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घोंघाप्रसाद (दलित)

कुसुम खेमानी
घोंघाप्रसाद समय से पहले ही धरती पर आ धमका था।

उत्तरा ने जिस तरह अभिमन्यु को पेट में बहुत सिखाया-पढाया था, उसी तरह उसकी माँ ने भी उसे बहुत समझाया कि : देख बेटा, शुकदेव इसलिए परम ज्ञानी बने, क्योंकि वे माँ के गर्भ में सोलह वर्ष तक बैठे रहे, और एक तू है कि सतमासिए की तरह कमजोर पैदा होना चाहता है। बेटा, वैसे भी यह दुनियाँ हम गरीबों के लिए कोई खूबसूरत जगह न होकर काँटों, विष-बेलों और दरिंदों से भरा एक ऐसा नरक है, जिसमें आना हमारी नियति है, पर जी पाना? वह उन ऊपर वालों के हाथ में है, जो ऊँचे-ऊँचे मकानों में बैठे हैं। बेटा, कहा मान, माँ के अनुभवों को सच जान, और मेरे गर्भ के सुरक्षा-कवच में कुछ दिन और रह ले। पर क्या नई पीढी ने कभी पुरानी पीढी की सुनी है, जो वह सुनता?

माँ की मनुहार ने घोंघा को और भी जिद्दी बना दिया और वह कोख से बाहर आने के अपने समय को बदल कर उसी वक्त इतनी तेजी से जमीन पर आया कि उसके कमजोर हाथ-पाँव टूटते-टूटते बचे।

बेचारी माँ ने सिर पीटने के बाद, तुरन्त उसकी गर्म तेल से मालिश की और उसे अपने से चिपका कर उसके नरम शरीर को गरमाई देने लगी। लेकिन घोंघा को जक नहीं पड रही थी। वह जिस रंगबिरंगी दुनिया की बातें माँ के पेट में पडा-पडा सुनता रहता रहा था, उन सबको! वह तुरन्त अपनी आँखों से देखना चाहता था। इसलिए वह कूद कर तालाब किनारे की घास से बाहर सीमेंट की पटरी पर आ गया।

अपने पूरे शरीर को शंख के कडे कवच से ढँके घोंघा आँखें फाडे झूमते दरख्त, चहचहाती चिडियाँ, कूकती कोयल, बारिश और सतरंगी इन्द्रधनुष को देखे जा रहा था कि भडाक की आवाज के साथ उसे जोरों की ठोकर लगी, उसने मुश्किल से अपनी आँखें और सिर को बचाया और किसी तरह घिसटता-सा वापस अपनी माँ की गोद में जा दुबका। तभी उसके कानों ने एक मालिकाना हुक्म सुना माली, क्या तुम सारे टाइम सोते रहते हो, जो हमलोगों की सैर के समय भी यह पट्टी साफ नहीं कर सकते? जरा आँख खोलकर देखो, यहाँ कितने घिनौने-घोंघे फैले पडे हैं, लगता है, मुफ्त की रोटियाँ तोडने के सिवा तुम जरा भी हाथ-पाँव नहीं हिलाते। माली, तुम्हें शर्म से डूब मरना चाहिए।

माली बेचारा! जिसकी हैसियत घोंघे-सी ही थी, हाँ हुजूर! हाँ हुजूर! करता मरा जा रहा था, पर उसके मालिक का कठोर चेहरा जरा भी नहीं पिघल रहा था। माँ की गोद से सब कुछ देखते-सुनते घोंघे को उसकी इस घिघियाती हाँ-हजूरी पर बहुत गुस्सा आ रहा था। उसके हिसाब से तो उसे जवाब देना चाहिए था : साहब! खैर, वह तो घोंघा था, पर आप तो चार आँखों वाले बडे आदमी हैं, क्या आप देख कर नहीं चल सकते थे?

