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मैं अपनी किसी भी रचना से पूरी तरह असंतुष्ट नहीं होता !

हेमन्त शेष
;कृष्ण बलदेव वैद ;जन्म ः १९२७ डिंगा, अब पाकिस्तान मेंद्ध का रचना-संसार बहुत बडा है - विपुल और विविट्टा अनुभवों से भरा। इसमें हिन्दी के लिए भाषा और शैली के अनेकानेक नए, अनूठे, निहायत मौलिक और बिलकुल ताजा प्रयोग हैं। हमारे समय के एक जरूरी और बडे लेखकों में से एक वैद जी नैतिकता, शील अश्लील, प्रयोगशीलता और भाषा जैसे प्रश्नों को लेकर केवल अपने चिंतन ही नहीं, बल्कि अपने समूचे लेखन में एक ऐसे मूर्तिभंजक रचनाशिल्पी हैं, जो विट्टााओं की सरहदों को बेहद यत्नपूर्वक तोडते हैं। हिन्दी के हित में यह अराजक तोडफोड नहीं, एक सुव्यवस्थित सोची-समझी पहल है - रचनात्मक आत्मविश्वास से भरी। पाठकीय-आलोचकीय अस्वीकृतियों का खतरा उठा कर भी जिन थोडे से लेखकों ने अपने शिल्प, कथ्य और कहने के अंदाज को हर कृति में प्रायः नयेपन से संवारा है, वैसों में वैदजी बहुट्टाा अप्रत्याशित ढब-ढंग से अपनी रचनाओं में एक अलग विवादी-स्वर सा नजर आते हैं। विनोद और विट, उर्दूदां लयात्मकता, अनुप्रासी छटा, तुक, निरर्थकता के भीतर संगति, स्वैर-आट्टाुनिकता-ये सब वैद जी की भाषा में मिलते हैं। निर्भीक प्रयोग- पर्युत्सुकता वैद जी को मनुष्य के भीतर के अंट्टोरों-उजालों, जीवन-मृत्यु, सुखों-दुःखों, आशंकाओं, डर, संशय, अनास्था, बि, उकताहट, वासनाओं, सपनों, आशंकाओं, विडम्बना, सब के भीतर अंतरंगता झोकने का अवकाश देती है। मनुष्य की आत्मा के अन्ट्टाकार में किसी अनदेखे उजाले की खोज करते वह अपनी राह के अकेले हमसफर हैं - अनूठे और मूल्यवान। कृष्ण बलदेव वैद हिन्दी के ऐसे आट्टाुनिक रचनाकार हैं, विदेश में प्रवास के लम्बे दौर के बावजूद जिनमें भाषा और लेखकीय-संस्कार के बतौर एक हिन्दुस्तानी का ही मन रचा-बसा रहा है। अपनी हर औपन्यासिक-कृति में वह अगर हर बार मूल्य-दृष्टि की अखंडित भारतीय एकात्मकता के उपरान्त भी पहले से भिन्न नजर आते हैं तो यह उनके अनुभव और रचनात्मक-सम्पन्नता का ही पुनर्साक्ष्य है, जो हमें हर बार नए ढंग से यह बतलाता है कि उसमें अपने समाज और अपने समय - दोनों को हर बार नए ढंग से देखे-पहचाने गए भाषाई रिश्तों में सामने लाने की अटूट प्रतिज्ञा है। आश्चर्य की बात नहीं कि उनकी अट्टिाकांश रचनाऐ पश्चिम के परिवेश लोकेल और मानसिकता को अपनी सर्जनात्मक-प्रेरणा नहीं मानती, जैसा कुछ सुपरिचित हिन्दी कथाकारों ने किया है। इसके