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मन का बोझ

एस. भाग्यम शर्मा
’’यह शादी नहीं हो सकती जी, नहीं होनी चाहिए। आप किसी तरह इस शादी को रोकिये।‘‘ कमला के हाथों को पकड कर बडे आवेश में आकर चिल्लाई प्रेरणा।
कमला जो होने वाली समट्टिान थी उसे भारी सदमा लगा। मीशा व सुकुमार दोनों को प्यार हो गया। अब शादी पक्की हो गई थी। ऐसी स्थिति में प्रेरणा ने यह कहकर एक बम ही फोड दिया।
’’ये क्या कह रही हैं आप? आपकी पूरी सहमति है ऐसा मेरे बेटे सुकुमार ने कहा था। फिर ये क्या नई समस्या है?‘‘ कमला को कुछ भी समझ में नहीं आया। उसको तो ऐसा लगा कि उसे किसी ने अेट्टो कुऐ में ट्टाकेल दिया हो।
’’यह सच है पर सच के मालूम होने के बाद मेरी तो जान ही निकल गई।‘‘ प्रेरणा का शरीर अभी भी कोप रहा था।
’’कौनसा सच?‘‘
’’हे भगवान, यह सच कैसे बोल? सुकुमार व मीशा दोनों बहन-भाई हैं। ये क्या ठीक होगा?‘‘
यह बात कमला के क्तदय में तीर जैसी चुभी। यह क्या असमंजस की स्थिति है।
’’यह क्या बक रही हैं आप? होश में तो हैं आप?‘‘
’’मैं बक नहीं रही ह, यह सच है। यह वह सच है जो बीस साल से मुझे अंदर ही अंदर जला रहा है। मेरे मन का बोझ कहे बिना कम नहीं होगा। आपको कहने पर ही मेरे पेट की जलन बुझेगी। उस समय मैं १७ साल की थी। मैं १२वीं पास कर चुकी थी। उसी समय मेरी शादी भी पक्की हो गई व सगाई भी हो गई।
’’घर पर कोई नहीं है क्या?‘‘ सुनकर बाहर आई प्रेरणा, बाहर देख शरमा कर तुरन्त अंदर भाग गई।
’’जवाब क्यों नहीं दे रहे हो?‘‘ बाहर से आवाज आई। दरवाजे के पास खडे होकर ’’मम्मी व मामा शहर गये हैं। कुछ कहना है क्या?‘‘
’’थोडा बाहर आकर बात करो।‘‘
प्रेरणा बिना कुछ कहे मौन रही। कुछ क्षण पश्चात ’’पानी तो मिलेगा न?‘‘
’’एक मिनिट‘‘, कहकर अंदर जाकर शरबत बनाकर पलटी तो उसको इतने समीप देख हिचकिचाई। ’यह कब अंदर आया?‘ वह सोच ही रही थी कि उसके मजबूत बलशाली हाथों ने उसे जकड लिया। उसका शरीर कोपने लगा।
किसी पुरुष का पहला स्पर्श! उसके मन में एक आग उठी। कोपते शरीर पर और कसा उसका हाथ।
’’इतना घबरा क्यों रही हो? तुम्हारा मंगेतर ही तो ह। मेरे साथ ही तो शादी होने वाली है।‘‘ कान में वह बुदबुदाया।
’’फिर भी...फिर भी...‘‘ शब्द बाहर न आकर हवा में ही लहरा गए। उसने उसे बोलने न देकर उसके होठों को बंद कर दिया। उसके हाथ का बंट्टान कसता गया। उसे रोकने का सोचना भी असंभव था। नया अनुभव उससे छूट भी न सकी, न उसे इसकी अनुमति भी दे सकी। इस अवस्था में जब वह थी तो वहो सब कुछ खतम हो गया।
’’डरो मत। बाद में होने वाला पहले हो गया। मैं चलता ह।‘‘ कहकर उसके विदा लेने पर प्रेरणा को कुछ भी समझ में नहीं आया।
उसकी मीठी-मीठी यादें चंदन पीसने पर जो महक हाथ में रह जाती है, ऐसा ही उसने महसूस किया। ये भी कब तक जब तक उनके घर समाचार न आया।
जो सगाई हुई, वह टूट गई। मंगेतर वासू शादी को रुकवा कर शहर चला गया। ऐसा लोग कहते हैं। प्रेरणा की सोस जोर-जोर से चलने लगी।
क्यों! क्यों! क्यों ऐसा किया? उसके मन में बहुत से प्रश्न उठे, पर उनका उार कौन देता? मो और मामा गोव वालों के प्रश्नों का जवाब न दे सके। वे बहुत परेशान हुए।
प्रेरणा की घबराहट दूसरे तरह की थी। एक बार के संबंट्टा ने पेट में जड पकड ली, ये बात उसने महसूस की। उसने तो महसूस ही की, पर अनुभवी मो को जब पता चला तो वह स्तम्भित रह गई। बिना बाप की लडकी उस पर ये हाल! यूं ही सब लोग कुछ-कुछ बकते हैं और जब कुछ मसाला मिल जाए तो क्या कहने! नमक-मिर्ची छौंकन के साथ ही परोसेंगे न! अब क्या होगा
कमजोर दिल की मो दिल को हाथों से थामे जो नीचे गिरी, फिर कभी न उठी। बाप तो पहले ही मर गये थे। मो के मरने के बाद मामा जी सम्भल गये। जो थोडी सी जमीन थी, उसे और घर को बेचकर दीदी की बेटी प्रेरणा को लेकर गोव छोडकर चले गये।
