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गर फिरदौस बररूये जमी अस्त/ हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त

राकी गर्ग
पिछली सदी के अन्तिम वर्षों से लगातार अपनी जड जमीन, परम्परा, आजीविका, परिवेश, समाज-संस्कृति और भाषा से उन्मूलन एक त्रासद सच बनता जा रहा है। विस्थापन की कोई न कोई खबर समाचार-पत्रों का एक हिस्सा बनती जा रही है। यह वैश्विक स्तर पर घटित हो रहा है। आधुनिक दुनिया लोकतन्त्र और समानता जैसे मूल्यों से निर्देशित दुनिया है और उत्तर आधुनिकतावादियों ने प्रतिनिधित्व की अवधारणा को विकसित किया, लेकिन युद्ध, जातीय और धार्मिक संघर्ष, अलगाववाद, आतंकवाद आदि ने विस्थापन के बडे कारणों को सृजित किया। सीरिया, फिलीस्तीन, म्याँमार (रोहिंग्या), ईराक, से व्यापक विस्थापन इन्हीं कारणों से हुआ जहाँ के शरणार्थियों की समस्या अभी भी बनी हुई है और यह एक मानवीय संकट का रूप ले रही है। भारत में भी बीसवीं सदी के नब्बे के दशक में कश्मीर में हुई अलगाववादी घटनाओं और आतंकियों के कारण लाखों की संख्या में कश्मीरी पण्डितों को अपनी मातृभूमि को छोडकर रातों- रात भागकर जम्मू -दिल्ली जैसे सुदूर शहरों में जाकर शरणार्थी जीवन जीने को विवश होना पडा था। यह भारत विभाजन के बाद दूसरा सबसे बडा जातिगत सामूहिक विस्थापन था जिसे कश्मीरी पण्डित अपना निर्वासन मानते हैं। यह एक ऐसी घटना थी जिससे कश्मीरी समाज गहरे से प्रभावित हुआ था।
पिछले कुछ महीनों से विशेषकर कश्मीर फाइल्स फिल्म आने के बाद देश भर में कश्मीर से विस्थापित कश्मीरी पण्डितों के विस्थापन की चर्चा फिर से जोरों पर है। इसे कुछ लोगों द्वारा हिन्दूत्ववादी राजनीतिज्ञों द्वारा दो धर्मों के बीच नफरत की राजनीति भी कहा जा रहा है, लेकिन इन सभी राजनीतिक मत प्रचार और दुष्प्रचार से दूर इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि विस्थापन एक कारुणिक घटना है। वह किसी भी देश, राज्य प्रान्त क्षेत्र में घटित हो उसकी पीडा समान ही होती है। अपने सदियों से बसे -बसाये घर, अपनी भाषा, अपने समाज और अपनी संस्कृति से अलग होकर जीवन बसर करने में व्यक्ति का आत्मविश्वास और अस्मिता दोनों ही खण्डित हो जाती है। अपनी जन्मभूमि से विस्थापित कश्मीरी पण्डित भी इसके अपवाद नहीं है। आज उनके निर्वासन के इक्कतीस साल बाद भी उनकी स्थिति ज्यों की त्यों बनी है बल्कि घाटी से लगातार कई राजनीति निर्णयों के कारण निकासी जारी है। जैसे अभी हाल में कश्मीर में इन्टरनेट की सेवाएँ बन्द होने से बेरोजगारी की स्थिति में अनेक कश्मीरी युवक (वहाँ के मुसलमान भी) घाटी छोडने को विवश हो गए ।
