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एहसास उचित के पक्ष में खडा होने का!

विश्वनाथ सचदेव
गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान शीर्षक से भले ही और कोई भी ध्वनि निकलती हो, पर यह आवाज तो कहीं से भी नहीं आती जो यह बताए कि यह एक उपन्यास है। हमारे समय की एक महत्त्वपूर्ण रचानाकार कृष्णा सोबती की शायद यह अन्तिम कृति है। मित्रों मरजानी, डार से बिछडी, जिदगीनामा जैसी कालजयी कृतियों की इस लेखक को सन 2017 में देश का सर्वोच्च साहित्य सम्मान, ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया था। इससे पहले उन्हें साहित्य अकादमी के सर्वोच्च सम्मान से अलंकृत किया जा चुका था। जिदगीनामा नाम को लेकर पंजाबी की महत्त्वपूर्ण कवयित्री अमृता प्रीतम के साथ हुए अदालती विवाद ने भी उन्हें अच्छी-खासी प्रसिद्धि दे दी थी। इसलिए जब उनकी नवीनतम कृति यानी गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान हाथ में आयी, तो उत्साह और जिज्ञासा के भाव से उसे पढना शुरू किया था। प्रकाशन ने इस शीर्षक के साथ निजी जीवन को स्पर्श करती औपन्यासिक रचना लिखकर पाठक को सावधान जरूर कर दिया था, पर मुझे इस कृति ने इसलिए कहीं *यादा आकर्षित किया था कि इसकी कथा-भूमि का बडा हिस्सा सिरोही से जुडा है। सिरोही राजस्थान की एक छोटी, पर बडी प्यारी, रियासत का नाम है। आज भले ही इसे इसलिए महत्त्व मिले कि राजस्थान का एकमात्र पहाडी पर्यटन-स्थल आबू सिरोही जिले में ही है, पर कभी इसकी प्रसिद्धि का एक कारण तलवार भी हुआ करता था। कहते हैं सिरोही की तलवार की धार कहीं कोई मुकाबला नहीं था। कहते हैं कि सिरोही शब्द सिर और ओही से मिलकर बना है। ओही का मतलब होता है काटने की हिम्मत रखने वाले अर्थात् सिर काटने की हिम्मत रखने वाले। लाहौर की कटार से तुलना होती थी सिरोही की तलवार की। चूँकि मेरे बचपन का एक बडा हिस्सा सिरोही में गुजरा था, इसलिए कृष्णा सोबती की इस किताब में जब शुरू में ही सिरोही का नाम आया, तो मेरी रुचि अचानक बढ गयी। मेरे लिए यह एक रोचक जानकारी थी कि मित्रो मरजानी की लेखिका ने भी अपने जीवन का एक हिस्सा, भले ही छोटा ही सही, सिरोही में बिताया था।
जब में सिरोही में था, तो वहाँ किसी से कृष्णा सोबती का नाम नहीं सुना था। यह शायद इसलिए हुआ हो कि कृष्णाजी का वहाँ जे समय गुजरा वह राजघराने के लोगों तक ही सीमित था। अपने पाकिस्तान वाले गुजरात को छोडकर वे हिन्दुस्तान वाले गुजरात, यानी सिरोही में, जीविका-उपार्जन के लिए पहुँची थीं। उन्होंने मान्टेसरी-शिक्षण का ज्ञान दिल्ली में पाया था और अखबार में एक विज्ञापन को देखकर सिरोही में शाही मान्टेसरी स्कूल खोलने के लिए पहुँच गयी थीं। तब वह स्कूल तो नहीं खुल पाया, पर उन्हें राज्य के नाबालिग राजकुमार की गवर्नेस बनने का काम मिल गया। इससे उनका दरजा भी बढ गया था। वे शायद दो-तीन साल ही वहाँ रही थीं। जब उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ, तो सिरोही में मेरे अध्यापक रहे एक सज्जन ने बडे गर्व से कहा था, जानते हो, कृष्णा सोबती भी कभी सिरोही में रही थीं? मेरे लिए यह नयी जानकारी थी। हालाँकि सिरोही से मेरा रिश्ता सिर्फ पाँच-सात साल का ही था, पर मुझे यह सुनकर कुछ अच्छा-सा लगा था। अरे वाह, मेरे सिरोही में भी रही थीं कृष्णा सोबती!
