fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

अँगूठा

अनुकृति उपाध्याय
आपको सुनकर कुछ अजीब लगे, लेकिन किसी व्यक्ति का पूरा जीवन ही एक भद्दी अँगुली के कारण बर्बाद हो सकता है। निराश आँखों वाले आदमी ने मन्द स्वर में कहा।
केवल एक अँगुली के कारण? मैं उसकी अतिशयोक्ति पर अपना अविश्वास छुपा नहीं पाया।
उसने गहरी साँस ली। अँगुली भी नहीं, अँगूठा, वो भी पैर का । मैं कोई झूठ या मनगढंत नहीं कह रहा हूँ, यह एकदम सच्ची बात है, मेरी जानी-देखी। मैं...मेरे एक दोस्त की...
मेरी जिज्ञासा जाग उठी। मुझे लोगों और उनकी कहानियों में हमेशा से दिलचस्पी रही है। मेरी बीवी इसे मेरी कस्बाई आदतों में गिनती है। तुम और तुम्हारी प्लेबियन नोजीनेस। वह मुँह बिदका कर कहती है। वह जो भी कहे, इसी आदत के कारण मेरे पास चित्र-विचित्र कहानियों का खजाना जुट गया है। क्लायंट मीटिंग हो या दोस्तों की दावत, सभी जगह मेरी कहानियाँ आग्रह से सुनी जाती हैं। मुझे लगा आज शायद शक्करखोर को शक्कर मिलने वाली है। मैंने मेज के उस ओर बैठे आदमी को गौर से देखा। वह डोसे के छोटे-छोटे टुकडे सांभर में डुबाकर मुँह में डाल रहा था। माटुंगा का यह रेस्तराँ दक्षिण भारतीय व्यंजनों के लिए प्रसिद्ध था। यह उस किस्म का रेस्तराँ था, जहाँ परोसगारी और सजावट का नहीं स्वाद का महत्त्व था, और सत्तर सालों में मेन्यू में बिलकुल बदलाव न होना गर्व का विषय था। मैं ठीक उस समय रेस्तराँ में दाखलि हुआ था जब दोपहर के खाने की भीड चरम पर थी। यदि मैं दस-पन्द्रह मिनट प्रतीक्षा करता, तो मेजें खाली हो जातीं। ऐसे रेस्तराँ में भोजन लम्बा खिंचने वाला अनुष्ठान नहीं होता, धाईं छूकर आने वाला नेम होता है। लेकिन मैं इंतजार नहीं करना चाहता था, खाने की खुशबू से मेरे नथुने फडक रहे थे। इसी तेल-मसालेदार खाना खाने के लालच में मैं रविवार की दोपहर, शहर के दूसरे छोर से आया था। मैंने पहली खाली कुर्सी खींची और बैठ गया। इस किस्म के रेस्तराँ में मेज के दूसरी ओर बैठे व्यक्ति से पूछने या माफी माँगने वगैरह की औपचारिकताओं की आवश्यकता नहीं होती। जहाँ जगह मिले, बैठ जाओ और जब खा चुके उठ कर चल दो। लेकिन मेज के उस ओर बैठे आदमी ने अपनी निराश आँखों से मुझे इस कदर देखा था कि मुझे सफाई देना जरूरी लगा था। दरअसल मुझे बडी भूख लगी है और दूसरी सभी मेजें भरी हैं।
अच्छा.... माने मेरे लिए तो अच्छा ही है, मैं तो अकेला ही खाता हूँ.... उसने आँखें मेज पर टिका दी और धीमे से दोहराया, हमेशा अकेला...
मैं हँसा था। यह तो नामुमकिन है! बम्बई में कोई हमेशा अकेला खा ही नहीं सकता है, शहर में इतनी जगह ही नहीं कि हर वक्त अकेला हुआ जा सके! उसकी निराश आँखों में कुछ कौंधा था और होंठ बिना आवाज हिले, जैसे उसे अपना कहा किसी और के सुनने योग्य न लगता हो। मैंने अपने भीतर चमकती रविवार की ताजगी का कुछ हिस्सा उसे देना चाहा था। मुझे ही लो, बीवी- बच्चों को डोसा-सांभर और बिना वर्दी वाले बैरे पसन्द नहीं। इस खुशबू और यहाँ की हलचल से उनकी नाक चढ जाती है तो मैंने सोचा आज अकेले ही खाया जाए लेकिन वैसा हुआ कहाँ?
