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अधिक सयानगी न करें शब्दों के साथ

कलानाथ शास्त्री
हमारी राष्टत्र्भाषा हिन्दी ज्यों-ज्यों प्रगति पथ पर अग्रसर होती जाती है, इसके शब्द-भंडार में विस्तार और निखार आता रहता है। कभी-कभी इस निखार में अनेक विचित्र सुट्टाार भी परिलक्षित होते हैं, जिन्हें देखकर हम दोतों तले उंगली दबाने को बाट्टय हो जाते हैं। हिन्दी में व्याकरण की दृष्टि से जो अशु= प्रयोग चल रहे थे उनके सुट्टाार का प्रयास तो स्वागत योग्य है, जैसे पुनरवलोकन की बजाय पुनरावलोकन या पुनः प्रवेश की बजाय पुनर्प्रवेश जो चल पडे हैं, व्याकरण की दृष्टि से गलत हैं, पुनः+अवलोकन पुनरवलोकन बनेगा, जैसे पुनः+आगमन पुनरागमन बनता है। इसी तरह संट्टिा में प आगे हो तो विसर्ग र नहीं बनेगा, विसर्ग ही रहेगा। जैसे अन्तःपुर अन्तर्पुर नहीं बनता, वैसे पुनःप्रवेश, अन्तःप्रान्तीय आदि शब्द बनेंगे, पुनर्पाठ, पुनर्प्रवेश, अन्तर्प्रान्तीय अशु= हैं। इस विषय पर हम विस्तार से विचार करेंगे, किन्तु जो शब्द शु= है पर ’अशु=-समझ‘ लिए गए हैं, उन पर पहले विचार कर लें। शु= की प्रर्याश में कुछ बेचारे ऐसे शब्द भी फेस गये जो शु= थे, किन्तु अट्टाकचरे व्याकरणविदों ने उन्हें अशु= समझकर उनकी मौत का फतवा दे दिया।
भूतपूर्व - ऐसा एक शब्द है भूतपूर्व जो ’फॉर्मर‘ या ’एक्स‘ ;पहले रहाद्ध के अर्थ में आता था। एक्सप्रेसिडेन्ट भूतपूर्व अट्टयक्ष कहा जाता था। हिन्दी में यह शब्द गत डेढ शताब्दी से चल रहा था। स्वयं पाणिनि ने इसका प्रयोग किया है ’’भूतपूर्व चरट्‘‘ उनका सूत्र है। अतः संस्कृत में ढाई हजार वषोङ से चल रहा था, किन्तु स्वतंत्रता के बाद न जाने किस दिन किसी स्वयंभू भाषाशास्त्री को यह सूझा कि भूत और पूर्व तो एक ही बात है, अतः केवल पूर्व लिखना ही पर्याप्त है, भूतपूर्व तो दोहराव हुआ। तब से पूर्व प्रट्टाानमंत्री, पूर्व कुलपति शब्द ही चलने लगे। भूत का डर ऐसा व्याप्त हुआ कि ’भूतपूर्व‘ को अशु= मान लिया गया जबकि भूत का अर्थ है हुआ या रहा, पूर्व का अर्थ है पहले। जो पहले मंत्री रहा वह भूतपूर्व, जो कभी नहीं रहा या हुआ वह अभूतपूर्व। जब अभूतपूर्व को आप अशु= नहीं मान रहे तो बेचारे भूतपूर्व ने ही क्या अपराट्टा किया है? किन्तु भेडियाट्टासान में इसकी किसी ने नहीं सुनी और केवल ’पूर्व‘ शब्द चल रहा है। अतः जो पहले जोनल मैनेजर ;बैंक आदि मेंद्ध, रहा उसे पूर्व अंचल प्रबन्ट्टाक कहा जाता है जिससे यह भ्रम होता है कि ये पूर्व अंचल के प्रबन्ट्टाक हैं, कोई और पश्चिम अंचल का होगा।