एक लोकतान्त्रिक देश में पूरा का पूरा एक समाज जबरन विस्थापित होने को विवश हो जाता है। इससे बडा दुर्भाग्य क्या हो सकता है? अपनी इस विवशता और निर्वासन पर कश्मीरी समाज के बुद्धिजीवी लगातार अपना प्रतिरोध व्यक्त करते आ रहे हैं। लम्बे निर्वासित जीवन- यात्रा में विस्थापन का दंश बार -बार उनकी रचनाओं में उभरता है। जिसके केन्द्र में जडों से उखडने की पीडा, घर की स्मृतियाँ, शरणार्थी जीवन का संघर्ष, अपने ही देश में शरणार्थी कहलाए जाने का दंश तथा सामाजिक व सांस्कृतिक संकट आदि है। कश्मीर निर्वासित साहित्यकारों में महराज कृष्ण सन्तोषी, हरि मृदुल, रतनलाल शान्त, महराज कृष्ण भरत, चन्द्रकान्ता, क्षमा कौल, शशिशेखर तोषखानी आदि के बीच में कवि अग्निशेखर का नाम भी है। अग्निशेखर बराबर कश्मीरी पण्डितों के हक के लिए लडते रहे हैं। एक समय वह भी उनके जीवन का था, जब वे अपने घर -परिवार को छोडकर अपने विस्थापित कश्मीरी समाज की आवाज अवाम के बडे राजनीतिज्ञों तक पहुँचाने का लगातार प्रयास कर रहे थे। अग्निशेखर घाटी से पण्डितों के निष्कासन को जलावतनी मानते हैं और इसको केन्द्र में लिखे साहित्य को निर्वासन का साहित्य कहकर बुलाते हैं। अपने समुदाय की जलावतनी के प्रतिपक्ष में खडे होने का कार्य यदि एक कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने किया है और उसमें अपना सभी कुछ अपना स्वाहा किया है, तो एक कवि के रूप में भी वे लगातार सक्रिय रहे हैं। किसी भी समय मुझसे छीन ली गयी मेरी नदी व जवाहर टनल काव्य संग्रहों के बाद अभी हाल में प्रकाशित जलता हुआ पुल में भी यह दर्द बार -बार नये सिरे से उठता है। जहाँ हताशा भरा हुआ मनुष्य कहता है कि.... हमारे लौटने के रास्ते हैं बन्द। घर पहुँचने के वास्ते बदलने होंगे रास्ते।1
अग्निशेखर के काव्य की केन्द्रीय सम्वेदना ही निर्वासन है। तीस साल से निर्वासित जीवन के बाद भी यह दुख किसी भी तरह कम नहीं होता है किसी भी समय। यह एक ऐसा जख्म है जो भरता ही नहीं है, रिसता ही रहता है और बार-बार उन्हें 19 जनवरी 1990 की उस रात्रि को पहुँचा देता है जब उन्हें और उनके ही तरह कश्मीर में रह रहे अन्य कश्मीरी पण्डितों को अलगाववादी आतंकवाद के कारण अपनी जान बचाकर रातों -रात भागना पडा था । 19 जनवरी के साथ बदलता है/हमारा निर्वासन संवत/ हम न चाहते हुए भी/ पहुँचते हैं 1990 की उस भयावह/ हुआँ-हुआँ करती घनी अँधेरी रात में/जब हजारों लाखों आसुरी आवाजों के/अरण्य चले आए थे/हमारी गलियों, चौक चौराहों/मुहल्लों, कस्बों, गाँवों, शहरों में/।2 कविता उस समय की भयावहता को व्यक्त करती है जिसके कारण वे अपनी घाटी से विस्थापित होने को विवश हुए थे। कश्मीर की तात्कालिक स्थिति के बारे में रामचन्द्र गुहा लिखते हैं कि, 1989 के बसन्त में कश्मीर घाटी में श्ाृ*ँखलाबद्ध रूप से गोलाबारी, बम -धमाके, और ग्रेनडों से हमले हुए। अब कश्मीर की हसीन वादियाँ क्लाससिनिकोव, डिटोनेटर, मोल्टोव कॉकटेल, जिलेटिन फ्यूज, मोटार्र और नकाबपोश आतंकवादियों का अड्डा बन गईं। जिसमें कम से कम 52 लोग मारे गए और 250 घायल हो गए। एक संवाद्दाता ने दुख व्यक्त करते हुए लिखा है कि कश्मीर दूसरा पंजाब बन गया है।