ओह ... आप अकेले खाना चाहते हैं, तो दूसरी मेज खाली होने पर चला जाऊँगा...
नहीं, मेरा यह मतलब नहीं था, मैं तो एक बात कह रहा था!
हमारा खाना आ गया था। हम दोनों ने ही उस रेस्तराँ के सबसे प्रसिद्ध व्यंजन मँगाए थे - कागज-सा पतला, मसाले की सुगंधित परत चढा डोसा, घी में भूने-कुचले आलू और इमली के चटखते स्वाद वाला रसम। निराश आँखों वाले आदमी ने शर्ट की आस्तीनें चुफ से खिसकाई थीं और छोटे कौर तोड रहा था। वह पहले से भी अधिक संकुचित लग रहा था, उसके झुके कंधे और भी गोलाकार, उसकी बाँहें बिलकुल देह से सटी, जैसे उसने मेरी बातों से, बाहर खडी मेरी कीमती गाडी और मोटी तनख्वाह वाली नौकरी भाँप ली हो। मैंने उसे सहज करना चाहा था। यह खाना मेरे लिए विशिष्ट है। मुझे अपने स्टूडेंट डेज की याद दिलाता है जब कभी-कभी बजट को नजरअन्दाज कर दोस्तों के साथ यहाँ खाने चले आते थे, सौ-दो सौ रुपए खर्च कर डालते थे। स्टूडेंट डेज में सौ रुपये बडी बात होती थी! निराश आँखों वाले आदमी ने कनखियों से मुझे देखा और अपना सिर डगमग डुलाया। मुझे खयाल आया कि शायद उसके लिए सौ-दो सौ रुपए अब भी बडी बात हो और अपने पर खीज आई थी। मुझे हर तबके के व्यक्ति से आसानी से बात कर पाने की अपनी काबिलियत पर गर्व है, लेकिन आज एक के बाद एक गलत बात मुँह से निकल रही थी। मैंने बैरे को चटनी लाने का इशारा किया। नारियल और मिर्च की चटनियों की कटोरियाँ मेज पर रखते बैरे के मैले, टूटे नाखूनों वाले हाथों पर मेरी नजर पडी थी। मैंने लक्ष्य किया था कि उसके बाएँ हाथ की छोटी अँगुली के बगल में एक अतिरिक्त अँगुली थी, छोटी-सी असहाय लटकती हुई। वाह लडके, तुम भाग्यशाली हो! हमारे यहाँ छिगुनियों को बडा भाग्यशाली माना जाता है! बैरे ने, वह एक दुबला-पतला, मरियल लडका भर था - बाँस-सी पसलियाँ घिसी शर्ट में टिकीं, और बेंत-सी टाँगे हाफ-पैंट से झाँकतीं - अपने हाथ की ओर गर्व से देखा था। मैंने गाँव में बैद से कहा था इसे काट दो, लडके सब मुझे चिढाते हैं, लेकिन उसने कहा ये बहुत भागवालों को होती है। निराश आँखों वाले आदमी ने कटी पूँछ-सी हिलती अँगुली को देखा था और आँखें फेर ली थीं। तुम शायद इस तरह की बातों को अंधविश्वास मानते हो। मैंने बात की कडी फिर से जोडने के लिए कहा था और जवाब में उसने अँगूठे से ज़ंदगी तबाह होने वाली आश्चर्यजनक बात कही थी।
मेरे मन में नई कहानी सुनने की तीखी गुदगुदाहट हुई। मैंने कुर्सी पीछे सरकाई और पैर फैला लिए। अँगुली, अँगूठों के रूप-रंग की इतनी अहमियत कहाँ कि वे जिंदगी पर असर डाले? मैंने अपना दायाँ हाथ मेज पर फैला दिया। मेरा अँगूठा भी कोई सौंदर्य-प्रतियोगिता जितने लायक नहीं! बचपन में पडोसी के बाग में घुस कर पकते अमरूदों पर पत्थर फेंक रहा था कि रखवाला आ गया। मैं भागा और जल्दबाजी में बाग के दरवाजे में अँगूठा आ गया। मैंने अपना दायाँ अँगूठा बाँएँ हाथ की अँगुलियों से हल्के-से छुआ। शादी के शुरुआती दिनों में मेरी बीवी इसके चपटे, टेढे-मेढेपन को अपनी नाजुक अंगुलियों से अचरज से छूती थी, और लाड से मुझे गुआवा-थीफ कहती थी। वास्तव में मुझे अपने अँगूठे की विरूपता से कोई परेशानी नहीं है। जब भी मेरे अँगूठे पर किसी की नजर अटकती है, मैं अपनी अमरूद-चोरी वाली कहानी सुना देता हूँ। अनेक बार मैंने देखा है कि मेरी कहानी सुन कर, छोटे कस्बों से निकले और बडे शहरों में चमकीले जीवन गढ लेने वाले सफल लोगों की आँखों में तरल झाइयाँ उतर आई है। उन घरों के लिए नॉस्टेल्जिया जाग गया है जिन्हें छोडने के लिए वे कभी उतावले थे। आप कह सकते हैं मेरा चपटा अँगूठा एक स्मृति-पुल है, उस के जरिए लोग पुराने मंजर देख आते हैं। निराश आँखों वाले आदमी ने मेरे अँगूठे को गौर से देखा। हाँ, चोट लगने पर तकलीफ हुई होगी, वह ढीलेढाले स्वर में बोला, लेकिन देखने में इस अँगूठे में कोई खास खराबी नहीं, इसका आकार और रंग एकदम सामान्य है। मैं जिसकी बात कर रहा हूँ वह अँगूठा एकदम अलग तरह का है, बेहद भद्दा और उसके भद्देपन के लिए मेरा दोस्त जिम्मेदार भी नहीं वह तो जन्मजात... वही छिगुनिया लडका स्टील के किनारदार ग्लासों में फिल्टर कॉफी रख गया। चाहे जितना भद्दा हो, पैर का अँगूठा *यादातर तो ढका ही रहता है। उसका किसी के जीवन पर क्या असर हो सकता है? मैंने उसे उकसाया। वह चुपचाप कॉफी में शक्कर की डलियाँ मिलाता रहा, फिर कटोरी में उँडेल कर एक घूँट में पी गया। इस कदर शक्कर ने उसके भीतर की कसैली गाँठों को शायद कुछ मिठाया। उसका चेहरा पहले से कुछ हल्का हुआ। यदि आप सोचें, तो पाएँगे कि हम बहुत से महत्वपूर्ण समयों और स्थानों पर नंगे पैर होते हैं। जन्म, मृत्यु, मंदिरों में, घर के भीतर, बिस्तर में और मेरे मित्र के लिए तो पूरे तौर पर अपना अँगूठा छिपा पाना सम्भव भी नहीं था। उसकी स्थिति तो बहुत *यादा बुरी थी अगर पूरी बात सुनें तब आप जान पाएँगे, भरोसा कर पाएँगे कि अँगूठे से कैसे मेरे दोस्त का जीवन नष्ट हो गया।
तो सुनाओ अगर तुम्हें समय हो। रविवार की दोपहर है और बढिया कॉफी। बस एक किस्से की कमी है!
निराश आँखों वाले आदमी ने रेस्तराँ के खुले द्वार से दिखते रविवार के चहल-पहल भरे बाजार पर नजर डाली। कपडों, बर्तनों और घर के दीगर सामानों की दुकानों में चमकीली साडियाँ पहने और बालों में फूल सजाए औरतों की भीड थी। तह के निशानों वाले धराऊ कपडे पहने, बुढिया के बालों से चिपचिपाए गालों वाले बच्चे जहाँ-तहाँ हुडदंग मचाए थे। मुर्गों-सी छाती निकाले संतुष्ट चेहरों वाले आदमी चटख धूप में चहलकदमी कर रहे थे। उसने गहरी साँस ली और कंधे झुका लिए। समय...तो खैर है लेकिन मेरे दोस्त की कहानी रविवार की दोपहरी को खुशनुमा बनाने जैसी नहीं। उसके जीवन की कहानीजीवन क्या, सही अर्थों में तो उसका कोई जीवन ही नहीं...
