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ये अब्र पुराने हैं बरसेंगे यहीं आकर

उषा दशोरा
(वरिष्ठ कवि अजन्ता देव की काव्य अंबुधि में युवा कवि ऊषा दशोरा की छपाक। यूँ कि पगरखे पुराने हैं और पैर नए।)
कबीर जिनी जिनी जानिया, करता केवल सार
सो प्राणी काहे चलै, झूठे जग की लार।
( कबीर)
जगत के मिथ्या रीति-रिवाजों को उन्होंने ही माथे पर बिठाया, जिनके पैर के नीचे की जमीन कभी भी मजबूत नहीं रही। जो सिर्फ किसी समूह के पीछे पुँपाडिया बजाते घूमे, ये वो लोग हैं/ जिनमें अकेले चलने का भय रहा। इसी पंगत में विवेक से बेरोजगार और मन से भीरू कविता के वे धराधिपति भी हैं जो बाहर से तो चमकीले दिखे पर भीतर का हिसाब - किताब शून्य था कि पाठक के मन पर कुछ न लगे न टिके। मेरे जैसे कईं- कईं युवा कवि भटकते हैं उन काव्य अंबुधि के पीछे जहाँ अँजुल- अँजुल प्यास बुझे। जो कवि, कविता की चमक से नहीं इसकी भभक से जलाए हमें क्योंकि इसी भभक की आँच, कविताओं से होती हुई सदियों साहित्य के तपोवन को साँस देती रहेगी। वही साहित्य जिस पर किसी एक कवि का नाम नहीं चस्पा है। इन्हीं कवियों में अजन्ता देव की कविता स्व का नहीं सर्व का नाद है। यही सर्वनाद अपनी ओर मुझे यों खींचता रहा है-
दुनिया की किसी भी भाषा में
नफरत से बोला गया नाम
मेरे नाम में बदल जाता है
हर युद्ध की मैं बन्दी हूँ
हर युद्ध मुझसे छीनता रहता है
नीला आसमान,हरे पेड
कुछ गीत और मोटा अनाज।
(कविता- युद्धबन्दी)
कविताओं को पाने की भटकन में कईं पीले पड चुके काव्य संग्रहों के उपसर्गों और प्रत्ययों को लाँघ-लाँघ, ढूँढ-ढूँढ उन कविताओं के पास डूब कर पहुँची मैं, जहाँ लिखा था अजन्ता देव की कविताएँ। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पंच तन्मात्राएँ उनकी कविताओं का प्रज्ञ है। इसी प्रज्ञ में उनकी कविता, अपनी विराटता में सुई की नोक की तरह सूक्ष्म और तीखेपन से हमें चुभन देती है। अजन्ताजी के भाव-भाषा का संभोजन मुझ जैसे पाठक को भर-भर इस तरह तृप्त करता है -
मुझे नहीं लगता घुन
जड कभी नहीं होती खोखली
बेदाग पत्ते
छिद्रहीन तना
मेरा स्वाद अब किसी को याद नहीं
मेरी गंध हवा में भी मौजूद नहीं
मैं एक विराट खाद्य हूँ
विराट उदर के लिए।
(पिछली फसलों का नमूना)
अजन्ता देव के किसी भी काव्य संग्रह के बाहर आपको कोई फैंसी नेमप्लेट टँगी नहीं मिलेगी, ना ही लटके मिलेंगे रंगीन बल्ब और लट्टू कि जो किसी भी ऐसे अपाहिज पाठक (वैचारिक रूप से ) को निमंत्रण दे, जो तू मेरी पीठ खुजला, मैं तेरी पीठ खुजलाऊँ के फार्मूले का मास्टर है। शायद इन्हीं मास्टरों के लिए कबीर कह गए हैं-
पाहण केरा पूतला, करि पूजै करतार।
