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तीन नवगीत

हरीश निगम
दिन हमारे
कडकडाते पर कटे तोते,
दिन हमारे, जागते-सोते।
अनकहा-सा बोझ
ओखों में ट्टाुओ
जिन्दगी लगने लगी
अंट्टाा कुओ।
मकडयों के जाल को ढोते,
दिन हमारे, जागते-सोते।
शेष कोई भी नहीं
भीगी छुअन
एक रेगिस्तान-सा
ओढे बदन।
रेत की जलती कथा होते,
दिन हमारे, जागते-सोते।
हरे नहीं हो पाए
फिर पछुआ के
वादे
टीस गये।
हरे नहीं हो पाए
सूखे पल
मन के भीतर
फैल गया जंगल।
सब के ही
खाली
आशीष गये।
बेचैनी कमरे में
रही तनी
बिखरी है
सोसों में नागफनी।
दिन मुद्दी में
हमको
पीस गये।
जलती नदी
अनपढ बुआ
पढता सुआ
ये घर
हमारा गोव!
कर्ज में
लिपटी हुयी सुबहें
ओख में ठहरी
ट्टाुओती शाम
बंजर जमीनों में
उगे बीमार सपने
चंद बासी रोटियों के नाम।
गोबर लिपी
देहरी चुकी
हारे हुये
हर दांव!
हरहराती नीम
तीखी ट्टाूप
सूखकर झरते हुए रिश्ते
और घर में
खांसते दादा
अंट्टोरे भाग लिखते
उम्र के हिस्से,
जलती नदी
मन से बंट्टाी
अमराइयों की छांव!
प्रेम बिहार कॉलोनी, प्रेमनगर, पो.बा. नं. ९६, सतना-४८५००१ ;म.प्र.द्ध, मो. ९८२७२ ०३२३५