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अनुराग तिवारी की कविताएँ

अनुराग तिवारी
तुम और छुईमुई

ऐसे दिख जाना एक दिन
जैसे कनखियों से मैं देखूँ तुम्हें
मुझे देखते हुए
और कोई तुम्हें ना देख रहा हो
वैसी वाली चुपचाप मुस्कुराहट
तुम पर छुईमुई की तरह खिली हो

छुइमुई छूने से मुरझाता नहीं
सिर्फ थोडी देर को शरमाता है
तुम मेरे देखने से घबराती नहीं
बस थोडी देर को
तुम्हारे मुझे देखने की लय
टूट जाती है।

मैं तुम्हें हाथों से नहीं
नजरों की त्वचा से छूता हूँ
मेरी पलकें मेरे होंठ हैं
जिनसे मैं एक चुम्बन
हर बार उडाता हूँ
तुम्हारे छुइमुई की तरह
शरमाने को सोचता हुआ।

भाषा का बुजुर्ग कवि
मेरी भाषा का एक बुजुर्ग कवि कविता पढ रहा है
सबसे वरिष्ठ इसलिए सबसे आखिर में
रात के कोई नौ साढे नौ बजे का वक्त
और ढाई तीन घंटे से चल रही है सभा

सभागार में उपस्थित गिने चुने श्रोता
उनकी उक्ताहट, भूख और नींद का मिलाजुला वक्त

फिर भी सब कमर कसे से बैठे हैं
बुजुर्ग कवि के सम्मान में
बीच बीच में थकी-थकी-सी वाह वाह करते
आजू-बाजू वाले श्रोता से
हल्की मुस्कुराहट लिए नजरें मिलाते हैं
इस से ही बँधा हो जैसे और बैठ पाने का ढाढस

जानते हुए
कि कुछ अतिरिक्त ही हो चुका है काव्यभार
बैठे हैं इस सन्देह में भी
कि जिस तरह की उम्र है कवि की,
जिस तरह का यह वक्त है
पता नहीं उस कवि को अगली बार
सुन भी सकेंगे या नहीं






बुजुर्ग कवि भी
जिसे थोडी सी देर खडे रहना भी मुहाल होता होगा
जो एक मझौली कविता पढने जितना समय लेकर
पहुँचा था मंच तक
निर्बाध पढे जा रहा है कविता
शिशु उत्साह में

उसे मालूम है
कि जीवन-मंच पर यह उसका अन्तिम सत्र है
वह जी भर कर पढ लेना चाहता है कविता
भर लेना चाहता अपनी आत्मा तक
खुद को सुने जाने का यह दृश्य


दरअस्ल
श्रोता कविता से *यादा स्मृति
और कवि कविता से *यादा जीवन सहेज रहा
कविता के बहाने

मैं सबके पीछे खडा देख-सुन-सहेज रहा
एक सुन्दर जीवन भाषा।
अभ्यर्थना

जो यात्रा चुनी है तुमने
वह स्वयंभू होने की है
और हर यात्रा की तरह
इसके भी अपने भटकाव हैं

जब मैं तुम्हें मुझसे लडते देखता हूँ
बुरा नहीं मानता
क्यूँकि जानता हूँ
तुम *यादातर तो सिर्फ झुँझलाई हुई हो
अपने आप के पुनर्परिभाषित होने के आत्मसंघर्ष से
(तुम्हारी मुख्य लडाई तो खुद से है)

तुम एक नया गीत गा रही हो
जिसका सम अभी जन्मा नहीं
जिस महत्त्वपूर्ण राग में तुम गाती हो
उसके विवादी स्वरों का इस्तेमाल
तुम्हारे जाने अनजाने होता है
और राग का माहौल टूट जाता है

मैं स्वप्न देखता हूँ
तुम अपनी बन्दिश खुद रचती
उस पर उन्मुक्त नृत्य करती हो
तुम्हें किसी ताली का इंतजार नहीं
न किसी उबासी का मलाल है

जानता हूँ तुम्हारा नया स्वर
क्रिया की प्रतिक्रिया का स्वर है
पर इस दुनिया को अब
किसी प्रतिक्रिया की प्रतिक्रिया की दरकार नहीं
सो उसे जन्म देने से बचना
अपने ही रचे को प्रेम और घृणा तुमने दी है बहुत
अब तुम्हारी क्षमा और उदासीनता उसे देना स्त्री