घोंघी माँ उसके क्रोध को शान्त करने के लिए उसके बदन को पपोलती हुई बोली : अभी तू बच्चा है, अक्ल का कच्चा है, इसीलिए ये सब नक्सली बातें सोच रहा है। बेटा, जब तुझे भी ऐसे ही लगातार जमाने की ठोकरें खानी पडेगी, तो तेरा यह गुस्सा, एक गहरी उदासी में बदल जाएगा और तू इन ठोकरों से टूटे हुए अपने हाथ-पैरों की मरम्मत करता हुआ, इन्हीं बडे लोगों की जी-हजूरी में जा खडा होगा, जैसे आज यह माली घोंघा खडा है। ध्यान से देख ले इस माली को, इसका वर्त्तमान ही तेरा भविष्य है।

क्यों? क्यों? मैं बडा होकर उस चार आँखों वाले बूटधारी जैसा क्यों नहीं बन सकता? क्या कमी है मुझमे? अच्छे-अच्छों से *यादा बुद्धि है, और दुनियादारी की समझ भी इन लोगों से मीलों आगे है। फिर मैं उन-सा क्यों नहीं हो सकता?

उसकी खरी, पर कडवी बातें सुनकर डरी हुई घोंघी माँ ने पहले तो चारों तरफ नजरें घुमाकर देखा कि कहीं किसी ने उसकी बातें सुन न ली हों और फिर उसे खींचते हुए अपने घरेलू दलदल में ले गई।

बेटे को पुचकारते हुए, घोंघी देवी ने उसे ऐसी-ऐसी सीखें दीं जैसी सती अनुसूया ने ब्रह्मा-विष्णु-महेश को, माँ सीता ने लव-कुश को और शकुन्तला ने भरत को भी नहीं दी होंगी। साथ ही उसने उसे चाणक्य का यह ब्रह्म वाक्य भी समझाया : बेटा, बडे लोग सिर्फ हमें धोखा देने के लिए धर्म के हवाले से यह बडी बात कहते हैं कि शरीर मिथ्या और आत्मा सत्य है। दरअसल ये सब पैसे वालों की दिखावटी ढकोसले मात्र हैं। तुम अपने मन में गहराई से इस सच्चाई को उतार लो कि यह शरीर ही सब कुछ है और यदि इसकी रक्षा के लिए तुम्हें दूसरे का खून भी करना पडे, तो कर देना चाहिए, पर हमेशा ध्यान रखना कि केवल अपने बचाव के लिए ही ऐसा करना उचित है, तुमको कभी लगे कि कोई बदजात! भगवान की इस धरती को अपने कुकर्मों से गन्दा कर रहा है, तो भगवान की राह न देख कर, तुम स्वयं उसके अत्याचारों से इस धरती को बचाना। और बेटा, तुम यह सब तभी कर सकोगे जब जिन्दा रहोगे। याद रखना, कि यदि सारी दुनिया भी तुम्हें खत्म करने पर तुल जाए, तो भी तुम्हें, हर हालत में जीवित रहना है। बेटा, मेरी दी हुई जन्मघूँटी का मूल-मन्त्र यही है कि हर हाल में जिन्दा रह कर तुम्हें अपनी माँ के दूध की लाज रखनी है।

आश्चर्यजनक ढंग से जिद्दी और महाछटपटिया घोंघा! अपनी माँ के कहे एक-एक शब्द को इस तरह पी रहा था, मानो उनका रसायन बनाकर अपनी शिराओं के रक्त में मिला रहा हो। इसके बाद उसने माँ के चरण छुए और अपने घुटने मोड कर माँ के सामने याचक की मुद्रा में बैठ कर कहने लगा : माँ एक बात बता, तू इतनी बुद्धिमान कैसे है? क्या तूने ऋृषि-मुनियों और विद्वानों की सेवा की है, जिसके कारण तू इतनी ज्ञानी हो गई? या मेरे पिता बहुत गुणी थे, जिसकी वजह से तू भी इतनी बुद्धिमती हो गई? माँ, तू इतनी अधिक सुन्दर है कि जवानी में तो तुझ पर ढेरों लोग मरते रहे होंगे और बचपन में तेरे माँ-बाप ने भी तुझे खूब दुलराया होगा? है ना माँ? माँ! मुझे यह भी बता कि तूने मेरा नाम कृष्ण कुमार क्यों रखा?