ठीक उलट, कृष्ण बलदेव वैद, हमारे अपने देश के ठेठ मट्टयमवर्गीय-मन को, प्रवास के प्रभावों से जैसे जानबूझ कर बचाते हुए, अपनी उन स्मृतियों, सरोकारों और विडम्बनात्मक स्थितियों को ही बारम्बार खंगालते हैं, जो एक बदलते हुए भारतीय समाज और आट्टाुनिक मनुष्य के भीतर घुमड रही हैं। ये स्मृतियो हो सकती हैं - उचाट अकेलेपन के अवसाद कीऋ असुरक्षा की भावना से उपजी स्वाभाविक हताशा की, संबंट्टाों की जटिलताओं और उनके खोखलेपन की, विडम्बनात्मक स्थितियों से जूझते स्त्री-पुरुषों की, उकताहट के बौ=क-विश्लेषण की... संक्षेप में कहें, तो समूचे मानवीय अस्तित्व का मायना खोजती उसी उाप्त और उग्र प्रश्नाकुलता भाषाई वैयक्तिकता की, जिसकी ट्टाट्टाक एक लेखक को भाषा में रचनाशील, जाग्रत और प्रयोग-पर्युत्सुक बनाये रखती है, जिसके साहित्यिक- अन्वेषणों और पर्यवेक्षणों के उजास में हम स्वयं को ऐसे अपूर्वमेय कोणों से देख सकते हैं, जो सिर्फ एक श्रेष्ठतर रचना के जरिये ही सम्भव हो सकते हैं। उनका लेखन जैसे एक चिर-’विस्थापित‘ लेखक की तर्कप्रियता का भाष्य है, अन्यों के लिए असुविट्टााजनक और रहस्यमय, पर स्वयं लेखक के लिए आत्मीय, जाना-पहचाना, अंतरंग भाषा का घर। उनकी हिन्दी कहानियों और उपन्यासों की प्रयोगकामिता अजस्र है और प्रचलित के प्रति अरुचि असंदिग्ट्टा, वह अपनी शतोङ पर अभिव्यक्ति के लिए सन्न= एक ऐसे लेखक हैं, जिनके लिए अगर महवपूर्ण है तो सिर्फ उस लेखकीय-अस्मिता, सोच और भाषाई वैयक्तिकता की रक्षा, जो उन्हें अपने ढंग के ’फॉर्म‘ का ऐसा कथाशिल्पी बनाती है - जो आलोचना के किसी सुविट्टााजनक-खांचे में नहीं अंटता... उनका सारा लेखन इसीलिये तो सरलीकृत व्याख्याओं और लोकप्रिय-समीक्षा ढंग के लिए लगभग एक चुनौती है - सम्पादकद्ध
हेमन्त शेष ः आप कहानी और उपन्यास - दो विट्टााओं के बीच लिखने का अनुभव कैसे करते हैं? कौन-सी चीज कहानी में आये और किस पर एक पूरा उपन्यास बने, ये फर्क किन मानसिक शतोङ पर और कैसे तय करते हैं आप
कृष्ण बलदेव वैद ः कैसे तय करता ह, नहीं जानता। ऐसे निर्णय अंतर्मन के अेट्टोरे में ही होते रहते हैं, वहीं होते रहने चाहिये! ऐसा मेरे साथ कभी नहीं हुआ कि किसी खयाल, अनुभव या कल्पना पर उपन्यास लिखना चाहा और कहानी लिख दी हो। इससे उलट अनुभव जरूर होता रहता है - ऐसा महसूस होता रहा है कि मेरी कुछ कहानियो, अपेक्षाकृत लम्बी कहानियो, उपन्यास हो सकती थीं - जैसे ः ’लीला‘, ’प्रवास-गंगा‘, ’सैर के साथी‘, वगैरह। और यह भी हुआ कि किसी खब्त पर एक से अट्टिाक कहानियो लिख लेने के बाद भी वह खब्त खामोश नहीं हुआ और मुझे उसे उपन्यास में उतारना पडा, जैसे - ’समाट्टिा‘, ’विमल कॉफी-हाउस...