यहाँ मैं तुमसे सहमत नहीं। चाहे कितना भी दुःखभरा क्यों न हो, सबका जीवन है, सब अपने जीवन से जुडे रहना चाहते हैं।
सिर्फ आदत के कारण हमें जीने की आदत है, जीते रहना परिचित है मृत्यु जाने हुए का अन्त है मृत्यु अगर मृत्यु से हमारा इतना अपरिचय न हो, यदि हम उसके बारे में सब कुछ जान जाएँ, जैसे कि मरने के बाद अंधेरा होता है या उजाला, चेतना पूरी तरह खत्म हो जाती है कि बिना देह के भी बनी रहती है, हम सब भूल जाते हैं या मेरा कहने का मतलब है कि अगर मृत्यु परिचित हो तो दुनिया के आधे से *यादा लोग मरना चुन लेंगे और जनसंख्या की सारी समस्या सुलझ जाएगी। उसके होंठों पर फेन की सफेद लकीरें खिंच गई थीं। आप सोच कर देखें, जीवन की समस्या का एक ही समाधान है - मृत्यु। अगर हम उससे पहचान कर लें तो सब चुटकियों में सुलझ जाए लेकिन तरह-तरह की, कानून की, धर्म की चालबाजियों से मृत्यु का हव्वा बना दिया गया है आदत और डर के कारण जिए जाना.... उसका चेहरा तमतमा गया, लानत है....
तुम्हें लगता है तुम्हारे दोस्त का जीवन इस कदर बुरा है कि उसे आत्महत्या कर लेनी चाहिए? मैंने भौंहें चढाई।
उसमें हिम्मत कहाँ है.. उसका चेहरा बुझ गया, बिलकुल बढा-चढा कर नहीं कह रहा, यकीन कीजिए, जिस दिन से वह जन्मा लोग उसके मनहूस अँगूठे के कारण उससे घृणा करने लगे, यहाँ तक कि उसकी माँ भी... गर्भ में वह टेढा था, जब ऑपरेशन करके निकाला गया तो बच्चा-नाल उसके विद्रूप अँगूठे में उलझी थी। ऑपरेशन वाली डॉक्टर उस भद्दे अँगूठे को देख कर चिहुँक पडी और नर्स की चीख निकल गई। वह चीख सुनकर बाहर इन्तजार करते मेरे दोस्त के पिता को दिल का दौरा पड गया और वह कई दिन अस्पताल में भर्ती रहा। रिश्तेदारों ने घृणा की उल्टियाँ रोकते हुए बच्चे को चदरे में लपेटा और माँ से उसके पति की बीमारी और बच्चे के पैर, दोनों बातें कईं दिनों तक छिपाए रखी। उसने जेब से रुमाल निकल कर अपना मुँह पोंछा।
अँगूठे को माँ से क्यों छिपाया?
दरअसल मेरी दोस्त की माँ को पैरों से खास लगाव था...
माने फेटिश?
नहीं, नहीं वैसा कुछ नहीं, बस उसे बच्चों के छोटे पैर बेहद खूबसूरत लगते थे। उसने अपने बच्चों के लिए तरह तरह के खूबसूरत मोजे-जूते बिने थे। किसी की हिम्मत नहीं पडी कि उसको बताए...
लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि तुम्हारे दोस्त का अँगूठा ऐसा क्या भद्दा था कि पिता को दिल का दौरा पडे या माँ के प्यार के आडे आए।
वह एक....एक बडे और बेहूदा कीडे के जैसा पक्के रंग का, नली के से आकार का, उस पर चमडी की झूलती परतें...
मैंने कल्पना करनी चाही, किन्तु असफल रहा। हो सकता है उसका अँगूठा किसी बीमारी से ग्रस्त हो। मैंने पिछले दिनों टीवी पर देखा कि एक लडकी की खाल दिनोंदिन पेड की मोटी, खुरदरी छाल में बदलती जा रही है। डाक्टरों का कहना है कि उसे एक असाधारण किस्म की बीमारी है।
पेड हो जाना कोई बीमारी नहीं, वह बुदबुदाया। हम जो समझ नहीं पाते उसे बीमारी मान लेते हैं या भगवान मेरे दोस्त के अँगूठे की बहुत पडताल हुई, बहुत से विशेषज्ञ आए, दर्जनों जाँचें की गईं, बीसियों मलहम दवाएँ दी गई, लेकिन अँगूठा भाग्य सा अबूझ रहा।
खैर किसी किस्म की बीमारी नहीं, यह तो अच्छा ही है।
