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पुरस्कार पीछे छूट जाएगा लेखिका बची रहेगी

प्रियदर्शन
जब अंतरराष्ट्रीय बुकर सम्मान की लांग लिस्ट की तेरह? औपन्यासिक कृतियों में गीतांजलि श्री का नाम आया तो सब ने कुछ अचरज से पूछा कि यह हिन्दी की लेखिका कौन है? इसके बाद छह उपन्यासों की शार्ट लिस्ट चाहिए तब तक गीतांजलि श्री के नाम से बहुत सारे लोग परिचित हो चुके थे। और उनके नाम अंतरराष्ट्रीय बुकर सम्मान की घोषणा के बाद लगभग पूरा देश उन्हें जान चुका है। अमेजॉन की बेस्टसेलर लिस्ट में उनकी किताबें लंबे समय तक पहले और दूसरे नंबर पर चलती रहीं। हर कोई रेत समाधि पढना चाहता है।
लेकिन लोकप्रियता शायद कभी गीतांजलि श्री का अभीष्ट नहीं रही। वह बाजार से अप्रभावित, पाठकों से बेपरवाह अपनी तरह की लेखिका रहीं जिनकी नजर सिर्फ अपने ढँग से कहीं जाने वाली कहानियों और उनसे जुडे किरदारों पर रही। सच तो यह है कि यह बात हिन्दी में गम्भीर कहे जाने वाले अमूमन पर लेखक के बारे में कही जा सकती है, लेकिन गीतांजलि श्री के संदर्भ में इसका एक खास मतलब भी है।
गीतांजलि श्री को पढना आसान काम नहीं है। जितने लोगों ने बहुत चाव से उनकी किताब खरीदी है, उनमें से शायद बहुत सारे लोगों को लगे कि इसको पढने में तो कोई रस नहीं है। गीतांजलि पाठकों को लुभाने वाली लेखिका नहीं हैं। वह किसी दिलचस्प कहानी का ऐसा ताना-बाना नहीं बुनतीं जिसमें पाठक बहता चला जाए। उल्टे वे कदम कदम पर अपने पाठक को रोकती हैं, या शायद वह अपने पाठक को भूल जाती हैं, वे कहानी को गति और क्षिप्रता के बिल्कुल उसी समीकरण में साध लेना चाहती हैं जो जीवन में होता है। जीवन में काफी कुछ बेडौल और अनगढ भी होता है तो गीतांजलि श्री किसी जिद की तरह उस अनगढपन, उस बेडौलपन को अपनी कथा में उतार लाना चाहती हैं।
दरअसल यही वह बिन्दु है जहाँ से गीतांजलि श्री का कथा संसार अपनी विलक्षणता अर्जित करता है। जिंदगी उनकी कथा में बिल्कुल साँस लेती दिखाई-सुनाई पड सकती है। बेशक इसके लिए वह आँख और कान भी लाने-लगाने पडते हैं जिनसे इन्हें देखा सुना जा सके। और इन कहानियों को पढते-पढते ही पाठक वह आँख कान अर्जित कर सकता है जिनसे उनका आस्वाद लिया जा सकता है। लेकिन नई आँख, नए कान अर्जित करना दरअसल एक नया व्यक्तित्व हासिल करना भी है, एक नया जीवन हासिल करना भी है। यही किसी लेखक का, किसी कथा का चरम लक्ष्य हो सकता है कि वह पढने वाले को बदल दे।
मुश्किल यह है कि इस हडबडाए हुए समय में, बहुत सारे प्रभावों से बिंधी रचनात्मक दुनिया में यह अवकाश किसी के पास नहीं है कि वह इस फुरसत से पढे और कथा के साथ अपने भीतर भी कुछ बदलता महसूस करे। इसलिए अचानक यह शिकायत शुरू हो गई है कि गीजांजलि श्री तो अपठनीय लेखिका हैं। यही नहीं, यह भी उत्साह के साथ जोडा जा रहा है कि अब बुकर मिलने के बाद आलोचक उनमें तरह-तरह की खूबियाँ खोज