क्योंकि ऐसे मास्टर कभी नहीं जान पाएँगे कि कवि अजन्ता देव के कम में भी कितना-कितना अधिक है। कम में अधिक कह देने का विशारद इनके यहाँ बहुतायत से है। एक ओर पक्ष जो मैंने करीब से महसूस किया कि जब आप इनकी कविता में विचरण करते हैं तो एक ही पंक्ति में पानी के तीनों रूप तरल, वाष्प और बर्फ आपको महसूस होंगे किन्तु इस आनन्द के लिए आपको डूबकर, विकट पाठक होकर ही यहाँ आना होगा-
पृथ्वी में कितनी कम चीजें हैं
जिनमें मैं मौजूद हूँ
कितनी कम घटनाएँ हैं जिनकी मैं गवाह हूँ
अभी-अभी गिलहरी ने दाना उठाया
मैंने देखा
कहाँ गई नहीं मालूम।
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जब सूरज डूबता है मेरे देश में
तब कहाँ-कहाँ उगता है नहीं जानती।
(गवाह )
मेरे प्रिय कवि की कविताओं की जानने का राज यही है कि ये कविताएँ तालियों से बेपरवाह दिखती हैं और इसी बेपरवाही से मुझे मुकम्मल इश्क हुआ। इनकी कविताओं का बाँकपन इस शब्द ध्वनि में छलकता है कि-
मैं प्रतीक्षा करुँगी / तुम्हारे डगमगाने की।
(विपरीत रसायन)
जब आप अजन्ता देव की कविताओं में होते हो, वो धडधडाती हुई आकर, हमारी अर्ध खुली खिडकी के पल्ले पर पावस की तरह टाँचे देती हैं। फिर तो उस टाँचे पर कराहो, चाहे तो टाँचे को सहलाओ मर्जी आपकी। हाँ, उनकी कविताओं में इतना स्पेस अवश्य है कि पाठक थर्ड डायमेन्सन की मुद्रा ले सकता है। इसी थर्ड डायमेन्सन में, मुझे उनकी कविताएँ कईं बार प्रयोगशालाओं-सी दिखती हैं। जो अपनी धडक में हर बार यों लौटाती हैं -
पर उसमें बचा हुआ था विश्वास
और वह विजयी हुआ
पुराने नायकों की तरह
सिनेमा के हीरो की अन्तरआत्मा की तरह
वह विलग हुआ खुद से
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लौटेंगी नहीं कुछ चीजें
जैसे ऊब थकान
और फटी हुई कमीजें
लौट नहीं जाएँगे दुख
वे खडे रहेंगे
खिडकी के बाहर
देखते रहेंगे अपलक
भीतर का दृश्य।
(पुराना नायक)
अगर मैं प्रयोगशाला की बात दोहराऊँ, तो अफसाना यह बनेगा कि अजन्ता देव के यहाँ स्त्री, जलधाम में गौरवर्णी पैर डालकर बैठने वाले सिनेमाओं से मुक्त है। उनकी कविताई पटकथा में स्त्री गुदगुदी देने वाली अदाओं की टी आर पी पर साँस नहीं लेती। मैं इस बात की भी कायल हूँ कि स्त्री के रोवण-धोवण की छूट उनकी कविताओं में नहीं है। अपनी आवाज के लिए अजन्ता देव की कविताएँ चीखते गले का इस्तमाल नहीं करती है बल्कि धैर्य से उनकी कविताएँ चूल्हे के पीत वर्ण और चेहरे के श्याम वर्ण को शस्त्र में बदलने का हुनर इस तरह देती है-
परन्तु एक बार आओ
मेरी रामरसोई में
अग्नि केवल तुम्हारे जठर में नहीं
मेरे चुल्हे में भी है।
(रामरसोई)
मेरा युद्ध जारी रहे
बाद मेरे मरने के।
(विसर्जन एक)
आखिर किसके डर ने काले को बनाया
डरावना और घिनौना
क्या वह कोई बच्चा था अँधेरे में काँपता
या कमजोर शिकारी बलवान के आगे
क्या रति स्पर्धा में कोई टिक नहीं पाया था
