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रचना प्रक्रिया के सोपान ः अर्जन-सर्जन-विसर्जन पर विचार करते हुए

इन्दुशेखर तत्पुरुष
कोई रचना समाज में कैसा स्थान पाती है यह रचनाकार की रचना प्रवृा पर तो निर्भर करता ही है, यह रचना के गृहीता समाज पर भी निर्भर होता है। रचना जिसे सम्प्रेषित की जा रही है, वह समुदाय और जिसके लिए लिखी जा रही है वह एक ही हैं अथवा दोनों अलग-अलग हैं, इसका विचार भी आवश्यक है। हो सकता है कि जिस वर्ग को लक्ष्य कर रचना लिखी गई और जिस समुदाय के समक्ष उसे प्रस्तुत किया जा रहा हो वे परस्पर भिन्न रुचियों-संस्कारों वाले हों। रचना के सम्प्रेषण की चुनौतियों में यह भी एक प्रमुख समस्या है जिसे अक्सर अनदेखा किया जाता है।
<br/>रचना करते समय हर रचनाकार के चिा में एक अदृश्य पाठक होता है, जो अनेक तरह के भोक्ता व्यक्तित्वों का सम्पुंजित रूप होता है। इनमें प्रथम तो स्वयं रचनाकार का पाठक रूप ही होता है, जिसके अच्छे-बुरे के अपने मापदण्ड होते हैं, प्रिय-अप्रिय के अपने संस्कार होते हैं। दूसरा व्यक्तित्व उन रचनाकारों का होता है, जो इस लेखक के प्रिय रचनाकार हैं और जिनके रचनात्मक वैशिष्ट्य की छाप उसके चिा पर गहरे अंकित होती है। तीसरे वे लोग, जो इस लेखक के रचनाकर्म के प्रशंसक पाठक रहे होते हैं और उसकी पूर्ववर्ती रचनाओं की जिनके द्वारा मुक्तकंठ से प्रशंसा की जा चुकी होती है। ऐसे प्रोत्साहक पाठकों के संस्कारों का भी परोक्ष भाव लेखक के चिा पर अंकित रहता है। चौथा व्यक्तित्व आलोचक-समीक्षकों का भी होता है, जो रचनात्मक परिवेश में ट्टार्मदण्ड की तरह व्यापते रहते हैं और गाहे-बगाहे रचनाकारों को अपने निर्णयों से टोकते-चेताते-डराते रहते हैं। इस तरह अनेक व्यक्तित्वों के रेशों से बुना हुआ एक संश्लिष्ट पाठक समुदाय रचनाकार के अन्तर्मन में पैठा हुआ उसे सतत नियमित-निर्देशित करता रहता है।
<br/>भारत के एक प्राचीन काव्यशास्त्री वामनाचार्य ने कवि के बारे में बात करते हुए इस संदर्भ में एक बडी रोचक और अर्थपूर्ण बात कही है। अपने ग्रंथ ’काव्यालंकारसूत्रवृा‘ में वे दो तरह के कवियों का उल्लेख करते हैं। लिखते हैं - ’’अरोचकिनः सतृणाभ्यवहारिणश्च कवयः‘‘। ;प्रथम अट्टिाकरण का दूसरा अट्टयाय, सूत्र सं. १द्ध इस सूत्र के वृा में वे इसे स्पष्ट करते हुए आगे लिखते हैं - इह खलु द्वये कवयः सम्भवन्ति। अरोचकिनः, सतृणाभ्य- वहारिणश्चेति। अरोचकिसतृणाभ्यवहारिशब्दौ गौणार्थो। को*सावर्थः। विवेकित्वमविवेकित्व चेति।।
