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लौटते हुए

क्षमा चतुर्वेदी
पुराने एलबम के पन्ने पलटते हुए एक फोटो पर मेरी नजर अटक गई थी। फोटो अंजु भाभी का था। इनके साथ काफी दिन बिताए थे मैंने और कितनी ही यादें जुडी हुई थीं। बीते कई साल जैसे मेरी नजरों के सामने से गुजर गए थे।
असल में मेरी शादी भाई साहब की शादी के पोच साल बाद हुई थी और अंजु भाभी एक प्रकार से मेरी हमउम्र ही थीं। तब भाभी के साथ बाजार जाना, घूमने जाना या उनके साथ खाना बनवाना, ये सारे दायित्व मेरे ही थे। पढाई-लिखाई के कारण अब तक मैं घर के कामों में ट्टयान नहीं दे पाई थी तो मो का फरमान होता -
’’जा, भाभी के साथ रसोई के काम में हाथ बेटा, तुझे भी तो चार दिन बाद ससुराल जाना है।‘‘
तब मन मारकर ही, अपनी किताब फेंककर मुझे भाभी के साथ काम में लगना पडता था।
वैसे अंजु भाभी रसोई के कामों में काफी कुशल थीं। सब्जी, दाल, अचार कोई भी व्यंजन हो, उनके हाथ से लजीज ही बनता था और रसोई के काम ही क्यों, सिलाई-बुनाई, गाने-बजाने सभी में वे अव्वल थीं। मो की तो यही इच्छा रहती थी कि मैं अब अपनी पढाई-लिखाई भूलकर अट्टिाकांश समय भाभी के साथ ही बिताे।
फिर शादी के बाद भी जब भी मायके आती, अंजु भाभी बेसब्री से मेरा इंतजार करती मिलतीं। उनके पास भी बातों का बडा-सा पिटारा होता था मुझे सुनाने को। बस हम दोनों की खुसर-फुसर चलती रहती। भाभी के दोनों बेटे रोहित और शोभित भी बुआ-बुआ कहकर मुझसे लिपटे रहते। जानते थे कि वे जो भी फरमाइश करेंगे, बुआ पूरी कर देंगी। छोटी बेटी श्वेता तो मुझे एक पल के लिए भी नहीं छोडती।
ट्टाीरे-ट्टाीरे मेरे भी घर-गृहस्थी के दायित्व बढ रहे थे। बच्चे बडे हो रहे थे। उनकी पढाई-लिखाई, पति का व्यवसाय और मेरी स्वयं की नौकरी। अब मैं मायके कम ही जा पाती थी। फिर मो के निट्टान के बाद से तो मायका लगभग छूट ही गया था। अब तो शादी-ब्याह या तीज-त्यौहार पर कभी भाभी के आग्रह पर दो-चार दिन को जाना हो पाता था। पर इस बीच में मैंने पाया कि अब भाभी का स्वास्थ्य पहले जैसा नहीं रहा है। काम करते-करते होफ जाती थी। सिलाई-बुनाई तो पहले ही छोड चुकी थी।
उनकी मदद के लिए भाई साहब ने खाना बनाने के लिए महाराजिन भी रख ली थी पर खाना बनाना और सबको खिलाना तो उनका पहला शौक था। पर अब बच्चों की शादी हो चुकी थी। शोभित मुम्बई में था और रोहित बैंगलोर में। श्वेता भी अपनी ससुराल में थी।
’’अब खाना बनाे भी तो खाए कौन, मैं बीमार, तुम्हारे भाई साहब तो शुरू से ही परहेजी खाना खाने वाले...‘‘
भाभी का शिकायती स्वर सुनकर मैं मजाक करती - ’’कोई बात नहीं भाभी, मैं खा लगी, आप तो बनाओ।‘‘
