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धूप के तट पर

शर्मिला बोहरा जालान
Sing the song of the obscure man,
Revea this unspoken soul
Soothe his humilated heart
Restore life and song
To this dry land
Rouse the failing herats and hidden men.
-RABINDRANATH TAGORE
यह कथा किस लिए !
बस यूँही है। अपने अन्दर के सागर में, दूर कहीं गहरे में तरंग उठती है उसको पकडने के लिए।
तरंग जो लहर बन जाती है, उन लहरों को समेटने के लिए।
लहर पर लहर उठती है, आती है जाती है। उन लहरों के बीच बनता है भँवर। उस भँवर को देखने-सुनने के लिए।
हर जीवन एक भँवर है! हर आदमी अपने भँवर का निर्माता ।
उस निर्माता के चक्रवातों के झंझावातों से गुजरने के लिए ।
उस छोटे बडे जीवन के अर्क, सार्थक निरर्थक, अदने और बडे जीवन के सत्त्व को पाने के लिए।
यह कथा कलकत्ता शहर के उपकार को बताने।
जिसने उसे आश्रय दिया ।
जिसने उसे फैलाव दिया ।
जिसने उसे रचा।
उसका जीवन कलकत्ता के होने से है।
कलकत्ता उससे नहीं है ।
वह कलकत्ता से है।
यह कथा मौसमी के जीवन के कुछ वर्षों का लेखा-जोखा है ।
बैसाख का 25वाँ दिन (पोचिशे बैसाख)
यह इलाका हरा भरा है। मौसमी बीएम बिरला हॉस्पिटल में बैठी हुई है। आजकल उसके अन्दर किसी भी बात की कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं होती। पिछले सात वर्षों में उसने अपने परिवार में तीन मौतें देख ली। इस बार पिता अस्वस्थ हैं। कितने लोग जीवन से चले गए। हर जीवन की अपनी सीमा है, थकान और घुटन। हाँ, एक बार हूक-सी उठी। उसके बाद अन्दर कुछ भी नहीं हुआ। पहले उसने सोचा पिता को देखने न जाए। आईसीयू रूम में वेंटिलेटर पर हैं, मुँह पर ऑक्सीजन का मास्क और चारों तरफ पाइपें लगी होगीं। कैथिटर लगा होगा। छाती में पानी भर गया है उसे निकालने के लिए भी पाइप होगी। अनगिनत पाइपें। क्या होगा देख कर! जी खराब होगा। फिर मन हुआ देखा आए। यह सच है कि अस्पताल के अन्दर की चहल-पहल, तेज रोशनी उसे अवसाद से मुक्त करेगी, घर में बैठे-बैठे एक अजीब तरह की उदासीनता भी घिर जाती है। उसे समझ में नहीं आता कि उसे क्या हो रहा है! यह इलाका खिदिरपुर की तरफ निकल जाएगा। मौसमी,अपनी बहन के साथ खिदिरपुर के लक्ष्मी मन्दिर में कई बार आई है। वही बहन सात महीने पहले कोरोना वायरस में नहीं रही। आजकल उसके अन्दर कुछ भी नहीं होता, न जाने कौन सी शीला जम गई है मन के ऊपर। कुछ भी नहीं पिघलता। जो होता है बस सुन लेती है। एक समय भावनाओं का ज्वार उठता था और चारों तरफ से ऐसा अकेलापन घेर लेता कि लगता था दम निकल जाएगा। पचास वर्ष की अवस्था में अब उसके अन्दर कोई भी बात उस तरह से नहीं घटती जैसी पहले घटा करती थी। उसे क्या हो गया है! दूसरे लोग उसके बारे में क्या सोचेंगे!