घोंघे के नदी की तरह बहते प्रश्नों को घोंघी बिना उत्तर दिए चुपचाप सुने जा रही थी। उसकी यह चुप्पी उतावले घोंघे को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हुई और वह माँ की पीठ से झूल कर उसके मुँह को अपनी ओर घुमाते हुए, मनुहार भरी आँखों से उसे उत्तर देने के लिए मनाने लगा।

उसका प्रेम भरा आग्रह देखकर घोंघी ने अत्यन्त शालीनता और गम्भीरता से उसे उत्तर दिया बेटा, तूने मेरे जन्म से जवानी तक अनेक प्रश्न, एक साथ पूछ लिए हैं, इसलिए मैं एक-एक करके, तुझे उनके जवाब दूँगी।

बेटा, मेरे मुँह में जन्म के समय से ही कुछ दाँत उगे हुए थे, इसलिए मेरी माँ ने जनमते ही मुझे जंगल के किनारे फेंक दिया था। लेकिन इसके लिए मेरे मन में न तो कोई विचार है और न ही मैं अपनी माँ को दोषी मानती हूँ, क्योंकि ऐसे बच्चे, माँ-बाप को भारी माने जाते हैं। दूसरे, गरीब के घर बेटी का जन्म! अर्थात् आफत का पहाड। पहले तो उसे सबसे बचाकर रखना और फिर ब्याह के समय सब कुछ बेच-खोंच कर या खुद बिक कर उसका ब्याह करना! मेरी मैया!! भला यह सब कहाँ से करती? उस बेचारी के पास तो अपना फूस का टापरा तक नहीं था, फिर वह बेचती भी तो क्या? इसीलिए उसने अपनी सारी माया-ममता तोड कर मुझे जंगल में यह सोच कर छोड दिया होगा कि यदि इसके भाग में होगा, तो जी लेगी।

बेटा, मैया ने ठीक ही सोचा था, क्योंकि राम जाने उस समय किसने मुझे पानी पिलाया? किसने दूध? पर पहली याद जो मुझे है! वह यह है कि मैंने एक कुत्ते के मुँह से छीन कर रोटी खा ली थी। इसके बाद तो मैं रोज ही कुत्ते, बिल्ली, कौवे आदि विभिन्न पशु-पक्षियों को पत्थर मार-मार कर उनसे कुछ न कुछ छीन-खसोट कर खा ही लेती थी। मुझे जंगल के फल-फूल, तालाब के सिंघाडे और कमलगट्टे भी बहुत पसन्द थे, इसलिए सब कुछ मिला-जुला कर मैं अपना पेट आराम से भर लेती थी।

कुछ बडे होने के बाद एक दिन मैं पास के गाँव में घुस गई और मैंने कचरे में फेंके हुए चिथडों को उठा कर उन्हें अपने शरीर पर लपेट लिया। वहाँ की झोपडियाँ देख कर, मैंने भी किसी तरह एक छोटी सी झोपडी बना डाली। एक दिन मैं आम के पेड पर चढकर आम चूसते हुए, जमींदार की गाजे-बाजे वाली सवारी को देख रही थी कि अचानक हाथ फिसलने के कारण मैं धडाम से जमीन पर जा गिरी। अभी मैं अपने लत्ते झाड ही रही थी कि जमींदार के हरकारे मुझे उठाकर एक बडे से घर में ले गए। उन्हीं की बातों से मुझे पता चला कि मैं बहुत सुनदर हूँ।

वहाँ मुझे पहनने के लिए एक से एक जरी काम के कपडे और खाने को बहुत ही बढिया-बढिया चीजें मिलीं। उन सबको देखकर मुझे लगा कि हो न हो यह उसी राक्षस की माया नगरी है, जिसकी कहानी कुछ ही दिन पहले एक महात्माजी ने मेरी झोंपडी में सुनाई थी। यह सोचकर कि मुझे इस पंचायती से क्या लेना-देना कि यह सुनदर दुनिया किसकी है, किसकी नहीं? मैंने पहले तो खूब ठूँस-ठूँस कर खाया और फिर वहीं जमीन पर पसर कर सो गई। बडी रात गए वहाँ बूढे जमींदार आए और मुझे पलंग पर सुला कर, मेरा बदन तोडने लगे। मुझे यह आदत तो अपनी झोंपडी में ही पड गई थी, इसलिए मैं आँखें बंद किये उनके शरीर से आती बढिया सुगन्ध को सूंघती रही, और खाए हुए पकवानों को याद कर मस्त होती रही। कुछेक दिन बाद वे ही हरकारे! रुपये-पैसे, कपडे-लत्ते, और पकवानों के साथ मुझे मेरी झोंपडी में पहुँचा गए।

