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हरीश भादानी : वातायनी घर के पिता

सरला माहेश्वरी
एक ही मंच पर पिता-पुत्री ! तस्वीर भले ही सच हो, पर उससे भी बडा सच है कि पिता के पाँव के नाखून बराबर भी नहीं !
पिता जैसा होना कठिन ..बहुत कठिन है ! कितने कम होते हैं ऐसे लोग जो इस दुनिया को सुन्दर बनाने में अपना जीवन होम देते हैं।
एक ऐसा इन्सान जिसे हर कोई अपना समझे ! सच्चा समझे ! एक कवि जो अपनी रचनाओं से भी बडा इन्सान हो !
एक कवि ! एक ऐसा जिन्दादिल इन्सान जिससे हर घर का हर सदस्य छोटे से लेकर बडा तक, प्यार करे, जिससे अपना दुख-दर्द तक साझा करे !
गालिब कहते थे :
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना
पर हमारे पिता ने सबसे अधिक मनुष्य के इन्सान होने के यकीन को ही पक्का किया ।
अपने इस पिता, हरीश भादानी के बारे में सोचती हूँ, तो बडी असमंजस में पड जाती हूँ । पिता की तस्वीर में आमतौर पर बच्चे अपने बचपन की स्मृतियों के ही रंग भरते हैं। लेकिन मैं जब अपने बचपन के दिनों की याद करती हूँ और उसमें अपने पिता को ढूँढती हूँ, तो मन के कैनवस पर कुछ धुंधली-सी रेखाओं के अलावा कुछ नहीं उभरता। सिर्फ एक अहसास, एक अनुभूति दिल-दिमाग पर तारी हो जाती है।
घर से आमतौर पर अनुपस्थित रहने वाले अपने पिता को घर के बजाय बाहर के विराट से ही ज्यादा जाना। कभी-कभार जब पिता के साथ बाहर, शहर में निकलने का मौका मिलता तो बस यही देखते कि उनसे मिलने वाले लोग कदम-कदम पर उन्हें रोक कर दुआ-सलाम करते; घर से बाजार तक की 10-15 मिनट की दूरी हम कभी आध घण्टे तो कभी 45 मिनट में तय करते हुए बाजार तक पहुँचते जहाँ से हमें ताँगा लेना होता था। हम बहनें उनके पीछे चलती हुई यह सब देखती रहती। ताँगे वाले भी उन्हें देखते ही मनुहार करते और वे बिना कुछ पूछे ताँगे पर सवार होकर उनसे खैरियत पूछते हुए बतियाते रहते। मुझे याद नहीं पडता कि कभी किसी ताँगे वाले से उन्होंने दाम ठहराए हों, हमेशा कुछ ज्यादा ही दाम देकर उतर पडते। उनके साथ कभी-कभार बाहर निकलने और घर में उनके बंधु-बाँधवों के अनवरत आगमन ने हमें इतना जरूर समझा दिया था कि हमारे पिता एक आम-फहम इन्सान नहीं हैं, वे एक बडे आदमी हैं जिनकी लोग इतनी इज्जत करते हैं।
इस पिता के मेरे अपनों का दायरा इतना बडा था कि उसमें उनके अपने जाए हम-हरफों का अलग से कोई स्थान या अर्थ ही नहीं था। घर में जमने वाली महफिलों में आए अपने रचनाकार मित्रों से जब हम बहनों का परिचय कराने की नौबत आती, तो पिता अक्सर गडबडा जाते, न तो उन्हें हमारी स्कूलों का नाम याद रहता और न ही यह याद रहता कि हम कौनसी कक्षाओं में पढ रहे हैं। लेकिन पता नहीं क्यों, उनका यह न जानना हमें कभी बुरा भी नहीं लगा। शायद यह उसी अहसास का फल था कि हमारे पिता एक दूसरी तरह के इन्सान हैं। बचपन में ही उन्हें कवि-सम्मेलनों में मजमा जमाए हुए देखा करते थे और लोग उनके गीतों पर वाह-वाह करते रहते थे। इसलिए पिता की छवि हमारे सामने एक खास इन्सान की थी, क्या हुआ जो उसे अपनी सन्तानों को देने के लिए वक्त नहीं हुआ करता था।
