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यादों की गलियों में : आईआईएएस

मीनू अग्रवाल
कार्यस्थल हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा होते हैं। प्रायः इस तथ्य पर हमारा ध्यान जा ही नहीं पाता कि कार्यस्थल पर हमारे जीवन का एक तिहाई है। यह भी गौर करने की बात है कि कार्यस्थल पर हमारा अधिकांश समय जागते हुए बीतता है। घर तो हम फिर भी सो जाते हैं, पर कार्यस्थल पर अपवाद को छोडकर सोना सम्भव नहीं हो पाता। यानी हमारे जागने के सर्वाधिक समय का भी कार्यस्थल पर ही व्यतीत होता है। अतः यह आवश्यक है कि वहाँ का हमारा समय पर्याप्त आनन्द में बीते और हम जीवन को पूरे मनोयोग से जीते हुए उसकी हर गतिविधि में शामिल हों। यह और अधिक अच्छे से तब संभव हो पाता है कि जब हमारा कार्यस्थ्ल आई.आई. ए. एस जैसा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और शैक्षिक चरित्र का हो। मेरा अपना निजी अनुभव यह बताता है कि हमारा कार्यस्थल हमारे व्यक्तित्व को रूपाकार देता है, बशर्ते हम उसके प्रति जागरूक और सहज हों।
भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में कार्य करते हुए मेरे लगभग 29 वर्ष के कार्यकाल के दौरान मेरा कईं मनीषियों के साथ सम्पर्क हुआ, जो अपने-अपने क्षेत्र की महान हस्तियाँ तो थीं हीं, साथ ही साथ बेहतरीन इंसान भी थे। अपनी यादों की गलियों में घूमती कुछ ऐसी स्मृतियाँ को आफ साथ साझा कर रही हूँ कि जिन्होंने मेरे व्यक्तित्व एवं जीवन को सम्पन्न किया।
1994 में श्री भीष्म साहनीजी संस्थान में अध्येता थे। जितने बडे लेखक उतने बडे इंसान । तमस ने उन्हें विश्वविख्यात कर दिया था । मैं जब भी उनकी पत्नी श्रीमती शीलाजी की स्वास्थ्य जाँच के लिए उनके निवास स्थान पर जाती, भीष्मजी स्वय अपने हाथों से चाय बनाकर मेरे लिए लाते। जिस व्यक्ति से मिलने के लिए लोग लालायित रहते थे, वह व्यक्ति स्वयं अपने हाथों से चाय बनाकर लाए, मन को आह्लादित करने वाला अनुभव था। जब मेरे घर पर बेटे का जन्म हुआ, तो दोनों पति पत्नी घर पर भी उसे आशीर्वाद देने के लिए आए।
उन्हीं दिनों हमारे चेयरमैन थे श्री गोपालकृष्णन जो की भारत के दूसरे राष्ट्रपति श्री राधाकृष्णन के बेटे थे। श्री राधाकृष्णन ने ही राष्ट्रपति निवास को भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान बनाने का फैसला लिया था। एक बार श्री गोपालकृष्णन मीटिंग के सिलसिले में संस्थान में आए हुए थे, उन्हे ब्लड प्रैशर चेक करवाना था। जब मैंने उनके कमरे में मशीन मँगवाकर चेक करने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि वे डिस्पेन्सरी में आकर ही करवाएँगे, और उन्होंने वैसा ही किया तथा डिस्पेन्सरी के स्टूल पर बैठ कर ही ब्लड प्रैशर चेक करवाया।
इसी तरह प्रसिद्ध साहित्यकार व लेखक श्री निर्मल वर्मा एक संगोष्ठी में संस्थान में आए हुए थे। दोपहर में उन्हे कुछ तबीयत खराब लगने लगी। मुझे बुलाया गया। वह दोपहर के भोजन अवकाश का समय था। वर्माजी ने तुरन्त मुझसे कहा कि आप पहले भोजन कर लीजिए उसके बाद ही मैं डिस्पेन्सरी में आकर दवा लूँगा। और उन्होंने वैसा ही किया।
एक बार पद्मविभूषण प्रसिद् वैज्ञानिक प्रोफेसर राजारमन्ना संस्थान में अपने बेटे के साथ आए। जब में उनके बेटे की तबीयत खराब होने पर मैं उसे देखने गयी, तो उन्होंने मेरे लिए कुर्सी लगा दी तथा स्वयं खडे रहे।
