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साहित्य समाचार

राजस्थान देश का पहला ऐसा राज्य हो गया है कि जिसने अपनी साहित्य अकादमी की मासिक पत्रिका मधुमती को राज्य के समस्त माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक विद्यालय के शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के लिए पुस्तकालय में आवश्यक रूप से निरंतर क्रय करने के आदेश जारी कर दिए हैं।
आदेश में शिक्षा निदेशक श्री गौरव अग्रवाल ने स्पष्ट रूप से राज्य के सभी माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक विद्यालयों को निर्देशित किया है कि वे अपनी अपनी संस्था के पुस्तकालयों के लिए विद्यालय विकास कोष के माध्यम से मधुमती का क्रय कर इसकी सूचना विभाग को अविलंब प्रेषित करें ।
आप सब से यह साझा करते हुए सुखद प्रतीति हो रही है कि कवि संपादक ब्रजरतन जोशी के प्रस्ताव पर राजस्थान के शिक्षामंत्री डॉक्टर बी.डी कल्ला के प्रयासों से यह आदेश जारी हुआ है।
यह आदेश राजस्थान के 15000 माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक विद्यालयों के अध्ययनरत विद्यार्थियों और शिक्षकों पर प्रभावी होगा इस आदेश से देश समाज में साहित्यिक सांस्कृतिक निर्माण के लिए अनुकूल अवसर उपलब्ध होंगे।
- डेस्क मधुमती
युवाओं के प्रेरक थे मदन-सावित्री डागा : हबीब कैफी
जोधपुर, संभावना एवं मदन डागा स्मृति ट्रस्ट, जोधपुर के तत्त्वावधान में आयोजित डॉ मदन सावित्री डागा स्मृति दिवस पर जोधपुर में हर वर्ष आयोजित होने वाला कार्यक्रम इस बार कोरोना काल होने के कारण दो वर्ष बाद आयोजित हुआ, सम्भावना की संस्थापिका डॉ सावित्री डागा के देहावसान के पश्चात उनकी दोनों पुत्रियां अपनी माँ की इस साहित्यिक धरोहर को संजोए हुए उनकी इच्छा अनुरूप ऐसे गरिमामय आयोजन करने हेतु तत्पर हैं, इस उपलक्ष में मजदूर दिवस पर होने वाले इस कार्यऋम में मुख्य अतिथि व वक्ता राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका मधुमती के सम्पादक डॉ ब्रजरतन जोशी थे, उन्होंने साहित्य : क्या, क्यों और साहित्य शिक्षण विषय पर अपने उद्बोधन में कहा कि साहित्य में सबसे अधिक महत्त्व देखने का है, सबका देखना, देखना नहीं होता है अर्थात एक दृष्टि चाहिए जो सूक्ष्म को देख सके। साहित्यकार इसी सूक्ष्म को देखता है,तभी उसमें चेतना के संतरण का स्तर भिन्न होता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए ख्यातनाम शायर व उपन्यासकार श्री हबीब कैफी ने डॉ.मदन डागा को याद करते हुए कहा कि डॉ.डागा युवा रचनाकारो के लिए हमेशा प्रेरणा का स्त्रोत रहे, सिर्फ प्रदेश में ही नहीं उनकी कविताएँ देश भर में लोकप्रिय हुई। हबीब कैफी साहब ने डॉ. मदन डागा की कविता की संसद तक गूँज की चर्चा की और उनके साथ बिताए पलों को साझा करते हुए कहा कि उनसे हमें बहुत सीखने को मिला, उनके भीतर एक तडप थी कि श्रम करने वाले को कम से कम भर पेट भोजन तो मिले, सामाजिक विषमताओं के प्रति वे बहुत सख्त हो जाते थे, तुम्हारी गोली से तो मेरी गाली में ज्यादा जान है, घुटन अभिव्यक्ति का प्राण है