और, हमारा हवेलीनुमा घर भी क्या घर था। उसे घर नहीं बल्कि एक सराय ही कहा जा सकता था, जहाँ अनगिनत लोग अपने-अपने कामों से आते, कोई महीना-दो महीना तो कोई छह महीना-साल भर भी रह जाता और फिर चल देता। बाहर से आकर रहने वाले ए मेहमान पिताजी के इतने करीबी दिखाई देते कि हमें लगता था कि इस घर पर उनका भी उतना ही हक है जितना हमारा, बल्कि हमसे कहीं ज्यादा।
आज सोचती हूँ, तो लगता है शायद पिताजी की इस घडत, वसुधैव कुटुंबकम वाली मानसिकता का राज उनके बचपन की कटु जिन्दगी में कहीं छिपा हुआ था। एक ऐसा बच्चा जिसके जन्म के फौरन बाद ही बाप संन्यासी हो गया था और माँ पति के वियोग में कुछ ही महीनों में चल बसी हो, ऐसे बकौल पोषक दाजी अपसगुनिए बच्चे का बचपन कैसा हो सकता था, इसका बयान खुद पिता ने इन शब्दों में किया है :
सुनो, हीए पर रख कर हाथ/हवेलीदार प्रजापतियों ने/लग गयी छूत की तरह उठाकर/पहनाई मुझे एक कंठी/जडी थी जिसमें एक छोटी-सी थेगडी/गुदा हुआ था उस पर-ऋंग-क्लिंग की लिपि में/ अपसगुनिया /किटकिटते रहते थे उनके दाँत/आया है दो को निकालकर/ कुबुद्धि तो निकलेगा ही/ ऐसे ही पालनों में झूल-झूलता/गीले से सूखा/सूखकर गीला होता हुआ/हो ही गया मैं/पाँच फुटा कीकर।
सामन्ती संस्कारों के गारे-पानी से बनी हवेली में अनचाहे उग आए इस पाँच फुटे कीकर ने शायद बहुत पहले ही इसकी सारी आततायी अन्तरकथाओं को जान लिया था और यह निश्चय कर लिया था कि वह इस बंद हवेली की हर ईंट को उखाड देगा। इसी कविता में वे एक जगह कहते हैं:
हम वह फावडा, कढाई, पाँव/ जो अतलांत तक जाकर/ समाधि दें/झंखाड मलबे को,/संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण/कुछ भी हैं/तो हम केवल कुम्हार/ तब तक फिराएँ चाक/ बन जाए यह धरती ही/ रोशनी से पुता/ वातायनी घर,/ हमारी अंगुलियों की छुअन से होता रहे/ अहल्या का रचाव सीता में,/ हमारा मन हिलकता पारदर्शी जल/ दिखे-देखें एक सा ही।
बचपन की अपनी उस हवेली की झूठी, सामन्ती मर्यादाओं को गेंती और फावडे से ढहा, झाड-बुहार कर हवेली से बाहर एक नया वातायनी घर बनाया था पिता ने। इस वातायनी घर के पिता ने अपनी संतानों के लिए कोई निश्चित अनुसरणीय रास्ता तैयार नहीं किया। दिखे-देखें एक सा ही मन वाले पिता के लिए हम-आजिए खुद अपना आज लिखने को मुक्त थे।
वातायनी घर से वातायन की याद आ गयी। लगातार 14 वर्षों तक उनके सम्पादन में निकलने वाली इस पत्रिका के साथ जुडे उनके सहयोगी मित्र ही हमारे घर के सदस्य थे। पत्रिका के काम अथवा पता नहीं किन जरूरतों की वजह से लगातार बाहर रहने वाले पिता की अनुपस्थिति में उनके एक मित्र ही हमारे अभिभावक बन गए थे। कई नाम याद आते हैं, लेकिन एक नाम जिसका साथ दूर तक रहा, वे सरल काकाजी (सरल विशारद) आज भी भूलते नहीं। माँ-बाप के प्यार से महरूम