निकालेंगे। जबकि सच्चाई यह है कि हिन्दी साहित्य में गीतांजलि श्री पहले से सम्मानित रही हैं। उनकी पहली तीन कहानियाँ हिन्दी की सबसे चर्चित साहित्यिक पत्रिका हंस में छपी। उनकी पहली कहानी बेलपत्र का दूसरी भाषाओं में अनुवाद हुआ। उनके पहले उपन्यास माई को भी खासी प्रशंसा मिली और उसके अंग्रेजी अनुवाद को क्रॉसवर्ड पुरस्कार की अन्तिम सूची में जगह मिली। उनको पहले भी हिन्दी के छोटे-बडे सम्मान मिलते रहे हैं। पिछले ही महीने, उन्हें एक लाख रुपये के वनमाली कथा सम्मान से भोपाल में सम्मानित किया गया।
लेकिन क्या वाकई गीतांजलि श्री का लेखन पठनीय नहीं है? यह पठनीयता क्या होती है? और यह जटिल भाषा कैसी होती है?यह दलील अब पुरानी हो चुकी कि न पठनीयता श्रेष्ठता की कोई शर्त है और न ही पठनीयता का कोई एक प्रकार होता है। पठनीयता दरअसल कोई ठोस या वस्तुनिष्ठ अनुभव नहीं, उसका एक व्यक्तिनिष्ठ रूप होता है। जो किताब दूसरों को पठनीय लगती है वह हमें बकवास लग सकती है और जिसे हम पठनीय मान कर रीझते हैं, उसे बहुत सारे लोग बिल्कुल अपठनीय बता सकते हैं।
लेकिन यह मामला इतना आसान नहीं है। पाठ की भी प्रविधियाँ होती हैं। पाठ को ग्रहण करने का अभ्यास होता है। रंगमंच में कहते हैं कि दर्शक को भी रसज्ञ होना चाहिए। दुनिया भर की कलाओं में, सभी भाषाओं के साहित्य में ऐसे मूल्यवान लेखक रहे जो कम पढे गए लेकिन फिर भी बहुत बडे लेखक कहलाए क्योंकि उन्होंने विचार और संवेदना के उन क्षेत्रों का संधान किया, जहाँ दूसरे नहीं पहुँच पाए। बल्कि दुनिया के *यादातर महान लेखक आसान या दिलचस्प लेखक नहीं रहे हैं। वे पाठकों को आकर्षित नहीं करते, पाठकों को उन तक जाना पडता है। दरअसल यह लोकप्रिय और शास्त्रीय का फर्क है जो सभी साहित्यिक विधाओं में ही नहीं, कला और संस्कृति के दूसरे अनुभव में भी दिखाई पडता है। जिन लोगों को किशोर कुमार, मुकेश, रफी, लता और कुमार शानू भाते हैं, वे कुमार गंधर्व, मल्लिकार्जुन मंसुर और किशोरी अमोनकर को सुन कर नाक-भौं सिकोडते हैं। जिन्हें नीरज के गीत अच्छे लगते हैं, उनके लिए मुक्तिबोध बेहद दुरूह पाठ हैं। पिकासो या वॉन गॉ के चित्र तो दुनिया के आम लोगों के लिए किसी अबूझ पहेली से कम नहीं। वे समझ नहीं पाते कि ये महान क्यों हैं। यश चोपडा और प्रकाश मेहरा की फिल्में देखने वालों को सत्यजित रे का सिनेमा बिल्कुल बेकार लगता है और दुनिया भर का महान सिनेमा अपने कारोबारी बॉलीवुडी-हॉलीवुडी संस्करणों के आगे पिट जाता है।
तो शास्त्रीयता की अपनी शर्तें होती हैं जिनमें पठनीयता अनिवार्य नहीं होती। यह लिखना कहीं से लोक-साहित्य या संस्कृति को खारिज करना नहीं है- आखरि शास्त्रीय लोक से ही आकार पाता है, गढा जाता है। लेकिन मनोरंजक या दिलचस्प साहित्य और संगीत की कल्पना और कामना करने वाले न लोक का रस ले पाते हैं न शास्त्रीयता की संवेदना से जुड पाते हैं।
