना बोल पडी, ’’भई बट्टााई हो, इस घर में आज हमारी बृंदा का सास के रूप में जन्म हुआ है।‘‘
रमोला-रवीश स्याह चेहरा लिए वक्त की नजाकत समझकर हेसी के समवेत स्वर में सहयोग करने लगे।
आरती की रस्म करवाती रमोला जीजी बोली, ’’अब क्या सारी बातें यही होंगी बृंदा, तुम तो भई वाकई भाग्यशाली हो, जो ऐसे बेटे-बहू मिले...‘‘ आरती की लौ को ओखों से लगाती हुई माही बोल पडी, ’’भाग्यशाली तो मैं ह, जो ऐसी सासू मो मिली...‘‘ कहते हुए वह सावट्टाानीपूर्वक कलश को पोव से गिराने लगी। बिखरे ट्टाान देखकर सहसा प्रतीत हुआ मानो घर की लक्ष्मी बृंदा के अस्तित्व और उसकी गरिमा के साथ गृहप्रवेश ले रही हो।
द्वारा ः क.पी.एस. त्रिपाठी, २८१/२, लेक कोर्ट्स, उदयपुर मिलिटरी स्टेशन, उदयपुर-३१३००१