‘, एक था विमल के बाद ः ’विमल उर्फ जाऐ तो जाऐ कहो!‘‘ संक्षेप में यही कि कहानी और उपन्यास के बीच कोई साफ सीट्टाी सीमा- रेखा नहीं बोट्टाी जा सकती। ऐसा कम ही होता है और वह भी बहुत ही छोटी कहानियों और बहुत ही लम्बे उपन्यास के संदर्भ में कि कहानी को उपन्यास या उपन्यास को कहानी न बनाया जा सके। कई लम्बी कहानियों को उपन्यास कहा जाता रहा है और कई छोटे उपन्यासों को लम्बी कहानी भी कह दिया जाता है। इसीलिये ’नोवेल्ला‘ और ’नोवलैट‘ नाम निकाले गए। ;बस इस पर इतना ही। यह भी कुछ ज्यादा ही हो गया।द्ध
हेमन्त शेष ः आपको अपनी लिखी कुछ कहानियो अच्छी लगती हैं तो क्यों, और अगर कुछ नहीं भी लगती तो क्यों? आपकी राय में ’बुरी‘ कहानी क्या है
बलदेव कृष्ण वैद ः मैं अपनी किसी भी रचना से पूरी तरह असंतुष्ट नहीं होता। ’बुरी‘ कहानी वही जो बेजान हो, बोदी हो, झूठी हो, इकहरी हो, बेअसर हो। कई निर्दोष कहानियो भी ’बुरी‘ कही जा सकती हैं, और कई दोषपूर्ण कहानियो भी ’अच्छी‘।
हेमन्त शेष ः क्या अपेक्षाकृत छोटी कहानी भी एक लम्बे से उपन्यास की तरह ही रचनाकार को प्रयोगट्टार्मिता, विस्तार, संवेदना की पूर्ण अभिव्यक्ति का अवकाश दे सकती है? आप अपनी कौन-कौन सी कहानियों को प्रयोग, भाषा, कथ्य, रूप आदि के लिहाज से सबसे उल्लेखनीय मानते हैं और क्यों
बलदेव कृष्ण वैद ः क्यों नहीं! वैसे जिन बातों की चर्चा आपने की - उन्हें देखते उपन्यास में गुंजाइश अट्टिाक है। बेशुमार कहानियों के नाम ले सकता ह, अपनी नहीं, दूसरों की, लेकिन तीन-चार के ही लेता ह, ’डैथ ऑफ इवान इलिच‘ ;तोल्स्तोयद्ध, ’द नोज‘ ;गोगोलद्ध, ’द ओवरकोट‘ ;गोगोलद्ध, ’द डैड‘ ;जेम्स जोयसद्ध, ’द बीस्ट इन द जंगल‘ ;हेनरी जेम्सद्ध, ’डैथ इन पेरिस‘ ;टॉमस मानद्ध, ’द पीनल कॉलोनी‘, ’द हंगर आर्टिस्ट‘, ’द मेटामोर्फोसिस‘ ;”ेंज काय्काद्ध...।
हेमन्त शेष ः आपको किन भारतीय और विदेशी कथाकारों ने सर्वाट्टिाक प्रभावित किया और क्यों
बलदेव कृष्ण वैद ः हेनरी जेम्स, जेम्स जॉयस, सेमुएल बैकिट, काय्का, जैनेन्ध् कुमार, फणीश्वरनाथ ’रेणु‘। ’प्रभावित‘ शब्द से मुराद मैं ये ले रहा ह कि मैंने इन्हें अपने अनुकूल भी पाया और शायद जाने-अनजाने में मैंने इनसे कुछ सीखा, लिया भी। इनके अलावा भी कई महान कथाकारों-तॉल्स्तॉय, प्रूस्त, मूसिल, फौकनर-वगैरह के प्रभाव मेरे लेखन में होंगे ही। ’क्यों‘ का जवाब कठिन। नहीं दगा।