<br/>अर्थात् दो प्रकार के कवि होते हैं - अरोचकी एवं सतृणाभ्यवहारी। आगे कहते हैं, ये दोनों शब्द गौणार्थक हैं। तो इसका वास्तविक अर्थ क्या है? यह प्रश्न करते हुए वे स्वयं उार देते हैं - अरोचकी का विवक्षित अर्थ विवेकित्व और सतृणाभ्यवहारी का अर्थ अविवेकित्व है। इस प्रकार आचार्य वामन विवेकी कवि के लिए अरोचकी और अविवेकी कवि के लिए सतृणाभ्यवहारी शब्द का बहुत व्यंजनापूर्ण प्रयोग करते हैं। ये दोनों संज्ञाऐ भोजनवृा से जुडी हुई हैं। अरोचकी ऐसे व्यक्तित्व को कहते हैं जो ’अरोचक‘ रोग से पीडत हो। ऐसे व्यक्ति की भोजन में रुचि नहीं रहती, पेट भरने के लिए वह बेमन से जैसे-तैसे कुछ खा-पी लेता है। वह केवल कुछ चुनिंदा खाद्य ध्व्यों की ओर ही आकर्षित होता है। उसकी भोजन के प्रति रुचि बढाने के लिए अनारदाना, इमली, लौंग, इलायची, तेजपत्र, जावित्री, जायफल जैसे सुगन्ट्टिात और क्तद्य ध्व्यों से संस्कारित भोजन की योजना करनी पडती है। दूसरी ओर ऐसे भी भुक्खड होते हैं जो खाद्य-अखाद्य कुछ भी नहीं छोडते। जैसे पशु अन्न को जड, डन्ठल, घास-पाों सहित ही खा लेता है, उसी तरह ये भी जो कुछ परोस दिया जाए बिना विचारे उदरस्थ कर लेते हैं। आचार्य वामन उक्त दोनों तरह के व्यक्तियों में से विवेकी कवि को अरोचकी और अविवेकी कवि को सतृणाभ्यवहारी संज्ञा से सम्बोट्टिात करते हैं। यद्यपि भोजन व्यवहार की दृष्टि से उक्त दोनों स्थितियो ही असामान्य हैं, किन्तु रचनात्मकता - जो कि स्वयं में एक असामान्य परिघटना है - की दृष्टि से अरोचकी की असामान्यता ही वरेण्य है। भाषा के क्षेत्र में सामान्य विवरण, सामान्य कथन, सामान्य भाषा प्रयोग जिनमें किसी रचनाकार की रचनात्मकता के कोई चिह्न नहीं होते, सर्जना की दृष्टि से निरर्थक हैं। एक सच्चा कवि इनम तब तक आकर्षण महसूस नहीं करता जब तक इसमें वह अपनी रचनात्मकता की छाप नहीं छोड देता। अपने अनुभव को सम्प्रेषित करने के लिए उसे एक विशेष प्रकार के शब्दर्म या भाषा योजना या अर्थवाही शब्दों की जरूरत होती है। यही एक विवेकवान् कवि की पहचान है। दूसरी ओर जो कुछ भी जैसा भाव या विचार मस्तिष्क में आता चला जाए, उसे बिना जोचे-परखे यथावत कागज पर उतार देना कुछ उसी तरह से है जैसे एक पशु अनाज को बिना निस्तुष किये, बिना छाने-फटके-बीने-पीसे-भूने उदरस्थ कर लेता है।
<br/>आठवीं सदी के इस महान् काव्याचार्य के सौंदर्य, अलंकार, रीति आदि विषयों पर उनके सि=न्तों से हम भले ही सहमत न हों, किन्तु वे साहित्य सर्जन की प्रर्यास में संग्रह-त्याग के सूक्ष्म विवेक पर बहुत बल देते हैं। खेत से जैसे उखाडा वैसा ही चर लेने वाले पशु की तरह मन के रास्ते सीट्टो ही जो कुछ कागज पर उतर आये उसे ही साहित्य मानने वाले को वे अविवेकी कवि कहते हैं। अपने लिखे के प्रति बहुत चयनट्टार्मी होकर निर्ममतापूर्वक कांट-छांट कर पाने वाले कवि को ही वामन विवेकवान् कवि मानते हैं।