कैसे-कैसे जुड जाते हैं हम कुछ जगहों, कुछ लोगों से। पाँच-सात साल का ही रिश्ता था मेरा सिरोही से, पर उस रिश्ते के बँधनों का प्यारा-सा अहसास मुझे आज भी होता है। आज भी मुम्बई या पुणे में किराने की अधिसंख्य दुकानों पर दुकानदारों को सिरोही की मारवाडी बोलते सुनता हूँ, तो मेरी जबान पर भी स को ह कहने वाली भाषा छलक-सी पडती है।
हाडे, हत्त, आना, हेर, ये थे वे चार शब्द जिनसे बाउजी ने हमें सिरोही का परिचय कराया था। वे हम से, यानी परिवार से पहले अकेले वहाँ पहुँचे थे। कुछ समय बाद जब वे परिवार को लिवाने आए तो उन्होंने बताया था, सिरोही को हिरोई और साग को हाग, सेर को हेर बोला जाता है वहाँ हाडे हत्त, आना हेर का मतलब होता है साडे सात आना सेर! फिर यह भी बताया था कि रेल सिरोही तक नहीं जाती। वहाँ से चौदह-पन्द्रह मील यानी बीस-बाइस किलोमीटर दूर से ही आगे निकल जाती है। हम बडे हैरान हुए थे। फिर जब इसका कारण पता चला तब तो और हैरानी हुई थी। पता चला कि जब रेलवे-लाइन बिछ रही थी तो अंग्रेजों ने सिरोही के महाराजा से अनुमति माँगी थी सिरोही को रेल-मार्ग से जोडने की। पर, कहते हैं, राजा ने अनुमति नहीं दी। उन्हें डर था कि रेलवे के आ जाने से बदमाश लोग सिरोही की बहु-बेटियों को भगा ले जाएँगे। पता नहीं यह बात कितनी सच है, पर यह सचाई तो सामने है कि रेलवे के न होने के कारण विकास भी सिरोही के पास से ही आगे गुजर गया! शायद 1950 में पहुँचे थे हम वहाँ जब आबादी पन्द्रह हजार के आस-पास थी। आज भी संख्या कुछ खास नहीं बढी है। तब भी सिरोही के युवा पढ-लिखकर बम्बई या मद्रास चले जाते थे रोजगार की लताश में, आज भी स्थिति कुछ *यादा नहीं बदली है।
बीस किलोमीटर दूर वाले रेलवे स्टेशन का नाम तब शायद एरिनपुरा था, अब सिरोही रोड हो गया है उसका नाम। स्टेशन पर उतरकर बस लेनी पडी थी। अपनी गुजरात वाली किताब में कृष्णा सोबती ने इस बस-यात्रा का वर्णन किया है। वे इतनी परेशान हो गयी थीं कि आधे रास्ते से ही वापस जाने की सोचने लगी थीं। हमारा परिवार जब उस बस से सिरोही जा रहा था, तो उसके पास वापस जाने का विकल्प नहीं था, और हमें इतना बुरा भी नहीं लगा था वह सफर।
बस जब वहाँ पहुँची, तो अड्डे पर हमारे स्वागत के लिए जवाहर था। नहीं, उसका नाम यह नहीं था, नाम तो जवाहर था, पर उसने अपना नाम जवाहर ही बताया था। बाउजी ने उसे घर के काम में मदद के लिए रखा हुआ था। बहुत ही प्यारा था जवाहर। कभी थकता नहीं था। पहली नजर में हम सबको भा गया था वह। गोरा रंग, सफेद कपडे और सिर पर टोपी में बहुत ही भला लग रहा था वह। उसने बाद में बताया था, टोपी तो वह हम पर रोब जमाने के लिए पहन कर आया था। सिरोही में हमारा पहला दोस्त था जवाहर। पर वह बहुत जल्दी बडा हो गया। बडा हो गया का मतलब है, उसे लगने लगा था कि अब उसे राज कारीगर का अपना पुश्तैनी काम करना चाहिए, ताकि वह अधिक कमा सके, माँ की मदद कर सके। उसके पिता का देहान्त पहले ही हो चुका था। वे जाति के कुम्हार थे, पर काम राज मिस्त्री का करते थे। राज-मिस्त्री यानी ईंट, गारे, सिमेंट को इमारत में बदलने वाले। सो, यही सब करने के लिए हमारा जवाहर अहमदाबाद चला गया था। एकबार वह वहाँ से लौटा तो बडे उत्साह से उसने बताया था कि वह रेलगाडी के मुसाफिरों को अंग्रेजी में डाँटकर आया था। हम जरा चौंके थे वह अंग्रेजी कबसे सीख गया। तब उसने बताया था कि रेलगाडी में पहले से बैठे मुसाफिर उसे डिब्बे में घुसने ही नहीं दे रहे थे। जब उसने उन्हें अंग्रेजी में डाँटा तब जगह मिली। कैसे डाँटा था? इस प्रश्न का जो उत्तर जवाहर ने दिया वह एक परायी भाषा के प्रति हमारी भक्ति और उसके दबाव में जीने की हमारी मानसिकता को दरसाने वाला है। उसने बताया था, मैंने मुसाफिरों को जोर से डाँट कर कहा, आई डैम बलेडी फूल। हमें गुलाम बनाकर रखने वाले गोरों की भाषा के आतंक और रोब का ही फल था कि जवाहर को रेल के डिब्बे में जगह मिल गयी। उसने क्या कहा, यह महत्त्वपूर्ण नहीं था। सच तो यह है कि वह खुद भी नहीं जानता था कि वह अंग्रेजी में खुद को गाली दे रहा है। यह घटना साठ-पैंसठ साल पुरानी है, पर, दुर्भाग्य से हम आज भी उसी बीमार मानसिकता में जी रहे हैं। आज भी सही-गलत अंग्रेजी में गिटर-पिटर करने वाला हमारे देश में सम्मान की नजरों से देखा जाता है। मजे की बात यह है कि हमारा अनपढ जवाहर तब भी इस बात को समझता था और आज भी हम यही मानते हैं कि अंग्रेजी के बिना पढा-लिखा नहीं बना या नहीं कहाया जा सकता!