हेमन्त शेष ः एक साहित्य-अट्टयापक और लेखक के बतौर क्या आपको व्यक्तित्व संबंट्टाी द्वंद्व कभी अनुभव हुआ या आप दोनों को अलग-अलग करके रहे? क्या दोनों बातें परस्पर शत्रु हैं, मित्र या सम-भाव है इन दोनों में? आपने क्या किया
बलदेव कृष्ण वैद ः ’शत्रु‘ या ’मित्र‘ तो नहीं, लेकिन दोनों का रिश्ता सरल या सहज नहीं। मैंने उन्हें अलग रखने की कोशिश की - अट्टयापक को अट्टिाक शह नहीं दी, इसीलिये शायद लिखता रहा। बतौर अट्टयापक मैंने अपनी महत्वाकांक्षाओं को मारा। अगर नहीं तो दबाया बहुत, और यह ठीक ही किया।
हेमन्त शेष ः १९५१ के बाद किन-किन दशकों में आप स्वयं अगर अपनी कहानी-कला में ’बदलाव‘ देखते हैं तो उनके कारण क्या हैं
बलदेव कृष्ण वैद ः इस सवाल का जवाब तो आप ही दें।
हेमन्त शेष ः क्या आप भी ऐसा महसूस करते हैं कि आपकी रचनाऐ पिछले दस-पन्ध्ह सालों में अट्टिाक संश्लिष्ट, अट्टिाक दार्शनिक, अट्टिाक विचार- केन्ध्ति और भाषा की दृष्टि से अट्टिाक प्रयोगकामी हुई हैं
बलदेव कृष्ण वैद ः शायद। शायद इसलिए कि मेरे अपने अन्दर कई अंदरूनी बदलाव आये हैं और इसलिए भी कि आहिस्ता-आहिस्ता मेरी दृष्टि में उपन्यास और कहानी एक- दूसरे के करीब आते गए हैं।
हेमन्त शेष ः लेखन में ’प्रयोग‘ के लिए आपकी मानसिक-प्रेरणाऐ और संवेगात्मक-उध्ेक कौन- कौनसे हैं
बलदेव कृष्ण वैद ः इस सवाल की ट्टाार मैं नहीं पकड पाया।
हेमन्त शेष ः आप कहानी को किस विट्टाा के निकटतम मानते हैं? नाटक, कविता, निबंट्टा, उपन्यास, चित्रकला, संगीत या कोई और
बलदेव कृष्ण वैद ः कहानी, मेरी कहानी, तो शायद निबंट्टा के ही अट्टिाक निकट है - या शायद कविता के, या शायद नाटक के? कुछ कहानियो निबन्ट्टा के, ;’उसके बयान‘, ’बुढया की गठरी‘, ’रात की चीर-फाड‘ वगैरहद्ध कुछ कविता के ;’लीला‘, ’रात की सैर‘द्ध, कुछ नाटक के ;’सब कुछ नहीं‘, ’दूसरे किनारे से‘, ’चोर दरवाजा‘।द्ध
हेमन्त शेष ः आपकी कला पर जिन्होंने लिखा उनमें से क्या कुछ समीक्षक या लेख आदि आप तत्काल याद करना चाहेंगे
बलदेव कृष्ण वैद ः हो, ’मेरा बचपन‘ पर नेमि जी का निबन्ट्टा, आपका लिखा हुआ आलेख, प्रकाश ;परिमलद्ध जी की टिप्पणी, ज्योत्स्ना मिलन आदि का लिखा... लेकिन सच तो ये है कि अभी तक शायद ही किसी ने ऐसा कुछ लिखा हो, जिसे पढ कर किसी पाठक को मेरे बारे में प्रचलित दुराग्रहों को दुरूस्त करने में सहायता मिले। चुनौती!!
४०/१५७, मानसरोवर, जयपुर-३०२ ०२०,
मो. ९३१४५ ०८०२६