fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

रेख्ते के बीज- एक पाठकीय टीप

मनमीत सोनी
क्या कहा जाए - उसके बारे में जिसके बारे में सोचते ही बहुत कुछ टूट कर जुड जाता हो या जुड कर टूटने लगता हो। एक असंभव वर्णन। एक अछोर प्रसार। एक इन्द्रधनुषी वितान। एक उलझाऊ डूब। एक फक्कड ऊब। एक अनसुनी चीख। एक घुटी हुई पैंसठ बरस की साँस। एक भयानक दुष्प्रचार। एक प्रायोजित महिमा मण्डन। एक अनवरत मुठभेड। सैंकडों द्वैतों के बीच अकेला अद्वैत। भीड जुटाता मदारी। पत्थर फेंकता पागल। ध्यान में लीन फकीर। कितना अधूरा उसका होना। कितना पूरा उसका अधूरापन।
असहमतियों की एक लम्बी सूची और उसे नकारने को उकसाती निजी विचारधारा। सहमतियों की भरपूर संभावना और उसकी ओर धकेलता मेरा मन। कृष्ण कल्पित होना कोई मजाक नहीं। स्याही के समन्दर में गोते लगाता एक प्यासा राजस्थानी डोकरा। बिल्कुल अपना-सा। जिससे केवल लडने के लिए एक बार मिलने की इच्छा की जा सकती है।
कृष्ण कल्पित पर लिखना आसान नहीं। क्या वे मार्केटिंग के उस्ताद हैं। अपनी फटेहाली का तमाशा बनाने वाले। क्या वे फटेहाल हैं भी। बिजली के नंगे तार जैसे। अपने आँसुओं से भिगोकर उस तार में करंट दौडाते हुए। उनकी फटेहाली क्या है। उनके भीतर क्या दुःख है। वे इतने बेचैन, कुण्ठित और कामुक क्यों दिखाई पडते हैं। और तभी अचानक उनके पास जो कुछ है; उसे लुटाने की मुद्रा में आ खडे होते हैं। उन जैसा कोई दाता हिंदी-कविता में दूर-दूर तक क्यों नहीं। उनमें सरहप्पा, गोरख, कबीर, निराला, मुक्तिबोध और शमशेर की परम्परा से खुद ही खुद को जोडने का साहस कहाँ से आता है। और यदि यह दुस्साहस भी है, तो कहाँ से आता है। अब तो बकौल कृष्ण कल्पित मार्किट में प्लास्टिक के शराबी’ पेश किए जाते हैं। क्या शराब उनमें यह साहस भरती है या अफीम या गाँजा या कुछ और। वह क्यों कह रहे हैं कि मुझे अफीम का पानी दे दिया जाए। यह समय नहीं गुजरता।
कवियों के बस का नहीं / कोई अफीमची ही बदलेगा इस निजाम को / जिससे बडा जुनूनी पृथ्वी पर कोई नहीं।
सनद रहे कि जुनूनी पृथ्वी पर - केवल भारत पर नहीं। निजाम धरती का - केवल भारत का नहीं। कविता कोई पाँच-दस बरस का स्टेटमेंट नहीं होती। वह इतनी निजी नहीं होती कि क्रांति-क्रांति का कागजी बिगुल फूँकने वाले अपने कविता-संग्रहों के फुटनोट्स में यह लिखने को मजबूर हो जाएँ कि फलां कविताएँ फलां सरकार के सत्ता में रहने के दौरान लिखी गईं। फिर तो कविताएँ लिख ही क्यों रहे हो।