<br/>वस्तुतः इन प्रभावों में रचनाकार अपनी रचना के लिए बहुत सारी सामग्री एकत्र करता और छोडता जाता है। वह कच्चे माल के ढेर पर ढेर लगाता जाता है और उसमें से कुछ उपयोगी साम्रगी चुन पाता है। अपने अनुभव को सम्प्रेष्य बनाने के लिए वह भाषा की अनेक जानी-अनजानी गलियों से गुजरते हुए बहुत छानबीन के बाद ही अपनी अनभूति को ठहराने का ठिकाना पाता है। साहित्य सर्जना का अर्थ ही यह है कि रचनाकार कुछ ऐसा रचे कि वह उसका ही किया- ट्टारा लगे। किसी अन्य के किये हुए पर अपना ठप्पा लगा देना सर्जना नहीं है। इसी कारण रचनाकार की यह सकेलने-समेटने-छोटने-चुनने की प्रर्याब तब तक चलती रहती है, जब तक उसे ऐसी अभिव्यक्ति नहीं मिल जाती जिसे देखते ही वह कह उठे, अरे! यही तो मैं कहना चाह रहा था। जब तक वह उस अनदेखे मुकाम पर नहीं पहच पाता, भाषा के इलाके में वह भटकता ही रहता है। उसकी यह भटकन ही उसकी रचना प्रर्याा है।
<br/>अच्छे कवि की विशेषताओं के सम्बन्ट्टा में आचार्य वामन कई महत्वपूर्ण सूत्र-संकेत देते हैं। काव्य के अंगों की चर्चा करते हुए वह एक अद्भुत बात कहते हैं। काव्य रचना के हेतु बताते हुए अभियोग ;उद्यमद्ध, प्रतिभा, अवट्टाान ;दाचिाताद्ध आदि के साथ ही ’अवेक्षण‘ का उल्लेख करते हुए उन्होंने एक नयी और आज की दृष्टि से अत्यन्त प्रासंगिक बात कही है। उनके मत में पदों का स्थापन ;रखनाद्ध और उ=रण ;हटानाद्ध का विचार ही अवेक्षण है। प्रथम अट्टिाकरण के तीसरे अट्टयाय के सूत्र संख्या १५ की वृा में लिखते हैं - ’’आट्टाानो=रणे तावत् यावड्ढोलायते मनः।‘‘ अर्थात् जब तक चिा में स्थिरता नहीं होती है तब तक पदों का स्थापन और अपसारण चलता रहता है। एक निश्चित पद और पदर्म पर जब तक लेखक का विवेक जम नहीं जाता तब तक रचना न तो आगे बढती है और न पूर्ण ही हो पाती है। पदों के समुचित आट्टाान को ही वे ’न्यास‘ कहते हैं। ऐसी स्थिति में आचार्य वामन कवि की उस शक्ति की अपेक्षा करते हैं जिसके बल पर कवि द्वारा प्रयुक्त शब्द इतने औचित्यपूर्ण और अनन्यट्टार्मी होते हैं कि उनका कोई अन्य विकल्प ही नहीं हो। उनके स्थान पर कोई अन्य शब्द या शब्दर्म। या पदबन्ट्टा प्रयोग करने पर अर्थ सम्प्रेषित ही नहीं हो सकता है, जो कवि का वांछित है। वे कहते हें -
<br/> यत् पदानि त्यजन्त्येव परिवृासहिष्णुताम्। तं शब्दन्यासनिष्णाताः शब्दपाकं प्रचक्षते।।
<br/>अर्थात् ’’जब कवि द्वारा प्रयुक्त पद परिवर्तन-सहिष्णुता त्याग देते हैं तब उस पद को शब्दन्यास में कुशल कविगण ’शब्दपाक‘ कहते हैं।‘‘
<br/>यहो परिवर्तन-सहिष्णुता को त्याग देने का अर्थ यह है कि कवि द्वारा प्रयुक्त शब्द और शब्दर्म ऐसा अटल अपरिवर्तनीय होता है कि इसमें से एक भी शब्द इट्टार का उट्टार नहीं किया जा सकता। एक शब्द भी बदल देने मात्र से कविता का पूरा ढांचा मानो लडखडा कर गिर जाये। जिन कविताओं का गठन इस तरह होता है कि उनके कुछ शब्दों को बदल देने अथवा आगे-पीछे कर देने पर उनके अभिप्राय में कोई अन्तर नहीं पडता उनके वे पद परिवर्तन-सहिष्णु कहलाते हैं। किन्तु अत्यन्त सुगठित और कसी हुई कविता के लिए इस वृा से मुक्ति पा लेना अनिवार्य है। वामन के शब्दों में यही शब्दपाक है। यहो हमें अनायास सैमुअल