तथा जिन्दगी के उबड-खाबड रास्तों पर अकेले ही अपना रास्ता बनाने को छोड दिए गए मेरे पिता को शायद अपने खुद के अनुभवों के चलते ही यह जरूरी नहीं लगा कि अपनी सन्तानों के लिए कोई निश्चित और निश्चित रास्ता बनाने का कष्ट उठाए। बडे से हवेलीनुमा घर में दादा और पडदादा के बडे नाम के साथ रहने वाले पिता के पास अपनी कीर्ति के अलावा अपने वंशजों का दिया नाम और इज्जत तो बहुत थी, लेकिन उस नाम और इज्जत को बचाए रखने में हम बच्चों की हालत खस्ता थी।
पिता को अपने दादा से जो भी सम्पत्ति मिली थी, उसे बडी बेरहमी से लुटाकर फक्कड होने में उन्हें ज्यादा समय नहीं लगा। जो पहले अपना घर फूँके, फिर धर-मंजला चलना चाहे/ उसको जनपथ की मनुहारें! इस जनपथ पर चलते-चलते दाजी के समय के ताँगे-इक्के, हवेलियाँ, दुकानें सब बिकती गयी। और रह गयी सिर्फ एक यह छबीली घाटी की हवेली। हम बहनों का नाम भी बडी स्कूल से कटवा कर मोहल्ले की एक छोटी-सी पाठशाला में लिखवा दिया गया था। घर से प्रायः अनुपस्थित रहने वाले पिता का फर्ज कुछ हद तक माँ ने ही अदा किया। मुझे याद पडते हैं वे दिन जब स्कूल में फीस देने का वक्त होता, तो इतना डर लगता कि क्या होगा। माँ को दो-तीन दिन पहले बोलना पडता था और अक्सर माँ कभी अपना कोई गहना बेचकर या गिरवी रख कर हमारी फीस अदा करती। मोदी की दुकान का बढता जाता बिल हम बहनों को फिर उसकी दुकान तक जाने से डराता रहता। इसी तरह से चलते संसार में एक दिन पिताजी का अवतरण होता, थोडे दिनों के लिए फिर जिन्दगी कुछ लाईन पर आती, दाना आया घर के अन्दर बहुत दिनों के बाद की नागार्जुन की पंक्ति को चरितार्थ करते हुए थोडे दिन चैन के बीतते और फिर शुरू हो जाता अभाव का एक और वृत्त। इस अभाव के संसार की माँगों से उत्पन्न खीज और बेचैनी ने ही शायद पिता से लिखायी होगी बिना नाप के सीए तकाजे सारा घर पहनाए की तरह की पंक्ति।
बहरहाल, मजे की बात यह है कि ऊपरी तौर पर हमने अपने पिता को जैसा देखा उसमें चाहे पैसा हो या न हो, दूसरों के लिए उनकी दरियादिली में कभी कोई कमी नहीं दिखाई दी। वो वाकया मुझे कभी नहीं भूलता जब पिता की जेब में आखिरी 50 रुपए थे और एक रिश्तेदार घर में आ टफ, पता नहीं उनकी जरूरत शायद हमसे बडी रही हो, पिताजी ने माँ की इस बात को नजरअंदाज करके कि घर में तेल नहीं है खाना कैसे बनेगा, रुपए उस आदमी के हवाले कर दिए। पिताजी की इस आदत से पूरे परिवार को कई बार काफी तकलीफें उठानी पडती थी। कुछ लोग थे जो इस बात से बेखबर होकर कि हवेली पूरी तरह खोखली हो चुकी है, अपनी जरूरतों के चलते प्रायः उनसे पैसा माँगने आते थे।