मेरे मजाक से ही वे खुश हो जाती। पर उनके स्वास्थ्य की अब मुझे भी चिंता होने लगी थी। घुटने के दर्द से वे काफी दिनों से परेशान थीं, ऑपरेशन कराया तो वह भी सफल नहीं रहा। इट्टार रीढ की ह्यी में भी कुछ खराबी आ गई थी तो उठना-बैठना मुश्किल हो गया। डॉक्टर ने उन्हें बेड-रेस्ट की सलाह दी थी, खबर सुनकर मैं भी उन्हें देखने पहची।
भाई साहब तो बाहर बरामदे में कुर्सी पर बैठे रो रहे थे।
’’भैया, क्या हुआ?‘‘ मैं तो अब घबरा ही गई थी।
’’रज्जो! तेरी भाभी अब चली जाऐगी मुझे छोडकर।‘‘
उनकी भीगी आवाज मुझे भी भिगो गई थी।
’’ऐसा क्यों सोचते हो भैया, भाभी ठीक हो जाएगी। आप सारे टेस्ट करवा तो चुके हो। अब थोडा बहुत तो बीमारी है, वह भी दवाई और आराम से ठीक हो जाएगी।‘‘
’’नहीं रज्जो, मुझे लगता है कि इसे कोई गंभीर बीमारी है, नहीं तो डॉक्टर इस प्रकार बेड रेस्ट के लिए क्यों कहते?‘‘ भैया मेरी बात मान ही नहीं रहे थे।
’’पहले तो मैं उसे बहुत डांटता था कि आजकल की पढी-लिखी महिलाओं की तरह क्यों नहीं रहती हो। घर से बाहर निकला करो। बैंक के काम अपने आप करो, अकेले सफर करना सीखो। क्यों हर बात पर उस पर आश्रित हो गई हो। आखिर बी.ए. पास हो। पर अब मैं सोचता ह कि यह जैसी भी है, अच्छी है। बस स्वस्थ रहे, मुझे इस मंझट्टाार में छोडकर नहीं जाए। आखिर इस उम्र में हम दोनों को एक-दूसरे का ही तो सहारा है। बेटे-बहू तो अपनी दुनिया में व्यस्त हैं।‘‘
’’भैया, भाभी को कुछ नहीं होगा, आप नाहक परेशान हो रहे हैं। कुछ दिनों को डॉक्टर ने बेड रेस्ट बता दिया है ताकि आराम करें और स्वस्थ हो जाएं। फिर आपको वैसा ही लजीज खाना बनाकर खिलाऐगी, शायद नौकरानी के हाथ का बना खाना खा-खाकर आप परेशान हो रहे हैं।‘‘
मैंने माहौल को थोडा हल्का बनाना चाहा था, पर भैया गंभीर ही थे।
कुछ दिन रहकर मैं लौट आई थी। भाभी प्रायः ठीक हो चली थीं। तभी अचानक खबर मिली कि भैया को हार्ट अटैक पडा और वे चल बसे।
सब अवाक थे। मैं तो विश्वास ही नहीं कर पा रही थी, इतने चुस्त भाई से अभी कुछ महीनों पहले ही तो मिलकर लौटी ह। फिर क्या हुआ? उन्हें तो हार्ट की कोई प्रॉब्लम भी नहीं थी। क्या भाभी के स्वास्थ्य के बदले अपनी बीमारी मांग ली थी उन्होंने।
आनन-फानन में पहची, सारा माहौल गमगीन था। मेरी तरह कोई भी भाई की इस असमय मृत्यु पर विश्वास ही नहीं कर पा रहा था, पर नियति के सामने तो सभी विवश थे।
भाभी तो जैसे पाषाणवत हो गई थी। न रो रही थी, न किसी से बात कर रही थीं। बस पथराई ओखें उनकी पता नहीं क्या देख रही थीं, शून्य में।