निराश आँखों वाले आदमी ने फिर लम्बी साँस ली। साँस की गहराई और नाक की सीटी से सरसराहट में वह मेरे योगा-ट्रेनर से बेहतर था! मेरा दोस्त शायद ऐसा नहीं सोचता। बीमारी के इलाज की उम्मीद होती है उसके कुत्सित अँगूठे का आप मानेंगे नहीं, लेकिन जब उसकी माँ ने पहली बार उसका अँगूठा देखा, वह बेहोश हो गई थी। उसे बेमन से जैसे-तैसे दूध पिला कर झूले में डाले रखती थी। वह तो जब रिश्तेदारों ने लानत-मलामत की तो उसकी देखभाल करने लगी। लेकिन उसने दूसरा बच्चा नहीं किया, बल्कि दूसरे बच्चे का खयाल भी उसे बर्दाश्त नहीं था जब मेरे दोस्त के पिता ने समझाने की कोशिश की, तो उसने मेरे दोस्त को झूले से निकाल कर पिता के पास डाल दिया। यह तुम्हारा नामलेवा है, तुम्हारी बहनें तो कह गईं हैं - खाँड के लड्डू, क्या टेढे, क्या मेढे, उसने कहा, तुम्हें दूसरा बच्चा चाहिए, तो दूसरा ब्याह कर लो। उसने मेरे दोस्त के पिता के हाथ झटक दिए और अलग खाट पर सोने लगी।
ओह.... मुझे अफसोस है। फिर तो बचपन से ही उसके भीतर अँगूठे को लेकर ग्रंथि बन गई होगी।
आप ऐसा कह सकते हैं...हालाँकि धुर बचपन में वह अपने अँगूठे के बारे में कुछ नहीं जानता था, अपने को दूसरों की कसौटी पर परखना तो उसने बाद में सीखा, जब घर और बाहर के लोगों ने उसे सिखाया कि तब तो वह सिर्फ इतना जानता था कि कोई भी उसे लाड से बाँहों में नहीं भरता, प्यार से उफन कर चूमता नहीं, न गुदगुदाकर हँसाता ही बस दबी निगाहें और फुसफुसाहटें....
फिर उसने कब जाना? अँगूठे पर अविश्वास के बावजूद मैं उसकी कहानी, उसके थके, धीमे स्वर में बँध गया था।
जब वह स्कूल जाने लगा। अँगूठे के कारण उसके दोनों जूते अलग नाप के थे, दायाँ जूता पंजे पर से काफी चौडा था, उसकी चाल भी कुछ डगमग थी। बच्चे उसे कभी कभी चिढाते थे, लेकिन अच्छा अंग्रेजी मीडियम का स्कूल था, बच्चों को घर में भी तमीज सिखाई जाती थी और कपडे-जूते गंदे होने पर सजा मिलती थी, तो बात बस नकल करने और शू- बॉय कहने तक ही थी। पानी सर तक तब आया जब स्कूल में जिमनास्टिक सिखाया जाने लगा। उन दिनों स्कूलों में जिमनास्टिक सिखाना नया नया फैशनेबल हुआ था। पहली ही क्लास मेरे दोस्त ने सब बच्चों की तरह अपने जूते-मोजे उतार कर कोने में रखे और कतार में खडा हो गया। अचानक सन्नाटा सा छा गया, फिर कुछ लडकियाँ चीखने लगीं, कतार में उसके नजदीक खडे बच्चे दीवार से सट गए। टीचर का मुँह भी उतर गया। मेरे दोस्त को तुरंत जूते मोजे पहन कर क्लास में जा बैठने को कहा गया। उस दिन कोई भी उसके पास नहीं आया। इंटरवल में उसने अकेले खाना खाया और मैदान के एक कोने में अकेला खडा बच्चों को ऊँच-नीच खेलता देखता रहा। घर पर उसकी माँ ने उसे लड्डू खाने को दिया और कामकाज में लग गई। मेरे दोस्त के गालों पर सूखे आँसू के दाग थे लेकिन उन्हें बिना देखे ही उसकी माँ को स्कूल वाली घटना के बारे में पता था। स्कूल की प्रिंसिपल का फोन आया था। अगले दिन उसके माता-पिता स्कूल पहुँचे, प्रिंसिपल को डॉक्टरी जाँचों की रिपोर्ट दिखाकर आश्वासन दिया कि उनके बेटे के अँगूठे की कुरूपता का कारण किसी बीमारी के कीटाणु नहीं। आप खुद देखकर तसल्ली कर लें, उसकी माँ ने कहा और उसे जूते-मोजे उतारने को कहने लगी। लेकिन प्रिंसिपल देख नहीं पाए और एक झलक पर ही मुँह फिरा लिया। मेरे दोस्त को उस स्कूल से निकाल दिया गया...