उन्होंने डॉ सावित्री डागा के साहित्यिक योगदान की भी चर्चा की, कि उनके अथक प्रयासों से संभावना संस्था हर वर्ष युवाओं को साहित्य से जोडने हेतु प्रशंस्य आयोजन करती है, इसी कारण हम हर वर्ष महत्वपूर्ण साहित्यकारों के विचारों से लाभान्वित होते रहे।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि श्री प्राण गोविंद बसाक कुलसचिव,आई आई टी, जोधपुर ने अपने व्यक्तव्य में अपने बाल श्रम के संस्मरण साझा किए .. इसके साथ ही बांग्ला भाषा में कविता का पाठ किया। डॉ. मदन डागा एवं सावित्री डागा के व्यक्तित्व एंव कर्तृत्व पर पत्रवाचन करते हुए कवयित्री एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ पद्मजा शर्मा ने कहा कि सावित्री डागा भावी पीढी के लिए सतरंगे शॉल-सी सुन्दर कविता रचना चाहती थीं और बुनना चाहती थीं हजार-हजार सपने, बुनती रहीं,-रचती रहीं-,बरसों बरस तक । वे अपनी रचनाओं के माध्यम से मनुष्य में संघर्ष का अटूट विश्वास जगाना चाहती थीं। वे सामाजिक सरोकार की कवयित्री थीं इसी से अन्याय, अत्याचार के खिलाफ जटायु की तरह लडने का आह्वान करती रहीं । वे पाठक से कहती हैं -निकट बस्ती में दिया बनकर लौ जलाओ कि -कृष्ण कह रहे हैं फिर गाँडीव उठाओ अर्जुन /युद्ध अभी रुका नहीं-,महाभारत जारी है/ प्रेम और करुणा की कवयित्री होने के कारण आपको राजस्थान की महादेवी और आधुनिक युग की मीरां भी कहा जाता है । डॉ पद्मजा शर्मा ने श्रम दिवस पर डॉ मदन डागा को याद करते हुए कहा कि क्रांति चेता डॉ. मदन डागा बहुआयामी व्यक्तिव के धनी थे। संवेदनशील-, संघर्षशील, जनांदोलनों-, मजदूर यूनियनों से सम्बद्ध, वंचितों के पक्षकार, शोषितों की आवाज के कवि, सम्पादक, अनुवादक, राजस्थान लेखक संघ के महामंत्री,कर्मठ कार्यकर्ता, संगठक, हिन्दी के साथ ही राजस्थानी भाषा में- लिखने वाले रचनाकार थे वे। समय से पहले महज 52 वर्ष की उम्र में 29 अप्रैल 1985 को यह दुनिया छोड गये। वह जगह खाली है। नेता की कुर्सी होती तो भर जाती। पर रचनाकार की जगह रचनाकर आप ही भरता है। आखिर में यह कहूँ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि डॉ मदन डागा का दूसरा नाम है निर्भय, तीसरा नाम है निडर, चौथा नाम है वैचारिक स्वतन्त्रता, पाँचवाँ नाम है जीवन संघर्ष और छठा नाम है सामाजिक -राजनीतिक प्रतिबद्धता। एक वाक्य- में कहूँ तो -डॉ मदन डागा भ्रष्ट, सुविधा भोगी राजनीति की वाट लगाने वाले अपने समय के, अपनी तरह के अनूठे और विरले कवि थे जिन्हें सदियाँ याद रखेंगी। उन्होंने मदन डागा की कई कविताओं का उल्लेख करते हुए अपनी बात कही,
दोस्त सावधान !