बहरहाल, जवाहर के नेतृत्व में ही मजदूर हमारी गृहस्थी के सामान को लाद कर उस मकान में पहुँचे थे जो आने वाले कुछ सालों के लिए हमारा आश्रय बननेवाला था। बस स्टेण्ड से *यादा दूर नहीं था घर। वैसे सिरोही में कोई भी जगह किसी से *यादा दूर नहीं थी। मोची लेन, मोदी लेन, तेलीवाडा, कुंभारवाडा जैसे नामों में बँटा हुआ था तब सिरोही। वैसे वहाँ पैलेस रोड भी थी। वह म्युनिस्पिल पार्क के लेकर राजा के महल तक जानी थी, इसीलिए उसका नाम पैलेस रोड था। हमारा स्कूल, जो सालभर बाद ही इंटर कालेज बन गया, कचहरी, शानदार लाइब्रेरी आदि इसी सडक पर थे। सडक के दूसरे छोर वाले पहल का दरवाजा बडा बुलन्द था। वहीं अन्दर की ओर वह बैंक था जिसके मैनेजर बनकर बाउजी वहाँ पहुँचे थे। राजमाता रहती थीं, तब उस महल में। सिरोही के राजा, जो दरबार साहब कहलाते थे, एक अलग महल में रहते थे, केसर पैलेस था शायद उसका नाम। कृष्णा सोबती उसी पैलेस में जाती होंगी युवराज को शाही तौर-तरीका सिखाने के लिए। एक और भी पैलेस था सिरोही में। शायद सरूप पैलेस। अब तो वहाँ सरकारी दफ्तर हैं, पर पहले राजकुमार शाही परिवार के साथ वहीं रहते थे। कृष्णा सोबती के उपन्यास में इसी जगह की *यादा चर्चा है।
चलिए, मोदी लेन में लौटते हैं, जहाँ हम रहते थे। शहर के सम्भ्रान्त परिवारों की बस्ती मानी जाती थी यह लेन। जिस किराये के मकान में हम रहते थे, उसके साथ ही लगी एक दुकान थी माँगीलाल की। इस दुकान पर बच्चों के लिए चाकलेट से लेकर कुशवाहकान्त तक की किताबें सब मिलती थीं। सुना है वह माँगीलाल मोदी बाद में सिरोही की नगरपालिका का चेयरमैन बना था, पर मेरे लिए तो वह नयी-नयी किताबें पढाने वाला दाता था। भले ही उसकी दुकान किताबों की दुकान नहीं थी, और न ही वह कोई पुस्तकालय चलाता था, पर लोकप्रिय चलाता था, पर लोकप्रिय किताबें मँगवाकर पढाना उसकी अतिरिक्त आय का साधन था। और मेरा लगभग सारा जेब खर्च उसकी इस अतिरिक्त आय का हिस्सा बन जाता था। एक रुपये की किताब पर एक आना लिया करता था वह पढने का। और जेबखर्च के रूप में मुझे दिन का एक आना ही मिलता था। एक आना यानी रुपये का सोलहवाँ हिस्सा। कईं बार तो मैं उसे यह एक आना एडवान्स में दिया करता था- इस शर्त पर कि नयी आने वाली किताब सबसे पहले मुझे मिलेगी। पूरे सिरोही में सबसे पहले! इस अहसास का भी एक बडा सुख हुआ करता था कि कुशवाहकान्त की लाल-रेखा मैंने सिरोही में सबसे पहले पढी थी। आजकल जैसे समाचार चैनलों में सबसे आगे और सबसे पहले की होड लगती है कुछ वैसा ही अहसास कोई किताब सबसे पहले पढने का हुआ करता था।
किताबे पढने का यह चस्का मुझे कुछ जल्दी ही लग गया था। छठी-सातवीं में जब पढता था तभी शुरू हो गया था यह सिलसिला। इसे शुरू कराया था हमारे हिन्दी के अध्यापक भोमारामजी ने। इनके पिता मोची थे और आर्यसमाजी नेता भी। बाद में भोमाराम आर्य राजस्थान प्रशासनिक सेवा में अफसर बन कर चले गए थे। उन्होंने ही मुझे कहा था, मुझे हिन्दी के लेखकों की किताबें पढनी चाहिए। उन्हीं के कहने से मैंने अपने इन्टर कॉलेज की लाइब्रेरी और सिरोही की शानदार सार्वजनिक लायब्रेरी से प्रेमचन्द की सारी किताबें पढ डाली थीं। यह सातवीं कक्षा की बात है। पता नहीं तब मुझे प्रेमचन्द कितना समझ आए थे, पर यह बात मैं जरूर समझ गया था कि किताबें पढना एक अच्छा नशा है। खूब चढा था यह नशा उन दिनों। हालत यह थी कि माँगीलाल के कुशवाहकान्त से लेकर सार्वजनिक पुस्तकालय के प्रेमचन्द और महादेवी वर्मा तक के विस्तार में मैं जीने लगा था। भूतनाथ और मुत्यु किरण जैसे तिलस्मी उपन्यास भी मैंने तभी पढे थे। यह कहना भी एक मजाक ही है कि मैंने महादेवी को पढा था। सच तो यह है कि मैंने तब पुस्तकालय की एक अलमारी में उनकी पुस्तक यामा देखी थी। वह एक सुन्दर प्रकाशन था। अपने गीतों को उन्होंने अपने ही बनाए चित्रों से सजाया था। बस तब इतनी-सी बात ही मुझे समझ आयी होगी। पर महादेवी जैसी रचनाकार की किसी रचना से किसी भी तरह से जुडना अपने आप में एक अनुभव है। मुझे खुशी है कभी मैंने वह अनुभव जिया था।