3 अफगानिस्तान में सोवियत संघ की सेना हटने के बाद मुजाहिद्दीन यहाँ भी यानी कश्मीर में इस्लामिक राज्य की स्थापना का आश्वासन कश्मीरियों को देना शुरू किया था। कश्मीरी पण्डितों को धमकियाँ मिलने लगीं। उन्हें कहा गया कि अपने घर की औरतों को छोड जाएँ और खुद चले जाएँ। साथ ही मस्जिदों के लाउड-स्पीकरों से, उर्दू अखबारों में छपी सूचनाओं से एक ही आवाज आ रही थी जिहाद, जिहाद और जिहाद। घर के बाहर नामों की सूची चिपका दी गयी थी। किसका कब नम्बर है। तेजनाथ धर अपनी डायरी में लिखते हैं कि, घाटी में कश्मीरी पण्डित, कस्बों में, विशेषकर श्रीनगर में समुदायगत रहते आए हैं जिसके कारण अतिसम्वेदनशील क्षेत्र बन जाते हैं। उस दिन ढलती साँझ को जब पूरा गाँव अंधकार से घिरने लगा था, पण्डितों को दूर से आते कुछ नारे सुनाई देने लगे ...पहले कुछ असपष्ट से बाद में बिलकुल स्पष्ट ... । फिर खलबली मचा देने वाला शोर। टीन की छतों पर लगातार होती पत्थरबाजी। यह सब क्या था? सब पण्डित दुबके हुए सहमे हुए लग रहे थे।...सब लोग घरों में बैठे हुए ऐसे लग रहे थे जैसे वधशाला में ले जाए जाने वाले पशु हों।4 अग्निशेखर की जवाहर टनल एक ऐसी कविता है जो अपनी जान बचाकर भागते हुए कश्मीरी हिन्दुओं का एक ऐसा बिम्ब प्रस्तुत करती है जैसे आँखों के सामने कोई फिल्म चल रही हो। जवाहर टनल कश्मीर का हिन्दुस्तान के अन्य राज्यों से जुडने का मार्ग है। ये लाखों कश्मीरियों के लिए भागने का रास्ता भी था जिससे बाहर होते ही वह आतंकवाद के भय से मुक्ति पा सकते थे और एक अन्धेरा रास्ता पार करने का रूपक भी। सुरंग पार होते ही रोशनी थी, उजाला था, लेकिन किस बात का बस इतना ही-एकमात्र था इतमीनान /कि जैसे तैसे बचा लाए थे/ हम खौफजदा बहू-बेटियों को अपने साथ स्कूली बस्ते/ कृषकाय बुजुर्गों कि रो*ा की जिन्दगी/वही थी उपलब्धि इस वक्त... कमीज के अन्दर थे छिपाए/ चिनार के पत्ते /और जेबों में ठूँस भरी थी/ गाँव की मिट्टी 5
अग्निशेखर निर्वासित समुदाय की विवशता को बडी सूक्ष्मता से व्यक्त करते हैं, हालाँकि शाब्दिक तौर पर कविताएँ बहुत लाउड लग सकती हैं, लेकिन देखा जाए तो एक विस्थापित समाज अपने साथ क्या लेकर चलता है? अपने गाँव की स्मृति, वहाँ की मिट्टी की गन्ध और अपने प्रियजन। सारी सम्पत्ति सारा वैभव उनका वही छूट जाता है। यहाँ पर एक ध्यान देने की बात यह है कि यहाँ कोई भौतिक उपादानों या सम्पत्ति का जिक्र नहीं है, बल्कि अपने परिवेश अपनी मिट्टी से अलग होने का दुख है और यही किसी भी कवि की सम्वेदनशीलता होती है जो उसे औरों से अलग करती है। वह बार -बार अपने गाँव सुंबल, अपने पहाड, नदी वितस्ता, चिनार, बर्फ व बारिश, आदि को याद करते हैं। मत दिलाओ मुझे बर्फ की याद/मेरी उम्र होगी कम/या मर ही जाऊं मैं/रो- रो कर/फिर लोग गलतफहमी में/इसे मुझसे जोड कर/किया करेंगे याद/जबकि बर्फ ने मुझे/हजारों साल माँ की तरह/पाल पोसकर किया है बडा/मातृभूमि में..। 6