आज 25 बैसाख (पोचिशे बैसाख) है। ठाकुर रवीन्द्रनाथ की जयन्ती। घर के सामने जो बिडला स्कूल है वहाँ सुबह नीचे मैदान में सभी छात्राएँ इकट्ठी हो गई थी और रवीन्द्रगान चल रहा था और देखते ही देखते बादल छा गए। जोरों से बारिश होने लगी। मई महीने की बारिश। सोमाली कितना सुन्दर सजी थी। जूडा बाँधा था और उसमें फूल भी लगाया था। कितना सुन्दर नृत्य कर रही थी। विद्यालय रवीन्द्र जयन्ती के कार्यक्रम में डूबा हुआ था। एक तरफ यह सब हो रहा है दूसरी तरफ पिता बी एम बिरला हॉस्पिटल में वेंटिलेटर पर है। सिस्टर ने कहा-

मिलने का समय ओवर हो गया है। अब आप नहीं जा सकतीं।
मौसमी ने रिक्वेस्ट किया-
मेरे पिता हैं। एक मिनट रुकूँगी और ज्यादा नहीं। सिस्टर प्लीज।..प्लीज ।
सिस्टर ने कहा - ओके। बट डोन्ट स्टे
मौसमी लिफ्ट से ऊपर गई। उसने देखा पिता के मुँह में, हाथ में, हर तरफ पाइप लगा दी गई है। आँखें बन्द और चेहरा फूला हुआ । मौसमी ने उनके सिर पर हाथ फेरा। बार -बार हाथ फेरने से उन्होंने आँखें खोली। मौसमी को पहचान गए। इशारे से बोले-देखो कितनी पाइप लगा दी है।
मौसमी ने कहा- आप जल्दी घर आएँगे। वह उनके सिर पर हाथ फेरती रही और जल्दी ही लौट आई। लौटते हुए फिर एक बार घूम कर देखा, पास गई और नीचे आ गई। अस्पताल से निकल कर घडी देखा, शाम के साढे छह बज रहे थे। कोयल जोर-जोर से कूँ- कूँ रही थी। ठण्डी हवा चल रही थी और ऊपर बादल उमड रहे थे। आज दिन में बारिश हुई थी। मौसम अच्छा था। भीगा-सा। तुरन्त याद आया पिता वेंटीलेटर पर हैं और कानों में रवीन्द्रगान चल रहा है, बाहर गोधूली में कोयल जोर-जोर से बोल रही है। एक साथ उसके अन्दर कई चीजें चलती रहती हैं। ठाकुर रवीन्द्रनाथ ने कितना अकेलापन भोगा और परिवार में कितनी ही मौतें देखी ।
मौसमी का मन होता है अस्पताल की यादों से छुटकारा पाए। किसी से बात करे। पर किसी से बात कर लेना कोई अकसीर दवा नहीं है। हर नई समस्या का नया ही हल होता है इस से दिमाग में भी सीलन नहीं रहती।
आलोक मेहरा
बहुत दिनों के वक्फे के बाद उसे याद आते हैं वर्षों पुराने वे दिन जब पडोस में रहने वाले प्रसाद बाबू के यहाँ उनके मित्र आलोक मेहरा से मिली थी। मुद्दत हो गई उनकी कोई खबर नहीं। स्वस्थ तो है ना! उम्र पचहत्तर के आस-पास हो गई होगी। उन दिनों को याद कर उनकी बातों को याद करने लगी। मुद्दत नाम से उसने उनकी बातों को सिलसिलेवार पिरो कर रख लिया था। वे अक्सर दोस्त और दोस्ती की बात करते। उनकी बातों से उनके बारे में कुछ भी नहीं जाना जा सकता था । वह अपने बारे में खुलते नहीं थे। पत्नी, बच्चे, बच्चों की शादी, नौकरी! मौसमी से नहीं कहते पर प्रसाद बाबू से अपने परिवार की बात करते थे ।
फिर पिता याद आ गए। पिता की बात याद करते हुए भाई का चेहरा याद आया। वह किसी से बात कर रहे थे- मेडिक्लेम। हाँ। मेडिक्लेम किया हुआ है। बीएम बिरला। वेंटिलेटर पर पिता। हर दिन का खर्च। चेहरे पर चिन्ता की लकीरें न जाने कितने दिन डॉक्टर उन्हें यहाँ रखेंगे।
मुद्दत
अलोक मेहरा कहते- दोस्त ना हो तो आदमी जिन्दा भी मरा समान है। दोस्ती का जज्बा भी शराब जैसा है। फिर कहते-
एक कतरा मय का
जब पत्थर से होंठों पर पडा
उसके सीने में भी
दिल धडका
और उसने यह कहा
जिन्दगी ख्वाब है ,
ख्वाब में झूठ क्या,
और भला सच है क्या!