भोमारामजी हमारे क्लास टीचर थे। हमें हिन्दी भी वही पढाते थे। पाँचवीं कक्षा की बात है। एक दिन उन्होंने कक्षा में कोई कविता पढाते हुए पता नहीं क्यों पूछ लिया, तुम में से कोई कविता लिखना जानता है? मैं कोई भी काम कर सकता हूँ के भ्रम में जीने वाले बच्चे की तरह मैंने हाथ खडा कर दिया था। भोमाराम जी को आश्चर्य हुआ हो तो पता नहीं, पर मेरे सहपाठियों को यह देखकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ था। वे जानत मानते थे कि ऐसा करना मेरी आदत का हिस्सा है। भोमारामजी ने कहा, अच्छा, कल कविता लिखकर लाना। वे तो यह कह कर भूल गए होंगे, पर मेरे भीतर तो जैसे एक धुक-धुक मच गयी थी। यह एक ऐसी चुनौती थी, जिसे मुम्बई की भाषा में पंगा लेना कहते हैं। सुमित्रा नन्दन पन्त की कविता तो पता नहीं कैसे चुपचाप आँखों में उमड आयी होगी, पर मेरा वह पूरा दिन, और पूरी रात, कविता के इंतजार में बीत गया। आँखे तरसती ही रही। कविता नहीं आयी।
दूसरे दिन मैं बहुत जल्दी स्कूल पहुँच गया था। शायद मुझे लगा होगा कविता एकान्त में आती है। मैं खाली क्लास में जाकर बैठ गया। मेरी बेचैनी बढती जा रही थी, बीतते हुए हर पल के साथ मैं मना रहा था, किसी तरह कविता आ जाए... और फिर सचमुच कविता आ गयी। बन्दर मामा, बन्दर मामा, करता खों-खों, खों-खों, शायद यही वह पहली पंक्ति थी जिसे मैंने कविता की शुरूआत मान लिया। फिर इसकी तुक मिलायी मोटर की भों-भों से। मतलब भले ही कुछ न निकल रहा हो, पर तुक मिल रही थी। मतलब यह कि तुक्कड मैं हो गया था। मैंने अपने आप को कवि मान लिया। कुछ और पंक्तियाँ जुड गयीं, मैं कवि बन गया! तबतक कुछ और छात्र भी कक्षा में आ गए थे। फिर भोमारामजी भी आ गए। कक्षा शुरू हो गयी। मैं इन्तजार कर रहा था कि कब वे मुझे कविता दिखाने के लिए कहें, पर वे शायद भूल गए थे उस बात को। जब कालांश खत्म हुआ, तो मुझसे रहा नहीं गया। मैंने वह कॉपी जिसमें कविता लिखी थी, उनके सामने रख दी। पहले मुझपर सवालिया निगाह डाली और फिर उनकी नजर बन्दर मामा पर पडी। पंक्तियाँ पढते-पढते उनके चेहरे पर मुस्कान आ गयी। अब उनकी निगाहों में स्नेह था। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा और मुझे लगा था जैसे कवि-रत्न का ताज पहना दिया है मुझे। आज भी, यानी उस घटना के लगभग पैंसठ साल बाद भी, यह सब याद करते हुए, मुझे अपने सिर पर उस ताज का एहसास हो रहा है। सोच रहा हूँ उस दिन उस हल्के हाथ का बोझ यदि मेरे सिर पर न रखा जाता, तो क्या मैं वह सब लिख पाता जिसे मैं कविता कहता हूँ?
बहरहाल, भोमारामजी ने एक बोझ और रखा था मेरे सिर पर, जिसे स्वीकारने से मैंने इन्कार कर दिया था। आठवीं-नौवीं कक्षा तक आते-आते मेरी तुकबन्दी बढ गयी थी। इस बीच हमारा स्कूल भी इन्टर कॉलेज बन गया था। कॉलेज की पहली पत्रिका प्रकाशित हो रही थी। मैंने भी अपनी एक कविता छपने के लिए दी। पत्रिका में जो कविता मेरे नाम से छपी थी, वह मेरी लिखी हुई नहीं थी। मुझे यह बात अपमानजनक लगी और मैं शिकायत करने प्रोफेसर इन्चार्ज के पास पहुँच गया। वे समझ नहीं पाए इसमें मेरा अपमान कैसे हो गया, उनके हिसाब से तो मुझे खुश होना चाहिए था कि पत्रिका में मेरा नाम छपा है! वस्तुतः वह कविता मेरे प्रिय अध्यापक भोमारामजी की लिखी हुई थी और मुझे प्रोत्साहित करने के लिए मेरे नाम से छपायी थी। किसी तरह उन्होंने मुझे यह कहकर समझाया था कि अगली बार सचमुच में मेरी वाली कविता छाप देंगे। आज अपनी वाली कविता की बात याद करके हँसी आती है, पर मैं कल्पना कर रहा हूँ कि अपने अपमान की बात कहते समय मेरा चेहरा कैसे दिख रहा होगा! मेरे सामने मेरे वे अध्यापक भले ही न हँसे हों, पर तय है मेरे वहाँ से हटने के बाद जरूर हँसे होंगे। फिर भी, मैं इतना तो जरूर कहूँगा कि मुझे अपने स्कूल के अध्यापकों से ढेर सारा प्यार मिला था। जीवन में जो कुछ सीख-पाया लगता है उसके मूल में कहीं मेरे उन अध्यापकों का प्यार ही था।
क्या-क्या नहीं सीखते हम अपने अध्यापकों से। कृष्णा सोबती ने अपने गुजरात वाले उपन्यास में एक घटना का विवरण दिया है। जब उन्हें सिरोही के बालक महाराजा की गवर्नेस बनाया गया, तो उनका मुख्य काम उन्हें जीना सिखाना था। सिखाने के इस ढँग में एक बार जब बालक महाराजा तेजसिंह बिना पूछे उस कक्ष में आ गए, जहाँ वे राजमाता से बातचीत कर रही थीं, तो उन्होंने अपने छात्र से कहा, बिना पूछे अन्दर कैसे आए, पहले बाहर जाकर पूछो, क्या मैं अन्दर आ सकता हूँ, फिर मैं कहूँगी आप आ सकते हैं। तब अन्दर आना। राजमाता को यह सुनकर कुछ अटपटा लगा था। उन्होंने गवर्नेस से कहा, क्या महाराजा को भी पूछ कर अन्दर आना पडेगा, तो कृष्णा सोबती ने कहा था, महाराज को नहीं, मेरे छात्र को। यह छोटी-सी घटना अध्यापक के महत्त्व को समझाने के लिए पर्याप्त है!