मेरी झोंपडी में एक खटिया के साथ एक चूल्हा भी बन गया था, जिस पर मैंने गाँव की जमना मासी से सीख कर रोटियाँ सेंकनी शुरू कर दी थीं। समय के साथ जंगल कटता गया और देखते ही देखते मेरी झोंपडी उस सडक के किनारे आकर खडी हो गई, जहाँ लॉरियों के और उनके ड्राइवरों का ताँता लगा रहता था।

मेरी झोंपडी में कुँए का मीठा पानी, फल-फूल, गरम रोटियाँ, जंगल के नीबू-मिरच का मसालेदार अचार और जंगली पत्तियों की चरपरी तरकारी हर वक्त तैयार रहती थी। इस वजह से सुबह काम पर जाते लोग तो खाने के लिए आते ही थे, कभी-कभी कुछ लोग दोपहर में भी मुझसे अकेले में मिलने के लिए चले आते। सुबह से रात तक आने-जाने वालों में आपसी बहसें भी खूब होती रहती थीं, जिनमें से मैं काम की बातें गुन लेती और उन्हें मन ही मन घोटती रहती।

बेटा, तुमने अपने बाप के बारे में पूछा था, तो मैं साफ-साफ तो नहीं बता सकती कि तेरा बाप कौन था, क्योंकि मैं कोई रानी कुंती तो हूँ नहीं, जो कह पाती कि फलाँ सूरज का बेटा है, फलाँ हवा का और फलाँ इन्द्र का। पर बेटा, तेरी अच्छी बुद्धि देख कर लगता है कि तू किसी महन्त, साधु, संन्यासी या जमींदार का बेटा न होकर उस कच्ची भीगी मसों वाले का बेटा है, जो सारी दुनिया का भला करना चाहता था और जो एक दिन अपनी पीठ में छुरा घुँपवा कर, मेरी गोद में सिर रख कर मर गया था। बेटा, वह भला आदमी भगवान श्रीकृष्ण को बहुत मानता था। कहता था कि शिशुपाल, श्रीकृष्ण को शूद्र कह कर गालियाँ देता था, पर श्रीकृष्ण ने न केवल इसे स्वीकार किया, बल्कि उन्होंने सूर्यवंश, चंद्रवंश, राजपूत घरानों की तरह ही यदुवंशियों को भी उनके समानान्तर प्रतिष्ठित कर दिया। ये ही सब बातें सोच कर मैंने तेरा नाम कृष्ण कुमार रख दिया, और उसी ने गाँधी बाबा की बगल में बाबा अंबेडकर की भी फोटो लगा दी।

घोंघा ने माँ की सारी बातें ध्यान से सुनने के बाद माँ के पैर छू कर कहा : माँ! तू इस धरती की सबसे बडी सती है। तूने शरीर से *यादा आत्मा को माना, इसलिए तू साक्षात् देवी है। माँ, मैं कसम खा कर कहता हूँ कि मैं भी अपने पिता की तरह ही इस धरती को सुंदर बनाने की कोशिश करूँगा।

माँ घोंघी ने उसे असीस देते हुए कहा : बेटा, सम्भल कर रहना, और लम्बे समय तक जीवित रह कर अच्छे काम करते रहना।

माँ के ये आशीर्वचन सुनते ही घोंघा ने अपने कपडे झाडे और सीधा तन कर खडा हो गया। उसकी अटेन्शन-मुद्रा को देख कर लग रहा था कि वह अभी ही लेफ्ट-राइट करता हुआ सीधा, युद्ध के मैदान में जा धमकेगा।

पूरे साज-बाज के साथ जैसे ही घोंघा सडक की पटरी पर आया, तेजी से गुजरती एक बडी गाडी से किसी ने उस पर जर्दा मिली पान की पीक थूक दी। घोंघा की सतर्कता के कारण उसकी आँखें तो बच गईं, पर सारे कपडों का सत्यानाश हो गया। क्षोभ से उसका बुरा हाल देखकर ज्ञानी माँ ने उसे कण्ठ से लगाया और बोली : बेटा, यह तेरी लडाई की शुरुआत है। तू कभी भी हार मत मानना और न ही काबिल बनने के बाद इन्हें बख्शना! अरे, कपडों का क्या है? ला, मैं इन्हें तुरन्त ही तालाब में डालकर फींच देती हूँ।