गीतांजलि श्री को मिले अंतरराष्ट्रीय बुकर सम्मान के बाद एक दुर्घटना यह भी हुई कि उनकी तथाकथित दुरूह शैली और जटिल भाषा पर जो बहस चल पडी, उसमें वह कथावस्तु अलक्षित रह गई जो गीतांजलि श्री के लेखन-संसार को हमारे लिए अलग तरह से महत्त्वपूर्ण बनाती है। तीन दशकों से कहीं *यादा समय से लगातार कथा-साहित्य में सक्रिय गीतांजलि श्री एक साथ दो स्तरों पर काम करती हैं। उनकी सारी रचनाएँ जैसे मन का सुराग खोजने वाली रचनाएँ हैं- व्यक्तियों की मार्फत वे परिवारों को और परिवारों की मार्फत समाज को पहचानती हैं। वे चरित्रों को बिल्कुल उनके अंतर्जगत की प्रतिक्रियाओं से पकडने की कोशिश करती हैं। इससे कभी-कभी यह भ्रम होता है कि वे व्यक्तिवादी अनुभवों की कथाकार हैं- कुछ निर्मल वर्मा की तरह, कुछ वर्जीनिया वुल्फ की तरह या ऐसे और भी लेखकों की तरह जो हमारे अंदरूनी संसार की तलाश में भटकते हैं।
लेकिन गीतांजलि श्री के चरित्रों का यह आन्तरिक विश्व बाहरी कार्यव्यापार के आईने में ही घटित होता है। दुनिया जैसी है, जिस दिशा में जा रही है, जिन सवालों से जूझ रही है, वे सब उनके चरित्रों में परिलक्षित-प्रतिबिंबित होते हैं। और यही वह चीज है जो अचानक गीतांजलि श्री को हमारे लिए बेहद महत्त्वपूर्ण बना डालती है। हम पाते हैं कि पिछले कुछ वर्षों मे जो विमर्श हमारे लिए सबसे जरूरी रहे हैं, जिन सवालों से हमारी रोजाना मुठभेड होती है, वे उनके मौन-से लगते लेखन में बहुत मुखरता से अभिव्यक्त हो रहे हैं।
मसलन सांप्रदायिकता के सवाल को लें। उनका उपन्यास हमारा शहर उस बरस नब्बे के उस जलते हुए दशक में आता है जब राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर है और 400 साल पुरानी एक मस्जिद ध्वस्त की जा चुकी है। यह टूटन जैसे पूरे समाज पर पसरी हुई है और उन लोगों को भी तोड रही है जो खुद को इन सबसे ऊपर मानते हैं। हिन्दू और हिन्दू हुए जा रहे हैं, मुसलमान और मुसलमान हुए जा रहे हैं। यह दुर्घटना भी सिर्फ आम लोगों के साथ नहीं हो रही, खुद को प्रगतिशील मानने वाले ऐसे लोगों के बीच हो रही है जो एक छत के नीचे रहते हैं, रोज बहस करते हैं, सांप्रदायिकता के उभार पर चिंतित होते हैं और एक दिन ठिठक कर पाते हैं कि यह तो उनके भीतर भी दाखिल हुई जा रही है।
सांप्रदायिकता के इस सवाल पर गीतांजलि श्री बाद में भी लौटती हैं। जैसे लगता है कि हमारा शहर उस बरस को बाद के बरसों में भी वे देख रही हैं। शायद 2012 के आसपास उनका संग्रह यहाँ हाथी रहते थे आता है और उसकी कुछ कहानियाँ फिर से बहुत मार्मिक ढंग से सांप्रदायिक आघातों से तहस-नहस हो चुकी नागरिकता को दर्ज करती है।