किसी भी तरह के सामुदायिक विस्थापन की शरण राहत शिविर या शरणार्थी शिविर ही होते हैं । किसी भी व्यक्ति के लिए जिसने एक सम्मानित जीवन व्यतीत किया है शरणार्थी कैम्प में रहने की विवशता भी बार -बार उस स्थान पर लौटा ले जाती है जहाँ से वह चलकर आया था । किसी भी शरणार्थी की यह बेबसी, बेचारगी और लाचारी है कि शरणार्थी शिविरों में रोज उन्हें कभी एक पाव (डबल रोटी) के लिए कभी मुट्ठी भर चावल के लिए घण्टों लाइन में लगना होता है जबकि उनका एक सम्पन्न इतिहास रहा हो। उनके जीवन में एक अनिश्चितता आ जाती है। घर -परिवार, जमीन छूटने के बाद आजीविका की समस्या भी सिर उठाकर खडी हो जाती है, जब तक कि इतनी जमा पूँजी पास न हो कि उससे से दुबारा जीवन शुरू किया जा सके। अंततोगत्वा वे सरकार के रहमोकरम पर निर्भर हो जाते हैं। स्वयं विस्थापन की मार सहते हुए क्षमा कौल ने अपनी डायरी समय के बाद में लिखा है कि चार मास से बघेरों को राहत नहीं मिली है.....आतंकवादी एक गोली के साथ मुक्ति भी तो दे देता है। । अग्निशेखर बखूबी जानते हैं कि उनकी बेघरी को नेतागण कैसे भुनाते हैं। विस्थापितों के दुख से अधिक नेताओं को कैमरे से लेना -देना है। जिसे रघुवीर सहाय दुख की एक प्रोफेशनल पॉलिटिक्स कहते हैं। अग्निशेखर की कविता में यह दुख बहुत सघन रूप में आता है कि वे बच्चे जिन्हें निर्वासन का क-ख-ग भी नहीं पता है और उन्हें यह भी नहीं मालूम कि उनका भविष्य इन शिविरों में कितना सुरक्षित है, वे भी इन सभी दुषचक्रों का शिकार होते हैं।
विस्थापित शिविरों में सो रहे बच्चों की खुशियाँ/अनिश्चिय के गर्भ में हैं/बच्चों के रंग-बिरंगे कपडे/पीछे छूट चुके हैं सन्दूकचियों में/जो हमारे चुराए गए घरों में पडी है/निर्जन कोनों में/बच्चों का संसार खो जाना/कुछ अदृश्य फैसलों का वास्तुशिल्प है/मेरी बुजुर्ग घाटी में/नहीं जानते अबोध विस्थापित/ बच्चे कि वे नींद ले रहे हैं हम सबकी उनींदी गोद में/ सैकडों-सैकडों चिथडे तम्बुओं की बस्तियाँ/ मेले हैं उनके लिए/ वे जैसे उतरकर घर की सीढियाँ खेल रहे हैं/ अजब आँगन में वे/ बस्ती में दूर से आती भोंपू और झण्डोवाली/ कारें देखकर तालियाँ बजाते हुए/अपनी माताओं को राहत लेने जाने को कहते हैं/उन्हें समझ नहीं आता/कि क्यों नहीं लेना चाहते हैं कुछ बच्चों के पिता/लाइनों में प्लास्टिक की बाल्टियाँ/गिलास या दवाई की गोलियाँ/बच्चों को समझाया नहीं जा सकता/कि शिविर में कैमरावालों के साथ आए नेता/कैसे बेचते हैं उनकी बाल सुलभ नजरों को/अखबारों में/समय खिसक रहा है पाँव तले जमीन की तरह/और घनी रात खोलती ही जा रही है/अपनी राक्षसी जटाएँ/बच्चे सो रहे हैं विस्थापित शिविरों में।8 आँकडों के मुताबिक भारत में विभिन्न कारणों से विस्थापित बच्चों की संख्या लगभग पाँच करोड है जिनकी शिक्षा और भविष्य अन्धकारमय है। वे कहीं भी विस्थापितों को लेकर बनाई नीतियों में सम्मिलित नहीं हैं।
