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बिजली बन्नो

आशा शर्मा
’’बिजली बन्नो! नहीं-नहीं... वो यहो कैसे हो सकती है? उसे तो मैं ७ साल पहले जुआदरा में छोड आयाथा... शायद ये मेरी ओखों का भ्रम है... चेहरा ठीक से नहीं देख सका, लेकिन इस बिजली-सी बल खाती चाल को पहचानने में मेरी ओखें ट्टाोखा नहीं खा सकती... हो! ये वही है...‘‘ मनीष अपने आप से तर्क कर रहा था।
जयपुर रेलवे स्टेशन पर अचानक एक आकृति मनीष के सामने आई और भीड के रेले के साथ बह गई। मनीष ने दौडकर उसका पीछा किया। मुख्य दरवाजे से बाहर निकलते समय भी उसकी ओखें चारों तरफ उसे ही टटोल रही थीं। अचानक उसने देखा कि वह लडकी एक ऑटो रिक्शा में बैठकर चल दी। मनीष ने तुरन्त दूसरे ऑटो वाले से उसके पीछे चलने को कहा। कुछ ही देर में दोनों ऑटो सवाई मानसिंह अस्पताल के सामने रुक गये। मनीष ऑटो वाले का हिसाब करके मुडा, तब तक बिजली फिर से ओझल हो चुकी थी।
’’ये बिजली भी ना... बिजली की ही तरह ओख-मिचौली खेलती है... अभी थी... अभी गायब...।‘‘ सोचते हुए मनीष मुस्कुराया और हॉस्पिटल के मुख्य दरवाजे की तरफ बढ गया। अब बिजली उससे महज ५० कदम की दूरी पर ही थी।
’’बिजली बन्नो!‘‘ मनीष की पुकार के साथ ही आगे चलती लडकी एक पल को ठिठकी, फिर तेजी से बढ गई। मनीष का शक यकीन में बदल गया कि ये बिजली ही है। वह तेजी से लपका और उसका रास्ता रोक कर खडा हो गया।
’’बिजली, सुनो तो!‘‘ मनीष गिडगिडाया।
’’आपको गलतफहमी हुई है... मेरा नाम बिन्नी है मास्टर जी...‘‘ कहती हुई वह लडकी जनरल वार्ड के अंदर दाखिल हो गई। मनीष ने उसे रोकना चाहा मगर सिक्यूरिटी गार्ड ने डॉक्टर्स के राउण्ड का समय देखते हुए दरवाजा बंद कर दिया।
’’कडवी ही सही... यादों की परछाई बाकी तो है...‘‘ सोचता हुआ मनीष वहीं बाहर वेटिंग हॉल में बैठकर इंतजार करने लगा। कुछ कडवी, कुछ मीठी यादें जेहन में तैरने लगी।
लगभग १० साल पहले की बात है। बेरोजगारी की मार झेल रहे जयपुर निवासी मनीष को जब सीमांत जिले बांसवाडा के छोटे से आदिवासी बहुल गोव जुआदरा में तृतीय श्रेणी अट्टयापक की नौकरी मिली तो उसने सोचने में बिना एक पल गंवाये अपना बिस्तर बोट्टा लिया था। यह गोव जिला मुख्यालय से लगभग ४० किलोमीटर की दूरी पर था। वहो की विषम परिस्थितियो देखकर एक बार तो उसे अपने फैसले पर अफसोस हुआ और उसने वापस लौटने का मानस बना लिया, मगर फिर यह सोचकर अपना विचार बदल लिया कि कौन जाने फिर और कोई नौकरी मिले या ना मिले।
बहुत मेहनत और अथक प्रयासों से मिली इस उम्मीद की किरण के दामन को वह छोडना नहीं चाहता था।
मनीष को यहो दो साल हो चले थे। एक और अट्टयापक शेखर की नियुक्ति के साथ ही अब वहो कुल तीन व्यक्तियों का स्टाफ हो गया था। प्रट्टाानाट्टयापक विष्णु जी बांसवाडा के ही थे और हर रोज आना-जाना किया करते थे, इसलिए स्कूल का सारा काम मनीष और शेखर ही देखा करते थे।
इस सरकारी स्कूल में नामांकन जरूर २० बच्चों का था, मगर पढने के नाम पर सिर्फ ३ ही बच्चे स्कूल आते थे। हो! अट्टिाकांश बच्चे आट्टाी छुड्डी में पोषाहार वितरण के समय अवश्य ही दिखाई दिया करते थे।