कृष्ण कल्पित नकली आदमी नहीं है। वे रफ होने की हद तक मौलिक हैं। वे कहते हैं - नकली आदमी सबसे ज्यादा चिल्लाता है/ कोपीराइट कोपीराइट। वे कहते हैं - मैं एक ठोस चेहरा चाहता हूँ। वे कहते हैं - मैं खारी झील का नमक हूँ। वे कहते हैं - इसी भाषा में एक कवि / दो टूक कलेजे के करता पछताता / लिखता जाता था कविता / और फाडता जाता था। वे कहते हैं - अरथी पर सजाकर कहाँ ले जा रहे हो मुझे / अभी तो मैं पैदा हुआ था / अभी कल की बात है। वे कहते हैं- मैं चाहे कबूतर की बीट हूँ / पर कवि नहीं हूँ। वे कहते हैं- लिखना एक लडाई है / यह एक खून-खराबा है। वे कहते हैं- बनाना मुझे मातृभूमि की / एक मुट्ठी धूल। वे कहते हैं- प्रभुजी एक अरज मोरी सुन लीजो / अगले जनम मोहे कवि न कीजो। वे कहते हैं -गुमनामी का वरदान ही देना प्रभु / और ख्याति दो तो ?सी कि जब मैं बताऊँ अपना नाम / तो जवाब मिले / झूठ बोलते हो / तुम वह हो ही नहीं सकते।
(.....कि मुझे याद आ गया फटेहाल गुरुदत्त)
अब सवाल यह है कि खुद के खिलाफ ऐसी जंग क्यों। कोई तो वजह होगी। बहुत सारे आलोचकों ने उत्तर-आधुनिकतावाद में इसकी जडें खोजने की कोशिश की है। वे समझदार हो सकते हैं, लेकिन एकांगी हैं। यह जंग बहुत पुरानी है। कविता इसी तरह की गुमनामी और ख्याति के बीच में कवि को झुलाती रही है। इसमें कुछ नया नहीं है। नया है तो बस यह कि हमारे कविता-समय में यह तेवर इतनी ईमानदारी के साथ दुर्लभ हो चुका है।
कबीर की पंक्तियाँ कौंधती हैं - कबीर हरि रस यों पिया / बाकी रही न थाकि / पाका कलस कुम्हार का / बहुरि न चढई चाकि।
कबीर से भी पहले के भर्तृहरि कौंधते हैं - क्षण भर में बालक, क्षण भर में रसिया, क्षण भर में दरिद्र, क्षण भर में वैभवशाली, मनुष्य संसार रूपी रंगमंच पर अभिनेता जैसा अभिनय कर अन्त में बुढापे से जीर्ण-शीर्ण होकर यम के धाम को पहुँच जाता है।
अब आप ही बताइए कि क्या कबीर और भर्तृहरि किसी आधुनिकता या उत्तर-आधुनिकता के मोहताज हैं। भर्तृहरि आयु भी तो कह सकते थे। उन्होंने क्षण कहा। यह भी महाख्यान का टूटना है। सुख, दुःख और आयु से बडा निजी आख्यान और क्या हो सकता है। इतिहास - वितिहास की बातें भी करेंगे, लेकिन कुछ बाद में।
कृष्ण कल्पित अपने कविता-संग्रह को पूरब की कविता की प्रस्तावना बताते हैं। हो सकता है यह ठीक ऐसा ही हो। मैं दुआ करता हूँ कि जैसा वे चाहते हैं - ठीक उसी तरह उनके संग्रह के बारे में सोचा जाए। इसके समान्तर एक सवाल यह भी खडा होता है कि अब तक तो इस लडाई या संघर्ष के बारे में हमने कम ही सुना था। अचानक यह नया जुमला क्यों उछाला जा रहा है। क्या