अँगूठे के कारण स्कूल से निकाल दिया? यह तो कतई गलत बात है। ऐसा नहीं होना चाहिए था।
ठीक कहते हैं। लेकिन अगर हम न्याय-अन्याय के मूलभूत प्रश्न पर विचार करें तो मेरे दोस्त का अँगूठा ही वैसा क्यों होना चाहिए थे? ज़ाहिर है यह प्रश्न न मेरे लिए था, ना इसका कोई उत्तर ही हो सकता था। मैंने और कॉफी मँगाई। मेरे दोस्त के माता-पिता ने सब तरफ जोर मारा और आखरि में उसे सरकारी स्कूल में दाखलि करा दिया। सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल ने एक नजर अँगूठे पर डाली और कहा कि ये घिनौना अँगूठा क्या अगर इसके चार सिर भी होते तब भी दाखलिा देने से मना नहीं कर सकता, सरकारी नियम हैं... उसने कॉफी के ग्लास में नजर डुबो दी, सिर्फ प्रिंसिपल ने देखा था, लेकिन सब को उसके अँगूठे के बारे में पता था उस अभिशप्त अँगूठे की मनहूस छायाबिना जुर्म सजायाफ्ता बच्चे उसके बेडौल जूते वाले पैर को जानकर कुचल देते थे और खेल के मैदान में उस पर गलीज कीचड और कीडे फेंकते थे वह जान गया कि अँगूठे को छुपाने की कोशिश व्यर्थ है, एकमात्र उपाय है खुद को छुपाना क्योंकि वह अपने अँगूठे के अलावा कुछ नहीं है जब तक वह सामने रहेगा उसका विद्रूप अँगूठा छुपा होने पर भी दिखेगा....
छुपना? छुपना माने?
माने नजर न आना, बिलकुल अदृश्य हो जाना, क्लास के पिछले कोने में, खेल के समय लाइब्रेरी कहलाने वाले बिना खिडकी के कमरे में, वह छुपने में इतना सफल हुआ कि उसके सहपाठी उसके बारे में बिलकुल भूल गए। कभी-कभार जब वे आपस में उसके अँगूठे की बात करते तो ऐसा लगता मानो वे कोई सुनी-सुनाई बात कर रहे हों, मानो भद्दे अँगूठे वाला लडका सालों पहले स्कूल में पढता हो और उन्होंने उसे कभी नहीं देखा हो...
ऐसे में तुम्हारा दोस्त पढ लिख तो क्या पाया होगा।
पढ पाया। पढने में तो कोई अडचन ही नहीं थी। सारा दिन अकेले पढता नहीं तो और क्या करता। कुछ खास प्रतिभा नहीं लेकिन याददाश्त उसकी अच्छी थी, इसलिए अच्छे नम्बर आते थे, एक वजीफा भी मिला, अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिल भी....
चलो उसे अँगूठे का कुछ तो फायदा हुआ।
आप चाहें तो ऐसा सोच सकते है...
तो तुम ऐसा नहीं सोचते?
निराश आँखों वाले आदमी ने दबी दृष्टि डाली। आफ-मेरे सोचने से क्या फर्क पडता है? मेरा दोस्त निश्चित रूप से ऐसा नहीं सोचता। स्कूल के अकेले नरक के बाद कॉलेज के रौरव में जा पडा... बहुत दिनों तक उसका अँगूठा छिपा नहीं रहा, हालाँकि उसने कोशिश जरूर की कि मगर हॉस्टल में चार लडके एक कमरे में रहते थे, छुपना असम्भव था रैगिंग के दौरान उसके अँगूठे की नुमाइश हुई, लडकों ने जुगुप्सा भरे मुँह बनाए, लडकियों ने कै कर दी, उसे एक निहायत बेहूदे नाम से पुकारा जाने लगा।
उसका एक भी दोस्त नहीं बना? कोई ऐसा नहीं जिससे वह अपनी बात बाँट सके?
एकाध थे... लेकिन अकेलापन विचित्र होता है, जब दो अकेलेपन परस्पर छूते हैं, तो घटते नहीं, कई गुना बढ जाते हैं...यह शायद उसका सबसे कठिन समय था। दूसरों से छुपने की कोई जगह न थी। दिन-रात अँगूठे की गलाजत उस पर छाई रहती। इसी दौरान उसे वह भयावह सपना आने लगा जिसने फिर कभी उसका पीछा नहीं छोडा। ..
