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ममता शर्मा अंचल की कविताएँ

ममता शर्मा अंचल
जैसे गीली लकडी सुलगे
मेरा एकाकीपन,
सुधियों में तूफान संजोए,
धीरे-धीरे सुलगता रहा,
जैसे गीली लकडी सुलगे।
मैने अपने कई सलोने? सपने,
मरुथल की रेतीली माटी में,
जा कर बो दिए।
मन दौडता रहा वेग से,
अनजानी राहों पर,
साधना चलती रही,
पर सुर नहीं सधे।
कुजोग आते-जाते रहे,
अपसगुनों की ढिठाई,
मेरे घर से,
टारे नहीं टरे,
चोटिल अहम सन्निपात ग्रस्त,
मनमारे बैठा रहा।
देवता रूठे ही रहे,
हवन की आहुति पा कर भी,
और मेरी सारी आस्तिकता,
मुझे झूठा सिद्ध कर गई,
मेरे घर में ही मेरे समक्ष।
धूप डसती रही,
मेरे आस-पास की छाया को,
डर गई बौराई अमराई,
मेरे आहत प्राण को,
मधुमास ने नहीं उपचारा,
पल-पल सहेज कर रखी,
अपनी सारी पीडाओं को,
अपने गीत के मुखडों में,
जतन से लिखता रहा,
फिर भी मेरा रुदन,
नहीं छलका मेरी पलकों पर।
इस अभिशप्त जीवन के पक्ष में,
सारे मिले आशीर्वाद,
निःप्रभावी रहे आए.....

सिर्फ आदमी

लम्बी उदासी को
खिन्न मन कैसे सम्हाले
किस तरह सहेजे
धुँधली दृष्टि से धुँधले पल।
जिन्दगी धुँधले पलों पर
धुंधले रंग चढाने को विवश है।
हर मोर्चे पर हारी आशा
विधवा विलाप कर रही
अपनी पराजयों को
अपने मौन से और
घायल हाथों से
कैसे सहलाएँ कब तक।
इस आत्मा की धूसर
धूल भरी राह से
बगैर अनुमति तमाम अर्थियाँ
गुजर जाती हैं स्मसान की ओर।
एक गरीब आदमी
बिना जर जमीन के
बिना घर बार के
कहाँ- कहाँ भटकता फिरे
सुबह से शाम तक
थका तन-मन और भूख लिए।
अँधेरी रात में निढाल
किसी वीरान पूजाघर की
सीढियों पर लुढक जाता है
अपनी थकान भूख प्यास लिए।
उसकी जर्जर सांसें
उसे जिन्दा रखती हैं
जब कि उसे मृत्यु की आकांक्षा
सुकून देती है।
मगर उसके पास चलकर
कोई भगवान कोई देवता
नहीं आता है
वह थका भूखा
ऐसे ही मर जाता है
मोक्ष की कामना मन में लिए
एक आदमी की मौत....

अपना सा लगता



बस वही एक है जो अपना सा लगता है
बाकी रिश्तों का रस सपना सा लगता है

एकाग्र न होता और कहीं मन दुनिया में
बस बेमन से माला जपना सा लगता है

तप करें तपस्वी कहे भले दुनिया हमको
तप उस बिन केवल तन तपना सा लगता है

हों भांति भांति के व्यंजन चाहे थाली में
रुचि भोग बिना उसके चखना सा लगता है

मेहनत करलें चाहे अच्छा परिणाम मिले
फिर भी मन को केवल खपना सा लगता है

दो घूँट मिले यदि जल उसके कर से अंचल
कर पात्र हमें पूरा नपना सा लगता है....


ममता शर्मा अंचल
अलवर (राजस्थान)