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रति सक्सेना की कविताएँ

रति सक्सेना
युद्ध के लिए (उक्रेन से)

1

तलवार इसके हाथ में है

ढाल उसके हाथ में है

एक ने तलवार चलाई

दूसरे ने ढाल अडाई



बीच में

कट गया

एक बच्चे के पिता का हाथ

दूसरे की माँ की गर्दन

तीसरे की दादी का घर

चौथे के चाचा का सिर

पाँचवा,

छटा

सांतवाँ

आँठवाँ

.....



.....



तलवार सिर्फ एक के हाथ में है



2

सुबह -सवेरे माँ ने कडी रोटी

दूध में भिगो कर सामने रख दी

मीठे बिस्कुट का एक टुकडा भी



थमा दी प्लास्टिक की एक थैली

जिसमें रखे थे कुछ कपडे



दाईं हथेली में पकडाया कागज का पुर्जा

माँ के हाथ के पसीने की गन्ध वाला

बडे हो गए हो

तुम्हें बैठना था रेलगाडी में

जो कभी रुकती न हो



इतना भर कह, माँ मुडी

और घर के दरवाजे के भीतर हो गई



नहीं देख पाई उसे भीड में गुम होते हुए

भीतर इन्तजार में थीं, दो बूढी आँखें



दस साल के कदम

रेलगाडी के रोमांच में



चलते रहे, चलते रहे

पैदल, रेल गाडी से, अनजानी यात्रा में

सालों लग जाएँगे अंजाम तक पहुँचने में



(एक दस वर्षीय बच्चे को उसकी माँ ने अकेले पोलेण्ड भेज दिया, जिससे उसकी जान बच सके, माँ घर नहीं छोड पाई, क्यों कि घर में बूढे माता-पिता चल फिर नहीं पाते थे, यह खबर देखते हुए)



3

वह मोजे में आखिरी फन्दे डाल रही है

अपने होने वाले पोते के लिए



तभी गिरता है आग का एक गोला



प्रसूति घर पर



कैमरे का लैंस



माँस के लौथडों में साबुत दिखाता है



केवल एक नन्हा-सा पाँव



मोजे के बिना



(उक्रेन की राजधानी में प्रसूतिघर अस्पताल पर बम गिराने की घटना देख कर)

4

मेरे कूल्हों में दर्द है, इतना कि मैं

दरवाजे तक नहीं जा सकती

भीड मेरी खिडकी के सामने से गुजरती है



सूखे, उदास चेहरे लिए



मैं दीवार से टिकी साइकिल को देखती हूँ

मैं और मेरी साइकिल

उन सब जगहों पर घूम आते हैं

जहाँ मैं तुम्हारे साथ घूमी थी, पिछली बार





खिडकी मुस्कुराने लगती है

दरवाजा खडखडाने लगा है

एक फाइटर जेट ऊपर से गुजरता है

जल्दी मिलेंगे प्रिय!





(वृद्ध उक्रेन छोड नहीं पाए, अनेक अकेले रह गए, यह खबर सुनकर)



**



सम्पर्क - 9/६२४, विजयन्त चेदृकुन्नू, डीसीएनआरए, सी-48, वैलीव्यू गार्डन के पास, मेडिकल कॉलेज, पोस्ट त्रिवेन्द्रम

पिन- ६९५०११

मो. ९४९७०११०५