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पाँच कविताऐ

राम जैसवाल
नेपथ्य
कुछ भी, गलत, न सहने
की प्रवृा,
जो विरासन में मुझे
मेरे पूर्वजों से मिली थी।
उसे,
मेरे वर्तमान ने, बहुत गहरे
पत्थरों के नीचे
मेरी अनिवार्यताओं के साथ
दफना दिया था।
और,
मैं, किसी प्रकार जो चीजें
अपने बच्चों के
नन्हे हाथों में देता था
उन्हें भी,
मेरे आसमान में
मंडराते
चतुर कौवे
झपट ले जाते थे,
सुनो ः
उनकी हथेलियों पर
पडी खरोचों से रिसते
ख्ूान को
मैं पोंछ नहीं पाया था...
मेरे हाथ,
उस पत्थर के नीचे
दब गये थे
जिसके नीचे मेरा स्वाभिमान
और
अनिवार्यताऐ दबी थीं।
एडी से मस्तक तक
दौडते रक्त ने, मुझे
आत्महत्या नहीं करने दी,
और, विवश मैं,
कौवों के झपटने की साजिश १
और शोर
महसूसता रहा ह।
हो, ...
मैं कायर नहीं था
पर मेरे हाथ
जिस पत्थर के नीचे
दब गये थे
वह,
मेरे विश्वासों ने ही
रक्खा था।
और,
जब तक मैं यह जान पाया
मेरी मृत्यु
आरम्भ हो गई थी।
मित्र!
तुम, जो मेरे पास
उपस्थित हो,
तुमसे कह रहा ह
कि
किसी भी गलत को सहना
ट्टाीरे, ट्टाीरे,
आदमी को कापुरुष
बना देता है, ... मात्र
यही नहीं
वह तुम्हें
दिकभ्रमित भी करेगा।
तब,
स्वयं को तमाशा बनने,
और तमाशा देखने से
रोकना,
अन्यथा,
उनकी साजिश के झण्डे
हमारे घरों में भी
सज जाऐगे।
ओस पर पहरे हैं
कांटों पर बन्दिश है,
फूलों पर पहरे हैं,
साजिशें, सरसराती हवा,
बहते हुए जल पर
लहरें अवाक हैं।
इस तट से, उस तट तक
नौकाऐ बेच आतीं
नदी की सीमाऐ,
बार, बार, लहरों ने
समझाया तो बहुत,
पर, बहने, बिछडने के
दर्द बडे गहरे हैं,
महके तो है फिर, मोगरा,
गुलाब, बेला, आम बौराये हैं
पर, कैसे गाये कोयल,
मैना किसे बतलाये,
बन्ट्टाक बसन्त
और, जंगल के पेड सभी बहरे हैं।
पूस की रात है, और ’हलकू‘
रात भर जागा है,
शीत बहुत घना है,
और कपडे बहुत छोटे हैं,
कहीं है ये मौज, कहीं विवशताऐ घेरे हैं
तेरे मेरे घरों तक
ट्टाूप कब आती है
अपने तो आसपास
सियासी अंट्टोरे हैं।
सुख के हर एक क्षण पर
लिखी है महंगाई
और अनिवार्यताऐ
कोटों सी चुभती हैं,
कहो, कैसे, किस नाम के
ईश्वर से कहें अपने दुख,
मन्दिरों, मस्जिदों में
राजनीतिक डेरे हैं।
ट्टाूप और रेत, दोनों
फैले हैं क्षितिज तक
हर मोड, रास्तों पर
मृगजल के डेरे हैं।
इन हवाओं में, कोई
कब तक चल पायेगा,
प्यास पर बन्दिश है
ओस पर पहरे हैं।
न्नेत-समय
समय के
किस मोड पर आ गये हम,
जहो हमारी
नियति
मात्र भटकना है।
मृत हुए विश्वासों
और
जड हुई आस्थाओं
को ही
जी रहे हैं हम।
नहीं,
गलत कहा, मैंने।
हमारे मृत हुए विश्वास
और जड हुई आस्थाओं
में ही, हमें
प्रेत की तरह
आर्‍ान्त
कर रक्खा है,
हमारी आत्मा का चेतन स्वरूप,
और
वे ही जी रहे हैं हमें
हमारा शरीर, हमारी आत्मा
हमारा तिल, तिल होना।
वे ही
हमारे अस्तित्व को
सम्मोहित करके
हमारे ही हाथों से
वर्तमान पर
लिखवा रहे हैं
विकृत-भविष्य।
एक सच,
शायद, तुम जानते तो होंगे,
कि
जब कोई अस्तित्व
मृत होकर,
प्रेत हो जाते हैं, तो
वे
दूसरों के शरीर में
अपनी
वासनाऐ जीते ह।
हमारे मृत विश्वास भी
हमारे शरीर में
ईर्ष्या, वासना और
अतृप्त-इच्छाओं में
परिणत हो गये हैं।
उन्होंने
शरीर या वस्त्र तो
आज भी वे ही
वरण कर रक्खे हैं।
पारम्परिक, सहज
पर उनका आचरण
प्रेत-ग्रस्त ही है,
अतृप्त-आकांक्षाओं का
निर्मम-आर्‍ोश।
अब
तुम्हें ही
अपने अन्दर मूर्छित
भगीरथ को
जगाना पडेगा, करना पडेगा
अनिवार्य-तप,
;सहज नहीं हैद्ध,
कि फिर
मन के आकाश में
जन्मे
मोक्ष-दायिनी गंगा
’आबे हयात‘,
कि
हम अपने वर्तमान को
जड हुए विश्वासों
और ’मृत हुए अतीत‘
से मुक्त कर सकें।
.....