अब मनीष को वहो का माहौल रास आने लगा था। भोले-भाले आदिवासी वैसे तो अपने काम से काम रखते थे, लेकिन अट्टयापकों के लिए उनके मन में एक विशेष सम्मान का भाव था। उन्हें अपने जंगलों से बहुत प्यार था। वे अपने कबीले के नियम-कायदों पर ही भरोसा करते थे। उनकी अपनी पंचायत होती थी, जिसके फैसले सभी सिर झुका कर स्वीकार करते थे। वहो कबीले के मुखिया को भगवान के समान दर्जा दिया जाता था। देश के संविट्टाान और कानून से उन्हें कोई लेना-देना नहीं था। मनीष को उनके मेले-त्यौहार और रीति-रिवाजों में भी खूब आनन्द आता था।
आदिवासी बच्चों को शिक्षा और समाज की मुख्य ट्टाारा से जोडने के लिए चलाये जाने वाले विशेष अभियान के तहत मनीष एवं शेखर को घर-घर सम्फ करके गोव वालों को समझा कर अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करता था। इसी दौरान राट्टोश्याम के घर उसका जाना हुआ। बिन्नी राट्टोश्याम की इकलौती बेटी थी। गहरा सांवला रंग... टखनों से कुछ पिर तक पहना खूब घेरदार घाघरा और शीशे- कोडी जडी तंग कुर्ती... हाथों में हाथीदांत का चूडा और पोवों में चोदी के मोटे-मोटे कडे... इन सबके अलावा जो उसे अन्य आदिवासी लडकियों से अलग करता था वो था उसकी दाहिनी बोह पर बना हुआ दमकती बिजली की सी आकृति लिए गोदना... शायद यह सोप की आकृति थी, मगर मनीष को तो बिजली सी ही लगी। राट्टोश्याम के अनुसार बिन्नी की उम्र स्कूल नहीं, बल्कि ससुराल जाने की थी। १६ साल की बिन्नी ने कभी स्कूल का मह नहीं देखा था, लेकिन पढने की ललक उसे बहुत थी। बेटी की इच्छा और मनीष के व्यवहार को देखते हुए राट्टोश्याम ने उसे स्कूल भेजने की हामी भर दी।
बिन्नी उम्र के लिहाज से अपनी क्लास के बच्चों में सबसे बडी थी। अक्षर ज्ञान के अलावा उसे शेष सभी तरह का व्यावहारिक ज्ञान था। बात-बात पर खिलखिलाना उसकी आदत में शुमार था। जब वह हेसती थी तो उसके चेहरे पर एक ट्टावल पंक्ति बिजली सी चमक जाती थी। उसके काम में बिजली-सी फुर्ती थी। स्कूल में उसका आना-जाना भी गोव की बिजली व्यवस्था जैसा ही होता था। अभी है... अभी गायब...। मनीष ने मन ही मन उसे नाम दे दिया था - ’’बिजली बन्नो।‘‘
इस साल कबीले के मुखिया के विशेष आग्रह पर मनीष को सोम और माही नदियों के संगम पर लगने वाले वहो के प्रसि= बेणेश्वर मेले में जाने का अवसर मिला। आदिवासियों के कुम्भ कहे जाने वाले इस मेले में बिजली की भोति लरज-लरज कर लोकनृत्य करती बिन्नी को मनीष अपलक देखता ही रह गया। जब वह शिवमंदिर की सीढयों पर बैठी अपना पसीना पौंछ रही थी, तभी मनीष उसके पास गया।
’’तुम्हारा नाम तो बिन्नी नहीं, बल्कि ’बिजली‘ होना चाहिए... क्यों बन्नो? सही कहा ना मैंने... बिजली बन्नो...‘‘ मनीष की चुहलबाजी से बिन्नी के गाल सुर्ख हो गये थे। उसके कुंवारे श्वेत-श्याम मन में कितने इन्ध्ट्टानुष खिल उठे थे, ये मनीष नहीं देख पाया था।
अब बिन्नी का स्कूल आना नियमित हो चला था। कुछ सीखने की ललक लिए वह हर वक्त मनीष के आगे-पीछे मंडराती रहती। मनीष भी उसके भीतर छिपी प्रतिभा को निखारना चाहता था। वह अपने सुदृढ तने के सहारे उस नाजुक लता को ेचाइयो देना चाहता था...