मजबूत और गहरे रंग की पेशियों के सामने
क्यों किसी को शक्ति और काला एक-सा लगा।
(काली लडकी)
कवि अजन्ता देव की कविता सीरीज मरुधर की कविताएँ और ताँत की साडी कविता के वो दस्तखत हैं जिन्हें हर उस पाठक को पढना चाहिए, जिसमें कविता की सच्ची प्यास है -
मैं कुलीन और आवारा हूँ एक साथ
अभिजात और मेहनतकश
कभी सहेजी गई पीढियों तक
कभी निचोडा गया मुझे गन्ने की तरह।
(ताँत की साडी)
मेरी बाजार की भाषा अलग है
बेचने के लिए नहीं कहा जाता
ले लीजिए बहुत चल रही है आज कल।
(ताँत की साडी)
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रेत पर ऊँट की तरह दौड गया मेरा प्रेमी
छल-छल पानी की ओर
मेरा बादला अभी आधा भरा था
मैंने उसे ढुलका दिया फोग की जडों में।
(मरुधर की कविता)
अजन्ता देव की कविताएँ किसी तआरुफ की मोहताज नहीं है। हाँ, बिलकुल नहीं है। उन्हें सितारा कवि, उनकी कविताएँ बनाती है। उनकी कविता में प्रयोगशालाएँ, चुभ, शल्यचिकित्सा, सर्वनाद, त्रयम्बक भाव स्थान- स्थान पर प्रकट होता है जो उन्हें श्रेष्ठता के तगमे से नवाजता है।
एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि चलताऊ पढना और समृद्ध खोजकर पढना, इन दोनों पढने में भारी- भरकम किन्तु झीना पर्दा है। कितने लोग/ पाठक इस पर्दे को झाडने की जहमत उठाएँगे/ उठाते हैं। यही कर्म तय करेगा कि हम कितने सुन्दर व श्रेष्ठ साहित्य से भरी पेटियाँ और अलमारियाँ आने वाली जमीन को दे पाएँगे। बाकी तो ठण्डा मतलब कोकाकोला।
श्रेष्ठ पढने की यह रिक्तता क्यों पैदा हुई ? क्या ऐसी रिक्तताएँ हमारे समृद्ध साहित्य के एतबार को ठेस नहीं देती हैं? या मान लिया जाए कि कविता किसी की पीठ खुजलाकर ही की श्रेष्ठ कविता होगी? या पाठक दोषी है? जो कविता तो पढता है पर कविता खोजकर नहीं पढता। या इनकी या उनकी, हाँ में हाँ मिलाकर, दोस्ती- यारी में अपने पठन का दायरा तय करता है। अगर ऐसा है, तो हानि उन आने वाले अनाम साहित्य प्रेमियों की है जिन्होंने अभी जन्म नहीं लिया।
दो मिनिट की मैगी कवितओं से सुन्दर साहित्य से खारिज करना पाठक कर्म है। अजन्ता देव के कवितांश में पढिए -
इस पृथ्वी को जरूरत है
मुसलाधार की
लगातार एक सदी तक।
(मुसलाधार )
ऊँचे नाम फीके पकवान की रस्साकस्सी के बीजगणित का लेखा- जोखा तो एक अल्लसुबह खत्म हो जाएगा। तब क्या होगा बन्धु मेरे ? मजा तो तब है कि बिसार दिया जाए ना भले ही कवि। सिर्फ और सिर्फ कविता जिंदा रहे। अजन्ता देव की कविताएँ अपनी लिखी कविताओं का नहीं अन्य कवियों की लिखी श्रेष्ठ कविताओं का भी कस्स कर हाथ पकडती हैं। वे हमेशा के लिए मैं ही हूँ कहती हुई हम को जिन्दा रखेंगी-
मैं ही हूँ
जिसके पर नोचे गए
रामचरित मानस में
मैं ही हूँ
जिसे तीर मारा राजकुमार ने
मैं ही हूँ
जिसे घायल होकर
गिरना है पृथ्वी पर