शैलेंद्र उनके ख्याल में गालिब के बाद सबसे बडा कवि था। फिर जोर से हँसते कहते हिंदी के स्कॉलर यह सुनकर हँसेंगे, पर यह उनकी ही जहनी गरीबी की गवाही होगी।
फिर बोलने लगते कि कल कमाल की कहानी पढी। उसमें जो था वह यह कि अपनों की मृत्यु की कल्पना करना या कामना करना बहुत बडी सच्चाई है क्योंकि सोच का कोई दायरा नहीं, आदमी सब कुछ सोचता है। यह उसके वजूद की आजादी है। अच्छा सोचता है बुरा करने की या बुरा सोचने की अपने आप होने वाली कोशिश पर पापी होना महसूस करता है। मैं इस तरह के सोचने को स्वभाविक मानता हूँ। बिना कसूरवार महसूस किए आदमी को सब कुछ सोचने की आजादी उसके होने की निशानी है। अपने पिता की बात याद करते कहते-मेरे पिताजी जब जिन्दा थे (और जिन्होंने हमें, जैसा कहते हैं फूलों की तरह पाला) उनके मरने के सीन को कई बार जहन में लाता था। कौन-कौन अफसोस करने आया (जैसे पाखण्डी- हिन्दी में शब्द है) और कैसे उनको पार्थिव शरीर को आग के हवाले किया गया वगैरह ।
तसव्वुर में अपने को बुरा देखने की बात के बारे में जो कहानी पढी उस बात के बारे में अक्सर में सोचा करता था आदमी का सब कुछ सोचना जायज है और यह उसका अपना ढंग है।
वह अपनी बात को खत्म करते हुए कहते-तुमसे इतने दिन बात नहीं कर सका उसके लिए मु’आफी चाहता हूँ। तुमसे बात करने के लिए सकून जरूर चाहिए। कोहरे में मुझसे बात नहीं होती। फिर बोले मेरे पास जो एल्बम है उसमें तुम्हारी फोटो देख रहा था। उसमें तुम्हारा चेहरा बिना मुस्कुराए खुश दिखता है। खुश रहने की आदत सबसे अच्छी आदत है।

न्यू ईयर
आजकल मैं लगभग अकेला हूँ और अकेला होने का पूरा लुत्फ उठा रहा हूँ । सोच और कल्पना में गजब का तालमेल चल रहा है। जिस में रुकावट के लिए खेद की कोई गुंजाइश नहीं होती। सर्दी भी खूब पड रही है और आज सुबह से बारिश भी हो रही है । इस वक्त दोपहर के सरदार (हा! हा!!) बजे हैं। पर लगता है सूरज अभी निकलेगा।
मौसमी अपनी सफलता का पूरा पूरा लुत्फ लेना। सुख को झेलना मत। मैं अगर शिक्षकनुमा कोई आइटम होता तो मेरी जहनी हालत भी शायद ऐन तुम्हारी हालत जैसी होती क्योंकि सिखाने वाला शख्स होने का तो मैं तसव्वुर भी नहीं कर सकता। मेरे गिने-चुने दोस्त है दुनिया में। एक दो और भी होंगे, पर ये ही अहम हैं। बाकी बचे कुछ कम जान पहचान के हैं कुछ ज्यादा जान पहचान के हैं । इन जान पहचान वालों में रिश्तेदार भी हैं जिनमें अनेकों के साथ हमारी जान पहचान हमारे साथ एक तरह से जबरदस्ती है और इस जबरदस्ती की जान पहचान से निजात पाने की कोशिश हमेशा जारी रहती है....