हालाँकि यह सच है कि पिताजी का घर सिर्फ बीकानेर की हवेली में ही नहीं था। इस बीच विभिन्न शहरों के परिवारों में उनके अस्थाने बन गए थे, जहाँ वे महीनों टिके रहते, और वहाँ उनके लिए प्यार, सम्मान सब था। मुम्बई और कोलकाता के घर ने उनका परिचय आधुनिक महानगरीय जीवन से कराया, जीवन के लिए संघर्ष के कई नए रूपों से उनका साक्षात्कार हुआ, सीटियों से साँस भरकर भागते बाजार मिलों,दफ्तरों को रात के मुर्दे, मैंने नहीं कल ने बुलाया है, क्षण-क्षण की छैनी से काटो तो जानूं जैसी कई सशक्त रचनाएँ यहीं लिखी गयी। आज जब गौर करती हूँ, तो मुम्बई-कोलकाता प्रवास के उस काल को पिता की रचनाशीलता का सबसे स्वर्णिम काल कहा जा सकता है। कोलकाता के परिवार ने तो उन्हें सिर्फ प्यार और सम्मान ही नहीं दिया बल्कि जीने का एक नया दर्शन भी दिया। रमन माहेश्वरी के रूप में उन्हें ऐसे दोस्त मिल गए थे कि कल का रूमानी प्रेम और भावनाओं में डूबा रहने वाला कवि माक्र्सवादी दर्शन से लैस होकर एक सशक्त जन-कवि के रूप में सामने आया और हिंदी के जन-गीतों को एक नई ऊँचाई और सौन्दर्य प्रदान किया।
कोलकाता के परिवार में मुझे अपने एक नए पिता का रूप नजर आया। पहली बार जब घूमने के लिए ही कोलकाता इस परिवार में आयी तो यह देखकर दंग रह गयी कि मेरे पिता के सभी पुराने-नए गीत इस परिवार के लोग सामूहिक रूप में गाते थे। अपने पिता का यह रूप अपने घर में मैं सिर्फ कवि गोष्ठियों में ही देखती थी। घर लौटकर सारे गीत मैंने याद कर डाले यह सोचकर कि मुझे तो अपने पिता के गीत-कविताएँ याद होने ही चाहिए। कोलकाता के इस परिवार ने सिर्फ पिता को नहीं, हमारे पूरे परिवार को ही जैसे एक नया जीवन दिया था। शायद इस भरे-पूरे परिवार ने ही उन्हें एक पति, एक पिता का भी बोध दिया। बाद में, मेरी शादी के साथ इस परिवार से हमारा हमेशा का एक अटूट रिश्ता कायम हो गया।
माक्र्सवाद और पार्टी से पिताजी के सम्पर्क के साथ ही हमारे घर में राजनीतिक हलचलों का एक नया रूप सामने आया। 72-73 का जमाना था। बीकानेर में विश्वविद्यालय की स्थापना का आन्दोलन एसएफआई के नेतृत्व में शुरू हुआ था। हम भी कालेज में दाखिल हो चुके थे। इस आन्दोलन ने ज्यों-ज्यों तूल पकडना शुरू किया, सरकारी दमन भी उसी अनुपात में बढने लगा और उसके साथ ही हमारा घर भारी उत्तेजना का केन्द्र बन गया। पिताजी ने ही हमें इस आंदोलन में शामिल होने, एसएफआई से जुडने के लिए प्रेरित किया और उसी समय मोहता चौक पर छात्राओं की एक सभा को सम्बोधित करने का रोमांचक अनुभव मैं कभी भुला नहीं सकती। किसी भी आम सभा के मंच से राजनीतिक भाषण देने का वह मेरा पहला अनुभव था।
हम दोनों बहनों की शादी ने पिता को अन्तिम हवेली भी बेच देने का मौका दे दिया, और इस प्रकार हमारे परिवार की शान-शौकत का यह आखिरी नकाब भी उतर गया। हवेली के बगल में ही एक छोटे-से मकान में हमने डेरा डाला। हवेली से एक छोटे-से घर तक के इस सफर में थोडे से काल के लिए किराए के मकान में भी रहना पडा। पिता के सुख-दुख की साथी वह वातायन पत्रिका पहले ही बन्द हो गयी थी जिसके मंच से उन्होंने इस छोटे से शहर को साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र बना दिया था। इसी के चलते बाहर से छोटे-बडे साहित्यकारों का आगमन होता ही रहता था। अज्ञेय को बचपन