समय तुम्हें देख रहा है
कि तुम एक अभूतपूर्व इबारत लिखो
दर्शक तुम्हें देख रहे हैं कि तुम कब गिरो
कि कुछ तुम्हें उठाने आ जाएँ
कुछ दबोचने
कुछ अपनी जगह बैठ हसें
सो अबकी गिरना तो खुद उठना

अपने नए गीत के सम को पहचानो
और उसे जन्म दो
तुम्हारा तत्त्व सबके जीवन का सत्त्व हो
मैं इंतजार में स्वप्न देखता हूँ स्त्री।

प्रेमगीतः शोकगीत
एक)

वह शुरू से ही कंधों पर गिरता
शुरू से सुख भी देता, जरूरी नहीं था
पर रोज घटने वाली एक छोटी मृत्यु से बचाता रहा

प्रेम एक दुधमुँहा बच्चा है
हमें पता नहीं क्यूँ रोता है

नहीं किया उसे ऐसे मंच पर स्थापित
जहां उस से *यादा उसके अभिनय में होते
रहा जाता है प्रतिबद्ध इस तरह भी प्रेम में

महान नदी में तिरोहित हर धारा महान नहीं होती
विशाल तरलता में शामिल होकर बहना ही
उसका गौरव है।

अनजाने लोगों में नहीं
जानी पहचानी आत्माओं से चलता
प्रेम का कारोबार
मन की टूटी नाव को चाहिए
विश्वस्त देह का किनारा

निश्छल की नाव बैठ ही ढूँढ पाए
जीवन की मरुभूमि में जलप्रपात हम
आश्वस्ति के उर्वर गह्वर में होता रहा
आत्म-जल आचमन

द्वैत के मैदान में
साथ चलते हम
घास के दो तिनकों की तरह
इस दर्जा एकमेक हो जाते
कि साँस की फाँक तक मिट मिट जाती

जिन्दगी के धूसर केनवस में
सुख का रंग है अथाह
बशर्ते कि अपना दुःख स्थगित कर सकें हम

किसी के होने तक लगता था
अपना जीवन उसे दे दिया
दरअस्ल हम उसे कुछ दे ही नहीं सकते थे
वह भी कुछ स्वीकार करने की मनोदशा में कहाँ था

अपनी सन्तुष्टि के लिए हम
किसी जीवन हार चुके को लडाते रहते हैं
वह हमारा मन रखने
लडने का अभिनय करता रहता है
और मृत्यु के इन्तजार में
जीवन-सा लम्बा शोकगीत चलता रहता है।

दो)

कविता लिखने की रात कवि को
नींद नहीं आती
वह कविता को थोडा और लिखना चाहता है
जैसे कभी कभी प्रेम में रहते रहते
बढ जाती है प्रेम ही की प्यास

हमेशा जानते हैं किसी की कब्र पर खडे हैं
फिर भी जीवन के गीत गाते हैं हम

हर एक की अपनी एक हारी हुई लडाई है
मृत्यु का विचार जिसका पार्श्व संगीत है

कोई इतना प्रेम भी कर सकता है
कि उसके साथ रहकर हम बर्बाद हो जाएँगे
यह आत्मसात् होते ही कह देता है
जाओ मुझे तुमसे प्रेम नहीं
वह बार बार यही कहता
और हम लौट जाते हैं एक दिन
क्यूँकि अंततः हमें लौट ही आना पडता

हम अक्सर वही सवाल करते हैं
जिनके जवाब मालूम हैं
जिनके जवाब नहीं मालूम
हम वो सवाल भी नहीं जानते

अनबन में लिखे प्रेम पत्र अनकहे का प्रायश्चित हैं
प्रेम कमोबेश एक प्रायश्चित है,
खुद को माफ न कर पाने का।
जीवन भी अचीन्ही मृत्युओं की
पहचान के बाद एक प्रायश्चित ही है।

सम्पर्क - सी-17, ग्राऊण्ड फ्लोर, सिद्वार्थ एक्सीलेन्स अकादमी के पास,
डोमिनो पिज्जा के पीछे, होशंगाबाद मार्ग, भोपाल- ४६२०२०, मो. ९६६९९३००३५