अग्निशेखर जब निर्वासन, विस्थापन जलावतनी की बात करते हैं उन मूल्यों, आदर्शों और परम्परा की बात भी करते हैं जिसमें कश्मीर की पहचान विन्यस्त होती थी। कश्मीर में आतंकवाद के पहले बचे अल्पसंख्यक हिन्दू और बहुसंख्यक मुसलमान दोनों साथ-साथ रहते आ रहे थे और किसी धार्मिक पहचान के मुकाबले वे कश्मीरी नाम से अधिक जाने जाते रहे हैं। इसी वैचारिकता को केन्द्र में रखते हुए कश्मीरी पण्डितों के निष्कासन पर वेदराही ने लिखा था-लल्ल दे बाख दरबदर होए/ जियाँ झडदे चिनार दे पत्तर 9 अर्थात् ललद्यद के बाख चिनार के पत्तों की तरह झड कर इधर -उधर उड वे गए हैं। ललद्य कश्मीर की आद्य कवि हैं। ललद्यद के बाखों (काव्य शैली) में हिन्दू- मुसलमान दोनों को साथ रहने की हिदायतें हैं। उनके बाखों का उद्देश्य ही दोनों के बीच में एकता स्थापित करना था और वे कश्मीरी जनता में दोनों संप्रदायों (हिन्दू-मुसलमान) के बीच समान रूप से लोकप्रिय भी हैं। कश्मीर से हिन्दुओं का जान बचाकर भागना दो धर्मों के बीच की एकता, प्रेम और सौहार्द का खण्डित हो जाना है। इसलिए धार्मिक कट्टरता के इस समय में अग्निशेखर अपने निर्वासन में ललद्यद को याद करते हुए कश्मीर की साझा संस्कृति और सह-अस्तित्व की परम्परा को याद करते हैं जब नूर-उद-दीन अर्थात् नन्दु ऋषि सूफी कवि को ललद्यद ने अपना दूध पिलाया था। आज फिर से सांप्रदायिक उन्माद को खत्म करने के लिए ललद्यद को ऐसे करने को कहते हैं। आज फिर/ एक बार पिला दे अपना दूध/ वे पी रहे हैं खून /और हम खून के आँसू/ओ प्यारी माँ/10 किवंदति यह है कि नूर-उद-दीन ने जन्म लेने के बाद अपनी माँ का स्तनपान करने से मना कर दिया था और ललद्यद के सामने आते ही वह स्वयं उनका दूध पीने लगे। वास्तव में दूध एक प्रतीक भर है। ऐसा माना जाता रहा है कि दूध पिलाकर, ललद्यद ने अपनी सांस्कृतिक विरासत नूर-उद-दीन को सौंपी थी जिसको वे नष्ट कर रहे है। अग्निशेखर ललद्यद के हवाले से जेहादियों को स्मरण कराना या चेताना चाहते हैं कि वे अपने ही अति प्रिय कवि और ऋषि (ललद्यद और नन्दुऋषि का कश्मीर में वही स्थान है जो हिन्दी में कबीर का) की शिक्षाओं, कश्मीर की परम्परा (हिन्दू- मुस्लिम एकता) अर्थात् कश्मीरियत को नष्ट कर रहे हैं। मैं थक गया हूँ समझा समझाकर/जिहाद की आग में/सिर्फ जला नहीं आस्तान नुंदऋषि का/ उसमें जला है ललद्यद का दूध/ जो कवि की रगों में था दौडता/ महकता उसके काव्य शलोकों में /देशी गुलाब सा।11 कश्मीरी पण्डितों का निष्कासन कश्मीरियत का पतन है।
आज जेहादी जिन्हें (कश्मीरी पण्डितों को) काफिर कह कर उनके पूर्वजों की धरती से उनका नामों-निशां मिटाने पर तुले हैं वहाँ उनकी पाँच हजार साल पुरानी सभ्यता और संस्कृति रही है। कश्मीर में कल्लहण, ललद्यद, आचार्य मम्मट और आचार्य अभिनवगुप्त जैसी महान विभूतियों एक दीर्घ साहित्यिक परम्परा रही है। कल्लहण द्वारा संस्कृत में लिखित राजतरंगिणी भारत के प्रथम व्यवस्थित इतिहासों में से एक है। अपनी जडों से छूटने, इधर -उधर बिखरने और बार -बार अल्पसंख्यक और काफिर शब्दों का आवर्तन उन्हें अपमान का बोध कराता है तथा एक निष्काषित कवि को