दूसरे दिन स्कूल में पहुँचते ही, मास्टरजी ने उसे ऐसी हिकारत से नाक चढाकर देखा, मानों कोई कूडे से भरी गाडी आकर उनके सामने खडी हो गई हो। उन्होंने झल्लाते हुए उसके सारे कागज-पत्तर देखे और फिर यह बडबड करते हुए कि : सरकार का तो दिमाग ही फिर गया है, जो इन गलीच लोगों को स्कूल में पढने का अधिकार दे दिया है। अरे, ये टूटी हाँडी के ठीकरे, सिवा ठोकर मारने के, किसी और लायक नहीं हैं, यह बात सरकार समझती क्यों नहीं है?

स्वागत की इस शिष्ट-अशिष्ट औपचारिकता के बाद, उन्होंने कडी सीधी अँगुली के इशारे से घोंघा को दरवाजे के पास जमीन पर बैठने का आदेश दे दिया।

लेकिन वह ठहरा महाइंटेलिजेण्ट घोंघा! जो अपनी ही शर्तों पर धरती पर आया था और उन्हीं पर जी भी रहा था। माँ की कहानी सुनने के बाद से तो उसे दरवाजे के पाँवपोंछ और बूटों की ठोकरों की पीडा भी नहीं व्यापति थी। न उसे गर्मी लगती थी, न ठण्ड, न भूख, न प्यास; उस पर तो बस जुनून की तरह एक ही धुन सवार थी कि बिना समय गँवाए, उसे जल्दी से जल्दी पढ-लिख कर बडा आदमी बनना है। यही वजह थी कि अपनी पैदाइश के पहले दिन से ही वह हमला होते ही, अपने लुंज-पुंज हाथ-पाँव को अपने सिर पर रख कर अपनी रक्षा कर लेता था। उसकी आँखों के सामने हर वक्त माँ की जिन्दा रहने की सीख का हर अक्षर फ्लोरोसेंट रंगों में चमकता रहता था और वह और भी मजबूती से कदम रखता हुआ अपने लक्ष्य की ओर बढता रहता था।

छात्रवृत्ति, छात्रवृत्ति, और छात्रवृत्ति! अर्थात् हर क्षेत्र की छात्रवृत्तियाँ उसे पग-पग पर मिलती रहती थीं। बावजूद शिक्षकों और क्लासमेट्स के घोर विरोध के; उसका कला, क्रीडा और पढाई में अव्वल आकर, हर वर्ष विजय-चौकी के उच्चतम पायदान पर खडे होकर, मेडल ग्रहण करना लाजिमी था। क्लास के दोस्तों की दुर-दुर, छी-छी का भी उसने एक सकारात्मक उपयोग यह कर लिया था कि वह फैलफितूरी और मौज-मस्ती का अपना सारा समय लायब्रेरी में बिताने लगा था।

उसकी माँ को जंगली जडी-बूटी और स्वास्थ्यप्रद पत्तियों की बेइन्तहाँ जानकारी थी। इसलिए बिना किसी खर्च के उन्हें खाकर और ढेरों वर्जिश के बाद तालाब की ताजा मिट्टी से रगड-नहा कर, वह काफी ताकतवर हो गया था। पर अपनी अन्तःप्रज्ञा के निर्देश से वह हमेशा हाथ के पंजों तक लटकती कमीज और ढीले-ढाले कपडों से अपने कद्दावर शरीर को छिपाए रखता था। ऐसे में स्वाभाविक था कि दूसरे आज भी उसे एक पिलपिल घोंघा ही समझते थे।

उसमें भलमनसाहत कूट-कूट कर भरी थी। उसकी साधुता की तो यह स्थिति थी कि एक दिन सुबह जब वह सूटेड-बूटेड होकर माँ के हाथ से दही-चीनी खाकर, मेडिकल के इंटरव्यू के लिए जा रहा था, तो एक आलीशान अट्टालिका से, बच्चे के मल-मूत्र से सना गंदा पोतडा उसके सिर पर आ गिरा। उसने जब गर्दन उठाकर ऊपर देखा, तो उसे खिडकी में एक गरीब नौकरानी का सहमा हुआ चेहरा दिखाई पडा। उसकी इस बेजा हरकत पर शोर मचाना तो दूर, उसने बिना एक शब्द कहे, उस गन्दगी को कचरे के डिब्बे में डाला, और वापस आ कर फिर से नहा-धोकर तैयार हो गया। समयाभाव के कारण उसे टैक्सी के किराए का खामियाजा भी भरना पडा, लेकिन उसे इसका मलाल नहीं था, क्योंकि कुछ न कह कर उसने एक गरीब की मदद की थी।

