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नवीन दवे मनावत की कविताएँ

नवीन दवे मनावत
घृणा और प्रेम..

मैं नहीं समझ सका
कि प्रेम की भी एक विडम्बना है..
और...बैठ गया अनिश्चित-सा होकर
टूटे और दरारी खण्डहरों पर
सोचने लगा कि कैसी होगी
निश्चल प्रेम की परिभाषा!
गढने लगा घृणा के शब्द.. यत्र-तत्र
निष्कर्षतः मुझे प्रेम विडंबित लगा
और....घृणा निश्छल

-

भीड की तरह

जब हम एकवचन होते हैं
भीड की तरह रहते हैं
आतुर कि द्विवचन क्यों न हो जाए
तब बढता है मोह
धीरे- धीरे बहुवचन होने का
बहुवचन होने का
मतलब मृगतृष्णा में जमा होने का

जब समष्टि में वचनबद्धता का मोह बढ जाता है
तब-तब होता रहेगा लालायित आदमी
और हो जाता है एकाकी या एकवचन

उस एकवचन होते आदमी पर करता है
कठोर प्रहार बहुवचन समुदाय
कि एक होना गुनाह की शर्त है
और द्विवचन समझौता

आज हर वर्ग एकवचन होने की कगार पर है
रखता है अलगाव बहुवचन के साथ
जो भयानक है द्विवचन के लिए
हम वास्तविक धरातल पर केवल
भीड की तरह बहुवचन होते जा रहे हैं
पर यथार्थ में सब एकवचन है

राहत दे सुखभरी !

बारिश हो रही है खूब !
घर में, गाँव में,
बाहर, भीतर तक!
कही भर गये ताल
तो कही है सुखें
जैसे वियोगी की आँखें
जो नीरस रो रही है !

ताल हँस रहे हैं
कह रहे हैं बरसो ,खूब बरसो
पर झूमकर नहीं
चूमकर एक संवेदना
एक मर्म

बारिश हो रही है
मेरे भीतर
पर एक बूँद को तरस रहा हूँ
जो राहत दे सुखभरी
यही चरित्र है.....


ओस की बूँद सौन्दर्य देती है
जब तक, तब तक
वह टिकीं है उस पर
जिसमें छाया रहता है सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड

एक क्षणिक
आभास देती है वह बूँद
सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमय प्रकृति का
वस्तुगतः बनने तक ।

सूरज स्वयं आभाषित होना चाहता है
उस बूँद में
प्रकृत्योचित बनने को
विलीन होने को
और..
सडक पर घना कोहरा
मिटा देता है सूरज की आभा को एक क्षण में
जो बनाया गया है
मानव द्वारा....

हमारा जीवन बूँद वृत्त ओस बने
शायद यही चरित्र है.....

सम्पर्क - कैलाश नगर साँचोर,
जालोर, राजस्थान
मो. 9414792013