में पहली बार बीकानेर में अपने घर में ही देखा था। उनकी वह शान्त, सुन्दर गरिमामय छवि आज भी आंखों में बसी हुई है। देखते ही देखते उनके सभी दोस्त इधर-उधर बिखर गए। किसी तरह एक छोटे-से प्रेस के सहारे सरल काकाजी और हमारा घर चलता रहा। संकल्पों के नेजों को और तराशो, और तराशो का ओज अब चुकने लगा था, और 75 के बाद का सन्नाटा, आज सोचती हूँ, तो शायद पिता के जीवन का वह सबसे एकाकी और कष्टभरा काल था। शादी के उपरांत हम दोनों बहनें छबीली घाटी छोड चुकी थी। तभी काट गए काफिले रास्ता, यह ठहराव न जी पाएँगे, टूटी गजल न गा पाएँगे, सन्नाटा ना स्वरा पाएँगे और इस तरह की उनकी रचना यात्रा का एक और दौर शुरू होता है।
कुछ जीवन की अपनी मजबूरियों ने और कुछ जीवन के हर रूप को देखने-समझने की चाहत ने इसी बीच उनका रिश्ता राजस्थान के गाँवों से जोड दिया, जहाँ वे साक्षरता अभियान में अपनी रचनात्मक शक्ति के साथ जुड गए। गाँवों की इस रेतीली धरती ने एक बार फिर उन्हें नया जीवन दिया, इस रेत में उनका मन ऐसा नहाया कि अब इन्हीं सूने धोरों पर आसन बिछा कर रम गए। रेत में नहाया है मन जैसी मरुभूमि के सौंदर्य और उसके जीवन संघर्ष के सतरंगी रूप को उभारने वाली अद्भूत रचनाएँ हमारे सामने आती हैं। मुझे याद आते हैं जनवादी लेखक संघ के वे सम्मेलन जब पिताजी से बार-बार ए माँग की जाती थी कि वे इन रचनाओं को सुनाएँ। इसी दौर में राजस्थानी भाषा में लिखे गए उनके हूणिए भी राजस्थान में लोगों की जुबान पर चढ गए थे। मिट्टी से इस जुडाव के साथ ही उनका रचनाकार वेदों और उपनिषदों की तरह भी जाता है। कुछ मोती वहाँ से भी तलाशने की कोशिश करता है। मौसम ने रचते रहने की ऐसी हमें पढाई पाटी के संकल्प के साथ पिताजी की लेखनी सदा चलती रही।
राजनीति की धूल फाँकने वाली उनकी बेटी एक दिन कवि बन जाएगी, शायद ही उन्होंने कभी सोचा था। हाँ, थोडा सा सुकून जरूर है कि उनके सामने ही कुछ कविताएँ लिखी थीं जिन्हें देखकर पिता का चेहरा खिल गया था। और कोलकाता में उनके रहते हुए एक अजीब संयोग यह भी हुआ कि एक दिन पहले मैंने बुद्ध पर कविता लिखी थी और दूसरे दिन ठीक उसी विषय पर पिता ने ! हम दोनों ने एक-दूसरे को अपनी कविता सुनाई और दोनों जोर से हँस पडे। पिता ने कहा बहुत अच्छी है तुम्हारी कविता और इसी तरह एक दिन रूफवर पर लिखी कविता सुनाई तो यकीन नहीं होता पर हँसते हुए कहा कि यकीन नहीं होता का तुमने बहुत अच्छा प्रयोग किया है।
आज जब कविताओं की कई पुस्तकें आ चुकी हैं,लेकिन पिता नहीं है। हालाँकि हर समय उनकी उपस्थिति को महसूस करती हूँ। कभी लगा ही नहीं कि वे नहीं है।
साहित्य संसार को उनकी यह सौगात ही उनकी सन्तानें अपने पिता की धरोहर समझ कर सम्भाल कर रखेंगी । अपने सागर जैसे पिता के लिए ए कविता :
सागर जैसे पिता !
सागर जैसे पिता
अक्सर याद आते हो तुम
अक्सर आँखे भर-भर आती हैं
कानों में सतत गूँजती रहती है
दर्द में डूबी
तुम्हारी गहरी, बहुत गहरी आवाज

