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चार गजलें

सैयद मुनव्वर अली
;१द्ध
चांद रोटी सा लगे तो लौट आओ गोव में
गंट्टा सौंट्टाी सी उठे तो लौट आओ गोव में
शहर के माहौल की रंगीनियो हैं बदचलन
बेटियां बढती दिखें तो लौट आओ गोव में
गंट्टा मेहंदी की लुभाये चूडयो भरमाए मन
ओढनी ट्टाानी खिले तो लौट आओ गोव में
शहर में अपने लिए हर आदमी है अजनबी
चाह अपनों की जगे तो लौट आओ गोव में
शहर में बंट्टाती है केवल रेशमी मजबूरियो
हूक राखी की उठे तो लौट आओ गोव में
ट्टाडकनें कहने लगें जब मो के ओचल की कथा
बरकतें झरझर झरें तो लौट आओ गोव में।
;२द्ध
रोशनी गर चाहिए तो लौ जरा म=म रखो
चाहिए मुझसे गजल तो ओख मेरी नम रखो
तौल जब होने लगा तो सब यही कहने लगे
दूसरे पलडे में अपनी जिंदगी के गम रखो
मेरी ओखें देख कर कहने लगा बूढा हकीम
इन पे बरखुरदार ख्वाबों का वजन कुछ कम रखो
कब ये चाहा दर्द से कोई ताअल्लुक हो मगर
अब तो ये ही दोस्त हैं जैसे बने कायम रखो
कौन सा फनकार था जिसको न तुमने दी कसम ओख में पानी रहे लब पे मगर सरगम रखो
चाहे कितनी भी ’मुनव्वर‘ मुश्किलें आएं मगर
डर के घबराओ नहीं तुम हौसलों में दम रखो।
;३द्ध
न जाने ये किस का खयाल आया है
खुशी का रंग लिए हर मलाल आया है
वो एक शख्स बहुत खुशगवार सा था
मिटा किसी पे तो जीना मुहाल आया है
अस्ल में मह पर जब खरी बात कही
नजर में यार का कैसा उबाल आया है
किया न जिर्‍ भी जिसका तमाम उम्र कभी
हमारे काम बहुत वो खयाल आया है
नहीं है तुमसे कोई दोस्ती भी अब लेकिन
कदम कदम पे ये कैसा बवाल आया है
गर्म मौसम में भी चलने लगी है ठंडी हवा
तेरी वफाओं का जब भी खयाल आया है।
;४द्ध
कितने खौफनाक आज के मंजर हैं
आस्तीन में सोप जेब में खंजर हैं
चेहरों की तख्तियां पढूं भी तो कैसे
जाहिर में वो नहीं असल जो अंदर है
पहले जिन हाथों में गेंद खिलौने थे
अब तो उनके हाथों में बस पत्थर हैं
दिल का रेगिस्तान बहुत ही प्यासा है
कहने को दुनिया में सात समंदर हैं
तूने ही दीदार कराया था उनका
नजर तेरे एहसान बहुत से हम पर हैं
कुछ ऐसे हालात आजकल बिगडे हैं
घर मे रहकर भी जैसे बेघर हैं
और ’मुनव्वर‘ अपनी हालत बतलाएं
घुसे हुए रगरग में जैसे नश्तर हैं
प्लॉट नं. ४७, खेतानाडी, मंडोर रोड, जोट्टापुर-३४२००७ मो. ९९२९४ ५४२८६