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पाँच कविताऐ

हरदान हर्ष
सहज न्नवाह में
रोजमर्रा की तरह उस दिन भी हम
साथ-साथ ही उठे थे
एक साथ ली थी हम दोनों ने चाय
और, इत्मीनान से
घूम कर आये थे साथ-साथ।
मझ-जेठ उस दिन हुई थी
अप्रत्याशित बारिश खूब जोरों से
फिर, सावण की झडी में
भीग गये थे हमारे मन
जैसे कभी भीगे थे मालरोड पर।
उस दिन भी मेरी चाहत पर
कहते ही उसने बनाई थी
मूंगदाल की पकौडयो
बरसात के दिनों की तरह
और, खाई थी हम दोनों ने
एक साथ बैठकर।
उस दिन भी सूरज के साथ-साथ
चलती रही थी हमारी चय्र्या
यथावत्’-निर्विघ्न-सतत्
और, हम दोनों बहते रहे थे
सहज प्रवाह में
एक शांत नदी की ट्टाार की तरह।
उस दिन भी हम
लेटे-लेटे करते रहे थे
देर रात तक जरूरी बातें
और, साझा की थी हम दोनों ने
घर-संसार की कई हलचल।
दस दिन परे हमें भान हुआ -
अरे! उस दिन थी हमारी शादी की
सैंतीसवीं साल-गिरह...
जिसकी विस्मृति पर ृ
खिलखिलाकर हेसे थे हम दोनों
एक साथ बहुत देर तक...।
उजास-गीत
मैं गोव में था
इतवार की रात...
गहन अंट्टोरे
रह-रह कर मेंढक
टर्रा रहे थे टर्र-टर्र...
वे गा रहे थे जी भर
मानो गा रहे हों
कोई विश्व-गान।
खरोड की चुभन
खोज रही थी
खुला आसमान
मुस्कराते चोद-सितारे...
टर्र-टर्र के बीच
गज उठा था बस्ती में
एक उजास-गीत।
इस घोर अंट्टोरे
यहीं-कहीं कोई
ओजस्वी स्वर में
गा रहा था...
अंट्टोरे को चीरती आवाज
फैल रही थी चारों ओर
उजास को छूने।
द्वन्द्व
मैं बढा था अपने गंतव्य की ओर
दो-चार कदम ही
और, लोग बेचैन हो गये
इन्ध् की तरह।
मैं अपनी राह साट्टान जुटाता
बुन रहा था - अपना तानाबाना...
मेरी चाह में कतई नहीं था
कोई भी किसी का इन्धसन।
लोग कहन-रूपसी आती हैं
सत्य साट्टाक की राह
इन्ध्-दरबार से परियो
और, माया भरमाती हैं
जैसे जानकी-राम के समक्ष दौडा था
सोने का हिरण।
लोग वृथा ही थे ईर्ष्यालु मुझे बढता देखकर
और, बेचारा इन्ध् कोरा बदनाम
कोई माया नहीं भरमाती
मन की खोखल सोते-जागते जारी रहता है
चेतन-अचेतन में अनवरत
इन्ध्यिों का द्वन्द्व।
पिता
दिन में पिता सूरज
रात में चोद है
मुझे छू सके
मजाल कि कोई
हर क्षण पिता
वज्र की सी ढाल है।
शीतल छोह
पितृ साये में
अंगुल पकड चला
जीवन पथ
मरूस्थल में पिता
शकुनभरा नखलिस्तान है।
काची माटी
पगडंडी पर
संस्कार बो रहा
सपनों के पंख लगाता
पिता मेरा
हर जरूरत का सामान है।
उथले पानी
या भंवर में
जब डगमगाती नाव है
दौडकर बोह थाम लेते
गर्दिशों में
पिता खेवनहार है।
स्नेह सरोवर
भरा लबालब
निशि-दिन खटता
घर की खातिर
मेरी नींव का पत्थर
पिता मट्टाुर अहसास है।
रिश्तों का न्नाण दें
ठोस हो रहे हैं चेहरे
अबोले में पसरा मौन
आओ! ठस होते चेहरों को
एक किरण मुस्कान दें।
मिलेंगे-बैठेंगे, बतकही में
गिला-शिकवा मिटेंगे
ट्टाोकर मन का मैल
आओ! सकून को विस्तार दें।
सूख रही है जो
भावों की नदी
खोलकर अन्तस के स्रोत
आओ! नदिया को अमीमय ट्टाार दें।
आओ! अविलम्ब हो आयें
आज उनके घर
पहल अपनी
निर्जीव पडे रिश्तों को प्राण दें।
ए-३०६, महेशनगर, जयपुर-३०२०१५, मो. ९७८५८ ०७११५