बिन्नी की लगन और मनीष की मेहनत के नतीजे दिखाई देने लगे थे। बिन्नी अब काफी कुछ पढने- लिखने लगी थी। मनीष चाहता था कि बिन्नी सीट्टो ही पोचवी कक्षा की जिला बोर्ड परीक्षा दे। उसके बाद आठवीं और फिर दसवीं... बिन्नी तो उत्साहित थी ही। राट्टोश्याम भी इसके लिये तैयार हो गया था। परीक्षा से एक महीना पहले मनीष ने राट्टोश्याम के सामने बिन्नी को स्कूल के बाद अतिरिक्त समय पढाने का प्रस्ताव रखा, जिसे उसने सहज स्वीकार कर लिया।
अब बिन्नी हर रोज शाम को मनीष के घर पढने के लिए आने लगी। अक्सर ही वह मनीष के लिए रात का खाना अपने घर से लाने लगी थी। ३-४ घंटे पढने के बाद दोनों साथ खाना खाते और फिर अेट्टोरा होने पर मनीष उसे उसके घर के बाहर तक छोड आता था। अेट्टोरे में बिन्नी उसका हाथ कसकर पकड लेती थी। कभी-कभी किसी जंगली जानवर की आवाज से डरकर उससे लिपट भी जाती थी। उसके स्पर्श से मनीष में एक अजीब से उोजना भर उठती।
स्त्री देह के प्रति आकर्षण पुरुष की सहज प्रवृा है। अवसर और उपलब्ट्टाता इसकी तीव्रता को और भी अट्टिाक बढा देती है। मनीष भी अनजाने ही बिन्नी की तरफ झुकने लगा था, लेकिन बिन्नी के प्रति तीव्र आकर्षण के बावजूद भी मनीष ने कभी अपनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया था।
एक शाम जब बिन्नी मनीष के घर आई तो हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। देखते ही देखते यह तेज बारिश में बदल गई। बिजली भी गुल हो गई थी। बरसाती नालों में उफान के कारण बिन्नी वापस अपने घर नहीं जा पा रही थी। उसने जाने की जिद की, क्योंकि वह जानती थी कि उनके जनजातीय जीवन में किसी पराये पुरुष के घर में रात बिताने को माफ नहीं किया जाता, मगर मनीष कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहता था, उसने उसे रोक लिया। बिन्नी ने जबरदस्ती बाहर की तरफ जाने की कोशिश की, जल्दबाजी में बिन्नी का पोव फिसल गया और वह गिर पडी। उसे सेभालने के चक्कर में मनीष भी रपट गया। दोनों एक-दूसरे को थामे कीचड में सन गये। अपनी हालत देखकर दोनों की हेसी फूट पडी। तभी बिजली कडकी और बिन्नी डर के मारे मनीष से लिपट गई। मनीष के पूरे शरीर में बिजली सी दौड गई।
’’अरे बाप रे! तुम तो ४४० वोल्ट का करंट मारती हो।‘‘ मनीष ने हौले से उसके कान में कहा।
’’बिजली किसी की दोस्त नहीं होती बाबू... सावट्टाानी न बरती जाये तो जान भी ले लेती है।‘‘ बिन्नी ने इठला कर कहा। जब उसे मनीष पर लाड आता था तब वह उसे इसी नाम से पुकारती थी।
’’अच्छा! बडी ज्ञानी हो गई तुम तो... मगर यही बिजली हमें जिार् भी देती है... है के नाम... बिजली बन्नो।‘‘ और इसके साथ ही एक सम्मिलित खिलखिलाहट ने बारिश की बूंदों के साथ जुगलबंदी कर ली। आज मनीष का दिल भी बेकाबू होकर उसकी चेतना पर हावी होने लगा था। वह बिन्नी को खुद से अलग नहीं कर पा रहा था।