लेकिन गीतांजलि श्री को असल में पहचानना चाहिए तो उनके स्त्री चरित्रों की मार्फत जो बिल्कुल पारंपरिक परिधान में रहती हैं, लेकिन उसमें अटती ही नहीं। वे लगभग हमेशा वहाँ से बाहर निकल आती हैं- कुछ ऐसा कर जाती हैं जिसकी दुनिया उनसे कल्पना नहीं करती। आप चाहें तो मुहावरेदार भाषा में इसे मौजूदा स्त्री विमर्श से जोड सकते हैं, लेकिन यह उनके लेखन में इतनी तरह से और इतने स्तरों पर पैबस्त है कि वह इस मुहावरे में भी समाने वाला नहीं है। मसलन नब्बे के दशक के आखिरी दिनों में ही आए उपन्यास तिरोहित की चच्चो और ललना बेहद मामूली लगती स्त्रियाँ हैं- लेकिन उन्हें देख रहा बिटवा जान रहा है कि कैसे इन दोनों स्त्रियों ने समाज को अपने ठेंगे पर भी रखा है और खुद को उससे अदृश्य भी रखा हुआ है। यह बात बार-बार दोहराई जा चुकी है कि यह उपन्यास हिन्दी में किसी महिला द्वारा स्त्री समलैंगिकता पर लिखा संभवतः पहला उपन्यास है (हालांकि इस वाक्य में ठीक अगली साँस के साथ यह भी जोडने की जरूरत महसूस होती है कि यह इतना भर नहीं है, इससे काफी आगे है।)।
बहरहाल, यह स्त्री-कथा- जिसे विद्रोही, बागी, चलन से अलग, अपारंपरिक- कुछ भी कहा जा सकता है- गीतांजलि श्री की पूरी रचनाशीलता में लगभग हर जगह बिखरी-छींटी पडी है। जैसे एक स्त्री आँख है जो सारी चीजों को देख और रच रही है। उनके उपन्यासों माई, हमारा शहर उस बरस, खाली जगह, तिरोहित और रेत समाधि में, उनके कहानी संग्रहों वैराग्य और वहाँ हाथी रहते थे में, उनके बहुविध लेखन में यह स्त्री इतने स्तरों पर और इतने अपारंपरिक रूपों में मौजूद है- कहीं अपनी नियति के दुख और अवसाद झेलती हुई, कहीं अपने हिस्से के मौन विद्रोह का रास्ता बनाती हुई- कि इन पर अलग से लिखने की जरूरत महसूस होती है।
बहरहाल, जिस कथावस्तु की चर्चा से यह टिप्पणी शुरू हुई, उसका तीसरा पक्ष भी अनुपेक्षणीय और शायद इतना ही महत्त्वपूर्ण है। वह परम्परा के बहुत सूक्ष्म रूपों से उनका परिचय है, पारिवारिकता के बहुतेरे द्वन्द्वों की स्मृति है और वह भाषिक सम्पदा है जिससे वह यह सारा माहौल रचती हैं। वे जीवन की हलचल को ठीक उसी तरह दर्ज करने की कोशिश में जैसे अपनी कलम लहराती हुई लिखती हैं, उनके लहरदार- कहीं लंबे और कहीं छोटे, कभी उठे हुए और कहीं दबे हुए- वाक्य, उनका पूरा भाषिक विन्यास- जो कहीं-कहीं अराजक और अबूझ भी लगता है- लेकिन अंततः एक विराट अनुभव-संसार को उसकी बहुत सारी बारीकियों के साथ रचने में सक्षम होता है- उनकी ताकत है। उनकी भाषा में एक अलग तरह की हिन्दी खिल उठती है जो अकादमिक-प्राध्यापकीय हिन्दी भी नहीं है और निरी साहित्यिक भी नहीं। उसमें हमारे खोए हुए शब्द भी मिलते हैं। कहना होगा कि बुकर ने सिर्फ अंतरराष्ट्रीय लेखन संसार मंच ही गीतांजलि श्री का परिचय नहीं कराया है, उन्हें उस हिन्दी संसार के लिए भी नए सिरे से सुलभ कराया है जिससे वे अपनी नियमित सत्रि*यता के बावजूद लगभग अदृश्य सी रही हैं। इन दिनों भी वे अपनी नई अर्जित लोकप्रियता से आऋांत अदृश्य रहने का तरीका खोज रही हैं। यह चीज बताती है कि पुरस्कार पीछे छूट जाएगा, लेखिका बची रहेगी।

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