अपने पूर्वजों की ऐन्द्रिक उपस्थिति में लौटने को विवश कर देता है। अपने निष्कासन से व्याकुल अग्निशेखर अपने पूर्वज अभिनवगुप्त की उपस्थिति महसूस करने के लिए इन्द्रियों को अन्तरक्षित में प्रक्षेपित करते हैं, तो स्वयं को वहीं उसी गुफा के बाहर बैठा हुआ पाते है जहाँ आचार्य अभिनवगुप्त ने भैरवस्रोत को पढते हुए गुफा के भीतर जाकर महाप्रयाण कर लिया था। इन चीथडे तम्बु-घरों में हम निर्वासित/ हर शाम जलाते रतनदीप/और तन्मय हो पढते /तुम्हारा भैरव -स्त्रोत / ङ्ग ङ्ग ङ्ग
हम विस्थापित सदियों से/ वहीं बैठे हुए हैं/ बीरूआ गाँव की उस गुफा के बाहर /तुम्हारे लौटने की आस में।12 इस अर्थ में अग्निशेखर अपनी कविताओं के माध्यम से कश्मीर के इतिहास और सभ्यता का पुनः स्मरण कराते है। कश्मीरी पण्डित समुदाय का मानना है कि विस्थापन के कारण उनकी हजारों वर्ष पुरानी भव्य संस्कृति बिखरने के कगार पर है। उनके इतिहास को जिहाद के नारों के बीच दबाया जा रहा है।
विस्थापित कश्मीरी अपने विस्थापन में अपने पूर्वजों के साथ अपने स्थानीय तीज- त्योहारों को भी याद करते हैं। विस्थापन में वे अपने त्योहारों को उस तरह से नहीं मना सकते जैसे वह सामूहिक रूप से मनाते आए थे। कश्मीर में हिमपात होना उनकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का एक हिस्सा रहा है। अन्य स्थानों पर रहते हुए वह कश्मीर में बर्फ गिरने को याद करते हैं। शिवरात्रि पर हिमपात का न होना काली बर्फ के गिरने जैसी असम्भव बात होती..... हम जलावतनी में करते हैं/हर शिवरात्रि पर बर्फ को याद/ चढाते थे मांगलिक कलश पर/ बर्फ के फूल / कैसे समझाएँ रोजगार की तलाश में/ जहाँ -तहाँ गए बच्चों को/ स्वाँग रचाती गिरती थी बच्ची बर्फ /फाहे गिरते थे आकाश से/ जैसे स्वेत पुष्प।13 शिवरात्रि पर बर्फ गिरने पर अखरोट का प्रसाद बाँटा जाता था। परिवार, गली मोहल्ले में उत्सव का माहौल होता था । कहने का अर्थ यह है कि विस्थापन पैतृक समुदायगत सामजिकता को खत्म देता है जिससे भाषा, तीज -त्योहारों, स्थानीय धार्मिक मान्यताएँ भी धीरे -धीरे खत्म होने लगती हैं विस्थापितों की अगली पीढी जो जगह -जगह रोजगार के लिए चले गए अब इस बर्फ गिरने नहीं देख सकते। वे नहीं जान सकते कि इस बर्फ का उनकी कश्मीरियत का क्या रिश्ता है। यहीं पर कवि की चेतना वैश्विक होती है जिसका सम्बन्ध किसी भी देश, जाति और समुदाय के विस्थापन के साथ सम्बद्ध है। विस्थापन सिर्फ एक स्थान से दूसरे स्थान पर चले जाना भर नहीं है बल्कि इसे सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भों में देखने की जरूरत है। उनका परिवेश भाषा संस्कृति सभी कुछ अन्धेरे में चला जाता है। संस्कृति का सम्बन्ध जमीन से है, जडों से है। वह कैसे एक राजनीतिक प्रत्यय में बदलता है वह एक अलग मुद्दा है।