दुनिया-जहान से बेखकर दो पंछी प्रणय र्‍ीडा में खो जाते, इससे पहले ही वज्रपात हुआ। राट्टोश्याम अपने दो साथियों के साथ खडा उन्हें घूर रहा था।
’’अच्छा! तो पढाई के बहाने ये सब हो रहा है... ये तूने ठीक नहीं किया मास्टर... यहो किसी के घर की इज्जत से खिलवाड करने की सजा क्या होती है, शायद तू नहीं जानता... मैं कल ही पंचायत बुलाउेगा, वही तुम्हारा भविष्य तय करेगी...‘‘ राट्टोश्याम गुस्से से कोप रहा था और बिन्नी डर से। राट्टोश्याम बिन्नी का हाथ पकडकर लगभग उसे घसीटता हुआ सा अपने साथ ले गया।
शोर सुनकर शेखर दौडता हुआ आया। उसने हेड मास्टर जी को फोन लगाकर पूरी घटना के बारे में जानकारी दी। हेड मास्टर जी कबीले के नियमों से भलीभोति वाकिफ थे। उन्होंने मनीष से तुरन्त ये गोव छोडने को कहा और इस तरह रात के अेट्टोरे में ही मनीष वहो से निकल आया। उसके बाद हेड मास्टर जी ने जिला शिक्षा अट्टिाकारी को घटना से अवगत करवाते हुए उसके टत्रंसफर की अनुशंसा कर दी और वह जयपुर के पास बसे चौमूं कस्बे में आ गया। फिर उसके बाद बिन्नी का क्या हुआ, मनीष को कुछ पता ही नहीं चला। आज अचानक उसे यहो इस हाल में देखकर वह तडप उठा था। कहीं न कहीं वह बिन्नी की इस हालत का कुसूरवार खुद को समझ रहा था।
दरवाजा खुलने की आवाज से मनीष वर्तमान में आया। डॉक्टर अपना राउण्ड खत्म करके जा चुके थे। वार्ड अब मिलन-जुलने वालों के लिए खोल दिया गया था। मनीष भी भीतर गया। देखा तो एक बेड के सिरहाने बिन्नी खडी थी। बेड पर लेटा हुआ मरीज लगभग मरणासन्न अवस्था में था। मनीष को अपनी तरफ आते देखकर बिन्नी वार्ड के दूसरे दरवाजे से बाहर निकल गई। उसके पीछे-पीछे मनीष भी।
’’मैं तुम्हारा गुनहगार ह बिजली बन्नो! मैं कायर था... हालात का सामना करने की बजाय भाग निकला... माफी नहीं मोगगा... तुम तो बस मुझे सजा दे दो... ताकि मेरे भीतर की आग कुछ शांत हो सके...‘‘ मनीष ने उसके दोनों हाथ पकड लिए।
’’सजा किस बात की बाबू! बेमेल प्रेम की यही नियति होती है... अच्छा ही हुआ जो तुम उस रात वहो से भाग आये थे वरना आज यहो मेरे सामने न खडे होते... पंचायत में तुम्हारी मृत्यु तय थी... मैंने तो तुम्हें कब का माफ कर दिया था।‘‘ बिन्नी ने कहा।
’’अच्छा ये बताओ! तुम यहो कैसे? कौन है ये व्यक्ति? क्या हुआ इसे?‘‘ मनीष ने एक साथ कई प्रश्न पूछ डाले।