टेलर कॉलरिज का कथन च्वमजतल पे जीम इमेज ूवतके पद जीम इमेज वतकमत याद आता है। सृजन प्रर्या में इस शब्दपाक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हालोकि अपने विचारों अथवा भावों को साहित्य के माट्टयम से अभिव्यक्त करना ही जिनका एकमात्र लक्ष्य होता है, अर्थात् साहित्य जिनके लिए सर्जन का नहीं, अपितु केवल प्रस्तुतीकरण का माट्टयम है, उनके लिए न पाकशब्द का महत्व होता है, न उचित पदन्यास का।
<br/>सम्पूर्ण रचना-प्रर्या को गहराई से देखा जाए तो रचनाकर्म तीन चरणों में सम्पन्न होता है - अर्जन-सर्जन- विसर्जन। किसी विशेष अनुभव या कथ्य को अभिव्यक्त अथवा सम्प्रेषित करने के लिए रचनाकार अपने विचारों, संस्कारों और ज्ञानेन्ध्यिों से प्राप्त अनुभवों का अनुभूति के रूप में अर्जन करता है। इन अर्जित अनुभूतियों को संचित करने का यह र्मन निरन्तर चलता रहता है। अर्जन, पूर्वसर्जनावस्था की वह उर्वर भूमि और अनुकूल पर्यावरण है, जो अव्यक्त सर्जन बीजों को ट्टाारण करने वाली ट्टारा और मिड्डी, हवा, पानी, खाद उपलब्ट्टा कराती है। वस्तुतः यह प्राक सर्जनावस्था है जो कि सर्जन की गर्भभूमि होती है। इस अवस्था में अर्जित किये गये उपादानों ;कच्चे मालद्ध में विचरण करती हुई काव्य प्रतिभा बिजली की कौंट्टा की तरह अकस्मात् और निरायास कुछ रचती है। रचना का यही चरण सर्जन है जो कि एक स्फोट की तरह प्रकट होता है और प्रत्यासन्न रचना का बीज स्वरूप होता है। इसका प्रस्फुटन अर्जन की भूमि पर होता है। आगे इस रचनाबीज के अंकुरण, विभाजन, परिवर्ट्टान, पल्लवन और फलन की प्रर्याज का नाम विसर्जन है, जो कि रचना प्रर्या् का तीसरा सोपान है। इस अवस्था में रचना प्रर्या पूर्ण होकर एक नई रचना पाठकों के समक्ष प्रस्तुत होती है। वस्तुतः जिसे हम कवि की कृति ;च्वमउ वद जीम चंहमद्ध कहते हैं, वह सर्जन नहीं विसर्जन का चरण होता है। सर्जन तो एक क्षणिक स्फोट की तरह अनायास प्रकट होता है जबकि आगे की प्रर्याी रचनाकार द्वारा सायास की जाती है। रचनाकार का सर्जनात्मक क्षण विसर्जन की प्रर्याी में ही कृति के रूप में तैयार होता है। सर्जनकाल में प्रस्फुटित हुआ रचना बीज जिस प्रर्यात से सांगोपांग विस्तार पाकर एक विशालकाय वृक्ष में परिणत हो जाता है, वह समूची प्रर्याक ही विसर्जन है। रचनार्मं में सामान्यतः जिसे सर्जन कहा जाता है, उसका अट्टिाकांश भाग विसर्जन चरण के अन्तर्गत सम्पन्न होता है। इस चरण में ही रचना अपना सम्पूर्ण स्वरूप और रूपाकार गढती है।