देखते हुए
लगातार पास आती धरती
फडफडाते हुए
भारी होते दो पंख।
(राग बिहाग )
चिह्ना जाए कवि राग-द्वेष के प्रकारान्तर से दूरी रखकर, शत्रु खेमों व मैत्री के होहुल्लड मंक भी गज भर की रेखा से पढा जाए कवि। कवियों की कविताएँ विष और अमृत के निन्यानवे पाखण्ड पर कपडा ढककर छानी जाएँ। इतने साफगोई से ही कविता का कल्ट और क्लासिक जिन्दा रह पाएगा वरना तो कविता जगत एक उजाड जंगल से *यादा क्या ही है। न पंछी न पंछी का जात, ना मधुर कलरव।
हाँ, चिह्ना जाए वो कवि यों कहकर कि बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी। फिर अजन्ता देव वो कवि हैं जिन्हें कई- कई बरस बाद भी कईं- कईं पीढियाँ ढूँढते हुए यों पढने आएँगी-
सोचे कोई
मौसम हमारे काबू में
तापमान नियंत्रण में
रोशनी हमेशा हाथ में
और क्या दे देगा
एक अदद घर।
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घर हमें नहीं उन्हें चाहिए
जो हर वक्त आसमान की ओर
देखते हैं घबरा के
और फिर सिर पकड लेते हैं
हर चीज पृथ्वी की डराती है उन्हें।
(बुरा वक्त)
फ्रेम के चारों कोनों से आजाद है, अजन्ता देव की कविताओं का दिगम्बरी मन। उनकी कविता का यही दिगम्बरी मन किसी युवा को रोक लेगा। (ये विशेष मेरे लिए है) वहीं-वहीं उन्हीं कविताओं के अन्तिम वर्ण पर, यह कहकर भी चौंकाएगा कि -
मृत्यु भी पूर्ण नहीं कर सकी /
एक अर्ध समाप्त जीवन।
(अधी समाप्त जीवन )
दुआपरस्ती ये है कि साहित्य रंगमंच पर पर्दे की आवक - जावक चलती रहेगी, शब्द,पंक्तियाँ आएँगी फिर लोप होंगी या टिक कर लम्बा ठहरेंगी, फीका ध्वनि और प्रकाश उम्रदराज हो वानप्रस्थ आश्रम का विचार करेंगे। कविताओं के कॉस्टयूम, डायलॉग, मेकअप सब बदलेंगे। नहीं बदलेगा तो उन कवि की कविताओं के वजन का रंग जो मन-पाठ पर अन्त तक भारी रहेगा। छाती पे कविता का वजन उठाना इतना आसां कहाँ? पर अजन्तादेव की कविताओं का वजन साहित्य श्रेणी को ऊपर उठता है जो अन्त के अट्टाहस में बौद्ध पुरोहित्य के मंत्र की भाँति यँर गूँज उठता है कि-
किसी की नजर मुझ पर नहीं थी
संवाद नहीं थे मेरे पास
जो तालियाँ बटोरते
बेजुबान मुद्रा में खडे रहना था
जब तक भीतर जाने का
इशारा ना हो।
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यहाँ तक कि परिधान भी वही
जो बीस बार पहना था
अलग- अलग नायिकाओं ने।
( कविता- अन्त में अट्टाहस)
समझो तो इशारा ये भी है कि आँखों के आगे हाथ रखने से पृथ्वी का कोई भी दृश्य नहीं छुपता। मानो तो यहाँ आँखें ही तो सबसे मासूम और बेवफा माशूका है। इन आँखों ने हमें भी वही दिखाया जिसे दूसरे देखकर वाह! वाह! करते हैं/ थे। एक पाठक की हैसियत से विचार करती हूँ कविता की जमात में नकली वाह!वाह ! लुटाने वाले अपनी आने वाली पीढी को क्या सौंप रहे हैं। नकली कविताएँ ?
