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छह कविताऐ

अम्बिका दत्त
;१द्ध बचो!
कैद है आचरण की जहो
नहीं है सद्व्यवहार / यदि
जीवन की सुसंगतता के लिए
छिपे हैं पाखण्ड के खरूंटों के अन्दर
घाव गहरे नफरतों के
तो डरो
प्रेम का तिनका भी नहीं है / दूब जितना
सिर्फ प्रतिहिंसा का जंगल ही ट्टाट्टाकता हो जहो
जाने से वहो
बचो।
जीवन के कुरूक्षेत्र से विरत कर जो हमें ले जाता हो
मार्ग
बाजीगरी के एकान्तिक अंट्टोरों में
तो जोचो!
उस पथ को / परखो
प्रश्न करो
प्रश्न करने का अट्टिाकार ही तो
मनुष्य होने की शर्त है
नहीं है अट्टिाकार यदि प्रश्न करने का भी /
तो ऐसे ट्टार्म की कारा में हरगिज मत रहो
मनुष्यता की पहचान खोकर
ट्टाार्मिक होने से बचो।
;२द्ध स्वप्न में समुध्
निकम्मे और ढीठ पुरुष की पत्नी के मन में
भरे क्षोभ की तरह
दूर तक रेत ही रेत थी उसके तट पर
प्रहर था
थके पिता की तरह अशक्त, शांत,
कण-कण बिखरता हुआ
हवा बेबस मो की तरह,
अपने बच्चों की फिर्‍ में बहती हुई
निशीथ!
अकेला नहीं था
नीरव-चन्ध्किा और लहरें
निश्चिंत-निश्छल-उर्मियो
दूर तक गरजता हुआ भवितव्य था वह
जिससे ख्ेालता था - मैं
वह जब भी आता है, मथता है मुझे
मेरी नींद को बिलोता है
मैं बच सकता था
जो स्वप्न में समुध् न देखता।
;३द्ध बची हुई खबर
अखबार में क्या छपा है ?
सब कुछ छपा है ?
या कुछ बचा है ?
कुछ छिपा हुआ बताया गया है
या कुछ छिपाया गया है।
जो बचा है
वो बच गया है या बचाया गया है
जो छिपा है
वो छिप गया है या छिपाया गया है
कुछ किया है अलग-अलग
या कुछ अपनी तरफ से मिलाया गया है
लोग खुश हैं
चलो सवाल तो उठाया गया है।
;४द्ध आलोचक के लिए न्नार्थना
ईश्वर ! क्षमा करना उसे
वह जान नहीं सका अपना खुद का स्वाद कभी भी फैलता रहा सदैव दूसरों की जीभ पर कडवा होकर स्वभाव में औषट्टिा की तरह वह
नहीं जानता था अपना असर भी
नादान जंगली जहरीली बूटियों की तरह
वह रहा होगा हमेशा ही अनजान
बेखबर-कोवच की फली की तरह
अपने रोओं से खुजलियो बेचैनियो और
सनसनियो फैलाता हुआ
उसे क्षमा करना प्रभु वह नहीं जानता था
अपने स्वभाव के बारे में
वह नहीं जानता था
अपने स्वाद के बारे में, असर के बारे में
अपने प्रभाव के बारे में
उसे क्षमा करना प्रभु।
;५द्ध तीर्थ

जानकर तो पाप कोई करता नहीं
अनजाने में जो हुए अपराट्टा
प्रभु सभी के क्षमा करते हैं
फिर क्या पाने की आकांक्षा ले जाती है - वहो
बुरे से बुरे आदमी के अन्दर भी
कुछ तो बचा होता है - ईमान।
वही तय करता है
एकमात्र।
उसकी साक्षी में जो हुआ - मैला
मन वही ट्टाुल जाए / निर्मल अगर हो जाए
तो सिवा उसके और है ही क्या -
हमारे पास ट्टाोने के लिए।

वस्त्र बदले अपने / केश भी भिगाए
गलाई देह / कुछ देर मन को बहाया
खुद को भुलाकर - भीड में
प्रार्थना में जला दीपक / कुछ देर
अनमना भी रहा
कर्म-पाखण्ड में निष्फल ही
सब कुछ नहीं था
उपदेशकों के स्वर निरर्थक नहीं थे सर्वथा
बदलने की जो उम्मीद होती है जरा-सी
उसी फिर्‍ में थे अनजान / मगर

एक झूठा भरोसा था अपने लिए
कि सब कुछ बदल जाएगा - अंतिम समय से पहले हम अपने पूर्वजों की अस्थियो बहाकर
वापस लौट आए वहो से जैसे गए थे।
;६द्ध बुरी कविताऐ
होते हैं जिस तरह बुरे दिन - बुरे लोग
उसी तरह होती होंगी बुरी कविताऐ भी
कोई लेने नहीं जाता बुरे दिन
बुलाता नहीं कोई भी बुरे लोगों को
पर वे आते हैं सहसा आ जाते हैं
सहज ही जीवन में बुरे दिन बुरे लोग
इसी तरह आती होंगी बुरी कविताऐ भी
बुरी कविताऐ लिख चुकने के बाद
सब जान चुके होते हैं जब उसके बाद
जान पाता है कवि बुरी कविता के बारे में
अगर उसके दिन अच्छे हों तो!
आसान है
बुरे लोगों के बारे में बात करना / रुचिकर भी
बुरे दिनों के लिए क्या सीख हो सकती है
सिवा ट्टौर्य के
बुरी कविताओं के समीक्षकों के लिए क्या कहें
कैसे सराहें उनके ट्टौर्य को
ट्टान्य हैं वे जो बुरे लोगों
बुरे वक्त और बुरी कविताओं के बारे में बात करते हैं लम्बे समय तक
उन कवियों को कहें - क्या ?
जो अच्छे दिनों में बुरी कविताऐ लिखते हैं
वे अच्छी कविताऐ लिखेंगे
शायद बुरे दिनों में।
२-बी-द्वितीय न्यू कॉलोनी, गुमानपुरा,
कोटा-३२४ ००७, मो. ९७९५१ १०५९९