यह सब इसलिए हो रहा है कि कृष्ण कल्पित अपने आप को कविता लिखने वाले सभी सभी कवियों-अकवियों से असम्पृक्त दिखाना चाहते हैं ताकि जब भी उनकी बात चले वह किसी दूसरे ही कोष्ठक में बाँची जाए। मुझे निजी रूप से ऐसा नहीं लगता। हो सकता है इसमें एक मासूम चालाकी हो लेकिन हो तब भी क्या अन्तर पडता है। क्या यह बात सच नहीं है कि पिछले तीस-चालीस बरसों में हमने अधिकतर कवि दिनचर्या बनाकर कविता लिखने वाले पैदा किए हैं। बकौल कृष्ण कल्पित क्या यह बात सच नहीं है कि यदि देश के सभी कविता संग्रहों में / आग लगा दी जाए / तो दो-चार साल तक आग न बुझे।
मेरे खयाल से कविता इतनी आसान विधा तो कभी प्रतीत नहीं हुई जितनी आज प्रतीत होती है। लिखना मेरा अधिकार है - यह सच है - लिखने का मन हो, तो लिखना ही पडेगा और फिर मैं मूल्यांकन-मूल्यांकन चीख कर हिंदी-कविता-समाज को दोष देता फिरूँगा - यह कर्तव्य में नहीं आता। इस बात को सीधे-सीधे मुँह पर कौन कहेगा। दुश्मनी मोल कौन लेगा। खारा और खरा कौन बनेगा। कृष्ण कल्पित आसानी से यह जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले लेते हैं। कैसे - यह जानने के लिए आप उनकी कविता विश्व हिन्दी सम्मलेन पढ सकते हैं।
कृष्ण कल्पित को कुछ अवयव अधिक कृष्ण कल्पित बनाते हैं। उनका इतिहास-बोध, उनका स्त्री-बोध और उनका वैराग्य-बोध। देखा जाए, तो पूरब के कवियों में यदि यह तीन बोध न हों, तो वह कविता नहीं लिख सकते। यह अलग बात है कि इतिहास को आप एक सीमा के बाद स्मृति पढिए, स्त्री को एक सीमा के बाद मुक्तिदात्री और वैराग्य को एक सीमा के बाद विध्वंस रचने वाली ऊब के बरक्स समझदारी भरा पलायन। हाँलाकि पलायन भी सही शब्द नहीं है। उनकी कविताओं में स्मृति और गल्प स्थायी भाव हैं। वे चमत्कृत करते हैं। कुछ भी उठाकर कुछ भी रच सकते हैं। यह कुछ भी अधिकतर कमाल होता है। वे अपनी कविताओं में संवेदनाओं के आँसू भीगे पुलिंदे भर नहीं हैं। वे तर्कशील हैं। कविता में भी तर्कशील। लगभग अकाट्य। कभी-कभी दुराग्रह की सीमा को छूते हुए। कभी-कभी तो वे फट पडते हैं। पाठक कहता है.... बस..बस..बस..! जैसे यह कविता-पंक्ति देखिए- जीवित कवियों के नखरे स्त्रियों से अधिक होते हैं या निर्वसन हूँ / और निर्वासित.... मेरा दुर्ग लुट गया... मेरा रेवड बिखर गया... मेरी रेलगाडी छूट गयी.... मेरा हवाई जहाज गिर गया.... यह सब पढकर मुझे इस कविता के लुटे-पिटे नायक पर कविता के समाप्त होने से पहले इतनी दया आई कि मैं अपनी आंचलिक भाषा में बोल पडा : मर ज्या ताऊ इयां कर।
खैर!