राजनैतिक - ऐसी ही लहर में एक शब्द और फेस गया। वह है राजनैतिक। सदियों से पॉलिटिकल का पर्याय राजनैतिक हुआ करता था। यह हमने पाठ्यपुस्तकों में भी पढा और अखबारों में। किसी दिन न जाने किस भाषाशास्त्री ने इसे अशु= करार दिया और राजनीतिक को शु= बता दिया। जैसे नगर से नागरिक, वैसे राजनीति से राजनीतिक। त=त प्रत्ययों में प्रथम स्वर को ही दीर्घ होता है ;जिसे व्याकरण में आदिवृ= कहते हैंद्ध, अतः राजनीति में रा ही दीर्घ होगा, नीति की नैतिक करने की जरूरत नहीं। तबसे अनेक अखबार ’राजनीतिक‘ लिखने लगे। सदियों से जो ’राजनैतिक‘ शब्द चल रहा था उसके बारे में न केवल हिन्दी के बल्कि अन्य भाषाओं के भाषाविदों ने भी स्पष्ट कर दिया था कि संस्कृत में जो ’उभयपदवृ=‘ होती है और जिसके अनुसार उन दोनों पदों का आदि स्वर दीर्घ हो जाता है, उसका ही एक मामला है राजनैतिक शब्द। जैसे अट्टिा+भूत से आट्टिाभौतिक बनता है, अट्टिा+देव से आट्टिादैविक अर्थात् अट्टिा के अ में और भूत के उ में वृ= होकर वे आ और भौ हो जाते हैं, उसी प्रकार राज और नीति दोनों के स्वरों में दीर्घ हो जाएगा। रा तो पहले से दीर्घ है ही, नीतिक नैतिक हो जाएगा। इसमें पहले राज या फिर नैतिक जोडा गया हो सो बात नहीं है, पर उनकी किसी ने नहीं सुनी। अब हम बहुत से अखबारों में ’राजनीतिक‘ पढते हैं और सिर ट्टाुनते हैं।
हमें आश्चर्य तब होता है जब हम पाते हैं कि ये नये भाषाशास्त्री जितने बु=मान् हैं, उतने उस समय के मूर्ट्टान्य और सर्वमान्य भाषाशास्त्री भी नहीं थे। डॉ. रघुवीर जैसे विद्वान का सर्वमान्य शब्द कोष पोलिटिकल के लिए सब जगह ’राजनैतिक‘ लिखता है। पं. किशोरीदास वाजपेयी भी राजनैतिक शब्द को सही मानते हैं। भारत सरकार के सारे शब्द कोष राजनैतिक पर्याय दे रहे हैं, अन्य भाषाओं में भी यही शब्द चल रहा है। हिन्दी के अनेक सुप्रसारित और प्रतिष्ठित राष्टत्रीय अखबार भी बराबर राजनैतिक ही छाप रहे हैं। संविट्टाान में भी राजनैतिक शब्द ही है। उसके अट्टिाकृत अनुवाद की उड्ढेशिका ;प्रिएम्बलद्ध देख लें। पर इन नये स्वयंभू भाषाशास्त्रियों के मत में तो डॉ. रघुवीर भी गलत है, संविट्टाान भी गलत है, केवल ये ही सही है। इन्हें ’उभयपद वृ=‘ की जानकारी नहीं है अतः ये हमारी तो सुनेंगे नहीं। अतः हमने तो अब यही सोचा है कि इनसे यही प्रार्थना करें कि आप इसी सि=ान्त पर अब अट्टिाभूत से ’आट्टिाभूतिक‘ और सर्वभूमि से ’सार्वभूम‘ लिखा करें, आट्टिाभौतिक और सार्वभौम तो अशु= हैं - उनमें दो-दो जगह वृ= है, सर्व में भी, भूमि में भी। ऐसे अनेक उदाहरण हैं।