अजन्ता देव की कविताएँ मशीनी साँचे में नहीं ढलकर, मिट्टी में पकी हैं जो निश्चित ही पाठक की पठन जिह्वा पर मिट्टी का स्वाद बिछाती हैं। यही मिट्टी का स्वाद उनकी कविताओं को इस तरह के सच से अलग बनाता है-
वो जानता है/ चालीस बरस का सच/ आधा झूठ होता है। (चालीस बरस का सच)
जो पढनेवाले अपने त्रयम्बक का इस्तेमाल करना जानते हैं उन्हें पता है कि महज आँख से देखा तो क्या देखा? किसी कविता को देखना-पढना यों कोई टल्लेनवीसी नहीं,वो एक चसक प्यास है और ऐसी ही चसक प्यास में आपको पानी की ख्वाहिश है, तो पढी जाए ये कविता-
कोई नहीं सोचेगा
पिछले दस सालों में
राजधानी ने गटक लीं
सैकडों कविताएँ
बीसियों चुम्बन
बेशुमार किस्से
यहाँ तक की बोतल में बची आखिरी बूँद भी।
जब कविता राजधानियाँ बनने लगे या राजनीति की शक्ल में वार्तालाप करने लगे, तो ठीक यही समय कविता का आपातकाल है और इसी आपातकाल में कविता, कविता कम और बन्धक *याद नजर आती है। एक पाठक के रूप में कई कविता संग्रहों से गुजरते हुए यह महसूस हुआ इसलिए लिखा जाना अनिवार्य था। अजन्ता देव की कविताएँ ऐसी कब्जियत और कोष्ठक से स्वयं को स्वतंत्र रखती हैं। प्लास्टिक, लोहा ,कंकड और सीमेंट को लताड देकर संपूर्ण संवेदनाओं के साथ सब्जी वाले के ठेले पर जाकर रुक जाती हैं-
उसने सबसे ऊपर सजा रखा है
हरा धनिया
ठेले पर उठाए बाग-बगीचा
वह आएगा
उससे पहले मगर
लुढकता हुआ आलू आएगा
पीले और मुरझाए लोगों की बस्ती में
हरी-भरी खबर लेकर।
(सब्जीवाला)
तो कवि के साथ अब मुझे भी सब्जी खरीदते हुए कविता से दिखते हैं ये सब्जीवाले। यही कविता का टारगेट है कि तुम मुझे भूल न सकोगे बरखुरदार। ये हर कस्बे, मोहल्ले , शहर और महानगर की सुबह- शाम की थाली में उपस्थित थे, किन्तु जिन्हें हमने अनुपस्थित मान लिया। अब वे बडे ठाठ के साथ अजन्ता देव की इस कविता में खडे दिखे। फिर देखा ये भी जाए कि मनुष्य की हर बस्ती के खूबसूरत रंगे होंठ के ठीक नीचे कीडों की बस्ती में कौन कवि बारीक प्रवेश कर पाया तो नाम लिया जाए केवल अजन्ता देव-
अच्छी तरह मालूम है उन्हें
आटे की गोलियों में जहर के बारे में
खेत में एकटक घूरते हैं पॉलिथीन की थैलियाँ
और खोदने लगते हैं और गहरा
पत्ते कुतरते हुए टपक जाते हैं
छींटों से बचकर
नाली की दीवार से चिपक कर
बहने देते हैं फिनायल का घोल।
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अब बेहोशी का अभिनय भी
कमाल का करते।
(कीडों के बारे में)
अपने लडकपन में पिता के साथ ऋगवेद के नासदीय सुक्त, पक्का गाँठ कर मैंने एक चीज जो ग्रहण की वो थी - खोजो।
यही सुक्त मेरे भीतर का विकट पाठक होकर अच्छा पढने की खोज करते रहने के लिए मुझे दौडाता रहा। पढा था कि तब न सत था, न असत था, न रात्रि, न दिन। केवल और केवल तमस था और इसी तमस से हर बीज फूटा। महत्त्व किसी वटवृक्ष का नहीं, बीज का है।