उत्तर-आधुनिकतावाद पर यहाँ एक टिप्पणी करनी आवश्यक है। मैंने किसी आलोचक से सुना था कि इस संग्रह की ध्रुव-कविता रेख्ते के बीज ऐसी कविता है जो उत्तर-आधुनिकतावाद की प्रतिनिधि-कविता है। यह ठीक बात है। इतनी टूटन - इतना बिखराव - इतनी अनिश्चितता और फिर-फिर एक ही केन्द्र की ओर लौट आने का आग्रह इस कविता को उत्तर-आधुनिकतावाद की प्रतिनिधि-कविता बनाता होगा। मुझे इससे कोई आपत्ति नहीं। मुझे आपत्ति इस बात से है कि यदि कवि स्वयं भी यह कहने लगे कि उस पर किसी वाद-विशेष का प्रभाव है और उसने इतिहास और गल्प के संघर्ष में गल्प, समष्टि और व्यष्टि के संघर्ष में व्यष्टि, नियोजन और उपयोगितावाद के संघर्ष में उपयोगितावाद तथा निश्चितता और संदेहवाद के संघर्ष में संदेहवाद को प्राथमिकता दी है - तब भी पाठक पर उसका प्रभाव न्यूनतम होना चाहिए। किसी समीक्षक या आलोचक पर तो नहीं के बराबर। कविता जिस रस की खोज में पढी जाती है उसका किसी इजम से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। कवि किसी भी रस्ते से कविता तक पहुँचे- पाठक के पास सबसे पहले केवल दो आँखों और एक धडकते हुए दिल भर की ही गुंजाइश होती है। फुर्सत में चाहे आप किसी कविता की कितनी ही चीरफाड करते रहें। यह आश्चर्य का विषय है कि इस चीरफाड को बकायदा एक अनुशासन की भाँति पाठकों पर लाद दिया गया है। कवि तो खैर बुरी तरह बर्बाद हुए ही हैं।
कृष्ण कल्पित के यहाँ उत्तर-आधुनिकतावाद उस तरह से कहीं मौजूद नहीं है जिस तरह उन्हें चाहने और प्यार करने वाले कुछ युवा-कवि उन पर थोप रहे हैं। मैं नहीं जानता कि कृष्ण कल्पित स्वयं इसका प्रतिकार कर यह क्यों नहीं कहते कि हो सकता है मेरी एक राजनीतिक विचारधारा हो या मैं एक प्रचलित उत्तर-आधुनिक समय में लिख रहा हूँ - लेकिन मैं इस संग्रह की प्रस्तावना से बिल्कुल नहीं डिगना पसन्द करूँगा कि यह पूरब की परम्परा में रची-बसी कविताएँ हैं - और पूरब अपने जागृति-काल से ही मूल्यपरक रहा है। यहाँ खण्डन का स्थान मंडन के बाद है। यहाँ दुत्कार का भाव आभार के बाद है। यहाँ नकार का भाव स्वीकार के बाद है।
प्रो. आनंद सिंह कृत अथर्वा की पंक्तियाँ कौंधती हैं - एक प्रेमानुभव में बन्द है जीवन का वृहत विराट सौन्दर्य / एक सुकोमल निरंतरता ईश्वरीय आभा की / काल को मुट्ठी में बन्द किए / दृढता से अन्ध मनोगुम्फी में विचरती है फेनिल अतृप्तियाँ लिए हुए।
यहीं पर इस संग्रह से कृष्ण कल्पित की कविता-पंक्तियाँ कौंधती हैं - सामने खामोश रहूँ / जब बोलूँ अनुपस्थितियों में बोलूँ / जीते-जी क्या बोलना / मरने के बाद बोलूँ / कवि अगर हूँ तो अपने न रहने के बाद कवि रहूँ और दूसरे जन्म में अपनी कविताएँ पढूँ / किसी अनजान पाठक की तरह।