थोडा आगे बढें- वर्ष 1957। देश का दूसरा आम चुनाव हुआ था तब। पर मेरे लिए यह पहला ही चुनाव था। उसी के यादें है मेरे पास। आज जैसे नहीं होते थे तब चुनाव। जुलूस निकलते थे, नारे लगते थे, परचे बँटते थे, सभाएँ भी होती थीं! जातियों की बात भी होती थी, और धर्म के ठेकेदारों की सक्रियता तब भी थी। पर इस सबके बावजूद, आज मैं यह अनुभव कर रहा हूँ कि तब, यानी आज से साठ साल पहले, चुनाव ऐसे नहीं होते थे, जैसे अब होते हैं। कांग्रेस पार्टी की तरफ से एक परचा छपवाया गया था तब। मुझे आज भी याद है, उसमें एक कविता थी। उसकी कुछ पंक्तियाँ हैं; ओ मतदाता, तुम भारत के भाग्य-विधाता/ राजसूय सम आज देश-हित यह चुनाव है होने जाता/ कागज का यह नन्हा टुकडा/ भारत माता का सम्बल है/ वोट नहीं, यह तेरे कर में/ महायज्ञ-हित तुलसी दल है।
बस यही पंक्ति याद हैं मुझे। राजसूय-यज्ञ और तुलसी-दल वाली बात ने चुनावों को एक नया ही अर्थ दे दिया था। जनतंत्र में चुनाव की महत्ता और पवित्रता दोनों उजागर हो रही हैं इन पक्तियों में। महायज्ञ कहा गया था चुनावों को और वोट को तुलसी-दल बताया गया था। इस कविता वाला यह पर्चा भले ही एक राजनीतिक दल की ओर से बाँटा गया था, पर बात सारे देश की, और सारे देश के लिए थी। पिछले सत्तर सालों में जो स्थिति बनी है, वह यह है कि चुनाव लगातार घटिया राजनीति का उदाहरण और माध्यम बनते जा रहे हैं, देश का भाग्य-विधाता, वोटर, लगातार राजनीति का हाथियार भी बन रहा है, और राजनीति का शिकार भी।
ऐसा नहीं है कि तब, यानी 1957 में, देश की राजनीति में पवित्र आत्मा का निवास था। राजनीति को शैतानों की अन्तिम शरण स्थली यूं ही नहीं कहा गया है। फिर भी तब की राजनीति आज की राजनीति से निश्चित रूप से बेहतर थी। तब राजनीति में कुछ अच्छे लोग भी थे, जो ईमानदारी से मूल्यों-आदर्शों की राजनीति करने में विश्वास रखते थे। पर सब ऐसे नहीं थे। हो भी नहीं सकते। गाँधी ने राजनीति को सेवा से जोडा था, आज राजनीति सत्ता हथियाने का माध्यम बनकर रह गयी है।
बहरहाल, चुनावों को राजसूय यज्ञ बताने वाली राजनीति के साथ-साथ उस समय भी दमडी-दमडी दम्माणी वाली राजनीति का दौर शुरू हो चुका था। सिरोही के उस पहले चुनाव की मेरी यादों में यह दमडी-दमडी वाला नारा भी है। वैसे, तब सिरोही में प्रजा-परिषद के संघर्ष से जुडे कांग्रेसी भी थे, पर पता नहीं क्यों कांग्रेस की हाईकमान ने बीकानेर के एक सेठिये को अपना उम्मीदवार बनाया था। दम्माणी उनका उपनाम था। पैसा चुनावों में क्या भूमिका निभा सकता है, यह तब मुझे पता नहीं था, पर इतनी समझ मुझमें थी कि मैं यह जान सकूँ कि दम्माणी को उम्मीदवार इसलिए बनाया गया था कि वे पैसे वाले थे। उनका मुकाबला जोधपुर के राज-परिवार के व्यक्ति से था। उन्होंने एक पर्चा छपवाया जिसमें दाल, चीनी, सब्जियों वगैरह के भाव दिए गए थे और सूची के अन्त में बडे अक्षरों में छपा था- दमडी-दमडी दम्माणी। हम बच्चों को दमडी वाला यह नारा लगाने में बडा मजा आता था। मजे की बात तब हमें यह भी लगी थी कि राज-परिवार के एक वरिष्ठ सदस्य को इस दमडी वाले ने हरा भी दिया था। कारण तो पता नहीं, पर तब मुझे एक राजा का चुनाव में हारना अच्छा लगा था। और मुझे यह भी नहीं लगा था कि दम्माणी अपनी दमडी के बल पर ही चुनाव जीते हैं। उसी चुनाव में मैंने बिना दमडी वाले को भी जीतते हुए देखा था। मजेदार घटना है यह भी।