चार पाँच मिनट तुमसे बात करने में तुम में अपने लिए मान देखा उसकी एवज में दुनिया में कुछ नहीं। बडी-बडी बातें करने के बावजूद मैं एक छोटा सा बच्चा बना बैठा था। अपने साथ कुछ निहायत ही अच्छा होना महसूस कर रहा था । इस तरह का सुख सूखा पडने के दिनों में मन को सींचत है। प्यार करना और महसूस करने में कोई शर्मसारी नहीं। हम छोटी-छोटी खुशियों को भी, दरबान बन, दिल में जाने नहीं देते। जब से दुनिया बनी है और जब तक रहेगी इस पूरे काल के एक छोटे से वक्फे में दोस्त इकट्ठे जिन्दा रहे हैं। यह क्या प्रकृति की सुन्दर परिकल्पना नहीं । किस बात की शर्मसारी। जो तुमने पिन्जरा दिया है उसकी खास बात यह है कि इस पिन्जरे में परिन्दे अपनी खुशी से कैद हुए हैं और आशियाँ बनाने के लिए खस भी फराहम नहीं कर रहे बल्कि
न तीर कमाँ में है न सय्याद कमीं में
गोशे में कफस के मुझे आराम बहुत है
(ना ही कमान में तीर है और ना ही शिकारी घाट में बैठा है और पिन्जरे के कोने में पडा मैं खूब चैन से हूँ!)
वह मौसमी से बोले मैं तुम्हारा दोस्त ही हूँ। एकदम बराबरी की दोस्ती का साफ सुथरा रिश्ता जिन्दगी में सबसे अहम होता है। जब हम किसी को उम्र के लिहाज से सम्बोधन में बाँधते हैं तो दो लोगों के बीच में होने वाले आत्मीय संवाद में दीवार उठती दिखती है। मैं किसी भी लिहाज से तुम से बेहतर नहीं हूँ। अपने बच्चों का भी दोस्त हूँ । दोस्त के नाते मैं तुमसे हजार बातें कर सकूँगा जो मैं सोचता हूँ या जो सामने पाता हूँ । जैसा कि मेरा यहाँ होना एकदम अनहोनी घटनाओं का घटना। संबोधन से जहन में फासला बढता है और बात करने की हिचक भी लेकिन इस मुद्दे पर तूल देने की मेरी मुराद नहीं है। मेरे साथ हमेशा से ही यह बात रही है कि मेरा जिस से भी सम्बन्ध रहा या बना बराबरी का सम्बन्ध ही रहा। मेरी बेटी भी मेरी दोस्त है। मेरा बेटा भी और मेरी पत्नी भी। उम्र का ज्यादा होना कोई नेकनामी नहीं। ज्यादातर लोग बडी, उम्र के लोग, बडी उम्र के तो होते हैं पर बुजुर्ग नहीं।
अपने अदने से वजूद में मैं ऐसा सोचता हूँ कि दुनिया में सबसे बुलन्द रिश्ता दोस्ती का है। दोस्ती के ज*बे में अनन्त फैलाव है। इसमें किसी तरह की घुटन या डर की कोई गुंजाइश नहीं। दोस्तों के बीच कोई जहनी दिमाग नहीं होती क्योंकि दोस्ती की इमारत सशक्त बुनियाद पर कायम होती है। वह बुनियाद है एतबार और खुलापन खयालात का। इस लफ्फबाजी का चंद शब्दों में मतलब यह है कि तुमने जो कहा मेरे दिल ने जज्ब कर लिया।
अण्डबण्ड