विनिवेश - बिल्कुल उलटे अर्थ में आने वाला एक शब्द इन दिनों ऐसा चला है कि उसे गलत बताने वाले को लोग पागल न समझ लें। अतः हमें लिखने में भी झिझक हो रही है क्योंकि उसे बिना संशोट्टान किए सरकार ने भी चलने दिया है। आजकल सरकारी पजी के नियोजन को वापस लेने की लहर चल रही है, जिसे डिसइन्वेस्टमेंट कहा जाता है। यह नया शब्द है। अतः इसके लिए शब्दकोषों में पहले से हिन्दी पर्याय नहीं छपा था। किसी ने शब्द बना लिया ’विनिवेश‘। उसका तर्क रहा होगा कि निवेश इन्वेस्टमेंट के लिए आता है, उसके विपरीत अर्थ बताना है, अतः ’वि‘ लगा लो, विनिवेश हो गया। तब से यही शब्द चल रहा है। एक विनिवेश मंत्रालय भी बन गया है, एक विनिवेश मंत्री भी। समस्या यह है कि संस्कृत में सदियों से विनिवेश शब्द इन्वेस्ट करने के लिए आता है क्योंकि ’नि‘ उपसर्ग के पहले ’वि‘ उपसर्ग आने पर उसका अर्थ होता है ’सोच-समझ कर‘। सोच-समझ कर निश्चय करना ’विनिश्चय‘, सोच-समझकर नियोजन करना ’विनियोजन‘ आपने सुने होंगे। निर्माण से विपरीत थोडे ही होगा विनिर्माण। वि का अर्थ विपरीत भी होता है, किन्तु ’सम्‘ जैसे उपसगोङ से पहले - जैसे संवाद से विपरीत होगा विसंवाद, संर्मुण से विपरीत विसंर्मजण। पजी वापस लेने के लिए अर्थशास्त्र में जो शब्द प्राचीनकाल में चल रहे थे उन्हें देखने की तवालत कौन मोल ले? इसलिए जल्दी में यह शब्द चल निकला, सरकारी शब्दावली आयोग के किसी शब्दकोष में नहीं है। पहले से यह उलटा अर्थ न दे रहा होता तो इस अर्थ में भी चलन द्वारा आ जाता, किन्तु केवल इन दिनों की इस लहर से यह दूसरे अर्थ में रूढ हो जाए यह कैसे होगा? हो जाए तो अलग बात है। हम उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हैं।
आतिथ्य - एक अन्य शब्द जो इन दिनों देखने में आ रहा है, संस्कृतवालों को आश्चर्य में डालता है। किसी आयोजन में शिक्षामंत्री या मुख्यमंत्री मुख्य अतिथि रहे हों, तो उसकी रिपोर्ट में बहुट्टाा यों लिखा जाता है के मुख्यमंत्री जी के ’मुख्य आतिथ्य‘ में सभा हुई। यहो लेखक यह बु=मानी दिखाते हैं कि जैसे किसी के सानिट्टय में सभा होती है या ’प्रामुख्य‘ में कोई कार्य होता है, वैसे ही मुख्य आतिथ्य में आयोजन हुआ, किन्तु इससे अर्थ उलटा हो जाता है। आतिथ्य में जो ष्यफ्ा् प्रत्यय अतिथि शब्द के साथ लगता है उसका अर्थ होता है - अतिथि सत्कार, मेजबानी, आवभगत। मुख्यमंत्री के ’मुख्य आतिथ्य में आयोजन‘ का अर्थ है मुख्यमंत्री की मेजाबानी में, मुख्यमंत्री द्वारा की गई आवभगत में हुआ आयोजन। संस्कृत में वषोङ से यही चल रहा है। महर्षि भरद्वाज ने राम का आतिथ्य किया अर्थात् आवभगत की, हम पढते रहते हैं। ’आतिथ्य‘ की बजाय ’अतिथित्व‘ लिख दिया जाए तो फिर भी सही अर्थ आ जाएगा। ’’उनके मुख्य अतिथित्व में या उनके विशिष्ट अतिथित्व में सम्मेलन आयोजित हुआ‘‘ प्रयोग सही अर्थ दे सकता है, ’आतिथ्य‘ तो मेजबानी वाला अर्थ ही देगा। ’आतिथ्य‘ और ’अतिथित्व‘ के अथोङ में यह सूक्ष्म विभेद सावट्टाानीपूर्वक समझ लेना प्रबु= लेखकों के लिए अत्यावश्यक है।
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