नई जगह में प्रेरणा ने एक बेटी को जन्म दिया। जब बेटी छह महीने की हुई तब प्रेरणा ने अट्टयापक का प्रशिक्षण लिया और अट्टयापिका बन गई, लगातार आगे पढती भी गई।
बेटी मीशा भी बडी होकर पढ-लिखकर नौकरी करने लगी। एक दिन मीशा सुकुमार को साथ लेकर आई और उससे शादी करने की मो से अनुमति मोगी। प्रेरणा को भी सुकुमार पसन्द आया और उसने सहर्ष अपनी स्वीकृति दे दी।
सब ठीक ही चल रहा था। एक दिन मीशा अपनी मो के साथ मंदिर गई। वहो मीशा ने एक दम्पा की ओर इशारा कर बताया कि ये ही सुकुमार के माता-पिता हैं।
’’ये वासू ही सुकुमार के पिताजी हैं?‘‘ कहकर बेहोश हो गई प्रेरणा! पूरी रात बुखार में तपती रही। मन में घबराहट रही। इसीलिए कमला को देखने दौडकर आई।
’’प्रेरणा ज्यादा परेशान मत हो..। आपका शरीर व मन ऐसा क्यों कांप रहा है?‘‘ कमला बोली।
’’मैं जो कह रही ह, उसे आप ट्टयान व ट्टौर्य से सुनिये। मेरी शादी के बाद दो बार मेरा अबार्शन हुआ। तीसरी बार बच्चा पोचवे महीने तक पहचने पर मेरे स्वास्थ्य के लिये खतरा हो या। अतः ऑपरेशन से मरे भ्रूण को हटाया और मुझे कह दिया, ’’अब आपको बच्चा हो ही नहीं सकता। आफ भाग्य में बच्चा नहीं है।‘‘ कमला ने दीर्घ निःश्वास लेकर बात समाप्त की।
’’ऐसी बात है तो ये सुकुमार?‘‘ प्रेरणा का चेहरा दमका।
’’हो प्रेरणा, ये सुकुमार मेरी ननद का बेटा है। छुटपन में ही एक एक्सीडेन्ट में माता-पिता को खो चुका था। हमें ही मो-बाप मानता है। उसे कुछ पता नहीं।‘‘ पूजा की थाली से कुमकुम निकाल कर प्रेरणा को लगाने को कमला ने दिया व बोली, ’’अब प्रेरणा जी आप माथे पर कुमकुम लगा लीजिये। अभी तो मीशा के पिता जिंदा हैं। आपने तो देखा ही है।‘‘
’’अब कमला मेरे कुमकुम लगाने से क्या हो जायेगा? जो कुछ होना था, वह हो चुका। अब तो बिना मतलब की समस्याऐ ही खडी होगी। मेरे लिए तो कम से कम मीशा के पिता एक खत्म हुआ अट्टयाय है। बिना शादी के, पिर से गर्भवती होना। ये शहर क्या पूरे संसार में बातें होगी! उस आदमी का तो कुछ न बिगडा। पर मुझे तो बिना शादी के एक विट्टावा का जीवन जीना पडा। इस समाज की जो भी कुरीतियो व अन्याय हैं, वह औरतों के लिए ही तो है। इसीलिये बिना शादी को ही मैंने अपने को विट्टावा बना लिया। सिर्फ कुमकुम व सिंदूर से ही दूर न रही, वरन् सारे “ाृंगार को भरी जवानी में दूर किया। शादी के दूसरे महीने में ही पति मर गया। सबसे झूठ बोला।‘‘ दो क्षण रुककर फिर बोली, ’’उस झूठ के कारण समाज ने हमें स्वीकार किया व इज्जत दी। ऐसे ही बाकी दिनों को भी चला लगी। ये ही मेरे लिए और औरों के लिए भी अच्छा है। अब बिंदी लगा, मोग भरने से सब पूछेंगे, प्रेरणा टीचर को क्या हुआ? कौन है वह जिसके लिए मोग भर रही हैं? मेरी बेटी की शांति को खतरा हो जाएगा। अब इन सबकी जरूरत ही क्या है? मने जो किया उसका प्रायश्चित ही मैं कर रही ह। इसी में सबका फायदा होगा व संतुष्टि भी मिलेगी।‘‘ कहकर चुप हो गई प्रेरणा।
सोचकर देखने पर कमला को उसका कहना न्यायसंगत होने पर भी उसको बहुत बुरा लगा। मन दुःखी हुआ। प्रेरणा की इस हालत का कारण उसका स्वयं का पति ही है, मालूम होने पर उस पर भी बहुत गुस्सा आया। कुछ ही मिनिट... वह भी मंगेतर, पति ही होने वाला है, सोच थोडा उदार होने का इतना बडा दण्ड
बेचारी प्रेरणा ने एक बडे बोझ को उठाकर अपने जीवन के बहुत बहुमूल्य समय को तपस्वी व छोटी संन्यासी जैसे बिताया।
’’कमला, आप उस पेड के पास देखो ना, सुकुमार मीशा को लेकर आ रहा है। कितनी अच्छी जोडी है।‘‘ कहकर प्रेरणा बच्चों जैसे हेसने लगी। वह भी हेसी और दूर खडी वह जोडी भी हेस रही थी। उन्हें देखकर प्रेरणा व कमला भी सब कुछ भूलकर मुस्कराने लगी और प्रेरणा को लगा जैसे सालों का बोझ उसके मन से हट गया हो।
बी-४१, सेठी कॉलोनी, जयपुर-३०२००४,
मो. ९४६८७ १२४६८