आज मेरे कुछ साल पहले ही बने एक दोस्त विकी ने दिल दुखाया। दिल दुखता है कि अपने ख्यालात के बयान करने की गर्मी में आप किसी का भी दिल दुखा सकते हैं । मैं किसी का माउथपीस नहीं हूँ। ऐसा कहना सही नहीं है कि मैं माउथपीस हूँ। जिस जिसको हम प्यार करते हैं हम उन सबके माउथपीस हैं । जिस शख्स को हम प्यार करते हैं उसे सहन भी करते हैं और उसकी बात को बढाते हैं और छोटी मोटी असहमति पर पानी फेरते हैं। ऐसा करने से ही सम्बन्धों की तस्वीर खूबसूरत बनती है। मेरे दोस्त की बडी खुरदुरी लय है। उसके लिए कुछ भी ठीक नहीं। ठीक क्या है वह भी वह नहीं कहता । वह जैसे बोला, मैंने सोचा खेल-खेल में वह बात खत्म हो गई । पर ऐसा बोला कि जान खुश्क हो गई। वह किसी को अपना नहीं मानता न खुद को अपना समझने देता है। उसने कहा कि मुझ में बेहतर होने का कॉन्प्लेक्स है। अपनी बात को साफ आवाज और पूरी ताकत के साथ कहने में कोई रोष नहीं। आदमी जो सामने है वही उसका स्वरूप है। ईनामयाफ्ता होने से कोई बडा नहीं होता ।
मौसमी संजीदा बातों से मैं ऊबता हूँ। राय देने की जगह भावनाओं पर जोर देता हूँ । उसने मेरा मन खिन्न किया है। बडा बनकर नहीं कह रहा हूँ ना ही फैसला देने की तबीयत से कहा ।
बात करने की तलब
अलोक मेहता ने किसी बडे दिन (पच्चीस दिसम्बर) को कहा - किसी जमाने में हॉलैण्ड में जहाँ हम रहते थे एक दिन उसके पास आसपास घूम रहा था। इतनी खूबसूरत जगह में भी मैं जैसे मारा मारा भटक रहा था। फोन खाख (वान गाग) बार में मैंने पेट भर और मन भर कर बीयर पी थी । वहाँ बीयर बार के नाम भी महान लोगों के नाम पर रखे जाते हैं। आम्स्तरदम में गाँधी बार भी है जहाँ शरीर और आत्मा का सर्वनाश होते देखा जा सकता है। यहाँ के लोग खाना बीयर से निगलते हैं। तेज बारिश हो गई थी और तय था कि होकर हटने का नाम नहीं लेगी। जबरदस्त सर्द हवाएँ बिना साँस लिए चल रही थीं। सामने आसमान के बादली रंग में रंगी झील या समन्दर का टुकडा था । शाम की तर्ज में दोपहर का वक्त बह रहा था। दो तीन बत्तखें अपनी बात मनवाने के चक्कर में कर्कश आवाज करते हुए गरदनें बाहर निकालती थीं। पानी के पार एक पुल था। जैसे नाव उलटी रखी हो। सफेद और रौशनी में तरबतर । कितना सुहाना समां है.. मैंने शायरी अन्दाज में खुद से बात करते हुए खुद को पकडा । अब यहाँ शाम जल्दी होने लगी है। गर्मियाँ खत्म होना चाहती है जैसे कि कहते हैं जिन दिनों हम यहाँ आए थे तब सूरज रात के ग्यारह बजे डूबता था। इस बारे में मेरे एक दोस्त के मटमैले जवाब में कोई हैरत नहीं छिपी थी । इतनी देर में सूरज के छिपने से इस तरह की परेशानी होती थी जैसी परिंदों और दरियों को पूरे सूर्य ग्रहण होने पर होती होगी । पानी के फासले के पार चौडी सडकों पर कारें तैरती सी दिखती है और मेरा दिल करता है मैं किसी से बात करूँ। दूर तक पानी है, हरियाली है, हवा है, सर्दी है, पर कोई ना आदमी, न आदमी की जात। दिल्ली में एक मकान के एक कमरे की चार पांच खिडकियों से दिखने वाले पेड और उन्हें न दिखने वाले बच्चों का शोर। कुछ सालों पुराने दोस्त। कुछ एक आध साल पुराने दोस्त और कुछ एक आध घण्टा हुआ बने दोस्त। पर क्या गजब की घनिष्ठता के दर्जे की बुलन्दी एक जैसी। उन दोस्तों के चेहरे फिल्मों में जैसे दिखाते हैं सामने की खूबसूरती में घुल मिल रहे थे । मेरी बात करने की तलब जोर पकड रही थी।