कैसा सपना?
सपने में उसे लगता था कि उसकी अँगुलियों ने उसके सारे शरीर को लील लिया है... वह महज एक अँगूठे में तब्दील हो गया है, घिनौना, भद्दा अँगूठा... वह हर रात अपनी ही उबकाईयों से जाग पडता... उसने अपना सिर हल्के हल्के झटका।
कॉलेज के बाद उसने क्या किया? नौकरी वगैरह?
हाँ, महानगर की म्युनिसिपैलिटी में। नौकरी के शुरुआती दिन उसके पूरे जीवन का सबसे अच्छा काल था। महानगर की अफरा तफरी में किसी को कहाँ फुर्सत कि उसके अँगूठे पर ध्यान दे... अच्छा समय... सरकारी ओहदा था, लोग हाथ बाँधकर, आँख झुकाकर बात करते थे, और काम उसकी पसन्द का था - शहर की विकृतियाँ, सीवेज, लैंडफिल, इंडस्ट्रियल एफ्लुएंट, इन सबका नियमन। गंदे-गलीज को साफ कर सुन्दर-स्वरूप करना। उसे काम में सफलता मिली, कुछ ठेकेदारों से दुश्मनी हो गई, कुछ नागरिक मण्डलियों ने उसका सम्मान किया। अपने इलाके में उसका कुछ नाम हुआ। उसे पहली बार लगने लगा की खुलकर साँस ली जा सकती है।उसके माँ-बाप ने उसके लिए आधे मन से ही सही रिश्ता ढूँढना शुरू किया। वह उत्सुकता से उनकी चिट्ठियाँ पढता और उनके भेजे फोटो देखता। पेईंग गेस्ट वाला कमर छोडकर एक छोटा घर लिया। लेकिन अचानक जाने कैसे लोगों को उसके अँगूठे की बाबत पता चल गया। शायद कोई कॉलेज का सहपाठी या घर साफ करने वाली बाई... जो कह सोचता था कि पीछे छोड आया है, वही सब फिर से शुरू हो गया ... टेढी नजरे, कानाफूसी, दबी हँसी लोग दफ्तर में, मीटिंग में या साइट पर उससे आँखें चुराते और दबी नजरों से उसके जूतों की ओर देखते... कुछ शुभचिन्तक तरह-तरह के इलाज सुझाने लगे- जडी-बूटी, टोने-टोटके, झाडा -ओझा... बस, यह आखिरी घात था, मेरे दोस्त ने इसके बाद हथियार डाल दिए।
हथियार डाल दिए माने?
माने कुरूपता से हार मान ली, समर्पण कर दिया। जीवन में किसी भी तरह की संतुष्टि या सार्थकता की उम्मीद छोड दी। औरों की तरह फाइलें इधर से उधर करने लगा और चिट्ठियों के साथ आने वाली फोटो बिना देखे कूडेदान में डालने लगा....
मैंने घडी देखी और मेज पर अँगुलियाँ ठकठका बिल मंगाया। एक बात बताओ, तुम्हारे दोस्त ने प्लास्टिक सर्जरी के बारे में नहीं सोचा? डॉक्टर आजकल लोगों के नए चेहरे लगा देते हैं, यह तो एक मामूली अँगूठा है। चाहो तो में तुम्हें अच्छे डॉक्टर का रेफरेंस दे सकता हूँ।
निराश आँखों वाले आदमी ने मेरी ओर देखा, प्लास्टिक सर्जरी से क्या अंतर पडता? क्या मेरा दोस्त भूल जाता कि ऐसी कुरूपता उसका हिस्सा थी या उसके माँ-बाप ही भूल जाते और उसे बाँहों में लेकर प्यार करते? उसके दोस्त बन जाते, शादी होने पर उसकी बीवी उसके भद्दे अँगूठे के किस्सों से शर्मिंदा नहीं होती...? वह उठ खडा हुआ। अनचाहे ही मेरी नजर उसके जूतों की ओर खिंच गई। उसने गहरी साँस ली। कुरूपता का दाग कभी नहीं मिटता, वह चिरंतन है, जीवन पर नश्वरता के कलंक सा...

सम्पर्क - 43, भूमितल ब्लॉक 4, हिल पार्क, ऐलेग्जैंडर ग्राहम,
बैल मार्ग, मालाबार हिल-मुम्बई-400006
email Aunkritiupadhyay@gmail.com