अब तुम्हारे अपनों ने
और कुछ दिया या न दिया
सौ -सौ घावों से रिसती
पीडाओं की अकूत सौगात तो दी ही थी

और तीखे -तीखे चुभते
इन अपनों से तुमने
जब बगावत करनी चाही
उनके बौनेपन, उनके कुबडे अहम
की दुखती यादों पर
फेंकनी चाही विस्मृतियों की धूल

तो बना लिया खुद को सागर
खोल दिए अपने सारे दरवाजे
बाँध लाए सारी आवारा पीडाओं को
घर के अन्दर

मिटा दिए सारे भेद ही
अपनों परायों के
जैसे मिल जाते हैं दूध और पानी
एकाकार हो जाते हैं सूरज और धूप

धरोहर-सी विश्वकर्माओं की
उस पुरानी, दीमक लगी जर्जर हवेली में
अब चमगादड नहीं
तुम जैसे ही तुम्हारे हमदम
बे-खौफ, बे -रोक -टोक
अनवरत आते ही रहते थे

सागर जैसे पिता !
कैसे बताऊँ तुम्हें कि वो बडी हवेली
अब तुम्हारे जाए हमजायों का घर नहीं
बन गयी थी एक बडी सराय
और तुम भी कहाँ रह गए थे सिर्फ हमारे

उस समय जब
नहीं जन्मा था हमारा कोई भाई
तब कितनी ही पीडा-सी सगी बहनें
बाँधती थी राखी तुम्हें
राखियों से भरे अनगिनत लिफाफे
खोलते -खोलते थक जाते थे हम

तुम तो संबंधों का
महासागर थे
कभी किसी के पिता,
चाचा,दादा, बडे भाई, छोटे भाई
तो किसी के अजीज मित्र
जिसको भाता जो रूप
उसी रूप में ढल जाते थे तुम

और देखते ही देखते
तुम भी बन गए आौलिया
साहित्य के औलिया
रेत के महासागर में
आसन बिछाए हुए कविवर !
कितनी ही छोटी -बडी नदियाँ
गिरती रही तुम्हारी गोद में

खुले हुए वातायन से
चारों ओर से आती ही रहती थीं हवाएँ
निरन्तर गूँजती रहती तुम्हारी आवाज
जो पहले अपना घर फूँके
फिर धर -मजला चलना चाहे
उनको जनपथ की मनुहारें

कभी कोलकाता, कभी मुम्बई
कभी जयपुर तो कभी कहीं
जाने कहाँ -कहाँ अलख उठाए फिरते रहते

आखरि बडी हवेली भी
चढ गयी जनपथ की भेंट
अक्षर -अक्षर जोड कर बना था जो काफिला
अब लगा था दरकने
टूट कर बनने लगे थे नए रास्ते
तुम गाते ही रह गए
काट गए काफिले रास्ता
यह ठहराव न जी पाएँगे
फिर भी रहे समझाते खुद को
उडना मन मत हार सुपर्णें

थकी जरूर थी पर हारी नहीं थी
तुम्हारी जिजीविषा
वह तो अब भी थी
लहरों की तरह प्रवहमान
टकराती ही रही पीर के मौनी किनारों से

हदें नहीं होती समंदर की
हदें नहीं होती जनपथ की
वह तो बस लाँघे ही लाँघे
ज्यों -ज्यों तपा जितना तपा
सोना तभी कुंदन बना

जलाए रखा तुमने इसी तरह
अपने ईमान का विश्वास
अक्षय ज्योति की तरह जलते ही रहे तुम
राह दिखाते ही रहे

देखो ! आज उसी जनपथ ने
बडे मान से उठा लिया है
तुम्हें अपने कंधों पर
गा रहा है तुम्हारी ही धुन
रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है
तेरी यही सडक मेरी भी
आ ! फिर दोनों साथ चलें हम ।

दिन कवि बन जाएगी, शायद ही उन्होंने कभी सोचा था। हाँ थोडा सा सुकून जरूर है कि उनके सामने ही कुछ कविताएँ लिखी थीं जिन्हें देखकर पिता का चेहरा खिल गया था। और कोलकाता में उनके रहते हुए एक अजीब संयोग यह भी हुआ कि एक दिन पहले मैंने बुद्ध पर कविता लिखी थी और दूसरे दिन ठीक उसी विषय पर पिता ने ! हम दोनों ने एक-दूसरे को अपनी कविता सुनाई और दोनों जोर से हँस पडे। पिता ने कहा बहुत अच्छी है तुम्हारी कविता।और इसी तरह एक दिन रूपकवंर पर लिखी कविता सुनाई तो ‘यकीन नहीं होता’ पर हँसते हुए कहा कि यकीन नहीं होता का तुमने बहुत अच्छा प्रयोग किया है।
आज जब कविताओं की कई पुस्तकें आ चुकी हैं,लेकिन पिता नहीं है। हालाँकि हर समय उनकी उपस्थिति को महसूस करती हूँ। कभी लगा ही नहीं कि वे नहीं है।

सम्पर्क : सीएफ, 204, साल्ट लेक, कोलकाता- ७०००६४