मेरे एक अध्यापक थे। अनुसूचित जाति के। उन्होंने भी शायद आरक्षित सीट से चुनाव लडा था। उनकी योग्यता और सिरोही में उनकी लोकप्रियता को देखते हुए यही माना जा रहा था कि उनका जीतना तय है। वे कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार थे और उनके सामने शायद रामराज्य परिषद नामक दल ने सिरोही में ही फुटपाथ पर जूतों की मरम्मत करने वाले एक मोची को खडा किया था। वह अँगूठा छाप था और गरीब भी। कोई उसे जानता तक नहीं था। पर वह चुनाव जीत गया! तब चन्दा करके लोगों ने उसे नये कपडे दिलाए थे और उसके राज्य की राजधानी जयपुर पहुँचने की व्यवस्था की गयी थी! ऐसे में उसका जीतना आश्चर्य की बात तो थी ही, पर चुनाव में हमारे लोकप्रिय अध्यापक का हारने का जो मुख्य कारण बताया गया, वह और भी आश्चर्यजनक था। बताया गया कि हमारे अध्यापक अपनी जीत के प्रति इतने आश्वस्त थे कि वे अपनी ही जाति के लोगों के पास वोट माँगने नहीं गए। वे मानकर चल रहे थे कि उनकी जातिवाले तो उन्हें वोट देंगे ही। पर उन्होंने वोट नहीं दिए- उन्हें यह अपना अपमान लगा कि उनकी जाति वाला उम्मीदवार उनसे वोट माँगने नहीं आया! उन्होंने अपने इस अपमान का बदला तेजारामजी को वोट न देकर लिया। एक सचमुच योग्य व्यक्ति चुनाव हार गया। तब उनके जिन छात्रों को बहुत बुरा लगा था, उनमें मैं भी था। मैं उनकी हार को न समझ पाया था, न पचा पाया। तब मैं चुनावी हथकण्डों से परिचित नहीं था, शायद इसलिए। आज चुनाव जीतने के लिए हमारे नेता क्या-क्या नहीं करते? धर्म, जाति, वर्ण, पैसा, झूठ, मक्कारी, सब हथियार बन चुके हैं चुनावी हार-जीत के!
योग्यता के लिए तो अब शायद हमारी राजनीति में जगह ही नहीं बची है। राजनीतिक दल उन लोगों को अपना उम्मीदवार बनाते हैं, जो किसी भी तरह जीतने की क्षमता रखते हो। मतदान को भी बिकने की चीज बना दिया है हमारी लगातार घटिया होती जाती राजनीति ने। भाग्य-विधाता तो आज भी कहलाता है मतदाता, पर वे ताकतें और ही हैं जो यह तय करती हैं कि भाग्य-विधाता किसका भाग्य चमकाए और कैस चमकाए! तेजाराम तब भी हारते थे, तेजाराम अब भी हारते हैं। उम्मीदवार तब भी झूठ बोलते थे, अब भी झूठ बोलते हैं। दमडी वालों को चुनाव लडाना तब भी राजनीतिक दलों की विवशता थी, आज भी है। तुलसी-दल की पवित्रता वाली तो अब कोई बात भी नहीं करता- राजनेता, चाहे किसी भी रंग के हों, जब अपने विरोधी पर उँगली उठाते हैं, तो यह भूल जाते हैं कि उनकी अपनी ही दो उँगलियाँ स्वयं उनकी ही ओर उठ रही हैं!
जहाँ तक मतदाता का सवाल है, तब शायद वह कहीं अधिक ईमानदारी से अपने जनतान्त्रिक कर्तव्य का पालन करता था। मुझे याद है, 1957 वाले उस चुनाव में मेरे पिताजी को चुनाव वाले दिन सबेरे-सबेरे किसी काम से सिरोही से बाहर जाना था। पर शहर से बाहर जाने से पहले उन्होंने मतदान केन्द्र पर जाकर राजसूय यज्ञ में भाग लेना जरूरी समझा था। वे अक्सर शान से बताया करते थे कि उस दिन वे मतदान केन्द्र पर वोट डालने वाले पहले मतदाता थे। एक नेक और जरूरी काम कर पाने वाली उनके चेहरे की वह चमक मैं कभी नहीं भूल पाया। ऐसा नहीं है कि अब उन जैसे मतदाता नहीं बचे, पर अब उन जैसे मतदाताओं के लिए हमारी राजनीति में वह महत्ता नहीं रही, जो तब थी। तब मतदाता सचमुच भाग्य-विधाता था, अब हमारी राजनीति के कर्णधार उन्हें हाथ की कठपुलतियाँ समझते हैं- और अक्सर उन्हें नचाने में सफल भी हो जाते हैं।
यह कहना तो गलत ही होगा, कि तब राजनीति बहुत अच्छी थी, और अब खराब हो गयी है, पर यह सही है कि अब राजनीति *यादा खराब हो चुकी है। शायद सैम्युल जॉनसन ने कहा था, राजनीति बदमाशों की अन्तिम शरण स्थली है। सारे राजनेता बदमाश ही होते हैं, यह मैं नहीं कहना चाहता, पर यह तो हम आज देख ही रहे हैं कि राजनीति में बदमाशों का ही बोल-बाला रहता है। सिरोही के उस चुनाव में जब हमारे प्रिय अध्यापक हारे थे, तो मुझे समझ नहीं आया था कोई तेजाराम कैसे हार सकता है। अब मैं उन जैसे उम्मीदवार की हार का कारण समझता हूँ। बहरहाल, तेजारामजी एक भले आदमी थे, चुनाव हारने के बावजूद समाज में उनकी इज्जत बनी रही थी। सच बात तो यह है कि राजनीति में तब भले आदमियों के लिए जगह थी।