अच्छाई से सींची क्यारी में जवाब के क्या गुल खिलते हैं । मेरा एक है दोस्त शिव, जो रूबरू मिलने में निहायत देर लगाता है। मिलना तय करता है, स्थगित करता है। तय करता है फिर बताता है कि नहीं आ सकता। गालिब कहते हैं -
दाम-ए-हर-मौज में है
हल्का-ए-सद-काम-ए-नहंग
देखें क्या गुजरे है कतरे पे गुहर होते तक
पानी की एक बूँद को मोती बनने तक क्या-क्या मुसीबतें सहनी पडती है। पर यहीं पर रुकना ठीक नहीं
दारा शिकोह ने कहा है- बूँद मोती बनने की आस क्यों लगाए, क्योंकि मोती तो जड है समन्दर क्यों न बने
WHY SHOULD A DROP BECOME A PEARL , WHEN IT CAN TRASFORM IT SELF INTO AN OCEAN .
इतने दिन प्रसाद से और तुमसे ना मिलने के लिए मैं शर्मसार हूँ । आदमी की अजीब फितरत है कि जो वह दिल के कहने पर करना चाहता है उसे काम को करने के वक्त को आगे-आगे धकेलता जाता है । तुमसे मिलने की इच्छा, बात करने की इच्छा, बात लिखने की इच्छा, और ना मिल पाने की शर्मिंदगी जहन पर हर पल छाय रहते हैं। खुदा गवाह है यह मेरे कुसूर पर लीपापोती नहीं है। तुम्हारे बात करने में बनावटीपन नहीं है। अक्सर लोग आक्रोश पर पन्नियाँ लगाते हैं और दर्द पर चाँदी के वर्क। कभी जब ऐसी कोई कहानी पढता हूँ तो लगता है साहित्य जिन्दगी के दायरे की दरारें तोडकर बाहर निकलने में बहुत बडा मददगार साबित हो सकता है। साहित्य में अकेलेपन का लेकर जितना रोना धोना होता है जिन्दगीमें यह अकेलापन लफ्जों के पार सर पर आरे फेरनेवाला होता है। मैं जो कहना चाहता हूँ लिख नहीं सकता। लेकिन मैं जो कहना चाहता हूँ तुमसे तुम्हारे सामने बैठकर ही कहा जा सकता है। अजीब तरतीब है कि आदमी कुदरत की कि जहाँ होना चाहता वहीं नहीं होता, दूसरी जगहों पर घूमता भटकता रहता है।
अपने बारे में मैं उदासी को बहुत बडी ताकत मानता हूँ। आसपास सब कुछ होते हुए भी हम घूम फिर कर अपने में ही लौटते हैं और कभी-कभार अपने दिल के अन्धेरे कोने में खडे होकर रोते हैं। रोने की खुशी खत्म होते ही साहसी होने की खुशी शुरू होती है। फैसलाकुन कदम उठाने की खुशी शुरू होती है ।
मेरा दोस्त शिव आजकल बदहवासी की हालत में है। हाशिये पर पडे लोगों की बात सोचता है। सिद्धान्तों की गुलामी में दुखी रहता है। मध्यवर्गीय जीवन उसे ऊबाता है। खूब साहित्य पढता है। वह निहायत नेक शख्स है, मेरा सबसे करीब का है। पर बेचैन रहता है। दुनिया में आप खुश रहना नहीं चाहते तो किसी और को इसकी फिक्र नहीं होती।