आजकल राष्ट्र प्रेम की बात
वे लोग कर रहे है´
जो दिन के अंधेरे में
तिजोरियां भर रहे हैं
कार्यक्रम के प्रारंभ में प्रो कैलाश कौशल ने अतिथियों का स्वागत करते हुए संचालन की भूमिका निभाई और डॉ. मदन डागा का प्रारंभिक परिचय देते हुए उन्होंने बताया कि डॉ मदन डागा बहुचर्चित छात्र नेता थे, विद्यार्थी जीवन में उन्होंने दस्तक व रश्मि नामक पत्रिकाओं का संपादन किया, वे माक्र्सवादी समझ के विद्रोही कवि थे, उन्होंने चिन्तना नाम से साहित्यिक मंच की भी स्थापना की, वे राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर से संबद्ध रहे। उनकी कविताओं का अनेक अंतरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय भाषाओं जैसे जर्मन, रूसी, गुजराती, सिंधी, तेलगु, पंजाबी, मराठी व राजस्थानी भाषा में अनुवाद हुआ। उनकी प्रसिद्ध कविता है
मेरी भाषा का व्याकरण
पाणिनी नहीं
पददलित ही जानते हैं,
क्योंकि वे ही
मेरे दर्द को पहचानते हैं।
एक अन्य कविता है
मेरी कविता का कमल
बगीचे के जलाशयों में नहीं
झुग्गी झोपडियों के कीचड में खिलेगा
मेरी कविता का अर्थ
उत्तर पुस्तिकाओं मे नहीं
फुटपाथों पर मिलेगा
कार्यक्रम के अंत में
डॉ हरिदास व्यास ने आभार ज्ञापित किया , उन्होंने डॉ मदन डागा एवं डॉ सावित्री डागा जी को याद करते हुए उनके साहित्यिक अवदान को भी रेखांकित किया, उन्होंने सभी वक्ताओं को धन्यवाद दिया । कार्यऋम के प्रारंभ में दीपा खेतावत ने सरस्वती वंदना का स्वर पाठ किया, अतिथियों ने सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया और डॉ. मदन डागा एवं डॉ. सावित्री डागा के चित्रों पर पुष्प अर्पित करते हुए उन्हें अपनी भावांजलि दी। इस कार्यक्रम में शीन काफ निजाम साहब, डॉ कौशल नाथ उपाध्याय, डॉ कालूराम परिहार, हरिप्रकाश राठी, मीठेश निर्मोही, दीप्ति कुलश्रेष्ठ, बसंती पंवार, डॉ चाँद कौर जोशी, दीप्ति कुलश्रेष्ठ, सुषमा चौहान, किशन लाल गर्ग, सत्यदेव स्वितेंद्र निसार राही, ब्रजेश अम्बर, माहिर, नितेश व्यास, मनोहर सिंह राठौड सहित डॉ. सावित्री डागा जी की दोनों पुत्रियाँ, डॉ. कविता डागा, डॉ. मनीषा डागा एवं शहर के अन्य साहित्य प्रेमी बडी संख्या में उपस्थित थे।
गीताजंलि श्री को मिला 2022 का बुकर पुरस्कार
हिन्दी की पहली लेखिका जिन्हें मिला है यह अन्तरराष्ट्रीय सम्मान
नयी दिल्ली, इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार के लिए नामांकित 13 उपन्यासों की लांग लिस्ट में गीतांजलि श्री के हिंदी उपन्यास रेत समाधि की अनूदित रचना टूंम ऑफ सैण्ड को श्रेष्ठ रचना मानते हुए साहित्य जगत का प्रतिष्ठित बुकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
उनकी इस उपलब्धि को 1913 में रवींद्रनाथ टैगोर की गीतांजलि को मिली ख्याति से जोडा जा रहा है। 110 साल बाद एक और गीतांजलि देश का गौरव बनी है। यह थोडा अतिशयोक्ति लग सकता है, हिंदी के लिए यह उत्सव का क्षण है और श्री ने दुनिया में न केवल हिंदी का परचम फहराया है, बल्कि कई प्रतिमान गढे हैं।