अपने जन्म से ही सबको चौंकाते घोंघे ने! इस बार तो चौंकाने के सारे रिकॉर्ड ही तोड दिए। पूरी दुनिया के सैकडों अडँगों के बावजूद उसके अंकों ने मेडिकल कॉलेज में एक नया प्रतिमान स्थापित कर दिया, जिसकी चर्चा पूरे शहर में यों हो रही थीः शिड्यूल कास्ट के एक घोंघे के ऐसे नम्बर? हो ही नहीं सकता; इसमें जरूर कोई गडबड है! देखना अन्त में घोंघे का नाम सबसे नीचे पडा मिलेगा। पर ऐसा हुआ नहीं, और घोंघा वहीं का वहीं शिखर पर जमा रहा।

हालाँकि यह हकीकत सबकी आँखों में काँटों-सी चुभ रही थी, पर सब निरुपाय थे। अन्त में उच्च-तन्त्र ने षड्यंत्र कर उसे एक ऐसे सरकारी अस्पताल में डाल दिया, जहाँ उसका विकास असम्भव और पतन अवश्यम्भावी था, पर तेज-तर्रार घोंघा वहाँ भी कुछ किए ही दिनों में अपने अधिकांश सीनियर्स की असिस्टेंटशीप करके उनके ज्ञान, अनुभव और चालबाजियों से पूरी तरह वाकिफ हो गया।

परिश्रमी, मेधावी और कर्मठ घोंघा से सारे सर्जन सहायता लेना पसन्द करते थे, क्योंकि वही एक था, जिसकी सारी मेहनत को वे बिना कुछ किए ही आराम से अपने खाते में डाल लेते थे। हालत यह थी कि मेहनत सारी उसकी, और पैसे सारे उनके! पर घोंघे को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी। उसे आपत्ति इसमें भी नहीं थी कि उसके सीनियर्स गरीबों के सारे हकूक अपने पैसे वाले मरीजों पर खर्च लेते थे। उसे सिर्फ और सिर्फ! इस बात पर आपत्ति थी कि ये डॉक्टर जानबूझ कर, अपनी लापरवाही और लालच से अधिकतर गरीब मरीजों को या तो अपाहिज कर देते थे, या मार डालते थे।

घोंघा अस्पताल में हर वक्त यह चौकसी करता रहता कि कहीं किसी गरीब की जान लेने का इन्तजाम तो नहीं हो रहा है, क्योंकि नई दवाइयों को पास के केमिस्ट को बेच कर उससे एक्सपायरी तारीख की दवाइयाँ इकट्ठी करने में वहाँ के डॉक्टर माहिर थे। गरीबों को जानबूझ कर महँगी दवाइयाँ लिख कर देना और दुकानदार की मिलीभगत से मोटा कमीशन खाकर उन्हें घटिया दवाइयाँ खिला देना वहाँ के हर डॉक्टर का जन्मसिद्ध अधिकार था।

घोंघा अपनी सीमाएँ जानता था, और वह उन नराधम डॉक्टरों की नीचताओं को सुबह से शाम तक बर्दाश्त भी करता रहता था, लेकिन जब कभी वह किसी गरीब की अन्तःशिरा में एक्सपायर्ड ग्लूकोज या ऐसी ही दूसरी दवाइयाँ चढती देखता, तो उसका खून खौल उठता। वह जब झल्ला कर झटके से उसकी नसों से बटरफ्लाई निकाल फेंकता, तो नासमझ मरीज और चोर नर्स दोनों चिल्लाने लगते। नर्स उसका लाल चेहरा और गुस्से से फटी आँखें देख कर वहाँ से भाग छूटती और असहाय मरीज दीनता से उसे देखता रहता।

घोंघा को अच्छी तरह पता था कि ढेरों सबूतों के बावजूद भी उसकी लिखी शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं होगी, बल्कि वे डाकू डॉक्टर और भी सावधानी से अपना वार करना शुरू कर देंगे। इसलिए वह रोजाना इस स्थिति से लडता रहता और जितना बन सकता गरीबों को बचाता रहता।