अजन्ता देव की कविताई जमीन की पहली परत से हर परत के नीचे बीज ही मिला मुझे। बीज माटाखाना का मजदूर है यही मजदूर नवसृजन की पूरी जिम्मेदारी अपने पृष्ठ पर लेता है। जैसे इस कविता में -

उसी ने सिखाया
कोरे मलमल में अभरक लगाना
सूखी रोटी में दाल पकाना
नजरें उठाकर चलना
उसी ने समझाया कामकाजी होने का सुख
उसी ने कहा था
कहना हो तो सिर्फ खेजडी से कहना अपना दुख
वह सूखेगी नहीं
रोना हो तो रेत भली
सोख लेगी आँसू।
(पुन्नी की माँ )
एक वरिष्ठ के रूप में कोई कवि, नए लिखने वालों को अन्धकाराच्छन्न भेदी नजर दे। चलताऊ विषयों से अफन्द्रक करे, आभिधानिक गुलाल,अबीर उनके लिखे शब्दों पर मल कर कहे - आज रंग है री/ रे और फिर उनके भाल पर अन्जन लगा यों छोड दे, शब्द-भाव अरण्य में कि खूब-खूब भटको, खूब खोजो, खूब पाओ और फिर तुम भी आगे को कविता लौटाओ, लुटाओ रंग। यही नजर, यही टेक, यही वातायन और कहूँ कि यही रेडियेशन अजन्ता की कविताओं में पसरा हुआ है। बशर्ते कि आप उसे कैसे और कब चुनते हैं? साथ ही इतने परिपक्व चक्षु और सम्वेदना आफ पास हों -
अप्सराएँ आती हैं मेरी सभा में
सीखने यह दिव्य संचालन
प्रेम प्रारम्भ में
दो देहों का नृत्य ही तो है।
(आज रंग है री)
यही आत्मावलम्बन एक काव्य पीढी से दूसरी काव्य पीढी में हस्तान्तरित करती हैं अजन्ता देव। तो अजन्ता देव ही क्यों? तो उत्तर है कि उनकी काव्य नजर में अपनी नजर टेक, देखोगे तो ऐसे कवि से इख्तिलात होता है कि उनके यहाँ कविता अभिनय नहीं करती। इस वाचाल समय में कविता करना और कविता का अभिनय करना इन दो वाक्य विन्यासों पर मेरा सर्वाधिक ध्यान रहा है। फिर कविता का अभिनय यों है कि जब तुम्हारे पानी के टैंक में पानी है ही नहीं, तब लाख चमकीला, महँगा नल लगवा लो तो क्यों?
बरखुरदार? उससे पानी थोडी ना आएगा। बंधु मेरे यही कविता की अभिनय गाथा है।
तभी तो अजन्ता यहाँ कहती हैं-
केश सुखाए बिना
शरीर सुखना व्यर्थ है
तुम फिर से गीली हो जाओगी।
(नया स्त्री प्रबोध )
------
भारत, मौलिकता का देश है, हर विषय पर खुली जबान का देश है, तो उसे बेबाक कवि का देश भी हो जाना चाहिए जो दाल, भात और रोटी सेकने और लडके कहाँ रोते हैं? इन लैंगिग भाषागत ठप्पों और साँचों से जुदा हो। कवि जेन्डर की तख्ती से ना बन्धे रहे। अजन्ता की कविताएँ जेन्डर को साइडलाइन करती हैं, वे ना तो सौन्दर्य साबुन निरमा की राइम में स्त्री नाजुकता का विज्ञापन करती हैं और ना ही अमूल मानो ये आराम का मामला है कहते पुरुष का लोहा मनवाती हैं। अजन्ता देव के यहाँ प्रेमी /पुरुष की आँख से बह आए जल पर लम्बी कविता मिल जाएगी या पुरुष देह की माँग करती प्रेयसी/ स्त्री इस कविता में बेबाकी से बयाँ हो जाएगी-
अगर पुरुष तुम्हारी देह माँगे
तुम उसकी आत्मा माँगो
और अगर वह तुम्हारी आत्मा माँगे
तुम्हें उसकी देह माँगनी चाहिए।
