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चार गजलें

पूर्णिमा जायसवाल
;१द्ध
आ गई पूर्णिमा वो उजाला हुआ
ऐ अंट्टोरे तेरा मह काला हुआ
चित प-ूे तो ये हारे पड पट तो वो
सोचता एक सिक्का उछाला हुआ
राह कांटों की थी पार कर ली मगर
फूल पर जो चले दिल पे छाला हुआ
शाम भूखा जो लौटा तो चूल्हा कहे
एक पत्थर रखा है उबाला हुआ
बोट दी आपने जो उम्मीदें हमें
एक भूखे को जैसे निवाला हुआ
आपको देखकर गिर पडा हाथ से
दिल जो अब तक ’अदा‘ था संभाला हुआ।
;२द्ध
जीत लिखो ना हार लिखो
लिखना हो तो प्यार लिखो
चाहे दुनिया ना माने
सच को बारम्बार लिखो
जैसा तुम पढना चाहो
वैसा ही व्यवहार लिखो
जीत सदा सच्चाई की
चाहे तुम हथियार लिखो
पार करे भवसागर से
ऐसी एक पतवार लिखो
नाम ’अदा‘ के लिखना गर
तो सारा संसार लिखो।
;३द्ध
हमने गाई अम्बर की
पंछी ने अपने पर की
लहरों के आमंत्रण पर
नदियो हुइङ समन्दर की
एक तरफ तेरी बातें
एक तरफ दुनिया भर की
तेरे दर तक पहचे हैं
खाकर ठोकर दर दर की
बाहर कैसे आ पहची
एक कहानी अंदर की
फूलों की जो गानी थी
तुमने गाई खंजर की
प्रेम नगर में रहते हैं
गाते ढाई अक्षर की
सच्ची बात ’अदा‘ तेरी
झूठी बातें शायर की।
;४द्ध
ये जो बिखरे तारे हैं
चन्दा के हत्यारे हैं
रोटी के बदले हमको
मिलते केवल नारे हैं
दुनिया से जीते लेकिन
अपनों ही से हारे हैं
पुण्य सभी उनके हिस्से
सारे पाप हमारे हैं
उठ्ठे दिल के सागर से
य ये ओसू खारे हैं
सच्चे चुप बैठे घर में
झूठे पोव पसारे हैं
जोड तोड कुर्सी पा ली
अब तो वारे न्यारे हैं
छूकर फूल ’अदा‘ बोली
फूलों में अंगारे हैं।
जसवन्त होस्टल के सामने, रातानाडा, जोट्टापुर ;राजद्ध मो. ७०७३५ ४४४४७