बुकर पुरस्कार के लिए शुरुआती नामांकन के दौरान उन्होंने इसे स्वीकारते हुए कहा, बुकर का मैंने न कभी ख्वाब देखा और न ही मुझे इसके बारे में सारी चीजें पता थी, जब लांग लिस्ट की बात आई तो कुछ दिनों तक मुझे यह भी मालूम नहीं था कि इसकी वकत क्या है। पास और दूर से लोगों के संदेश आने लगे और लोग इसकी बात करने लगे तो मुझे समझ आया कि ये कोई छोटी चीज नहीं है। हालाँकि साथ ही उन्होंने कहा कि शॉर्ट लिस्ट किए जाने तक वह इस सम्बन्ध में सबकुछ जान चुकी थी।
खुद को पूर्वी उत्तर प्रदेश की लडकी मानने वाली गीतांजलि श्री का बनारस और गाजीपुर से गहरा नाता है। उनकी माता का पैतृक गाँव जमुई (बनारस) है, तो पिता का गोडउर (गाजीपुर)। श्री के पिता अनिरुद्ध पाण्डेय भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे और उनकी मैनपुरी में तैनाती के दौरान 12 जून 1957 को गीतांजलि श्री का जन्म हुआ। चूँकि पिता आईएएस थे, तो उत्तरप्रदेश के छोटे-बडे शहरों में उनकी तैनाती रही और इन्हीं शहरों में श्री पली-बढी और प्रारंभिक शिक्षा ली। बाद में उन्होंने दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से स्नातक और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. किया। कुछ दिनों तक जामिया मिल्लिया इस्लामिया में अध्यापन के बाद उन्होंने सूरत के सेंटर फॉर सोशल स्टडीज में पोस्ट-डॉक्टरल रिसर्च की और वहीं रहते हुए उन्होंने साहित्य सृजन की शुरूआत की। श्री को साहित्य की सोहबत परिवार से मिली है। उनकी माँ साहित्य अनुरागी रही हैं।
गीतांजलि श्री हिंदी की पहली लेखिका हैं, जिन्हें प्रतिष्ठित अन्तरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिला और उनकी इस उपलब्धि से न केवल हिंदी व हिंदी साहित्य के लिए नए अवसरों के द्वार खुलेंगे, साथ ही वैश्विक साहित्य भी और समृद्ध होगा। पुरस्कार ग्रहण करने के बाद श्री ने कहा, मेरे इस उपन्यास के अलावा हिंदी और अन्य दक्षिण एशियाई भाषाओं में बहुद समृद्ध साहित्य मौजूद है। इन भाषाओं के कुछ बेहतरीन लेखकों के बारे में जानकर वैश्विक साहित्य और समृद्ध हो जाएगा। इस प्रकार के मेलजोल से जीवन के आयाम बढेंगे।
साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता हिंदी उपन्यासकार अल्का सरावगी ने कहा, गीतांजलि श्री की कृति के अनुवाद को बुकर पुरस्कार मिलने से हिन्दी लेखन के लिए अवसर के नये द्वार खुल गए हैं।
रेत समाधि की पहली समीक्षा लिखने वाले प्रख्यात हिंदी लेखक प्रयाग शुक्ल ने कहा कि हिन्दी साहित्य वैश्विक स्तर पर अपना वाजिब दर्जा पाने की ओर बढ रहा है। उन्होंने कहा, आप देखेंगे कि हिंदी साहित्य का अनुवाद पहले की तुलना में 20 गुना तेजी से बढेगा।
गीतांजलि श्री द्वारा रेत समाधि शीर्षक से लिखे गए इस मूल हिंदी उपन्यास का डेजी रॉकवैल ने अंग्रेजी में अनुवाद किया है। डेजी रॉकवेल एक पेन्टर एवं लेखिका हैं और अमेरिका में रहती हैं। इससे पूर्व भी उन्होंने हिंदी और उर्दू की कईं साहित्यिक कृतियों का अनुवाद किया है।
- डेस्क मधुमती