(नयी स्त्री प्रबोध)
जो कवि आत्मार्थी नहीं, वही जानता है पेड तो अवधि से पुराना होगा ही और नयी अवधि से ही पत्ता नया आएगा। तभी नये के लिए वो झर देता है अपना पुराना सब और जगह देता नई संज्ञाओं को। अजन्ता देव के यहाँ हर युवा कवि को यह स्पर्श मिलेगा। स्मरण आ रहा है पदम श्री लीलाधर जगूडी से हुए एक संवाद का जो कहते है - नए होने के लिए जरूरी है खूब-खूब पुराना होना पर ध्यान रहे कि पुराने का कोई भी कद तुममें विकार न पैदा करे। सन्तुलन वीणा के तार की तरह रहे। तार न *यादा कसे हो ना ही ज्यादा ढीले रह जाएँ।
किसी कवि का क्लोन होने से बचा जाए।
अपने सुबह, दिन और रात के भोजन के स्वाद में मुझे अजन्ता देव की कविता का स्वाद घुलनशील महसूस हुआ। इस पर हर्ष करूँ या विषाद इसका निर्णय आप यह कविता पढकर ही कर सकेंगे वे कहती हैं
कि स्वाद सबसे लम्बी और असमाप्त हिंसा है। इस पंक्ति पर मैं लम्बा ठहरी, मेरी अफीम नींद टूटी, तो पाया कि हिंसा का स्वाद वाकई कितना खतरनाक है, पढें व जाने -
एक लगातार छीना झपटी चल रही है जंगल से
हम पेडों को घेरकर नजदीक ला रहे हैं
तुरन्त टफ खून की तरह चाट रहे हैं ताजा रस
काली मिर्च को दाँतो के बीच
तोड रहे हैं हड्डी की तरह
अभी के अभी काट लाते हैं गोभी
कह कर उठा रहे हैं दरांती
खजूर का सीना चीर रहे हैं।
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एक भयंकर युद्ध की स्थिति में हैं हम सब
स्वाद सबसे लम्बी और असमाप्त हिंसा है।
( हिंसा का स्वाद)
आखिर कौन है अजन्ता देव? वह अंजता देव, जो कहती हैं- कविता सुनना नहीं देखना शुरु करो। बारिश की किताब पढते हुए मैंने जाना पिछली फसलों के नमूने। प्रेम के बाद महसूस किया रेगिस्तान की आँधी। गुल बनफशा चखकर सच्ची गवाह भी बनी। मैं उनके साथ जन्मभूमि में विचरी फिर प्राथमिक पाठशाला में प्रवेश लिया। जब चिडिया के कहने से लडाई के दिन ठहर जाओ कहते हुए चिडिया हुई, मैंने भी वो चिट्ठी पढी जो किसी ने नहीं पढी चिट्ठी जो लडकी ने प्रेमी के लिए सहेली को लिखवाई थी।
( ये अजन्ता देव की कविताएँ हैं )
जो डूबा सो उबरा, हाँ तो खुसरो मेरे दोस्त, इसी उबरने में पहले डूबा जाए अपने पुरखों के रचना संसार में, फिर उनके कद की ऊँचाई के साथ उनके जूते की घिसट पर निगहबानी हो। अजन्ता देव की कविता में डूबना, मेरे लिए बहुत कुछ पाने का पयार्यवाची है।
इति।
( ये अजन्ता देव की कविताओं की समीक्षा नहीं, केवल उन्हें लम्बे समय तक पढते हुए मेरे सहज विचार हैं)
सन्दर्भ -
काव्य संग्रह- एक नगर वधु की आत्मकथा, राख का किला, घोडे के आँख में आँसू, बेतरतीब। इनके अतिरिक्त डिजिटल स्त्रोत - हिंदवी, कविता कोश, सदानीरा, सबद , राग दिल्ली, दस्तक।
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सम्पर्क - 1185, ब्लॉक 22, रंगोली गार्डन, वैशाली नगर, जयपुर-३०२०३२