पर एक दिन तो इन जुल्मों की इन्तिहाँ ही हो गई। एक महा लालची हड्डियों के सर्जन ने पहले तो बेवजह एक गरीब की टाँगें काट दीं, और फिर उसे कचरे से भरे एक कोने में पटक कर उसकी जरा भी सुध नहीं ली। उसकी लापरवाही के कारण उस बेचारे के घावों में सेप्टीक हो गया और क्रमशः पूरे शरीर में उसका जहर फैल जाने के कारण वह मर गया।

उस दिन घोंघा के दुःख का ठिकाना नहीं था और उसे बार-बार वह दिन याद आ रहा था जब वह हट्टा-कट्टा जवान अपने पैर की साधारण सी चोट दिखाने के लिए उस दुष्ट डॉक्टर के पास आया था। घोंघा, उस जवान किसान की अकाल-मृत्यु पर, उसकी माँ, बीवी और छोटे-छोटे बच्चों का मर्मांतक रोना देख कर, किसी दूसरे के पाप-कृत्य के कारण घटी इस दुर्घटना से इस कदर ग्लानि से भर गया कि अपनी रातों की नींद गँवा बैठा।

उसकी घबराहटनुमा बेचैनी बेकाबू हो रही थी। हर क्षण उसे लगता, समर शेष है/ नहीं पाप का भागी केवल व्याध/जो तटस्थ हैं/ समय लिखेगा उनका भी इतिहास। अब उसे न अपने कपडे-लत्तों का होश था, और न ही बढी दाढी और बालों का। हर घडी, वही दुःखद दृश्य! उसकी आँखों के आगे बार-बार दिखता रहता और वह किम् करोति की मुद्रा में दीवारों से सिर फोडता रहता।

एक दिन सुबह की उजास फूटने के पहले के पवित्र क्षण में उसे आत्मदर्शन हुआ और उसे माँ घोंघी के कहे वचन आकाशवाणी की तरह सुनाई पडेः बेटा, बापू की अहिंसा को सही अर्थों में गुन कर समझ। जैसे कोई प्राणी यदि भयंकर यन्त्रणा भोग रहा हो, तो उसे मुक्ति देना उचित है, वैसे ही यदि कोई व्यक्ति दीमक की तरह पूरे समाज को चाट रहा हो, तो उससे भी इस धरती को मुक्त कर देना एक पुण्य-कार्य ही है। बेटा, भगवान कृष्ण का कहा याद कर कि ‘धर्म समय के साथ बदलता रहता है। यदि हम पुरानी और जड रूढियों को पकड कर बैठे रहेंगे, तो अधार्मिक हो जाएँगे। बेटा, अपने पेशे के प्रति सच्चा होना ही तेरा धर्म है, फिर चाहे इसके लिए तुझे भी श्रीकृष्ण की तरह ही अपनी प्रतिज्ञा भंग कर, चक्र क्यों न उठाना पडे।

इन तेजस्वी वचनों से घोंघा का आत्मबल आकाश छूने लगा, और मन ही मन माँ को प्रणाम कर वह पुराने दिनों की तरह ही सज-धज कर अस्पताल जा पहुँचा।

संयोग से आज वही सर्जन महोदय एक अमीर आदमी के ऑपरेशन की तैयारी में व्यस्त थे। उसे देखते ही वे खुश होकर बोले के.के., अच्छा हुआ कि तुम आ गये। सारी तैयारी हो चुकी है। तुम भी झट से तैयार होकर आ जाओ, हमें तुरन्त ही ऑपरेशन करना है।

बडे आदमी का ऑपरेशन सफलतापूर्वक करने के बाद डाक्टर साहब, उनसे एक बडी रकम ऐंठ कर लौट आए और नोटों से भरे बैग को बगल में रख कर, चुस्कियाँ लेते हुए आनन्द से चाय पीने लगे।

घोंघा प्रसाद ने इसे मंगल-मुहूर्त मान कर डॉक्टर साहब के मिजाज के अनुकूल ही एक मीठी धुन गुनगुनाते हुए उनके पैरों पर हल्के हाथों से कोई ऐसा रसायन मल दिया कि वे पैर खुजा-खुजा कर बेहाल होने लगे। उनके छटपटाते बदन को सहलाने के बहाने उसने उनके बाकी अंगों पर भी रसायन लगा दिया, जिसके लगते ही डॉक्टर साहब का पूरा शरीर जलने लगा और वे जोरों से चीखने लगे : अरे, मैं मरा रे, कोई बचाओ मुझे! कृष्णा बेटा, प्लीज, तुरन्त मुझे एक काम्पोज का इंजेक्शन लगा दो और मेरे पूरे शरीर पर आईस पैक्स रखवा दो। बेटा! जरा जल्दी करो!