विस्थापन में कश्मीरी पण्डितों के परिवार भी बिखर कर रह गए। जहाँ जिसको घर व रोजगार मिला वहाँ चला गया। इससे उनकी भाषा भी खतरे में पड गयी है। वह ज्यादा से ज्यादा अगली पीढी तक समझी और बोली जाएगी। सामान्य तौर पर विस्थापित ज्यादा से ज्यादा अपनी अगली पीढी तक भाषा, रीति -रिवाज और अपनी परम्परा को बचा पाते हैं। दूर -दूर शहरों में या देश से बाहर जाकर बसने वाले धीरे -धीरे वहाँ की भाषा वहाँ के रीति-रिवाज अपनाने लगते है और पीछे छूटी हुई संस्कृति का धीरे -धीरे विलोपन होने लगता है। पुरानी पीढी को यह विस्थापन जीवन मूल्यों और आदर्शों के भविष्य के प्रति बेचैन करता है। और दोहरी नागरिकता, (दो राज्यों या दो देशों के बीच एक जहाँ रह रहे हैं और एक जो छूटा हुआ है) दोहरी भाषा और दोहरी संस्कृति के बीच फँसा आदमी किसी भी तरह को कुछ बचा सकता है उसको बचाने के प्रयास में रहता है। कम से कश्मीर से निर्वासित कवि लिखित रूप में ही सही लगातार अपनी परपरा को बचाने के लिए प्रयासरत हैं। बुद्ध का कमण्डल लद्दाख में कृष्ण सोबती विस्थापन के दर्द पर आती हैं और कहती हैं कि, विस्थापन और देशान्तरण की त्रासदी द्वारा पीढी-दर-पीढी, शताब्दियों तक अपने अपरिवर्तनीय अतीत को गाते चले जाना ही शायद मानवीय इतिहास लिखने की शुरुआत होगी।14 कश्मीर से निर्वासित कवियों का साहित्य इस उक्ति को चरितार्थ करता प्रतीत होता है।
अपनी जन्मभूमि और अपने पैतृक निवास से अलग होने के बाद कश्मीरी पण्डित जहाँ रह रहे हैं वह उनके लिए घर नहीं हैं। यह घर उनका अपना चुनाव नहीं है। यह शरण है। पहले उन्होंने तम्बुओं फिर बाद में सरकार के बनाए रिहायशी दबडेनुमा घरों में शरण ली हुई है और वहाँ भी पारिवारिक इकाइयाँ एक साथ नहीं रह रहीं हैं। कश्मीर से ही एक अन्य विस्थापित कवि मोतीलाल साकी इसे अर्थी रखने की चौकी कहते है जहाँ मुर्दा रखकर अर्थी उठाने वाले कुछ देर सुस्ताते हैं। अपनी भूमि परम्परा और निरन्तरता से कटने के बाद कोई भी समाज ऐसा ही अनुभव करता है। घर सिर्फ रहने के लिए नहीं होता है। वह अपनी पुरातन सांस्कृतिक धरोहर, धार्मिक आस्थाओं के केन्द्रों और त्योहार मानने की परम्परा के बीच भी विन्यस्त होता है जो विस्थापन के साथ ही छूट जाती हैं। कश्मीरी पण्डित भी इसके अपवाद नहीं है। इसलिए उन्हें प्रतीक्षा है अपनी घर वापसी की। अग्निशेखर इसे बहुत मार्मिकता से अपनी कविता में एक बच्ची के सवालों के माध्यम से व्यक्त करते हैं। एक बच्ची कैंप में रहती हुई चिडियों का चहचहाना देखती है और जब वह अपने घोंसलें के लिए वापस उड जाती है तो वह भी अपने घर वापस जाना चाहती है। जिनके घर वापसी की कोई उम्मीद नहीं है वह पिता बच्ची के इस प्रश्न के आगे कितना असहाय पाता है।-कैम्प में चिडियाँ/इन दिनों मेरी बिटिया. निहारती है/कैप मे चिडियों को/सुनती है धूप में उनकी बाते/और देर तक रहती है गुम/सामने सामने/उड जाती है टैंटो की रस्सियों से/एक साथ बीसियों चिडियाँ/सूनी हो जाती है मेरी बिटिया/लुप्त हो जाती है उनकी चहक/फिर अनायास पूछती है-/पापा, हम कब जाएँगे घर?15 यह घर वापसी की प्रतीक्षा किसी भी देश या राज्य के शरणार्थियों में देखी जा सकती है वह तिब्बत हो या कश्मीर।
