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कैलाश मनहर की कविताएँ

कैलाश मनहर
1) अनायास

असीम, अनादि, अनन्त!

सात मन्त्रों वाले उस नासदीय सूक्त में
सृष्टि की रचना का संकेत भर था

क्या क्या डिकोड करती?

दर्शन पढाने वाले गुरुजी ने बतायाः

सब कुछ शून्य था,
सब कुछ उसी शून्य से जन्मा।
कि न हवा थी, न आकाश, न मिट्टी
जल तो बहुत-बहुत बाद जन्मा
प्रकाश का होना भी कई प्रकाश वर्ष दूर था।

केवल तम था
गहन, निविड अन्धकार!
इतना घनीभूत कि भ्रम होता कि उसमें समाहित है
कइ-कई अन्धकार..

उसी अन्धकार से प्रकाश की ओर
एक अन्तहीन यात्रा थी


न रोग था, न मृत्यु
और मृत्यु ही न थी
तो अमरता की कोई परिभाषा भी न थी।

किसी अनादि के अस्तित्व की कथा थी मात्र
किन्तु अपुष्ट, अस्पष्ट!

वह अजन्मा था
कि जन्म की संकल्पना भी तो न थी।

जैसी कोई इच्छा थी,
स्वप्न का कोई दृश्य
एक विचार बस
कोई अद्भुत कल्पना
अविश्वसनीय सी कामना
और फिर अनायास ही ऊर्जा की तरंगें खिली

पाँच तत्त्वों से बनी बनी सृष्टि
और देह मनुज की।

लेकिन कौनसे तत्त्व से आखिर बनता है मन
आत्मा की धातु कौनसी है
क्या इस सारे सृजन की कोई प्रेरणा नहीं
वर्तुलों में घूमते हुए इन सिद्धान्तो को
केन्द्र से बाँधने वाली वह त्रिज्या कौनसी है?

मैं पूछती और गुरुजी मुस्कुरा कर कहते
दर्शन में इतना उलझना ठीक नहीं।
अभी तुम्हारी आयु ही कितनी है।

वयस का वृक्ष ऋतु-चक्र की परिक्रमा करता रहा
तम से प्रकाश की यात्रा को
मानती रही अन्तिम सत्य
किसी प्रथम कक्षा की चंचला विद्यार्थिनी की तरह
बार-बार विस्मृत होती रही गणना

जाने कितने वर्षों से संसार में अनुत्तरित भटकता है
दर्शन की कक्षा में वह अनायास मन में उगा प्रश्न

जैसी अनायास यह समस्त सृष्टि।

2) अनुगूँज

व्योम के वितान पर
धरा की आकांक्षाएँ
अटकी हुई
टहनियों के सहारे
जागती फिर से
नीड की सम्भावनाएँ

कौन लिखता तुम्हें पाती
जबकि नहीं स्याही में
वे घुलती सुगंधें
जबकि नहीं वे गीत
जिनकी धुन बनी धुनकी
जबकि अब नहीं वह समय
स्मृतियों के दुशाले की गर्माहट भरा

पर्वतों के शिखर सारे
टोहते है तलहटी पे
लौटते पदचिह्न अचीन्हे

और तुम्हारे नाम की अनुगूँज।

3) अर्थ

सबसे प्रेमिल व्यक्ति वह था
जिसने उगाया कोई पेड
खिलाया कोई फूल
और सबसे ज्यादा घृणा
निश्चय ही उस मन में रही
जिसने किताबघरों में आग लगाई
और सबसे सार्थक था उसका अस्तित्व
जिसने किसी के आँसू पोंछे अकारण
अपनी करुणा के वश

संसार उन हथेलियों की ऊष्मा से प्राणवान है
(शेष सब मिथ्याः उन्नति के शिखर,
गति के विस्मय सब)

जिसने धरती के लिए उगाए पेड
कि बची रहे प्रकृति की गोद में मनुष्य की चेतना
जिसने बच्चों के हाथों में थमा दी किताबें
ताकि भविष्य का सूर्य ग्रहण से बचे
जिसने दृश्य से ओझल होना चुना,
एहसान से बोझिल दृष्टि को देखने की जगह।

4) दुःख

पावस से उपजते है सूखी धरा पे फूल
एक मुस्कान की रेखा से जुड जाती है
कई कई कोस से आकर स्मित की रेखाएँ
नेह का स्पर्श भरोसे की दीठ गढता है
सेतु उगाता है सिर्फ एक प्रेमिल शब्द
अपरिचय और अबोले की नदी पर

और प्रेम?

बस कष्ट! केवल दुःख
सम्पर्क - स्वामी मोहल्ला, मनोहरपुर,
जयपुर (राज.) - ३०३१०४
मो. ९४६०७५७४०८