इसी सन्दर्भ में मुझे एक भला नाम और याद आता है। इस नाम का सिरोही से कोई लेना-देना नहीं है, पर वहीं मैंने यह नाम सुना था। यह नाम था रफी अहमद किदवई, देश के बडे नेता थे किदवई। नेहरूजी के मन्त्रिमण्डल में खाद्यमन्त्री थे वे। उस जमाने में आज जैसी स्थिति नहीं थी मन्त्रियों की। वे किसी की कृपा के सहारे नहीं, अपनी योग्यता से पद पर पहुँचते थे। मैंने अपने पिताजी से ही सुना होगा कि रफी अहमद बडे कद के ईमानदार नेता थे। अचानक एक दिन मैंने पडौसी के रेडियो पर रफी अहमद किदवई के निधन का समाचार सुना। हमारे घर में तब रेडियो नहीं था। मैंने घर आकर यह खबर सुनायी थी। निश्चित रूप से पिताजी ने दिवंगत नेता के बारे में कुछ बहुत अच्छा कहा होगा, वरना वह खबर मुझे इतनी महत्त्वपूर्ण न लगती। जो बात मुझे महत्त्वपूर्ण लगी, वह दूसरों को भी पता होनी चाहिए, कुछ ऐसा ही भाव तब शायद मेरे मन में जगा होगा।
मैं जानता था कि मेरे आस-पास के घरों में भी रेडियो सिर्फ वहीं था जहाँ मैंने वह खबर सुनी थी। और अखबार भी सिरोही में दोपहर बाद पहुँचता था। मैंने एक बडा और जरूरी काम करने का निर्णय किया। अपनी एक कापी में से दो-चार पन्ने फाडकर मैंने रफी अहमद किदवई की मृत्यु का समाचार बनाया। मुझे याद है एक-दो वाक्य के उस समाचार की मैंने कार्बन पेपर से प्रतियाँ निकाली थी और फिर वह महत्त्वपूर्ण समाचार मैंने आस-पास के घरों में दरवाजों के नीचे से सरका दिया था- इस उम्मीद के साथ कि जब वे लोग सबेरे उठेंगे, तो दरवाजे पर उन्हें यह महत्त्वपूर्ण जानकारी मिल जाएँगी। पता नहीं किसी ने वह खबर देखी भी होगी या नहीं, पर खबर देने का काम मैंने जरूर कर दिया था!
आज सोच रहा हूँ मेरी पत्रकारिता की शुरूआत शायद उसी दिन से हुई थी।
और मेरे साहित्य की शुरूआत?

निश्चित रूप से बन्दर मामा वाली तुकबन्दी को कविता नहीं कहा जा सकता। पर मुझे लगता है शुरूआत वहीं से हुई थी। अन्ताक्षरी खेलने के लिए कविताएँ याद किया करता था मैं और इसी खेल के लिए मैंने तत्काल तुकबन्दी करना भी शुरू कर दिया था। अक्सर हास्यास्पद तुकबन्दी होती थी, पर कहीं न कहीं मेरे भीतर उसे कविता मानने का लालच भी पलने लगा था।
फिर पता ही नहीं चला उस लालच को कब पर लग गए। तब तक मैं सिरोही छोड चुका था। पिताजी का तबादला हो गया और हम बीकानेर पहुँच गए। तब मैं दसवीं में पढता था। स्कूलों में अभी गर्मियों की छुट्टियाँ थी। एक दोपहर अपना एक लेख लेकर मैं एक साप्ताहिक अखबार के दफ्तर में पहुँच गया। सम्पादकजी तो नहीं मिले, पर उनके सहायक मिल गए थे। ओंकार पारीक नाम था उनका। वह लेख देमडी-दमडी वाले चुनाव से सम्बन्धित था। उन्होंने उसे पढा और पसन्द कर लिया। तभी शायद मैंने उन्हें बताया था मैं कविता भी लिखता हूँ। निश्चित रूप से मैंने तुकबन्दी नहीं कहा था। शायद मुझे प्रोत्साहन देने के लिए उन्होंने मुझे गोष्ठी में आने का निमंत्रण दे दिया जो वे हर माह आयोजित किया करते थे। यही नहीं, उन्होंने यह भी व्यवस्था कर दी कि कोई मुझे लेने आ जाएगा। यह कोई मंगल सक्सेना थे, जो मुझे बाद में पता चला, बहुत अच्छे गीतकार थे। वे मुझे अपनी साइकिल पर बिठाकर उस गोष्ठी में ले गए थे। अर्से बाद जब हम दोस्त हो गए थे, तब उन्होंने मुझे बताया था कि उस दिन मुझे देखकर वे हैरान थे कि इस बच्चे को लिवाने के लिए ओंकारजी ने उन्हें भेज दिया! साहित्यालोक नाम से होने वाली वह गोष्ठी मेरे लेखन की पाठशाला बनी। वहाँ आने वाले सब मुझसे उम्र में बडे थे। कुछ तो प्रतिष्ठित साहित्यकार थे। यादवेंद्र शर्मा चन्द्र, भीम पण्ड्या, हरीश भादानी, राजानन्द, प्रेम बहादुर सक्सेना, योगेंद्र किसलय जैसे नामों से जुडना अपने आप में एक उपलब्धि थी। पहली गोष्ठी में ही हरीश भादानी, मंगल सक्सेना जैसे कवियों की कविताएँ सुनकर मैं समझ गया था कि मेरी तुकबन्दी के लिए वहाँ कोई जगह नहीं है। पता नहीं कितने महीनों तक तो मैं सिर्फ सुनता रहा था। फिर एक दिन मैंने? स्थापित गीतकारों के गीतों में आने वाले शब्दों की सूची बनाकर कुछ लिख डाला, जिसे मैं गीत समझता था। उसे सुनकर सबने मेरी पीठ थपथपायी थी। मैं गदगद था। पर हकीकत यह थी कि मेरा हौंसला बढाने के लिए ही साहित्यालोक के उन महारथियों ने पीठ थपथपायी थी, पर उनका यह पीठ थपथपाना, जो मैं हूँ, उसे बनाने में बहुत काम आया। वे मुझे काका कहते थे, पंजाबी में काका बच्चे को कहा जाता है। साहित्यालोक के मेरे उन अग्रजों ने साहित्य में मेरे बचपने को भी खूब दुलार दिया।