यहाँ ठण्डी हवा चली है। हफ्तों से जहन पर उदासी का साया फैला हुआ था जैसे ठण्डी हवा से छट गया । फिर मन हुआ कहूँ-
बारिश के अजब सुखों और अजीब दुखों
सुख अजब और दुःख अजीब।
आज जहाँ हूँ वह बहुत सुन्दर जगह है। सब तरफ हरे भरे पेड पहाड हैं और माहौल में सदा हरी-हरी-भरी खुशबू बसी रहती है। मेरी फिक्र तुम्हारे जरिए से तस्वीर का रंग बदलने के किसी उपाय में बदल ली जा सकती है। गालिब के शे’र का मिसरे
घर हमारा जो न रोते भी तो वीराँ होता
बहर गर बहर न होता तो बयाबाँ होता
(समुन्दर अगर समुन्दर ना होता, तो सब कुछ सुनसान सुनसान होता।) शिव मेरा ऐसा दोस्त है जिसे मैं जो मन में आए लिख सकता हूँ, बता सकता हूँ, हमारे बीच ना तो कोई दिखने वाली दीवार है या दिखने वाली दुराव का झीना पर्दा ।
दिल्ली में मौसम बदल रहा है । गर्मी दिन भर सर खाकर शाम को कहीं चली जाती है हल्की सर्दी जिस्म को सहलाती है। फूल पौधों से आने वाली निहायत दिल फरेब खुशबू को जीने के लिए उत्साह कहा जा सकता है।
दिन बीते कि मैं बैठा-बैठा सोच रहा था कि मुद्दत हुई साहित्य से मेरा प्रेम नायाब है जो नई चीजें महसूस करते हो वह भी नायाब होती हैं । अपने तजुर्बे को मेरे जैसे आदमी के साथ बैठकर मेरी सोच के दायरे को बढाते हो।
अलोक मेहता कहते- अक्सर अनमने होने की कोई खास वजह नहीं होती ।आदमी कभी मजे में होता है और कभी अचानक ही झुरमुट से घिर जाता है । वर्क चढी सद्भावनाएँ मुझे पसन्द नहीं। दोस्तों को अपनी बात कहना रोना-धोना नहीं है और ना उनकी बात सुनना कोरी उत्सुकता। यह अपनेपन के जज्बे की बुलंदी है ।
मौसमी एक तो यह कि अब हमारे दिनों में कुछ खास घटता ही नहीं और ना ही चीजों को देखने की क्षमता ही मौजूद है। घूम फिर कर अपने पास ही लौटता है आदमी और अपने में भी ऐसा कुछ नहीं देखता कि बताने लायक बने। जीवन में भ्रमों का ना रहना भी दुखदायक है। आदमी कितना ही विवेकहीन हो वह क्या है यह उस से नहीं छिपता। बचपन और उसके बाद के अरसे में जिन लोगों के हम मुरीद बने (भक्त नहीं कहना चाहता) वे अब भी हमारे दिल के करीब हैं। शैलेंद्र, दोस्तोव्यसकी, टॉलस्टॉय,कबीर, गालिब, मीर और चेखव और इस जमात में और भी कई सुखनवर हैं। हमारी जिन्दगियों में कुछ नहीं रहा तो हरदम हम इन खुदाओं के साथ रहते हैं और हमारी जिन्दगी में कुछ रहा है, तो यही लोग रह गए हैं।
दूसरों का दुख महसूस करना अच्छी फितरत है, पर जब किसी के लिए कुछ कर सकने की हमारी जिस्मानी या जहनी ताकत नहीं, तो दुख को पाल पाल कर बडा करना बेकार की बात है।

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