भाभी का अब क्या होगा, कैसे रहेंगी अकेली? मैं तो समझ ही नहीं पा रही थी। यह तो एकदम से भाई पर ही समर्पित थी, पूरी दुनिया ही इनकी भाई के इर्द-गिर्द घूमती थी। बाहर के परिवेश से जैसे कोई वास्ता ही न हो। बेटों ने दौड-ट्टाूप करके उनकी पेंशन का काम व्यवस्थित किया, बैंक के काम, प्रॉपर्टी का हिसाब, दुनियाभर के काम थे, पर भाभी सबसे अनजान कमरे में एक कोने में बेजान मूर्ति सी बैठी रहतीं। इट्टार अस्थमा का भी फिर से अटैक पड गया तो अस्पताल में एडमिट कराना पडा उन्हें।
ट्टाीरे-ट्टाीरे और रिश्तेदार विदा हो गए। बडे से घर में क्या भाभी अकेली रह पाऐगी, सवाल मन म घुमड ही रहा था कि तभी बडे बेटे रोहित ने कहा - ’’मैं मो को अपने साथ मुम्बई ले जा रहा ह। य्लैट छोटा है तो क्या हुआ, हमारे साथ रहेंगी, तो देखभाल हो जाएगी।‘‘
सबको यही ठीक लगा था, फिर शोभित ने भी कहा - ’’कुछ दिनों बाद बच्चों के इम्तहान हो जाऐगे तो मैं मो को बैंगलोर बुला लगा, उनका चेंज हो जाएगा।‘‘
जैसी भी हो, यही व्यवस्था सबको ठीक लगी थी। फिर भाभी रोहित के साथ मुम्बई चली गइङ। फोन पर यदा-कदा उनसे बात हो जाती। मैं सोचती कि अब तो मेरा मायका बिल्कुल ही छूट गया। भाभी से मिलने मुम्बई भी रोहित के छोटे से य्लैट में जाना मुश्किल ही है। उन लोगों को परेशानी होगी। फिर कुछ दिनों बाद खबर मिली कि वे शोभित के पास बैंगलोर आ गई हैं, सोचा कि अब अगर सुविट्टाा होगी तो मैं कुछ दिनों के लिए बैंगलोर हो आेगी। शोभित का तो य्लैट कुछ बडा होगा। शोभित कह भी रहा था कि मुम्बई के छोटे-से य्लैट की आबोहवा मो को रास नहीं आ रही थी, उनकी तबियत ठीक नहीं रहती थी तो उन्हें बैंगलोर ले आया है।
मैं बैंगलोर जाने का प्रोग्राम बनाने की सोच ही रही थी कि एक दिन भाभी का फोन आया कि वे भोपाल आ गई हैं, तो अब भोपाल ही आ जाना।
मैं तो एकदम चौंक गई। यह भाभी को क्या सूझी, तबियत ठीक रहती नहीं है। भोपाल में किसके पास रहेंगी। बेटों ने उन्हें जाने क्यों दिया।
शोभित और रोहित से भी बात की, उनका भी यही कहना था कि बुआ आप समझाओ मो को, इस उम्र में अकेले रहने की क्या सूझी उन्हें, कुछ हो गया तो कौन संभालेगा
पर हुआ क्या? क्यों चली गई? मैं अब तक समझ नहीं पा रही थी।
उट्टार रोहित का कहना था... ’’बुआ मुम्बई में तो छोटे से य्लैट से इनको परेशानी थीं, कहती थीं कि दो कमरों में दम घुटता है। न तो खुला आसमान दिखता है और न ओगन। तो मैंने और शोभित ने समझाया कि ऐसा करते हैं कि भोपाल का मकान बेच देते हैं, बाद में भी बिकेगा ही। फिर यहो बडा य्लैट ले लेते हैं, पर वे तो सुनने को ही राजी नहीं थी।‘‘
मुझे भी बेटों की बात ठीक लगी थी, वैसे भी अब भोपाल के मकान का करना क्या है, बेटों के पास आराम से रहें।
’’ठीक है, मैं बात करूेगी।‘‘