यस्स सर! यस्स सर! करते हुए घोंघा प्रसाद ने, राम जाने, उन्हें कौन-सा इंजेक्शन दिया कि उन पर बेहोशी छाने लगी।

उनकी तन्द्रिल अवस्था देखकर घोंघा ने उन्हें सलाह दी कि सर, आप ऑपरेशन टेबल पर लेट जाइए, उसके ठंडे स्टील से आपको आराम मिलेगा और आईस पैक्स लगाने में भी सुविधा रहेगी। मनभाती यह सलाह सुनते ही डॉक्टर साहब तुरन्त घोंघा के सहारे से टेबल पर लेट गए और कृष्णा बचाओ! कृष्णा बचाओ! का जाप जपने लगे। घोंघा प्रसाद ने इसे सही और शुभ समय जान कर, उन्हें तुरन्त क्लोरोफॉर्म सुँघा दिया और उनके पूरी तरह अचेत हो जाने के बाद कोने में रखी हुई अपनी हॉकी-स्टिक उठा कर, उनके दोनों घुटने तोड दिए। वह चाहता तो उन्हें बिना किसी को खबर हुए मार भी सकता था, पर वह गाँधी और अम्बेडकर का चेला था, इसलिए उसने उसे यही सजा दी।

घोंघा के हिसाब से तो उस राक्षस के पापों की यह एक बहुत ही छोटी सजा थी। उन्हें उसी हाल में छोड कर वह, सफल ऑपरेशन के बाद ऑपरेशन थियेटर से बाहर निकलते सर्जन की तरह मुस्कुराते हुए बाहर आया और आत्मविश्वास और शान्ति से भरे हल्के कदम भरता हुआ घर चला गया।

घोंघा प्रसाद उर्फ कृष्ण कुमार पर जब कई दिनों बाद इंक्वायरी बैठी तो उसे न केवल बाइज्जत बरी कर दिया गया, बल्कि उसका स्थानान्तरण एक बडे अस्पताल में ऊँचे पद पर कर दिया गया।

सत्यवादी और धार्मिक घोंघी माँ के पूछने पर घोंघा ने बिना काँट-छाँट किए उसे सारी सच्चाई बता कर कहाः माँ! इन दुष्टों के साथ काम करते-करते, मेरा फूल-प्रूफ बदमाशी सीख लेना साधारण-सी बात थी। यह बात इतर है कि मैं, कभी भी इन हथकण्डों को अपनाना नहीं चाहता था। माँ, मैं तुम्हारी कसम खाकर कहता हूँ कि अपने इस काम से मुझे किसी प्रकार की ग्लानि नहीं, बल्कि पुण्य-बोध हो रहा है। साथ ही यह सोच कर अच्छा भी लग रहा है कि कम से कम मैंने एक अत्याचारी को उसके पापों की कुछ सजा तो दी।

माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरकर उसे असीसते हुए कहा : बेटा! सुना है कि बहुत-बहुत साल पहले कृष्ण भगवान ने भी अपने चेले अर्जुन को कहा था कि पापियों का नाश करना अधर्म नहीं, धर्म है। चल बेटा! हम लोग गाँव के कोने वाले मन्दिर में चल कर श्रीकृष्ण जी से प्रार्थना करते हैं कि वे तेरी बुद्धि ऐसी ही रखें।

उस समय मन्दिर में आरती हो रही थी। हठात् घोंघा प्रसाद को लगा कि कृष्ण भगवान उसे अपने अभयहस्त से आशर्वाद दे रहे हैं।

प्रश्न है?.. कि क्या उस अपढ माँ ने अपने बेटे का नाम यों ही कृष्णा रख दिया था या वह जानती थी कि एक दिन उसका घोंघा भी श्रीकृष्ण की तरह ही परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।। को पुनः प्रतिष्ठित करेगा।



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