समय के इस मोड पर
जहो हमारी नियति ही
दिकभ्रमित होना है।
अप्रत्याशित
किस महत्वाकांक्षी
नाटकीय क्षण में,
संस्कारहीन समय में
यह निर्णय लिया था
कि ’शिक्षा‘
जन-जन के लिये
अनिवार्य हो, और
भाषा जैसी असीम शक्ति
दे दी जाय
कुसंस्कारित हाथों में,
कैसे भूल गये तुम
कि
शिक्षा संस्कारित नहीं करती
वरन
संस्कारों के सांचे में
शिक्षा, रूपायित होती है।
अब
शब्द, मात्र तर्क के
दुट्टाारे चाकू बन गये हैं
और
अनुभव प्यासी मरुभूमि
पर ओस कण।
किस
अभिशापित की
महत्वाकांक्षा व्यवक्तत हुई है,
कि दम्भ-संघर्ष को
’जनहित‘ कहा जाने लगा।
शरीर की भूख को
प्रेम
और उारदायित्वहीन
पीढी को
वंशज
कि विरासत में
अपना सारा मान, सारी
सामर्थ्य,
पौरुष,
उनके पैरों के नीचे डाल दिया,
यह
किन हाथों में आ गई है
जीवन के अश्वों की
बागडोर
कि अब पौरुष
रक्षा नहीं करते
बलात्कार करते हैं।
घरों के सारे अस्तित्व
संज्ञाहीन करके
गूंगे और बहरे
चेहरों पर
परम्परा के
मुखौटे
पहना रहे हो।
क्या
सारा ही युग
विक्षिप्त हो गया है, कि
अर्थी और बारातें
एक साथ चल रही हैं,
कि
पता ही नहीं चल रहा है,
कि कौन बाराती है और
कौन शवयात्री।
ये,
किनकी विक्षिप्त
महत्वाकांक्षाओं के चित्र हैं
कि हम इन्हें
देखने को बाट्टय हैं।
न्नतिट्टवनियो
वे लोग
प्रश्नवत-स्वरों में
मुद्दियो कसे हुए थे
कि यदि
गौतम (षि थे
तो
इन्ध् या चन्ध्मा को
उन्होंने
शाप क्या दिया था।
क्यों
अहिल्या को दण्डित
किया था।
क्या व्यक्तिगत आकांक्षा
की पूर्ति
पाप है।
और
यदि पाप है,
तो मर्यादा-पुरुषोाम राम ने
अहिल्या को
क्यों शाप मुक्त किया था।
अभिशापित-जीवन
जिया जाय,
इससे तो पत्थर होना ही
श्रेष्ठ है,
और अहिल्या ने
जड होना स्वीकार किया था।
इच्छा की पूर्ति
एक पक्षीय नहीं होती,
वह बलात्कार है।
और अब
तुम या मैं
या वे
किन्हीं न किन्हीं
बलात् आचारों के ही
प्रतिफल हैं।
इसीलिये हमें
सीमाओं से वितृष्णा है,
अन्यथा
’समय‘ ने बहुत
समझाया था
कि जब
व्यक्तिगत-इच्छा के लिये
व्यक्ति, बलात्
स्वपक्ष में
निर्णय लेता है,
तभी,
एक ययाति
बूढा होता है, और
एक भीष्म
निवङश, वामपंथी
होकर मरता है।
’उसका‘ कहा
एक शब्द, आज भी
व्योम में प्रतिट्टवनित होता है,
कि
चिरंतन-आनन्द तो
देह और आत्मा का
एकात्म-समर्पण,
’क्षण‘ भर होता है,
’सीमित‘
जो जीवन को
निरन्तरता देता है
षिा की अरुणिमा सा
संट्टया की केसर सा,
फिर से सुन ;मेरे समयद्ध
कुछ ऐसे कहो,
कि महसूस करके
आत्मसात् कर सक।
कला-लक्ष्मी सदन, न्यू कॉलोनी, रामगंज,
अजमेर-३०५००१