प्रसिद्ध लेखिका मैडम कृष्ण सोबतीजी हमें बताती थी कि उनके पिताजी ने उन्हें कह रखा था कि जब भी डॉक्टर के पास जाओ, तो अपनी समस्याओं कि सूची बना कर साथ ले जाओ, ताकि डॉक्टर का समय खराब न हो। इसी तरह कोई स्पीच देनी है, तो भी बिन्दु बना लो, ताकि श्रोताओं का समय खराब न हो।
इसके इलावा बॉलीवुड की प्लेबैक सिंगर श्रीमती अल्का यागनिक से भी भेंट हुई। इन सभी विभूतियों में एक बात कॉमन थी, इनकी विनम्रता। विद्या ददाति विनयम का सजीव उदाहरण। मेरा निजी अनुभव भी यह स्वीकारता है कि पका हुआ फल मीठा ओर भरा हुआ होता है। रूखा और खाली नहीं।
संस्थान में काम करते-करते मैंने जाना कि वास्तव में फ हुए फल रसदार तो होते ही हैं, साथ ही उनका मीठापन एक अलग अहसास लिए होता है। यह जो उनका मीठापन है, वही उनका मूल चरित्र भी है। जिसमें यत्किन्चित भी ह्यूमन, परुषता या अपने वैशिष्ट्य बोझ तले दबा होना नहीं होता, वरन् स्वयं को एक सामान्य मनुष्य की तरह उसकी साधारणता की गरिमा में जीते हुए असाधारण को कर दिखाने की अद्भुत और कामयाब कोशिशें उनके व्यक्तित्व का हिस्सा होती है।
अगर संस्थान के निदेशकों की बात की जाए, तो नब्बे के दशक में निदेशक प्रोफेसर जे एस ग्रेवाल थे। बहुत ही प्रभावशाली व्यक्तित्व। उनके विभाजन के समय के अनुभव की विडियो क्लिप आज भी जलियाँवाला बाग की यादें ताजा कर देती हैं।
उसके बाद प्रोफेसर मृणाल मिरी ने पदभार सम्भाला। उनका सम्बन्ध इर्थन जैसे विषय से था। उन्होंने संस्थान के बच्चों व महिलाओं के लिए कईं कल्याणकारी योजनाएँ चलाईं, जिनका संचालन श्रीमती मिरी करती थी। महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्हें सिलाई बुनाई सिखाई जाती व उत्पाद को बेचने के लिए प्रदर्शनी लगाई जाती। दिवाली मेले का आयोजन किया जाता। बच्चों के लिए सांस्कृतिक आयोजन किए जाते।
फिर आए प्रोफेसर श्रीवास्तव। उन्होंने संस्थान में एसोसियेटेस द्वारा सेमिनार प्रस्तुत करने की नई परम्परा डाली।
अगली निदेशक डॉक्टर भुवन चन्देल ने सुप्रीम कोर्ट तक केस लडकर संस्थान के अस्तित्व को बचाया। वरना यह संस्थान कब का पाँच सितारा होटल में बदल जाता।
उनके बाद आए प्रोफेसर डिसूजा। उन्होंने संस्थान में ऑडिटोरियम बनवाया, कैफे बनवाया। टेगोर सेंटर की शुरुआत हुई।
उनके बाद प्रोफेसर चेतन सिंह और प्रोफेसर मकरंद परांजपे। इनके समय में काफी शैक्षिक गतिविधियाँ हुई। हैल्थ कैम्प आयोजित किए गए। कोरोना काल की वजह से ऑनलाइन वेबिनारस हुए। संस्थान का स्थापना दिवस मनाया गया।
उनके बाद वर्तमान में संस्थान के वाइस प्रेसिडेंट प्रोफेसर सी एल गुप्ता निदेशक हैं, जिन्होंने कोरोना काल में संस्थान की रुकी हुई गाडी को फिर से गति प्रदान की।
अपने विगत जीवन का पर्यावलोकन करने के बाद मैंने पाया कि अगर हमारा कार्यस्थल तनावपूर्व न हो, खूबसूरत हो और प्रतिभाशाली व्यक्तित्वों का नैरन्तर्य बना हरे, तो हमें यानी हर कार्मिक को हर घडी हर क्षण कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। यह सीख हमें एक अच्छा प्रोफेशल तो बनाती ही है साथ ही एक अच्छे इन्सान में भी रूपान्तरित करती है

सम्पर्क - आवासी चिकित्सा अधिकारी,
आईआईएस, शिमला, राष्ट्रपति निवास,
शिमला- १७१००५ मो. ९८१६०-७४४२३