आज उस कश्मीर की यह स्थिति निःसंदेह बैचेन करती है जिसके बारे में अमीर खुसरो ने कहा था कि गर फिरदौस बररूये जमी अस्त/ हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त (धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं है, यही है)। स्वर्ग से नर्क की तब्दील शायद किसी भी धर्मान्धता कट्टर राष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद और नस्लवाद जैसी विचारधाराओं द्वारा लिखी जाती है। उसमें कोई भी देश राज्य और शहर स्वाहा हो सकता है- कश्मीर,अयोध्या,गुजरात, सीरिया, अफगानिस्तान, लेबनान व जर्मनी कोई भी। धर्म और नस्ल की आड में राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ ही हैं नहीं, तो कोई आतंकवादी स्कूली बच्चों की हत्या को कैसे जायज ठहरा सकता था। बुक्का फाड कर रो रहा था/पेशावर का आसमान/192 स्कूली बच्चों की हलाकत पर/और वो तालिबानी/एक टी वी चैनल पर/जायज ठहरा रहा था/जिहाद के नाम पर किसी भी बर्बरता को।16 घृणा और हिंसा से विभाजित -विस्थापित दुनिया की अगली पीढी किस विचारधारा को लेकर आगे बढेगी, जबकि उसकी भाषा, उसका देश, उसकी संस्कृति सब छिन गयी हो। यह एक सवाल है जिसका उत्तर शायद विश्व के उन तमाम वर्चस्वशाली, शक्तिशाली राष्ट्रनायकों के पास हो जो अपने हाथियारों से किसी भी देश को खत्म कर मिट्टी में मिलाने का माद्दा रखते हैं। अग्निशेखर की कविताओं से गुजरना सिर्फ कश्मीर से गुजरना नहीं है बल्कि नफरत और हिंसा की राजनीति की उस आग से गुजरना है जिसमें आज मानवीयता झुलस रही है।
संदर्भ
1. अग्निशेखर, जलता हुआ पुल, (भूमिका) ज्योति पर्व प्रकाशन 99, ज्ञान खंड -3, इन्दिरापुरम, गाजियाबाद।
2. वही, पृष्ठ संख्या 53
3. रामचन्द्र गुहा, नेहरू के बाद का भारत, पेंगुइन बुक्स, साइबर सिटी गुरुग्राम, पृष्ठ संख्या 252
4. जम्मू कश्मीर का समकालीन साहित्य, साहित्य भण्डार 50, चाहचंद, इलाहबाद, पृष्ठ 278,
5. अग्निशेखर, जवाहर टनल, मेधा पॉकेट बुक्स, एक्स-11, नवीन शाहदरा, दिल्ली, पृष्ठ संख्या 16
6. अग्निशेखर जलता हुआ पुल, पृष्ठ संख्या 78
7. क्षमा कौल, समय के बाद, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ संख्या 9
8. अग्निशेखर,किसी भी समय, सम्भावना प्रकाशन, रेवती कुँज, हापुड, पृष्ठ संख्या 109 -110
9. विस्थापन साहित्य के विविध आयाम, वर्ष 2004 संप्रति प्रकाशन जम्मू, पृष्ठ संख्या 94
10. अग्निशेखर, जलता हुआ पुल पृष्ठ संख्या 38
11. वही, पृष्ठ संख्या 39
12. वही, पृष्ठ संख्या 62
13. वही, पृष्ठ संख्या 50
14. सोबती कृष्ण, बुद्ध का कमण्डल लद्दाख, राजकमल प्रकाशन समूह, दिल्ली पृष्ठ संख्या 166
15. अग्निशेखर, मुझसे छीन ली गई मेरी नदी, शारदापीठ प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ संख्या 50
16. जलता हुआ पुल पृष्ठ संख्या 10।
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