’’उस रात की घटना के बाद बाबा मुझे लेकर सीट्टो मुखिया के घर गए और सुबह ही पंचायत बुलाकर तुम्हें दंड देना तय किया गया। तुम तो मिले नहीं, लेकिन मुजरिम तो मैं भी थी ना... बस! सजा के रूप में इस पचपन वर्षीय हीरा से मेरी शादी कर दी गई। मेरे पढने-लिखने के सपने चूर-चूर हो गये... हीरा शराब का आदी था... उसका लीवर खराब हो गया तो इलाज के लिए यहो राजट्टाानी आ गया, मगर पीना फिर भी नहीं छोडा। एक रोज ठेके पर गश खाकर गिर पडा। लोगों ने तरस खाकर अस्पताल में भर्ती करवा दिया। मुझे खबर मिली तो आज यहो आई ह। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है। अब अपनी आखिरी सोसें गिन रहा है... इसके बाद मैं विट्टावा हो जाेगी, फिर किसी दूसरे पुरुष के घर नाते बैठा दी जाेगी.. उसका मन भर जायेगा तो किसी तीसरे के... गेंद सी हो जाएगी जिंदगी... कभी इस पाले में तो कभी उस पाले में...‘‘ बिन्नी ने कुछ ओखों से तो कुछ शब्दों में... सब कुछ बयान कर दिया।
जिस दर्द को वह ७ मिनट नहीं सहन कर सका, उस पीडा को बिन्नी ७ वर्ष से सहन कर रही है... उस अपराट्टा की सजा जिसमें वह बराबर का भागी था, बिन्नी अकेली भुगत रही है...‘‘ मनीष धिवत हो गया।
’’मेरी छोडो... तुम अपनी कहो... तुम्हारे परिवार में सब कैसे हैं? तुम्हारी पत्नी... बच्चे... मो-बाप सब?‘‘ मन का गुबार निकलने के बाद बिन्नी अब सामान्य हो आई थी।
’’मो-बाप अनंत ट्टााम को चले गये और परिवार बसाने का मन ही नहीं हुआ... बस... चौमूं से रोज आना-जाना करता ह। देर शाम तक यहो रेलवे स्टेशन पर बैठकर लोगों का रेला देखता रहता ह... थक जाता ह तो उठ कर चल देता ह... वैसे भी कौन है जो मेरा इंतजार करता है... अकेला आया था और अकेला ही चला जाेगा...‘‘ मनीष सूखी से हेसी हेसता हुआ बोला।
’’अच्छा! चलता ह... फिर आेगा।‘‘ बिन्नी को दवाऐ और फल आदि थमाकर मनीष चला गया। जाते-जाते उसे कुछ रुपये भी थमा गया।
मनीष स्कूल से छुड्डी लेकर बिन्नी के साथ हीरा की तीमारदारी में जुट गया, लेकिन सप्ताह भर तक संघर्ष करने के बाद आखिर हीरा जिंदगी की जंग हार गया। मनीष ने पूरे विट्टिा-विट्टाान के साथ उसका अंतिम र्यांकर्म करवाया और बिन्नी के साथ उसकी अस्थियो लेकर बेणेश्वर ट्टााम गया।
’’अब क्या सोचा है बिन्नी?‘‘ मनीष ने बीच नदी में अस्थियो प्रवाहित करने के बाद पूछा।
’’सोचना क्या है बाबू! मेरी जिंदगी तो बिना मांझी की नाव सी है। इसे वक्त की लहरों के हवाले कर दगी... जैसे बहा ले जाएगी, बह जाेगी...।‘‘
’’यदि इस नाव की पतवार मैं थामना चाह तो? क्या मेरे साथ बहना चाहोगी?‘‘ मनीष ने उसका हाथ थाम लिया। मल्लाह नाव को किनारे की तरफ मोडने लगा था। बिन्नी ने उसके कंट्टो पर अपना सिर टिका दिया। अपनी जिंदगी की नाव की पतवार मनीष को थमा कर सुकून महसूस कर रही थी।
ए-१२३, करणी नगर ;लालगढद्ध, बीकानेर-३३४००१ मो. ९४१३३ ५९५७१