<br/>आचार्य वामन द्वारा कहे गये शब्दन्यास और शब्दपाक की सि= के लिए लेखक द्वारा की गई सारी मशक्कत सर्जन को विसर्जन में परिणत करने की परिघटना में ही होती है। इस प्रकार एक रचनाकार की समूची रचना प्रर्याी अर्जन-सर्जन-विसर्जन के र्मस में चलती है और इन्हीं के आट्टाार पर अपना रूपाकार निट्टाार्रित करती है। इसे हम इस तरह समझ सकते हैं कि माना किसी रचनाकार ने सर्जन के क्षण में एक रचनात्मक अनुभव किया। अब यह उसकी विसर्जन प्रर्याक पर निर्भर है कि वह उसे कितना और किस दिशा में विस्तार दे पाता है। उसे लघुकथा म ढालता है या कहानी में या कि किसी काव्यानुभव में। यह भी सम्भव है कि यह सर्जित काव्य बीज उपयुक्त विसर्जन प्रर्याै की प्रतीक्षा में कवि चिा में पडा रहे और कालान्तर में एक उपन्यास के रूप में प्रतिफलित हो जाए। किसी रचना प्रर्यास में कोई अनुभूति सर्जन अवस्था में ही अटकी रहकर लम्बे समय तक विसर्जन प्रर्याम के पूर्ण होने की बाट जोहती हुई कब कालकवलित हो जाए, यह भी याद न रहे अथवा कि सर्जन का क्षण इतना आवेगमय और जिार्वान हो कि अपनी निरन्तरता में विसर्जन प्रर्या से गुजरता हुआ एक बार में ही रचना को पूर्णता प्रदान कर दे।
<br/>भारतीय काव्यशास्त्रियों ने तीन प्रमुख काव्य हेतु बताये हैं - प्रतिभा, अभ्यास और व्युत्पा। इनमें प्रतिभा और अभ्यास तो सर्वविदित ही है, व्युत्पा का अर्थ बहुज्ञता बताया गया है और आचार्य मम्मट कहते हैं कि यह लोक, शास्त्र और साहित्य के गहन अवलोकन से आती है। अभ्यास और व्युत्पा परिश्रमसाट्टय होते हैं, किन्तु प्रतिभा जन्मसि= होती है। इस सुविदित तथ्य का यहो इसलिए उल्लेख किया जा रहा है कि ये तीनों काव्य हेतु काव्य रचना के उक्त तीनों चरणों, अर्जन-सर्जन-विसर्जन में अपनी प्रमुख और विशेष भूमिका निभाते हैं।
<br/>काव्य बीज के प्रस्फुटन से लेकर कृति के रचे जाने तक रचनार्मक के हर मोड पर प्रतिभा, व्युत्पा और अभ्यास की हेतुमाा रहती है। किन्तु सम्पूर्ण रचना प्रर्याक का गहराई से अट्टययन किया जाए तो हम पायेंगे कि रचना की गर्भावस्था-अर्जन‘, रचना की स्फोटावस्था-सर्जन- और रचना की विकासावस्था- विसर्जन इन प्रत्येक सोपानों में एक-एक काव्यहेतु की प्रमुख और अन्य की गौण भूमिका रहती है। अर्जन मं व्युत्पा की, सर्जन में प्रतिभा की और विसर्जन में अभ्यास की सर्वाट्टिाक भूमिका होती है। अनेक उद्यमी और लगनशील लेखक अल्पप्रतिभा के बावजूद अभ्यास से अर्जित अपनी विसर्जन क्षमता से प्रभूत रचनाकर्म करने में समर्थ होते हैं। दूसरी ओर अनेक प्रतिभासम्पन्न रचनाकार भी अभ्यासाभाव और प्रमाद के वशीभूत विसर्जन प्रर्यास को पूरी न कर पाने के कारण अपने सर्जन बिन्दुओं को प्रायः अट्टार में छोड देते हैं। ऐसे रचनाकारों का रचना हुआ साहित्य उच्च कोटि का होते हुए भी परिमाण में बहुत थोडा होता है।
<br/>इसी तरह व्युत्पा में अकुशल रचनाकारों का अर्जन क्षेत्र सीमित ही रहता है। उनके द्वारा विपुल मात्रा में और अर्थवान् साहित्य रचे जाने के बावजूद उनका वर्णन संसार बहुत छोटा होता है। विषयों की दृष्टि से भी और वस्तुओं की दृष्टि से भी। भावों की दृष्टि से भी, विचारों की दृष्टि से भी। इति शुभम्।।
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