मैं तब इन्टर में पढता था, जब हरीश भादानी ने वातायन नाम की साहित्यिक पत्रिका प्रकाशित करने की योजना बनायी। पता नहीं क्यों उन्होंने निर्णय किया कि पत्रिका का सम्पादन विश्वनाथ करेगा। वे स्वयं प्रबन्ध सम्पादक बने थे। छह सौ रूपये की पूँजी से शुरू किया गया था इस त्रैमासिक पत्रिका को जो बाद में मासिक बनी। बहुत कुछ दिया, बहुत कुछ सिखाया वातायन ने मुझे। सम्पादक बनने के मौके तो बाद में भी आए, पर वातायन का सम्पादक बनना मेरे भावी जीवन की नींव था। तब जो सुख और सन्तुष्टि का भाव मुझे मिला था, वह नवभारत टासम्स या धर्मयुग या नवनीत का संपादक बनकर नहीं मिला। वातायन ने मेरी दशा सँवारी, मुझे दिशा दी।
दिशा देने वाली बात आयी, तो याद आ रहा है, जब वातायन के लिए कुछ लिखने का आग्रह लेकर मैं आदरणीय उग्रजी से मिलने गया था। पाण्डेय बेचैन शर्मा उग्र हिन्दी साहित्य के दुर्वासा ऋषि कहे जाते थे। तब वे जयपुर में रहा करते थे। गर्मियों की एक तपती दोपहर मैं जब उनके पास पहुँचा, तो वे ठण्डाई घोट रहे थे। जब मैंने उनसे वातायन के लिए कुछ लिखने का आग्रह किया, तो उन्होंने कहा था, कैसा लेख चाहते हो मुझसे? दो तरह के लेख लिखता हूँ मैं- एक तो वे जिन्हें छाप कर पत्रिका बन्द हो जाती है और दूसरे वे जो सम्पादक की पिटायी के कारण बनते हैं। तुम्हें कैसा लेख चाहिए?
मुझे समझ नहीं आया मैं क्या उत्तर दूँ। पता नहीं कैसे मेरे मुँह से निकल गया, कोई बीच का रास्ता नहीं हो सकता? यह सुनते ही उग्र जी सचमुच उग्र हो गए। गुस्से में तमतमाते हुए उन्होंने कहा था, बीच का रास्ता? यह सडक देख रहे हो, यह है बीच का रास्ता। उँगली से इशारा करते हुए उन्होंने कहा था, यह रास्ता पकड लो।
मैं सचमुच डर गया था उनका यह तेवर देखकर। सुन तो रखा था उनके गुस्से के बारे में, पर वह ऐसे दिखेगा, यह सोचा नहीं था। मुझे समझ नहीं आया, मैं क्या बोलूँ। पर उन्हें समझ आ गया था मुझे कैसे सँम्भालें। वे वैसे ही शान्त हो गए जैसे गुस्से में आए थे। बीच का रास्ता कहीं नहीं पहुँचाता, उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा था, यह हमें तय करना होता है कि हम किस पक्ष में हैं। बीच के रास्ते से कोई पक्ष नहीं सधता।
मैं जब वहाँ से निकला, तो मेरे एक हाथ में आश्वासन था कि वे वातायन के लिए लिखेंगे, और दूसरे हाथ में था यह सबक कि साहित्य में कुछ करना-बनना है, तो बीच के रास्तों से मंजिल नहीं मिलेगी। शुक्रिया उग्रजी।
दो साल बाद मुझे बीकानेर छोडदेना पडा था। पर बीकानेर के साथियों ने कविता लिखने का जो भ्रम दिया था, वह मेरे साथ रहा। आज भी मेरे साथ है। आज यदि साहित्यालोक की गोष्ठी होती, तो मैं कह सकता था, मेरे तीन कविता-संकलन प्रकाशित हो चुके हैं। इतने लम्बे अर्से का इतना-सा सृजन कोई खास माने नहीं रखता, पर इतना तो मैं कह ही सकता हूँ कि इन कविताओं ने मेरे भीतर की संवेदनशीलता को जिन्दा रखा है। कविता और पत्रकारिता को साथ-साथ साधने के बारे में कई बार मुझ से पूछा भी जाता है, और मेरा यह मानना है कि बिना संवेदनशीलता के न सच्ची कविता जनमती है और न ही सार्थक पत्रकारिता की जा सकती है। मैं जब पत्रकारिता में आया, तो यह तो नहीं पता था मुझे ठीक-ठीक क्या करना है, पर कुछ करने का इरादा जरूर था मन में। समय और स्थितियों के साथ यह कुछ आकार लेता रहा है। आकार ही देना हो इस कुछ तो मैं कहना चाहूँगा उचित के पक्ष में खडा होने का एक ज*बा। जो सही है उसे निडर होकर सामने रखना पत्रकारिता और साहित्य दोनों का उद्देश्य होना चाहिए। मेरी कोशिश रही है ऐसा करने की। मैं यह कितना कर पाया, इससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण मुझे कोशिश की ईमानदारी लगती है। मैंने ऐसी कोशिश की है, यह अहसास मुझे बहुत कुछ सुख देता है।

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