मैंने भी कह दिया था। सोचा यही था कि मेरी बात तो मान ही लेंगी। कुछ महीनों बाद ही भोपाल जाने का कार्यर्म बन पाया था। स्टेशन पर भाभी के साथ डत्रईवर को खडा देखकर आश्चर्य हुआ था - ’’अरे भाभी आप! और गाडी कब ले ली?‘‘
’’ले ली बस, पुरानी कार है। पर काम तो दे ही रही है, अब चलें।‘‘
’’भाभी, सचमुच बहुत अच्छा लग रहा है। आपको इस तरह देखकर लगता है कि अब हमारी भाभी में आत्मविश्वास आता जा रहा है।‘‘ मैंने मजाक किया तो भाभी मुस्करा दीं।
पुराने घर को भाभी ने थोडा ठीक-ठाक करा लिया था। पिर का हिस्सा किराए पर दे दिया था तो कुछ आमदनी भी होने लगी थी। दिनभर के लिए एक नौकरानी रख ली थी, जो हमारे घर पहचते ही चाय, नाश्ता ले आई थी।
’’वा! अब लग रहा है कि मैं अपने मायके वापिस आ गई ह।‘‘ मैंने हेसकर कहा था।
’’हो, तो यही लगेगा, इसीलिए तो मैं यहो वापिस आ गई ह।‘‘ भाभी ने चाय का कप आगे बढाते हुए कहा था, मैं चुप रह गई। पर दो ही दिन में मैंने नोट किया कि भाभी का स्वास्थ्य अब पहले से बेहतर है। वैसे खाना नौकरानी बनाती थी, पर वे भी उसे निर्देश देती रहती थीं। बाजार से क्या सामान लाना है, सफाई कैसे होगी, माली को कब बुलाना है, सारी बातों में उनका दखल था। छोटे-मोटे काम डत्रईवर से ही करवा लेती थीं।
फिर भी एक दिन अवसर देखकर मैंने कह ही दिया - ’’भाभी, वैसे तो सब ठीक है, आपने व्यवस्था भी अच्छी कर ली है। पर ऐसे अकेले कब तक रहेंगी, बेटे बुला रहे हैं।‘‘
’’हो बुला रहे हैं, इसलिए कि मैं यह मकान बेच द।‘‘
भाभी ने मेरी बात बीच में ही काट दी थी। उनका स्वर भी तीखा हो गया था।
’’हो तो, बिक जाने दो न। वहो रोहित बडा य्लैट ले लगा, आपको भी आराम मिलेगा।‘‘
’’नहीं रज्जो, तू नहीं समझती है। वैसे ही काफी पैसा बेटे ले ही चुके हैं। मुझे तो बताया भी नहीं कि बैंक में कितना पैसा था, कितनी एफ.डी.आर. थी। शायद सब बेटों के ही नाम था। मैंने तो अपनी बेवकूफी से कभी इनसे इस बारे में कुछ जानना ही नहीं चाहा था। बस अब यही मकान है जो मेरे नाम है। इसलिए दोनों मेरे पीछे पडे हैं कि इसे बेच द, पर नहीं। यही तो अब मेरा सहारा है, ठीक है मेरे जाने के बाद जो उचित लगे करना, पर आखिर मुझे भी तो अभी जिंदा रहना है और स्वाभिमान के साथ। वहो रहकर तो मैं पूरी तरह बेटों पर आश्रित हो जाती। यहो तक कि अपनी मर्जी से किसी को बुला भी नहीं सकती उस घर में, यहो तक कि बेटी तक को भी नहीं। फिर....
’’पर भाभी, आपका स्वास्थ्य!‘‘ मैंने टोकना चाहा था।
’’स्वास्थ्य अच्छा नहीं लग रहा है क्या? और अच्छा हो जाएगा। अब मैं समझ गई ह कि अपना ट्टयान स्वयं ही रखना पडता है, तो रख लगी।‘‘
भाभी का चेहरा जैसे आत्मविश्वास से चमक रहा था और मैं उनके इस नए विश्वासी रूप को देखकर चकित थी।
१-ल-१, दादाबाडी अतिरिक्त, कोटा ;राज.द्ध-३२४००९