बरसों तक अपने निजी राजनीतिक - भौगोलिक - सामाजिक इतिहास के खाँचों में भयानक संत्रास को जीने वाले और उसी के भीतर अपनी चेतना की लगभग हत्या कर चुकने वाले औपनिवेशिक मानसिकता के विचारक और उनके मानसपुत्र उपन्यास की भाँति इतिहास लिखे जाने का जी भर विरोध करें, लेकिन यह भी याद रखें कि इसी वसुधा पर - हम पूरब के लोग जिसके परिवार होने की कल्पना और कामना करते हैं - जीवन अभी पूरी तरह से गल्प में नहीं बदला है और इतिहास उस स्मृति के सामने बौना है जो हमसे हमारे पितरों की पूजा करवाती है। कृष्ण कल्पित तो क्या कोई भी कवि इस सातत्य के प्रति विनयी हुए बिना एक हताश कविता से दूसरी उम्मीद भरी कविता की यात्रा नहीं कर सकता।
इस संग्रह में अनेक क्लासिक कविताएँ हैं। उन्हें एक सूची में बाँधना सरल तो है, लेकिन आवश्यक नहीं। फिर आप क्या पढेंगे। मैं आलोचना के अनुशासन में पका हुआ घडा तो हूँ नहीं। मैंने तो जो पढने के बाद सोचा वह जस का तस लिख दिया।


फिर भी मुझे यह लगता है कि कृष्ण कल्पित की कविताओं के साथ अखिल-भारतीय-न्याय होना चाहिए। यह न्याय उन्हें पढने भर से नहीं होगा। एक तो यह बडी ट्रेजडी हुई कि कविता को पढने और पढवाने भर का औजार बना दिया गया है। कवि उपहार-संस्कृति के वाहक हो गए हैं। उनके परमानेंट पाठक फूल-पत्तियों और चाय-कॉफी के प्यालों के बीच उनकी पुस्तकों के साथ सेल्फी खींचकर पोस्ट करने को युगधर्म समझ बैठे हैं। आलोचना से सब बिदकने लगे हैं। किसी को लाल दिखा दो, तो बिदक जाता है किसी को हरा दिखा दो तो बिदक जाता है किसी को भगवा दिखा दो, तो बिदक जाता है। मैं भी इस संग्रह की एकाध चलताऊ राजनीतिक कविताएँ पढकर बेतरह बिदका हूँ। इस बिदकने का इलाज ढूँढना जरूरी हो गया है- वरना साहित्य जैसा सबसे बडा लोकतन्त्र पढे-लिखे लठैतों का अड्डा बन जाएगा। सोशल मीडिया पर तो अपनी-अपनी रुचियों के आधार पर कुछ बाडे इतने स्थापित हो चुके हैं कि एक सख्त टिप्पणी की पर्ची भी उछाल दी जाए, तो मरने-मारने का माहौल बन जाता है। ऐसे में यह आश्वस्ति है कि कृष्ण कल्पित अपनी आलोचना के प्रति नरमी और अहोभाव से भरे हैं।
यह संग्रह उनकी तीस बरसों की साधना का परिणाम है। ईश्वर उन्हें और तीस बरस तो क्या साठ बरस दे। और यदि ऐसा नहीं होता है तो इस संग्रह को कई सौ बरस की आयु तो दे ही। इससे कम पर कृष्ण कल्पित की कविताई तुष्ट नहीं हो सकती। हो सकता है इस वाक्य को पढकर कृष्ण कल्पित मन ही मन कहें - मैं तुष्ट नहीं होना चाहता। मैं प्रेत बनकर मण्डराना चाहता हूँ।
उनके भीतर के कवि का अब अन्दाजा-सा होने लगा है।

अन्त में उन्हीं की एक कविता के साथ अपने अब तक के दुस्साहसों का समापन करता हूँ। न जाने कितना कुछ कहना अभी शेष रह गया है, लेकिन यहीं रुकना होगा। कृष्ण कल्पित की कविताओं के कैनवास की तुलना में यह टिप्पणी बहुत छोटी और अपर्याप्त है।
इस उम्मीद में हर रोज निकलता हूँ घर से / कि आज जरूर मारा जाऊँगा / लेकिन जिस गोली से मुझे मरना था / वह किसी और के सीने में धँस जाती है / वह दिन जरूर आएगा / जब मुझे मर गिराया जाएगा / मेरा जीवन / हत्यारों का चूका हुआ निशाना है

पुस्तक : रेख्ते के बीज
कवि : कृष्ण कल्पित
प्रकाशन : राजकमल पेपरबैक्स
वर्ष : 2022
मूल्य : दो सौ पचास रुपये
विधा : कविता
सम्पर्क - ई 164, धर्मनिकेत, अग्रसेन नगर,
चुरू, राजस्थान।
मो. 6377410373
manmeetsoni@yahoo.com