fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

पारसी थिएटर का योगदान

शैलेन्द्र चौहान
पारसी रंगमंच, 19वीं शताब्दी के ब्रिटिश रंगमंच के मॉडल पर आधारित था। इसे पारसी रंगमंच इसलिए कहा जाता था क्योंकि इससे पारसी व्यापारी जुडे थे। वे इसमें अपना धन लगाते थे। उन्होंने पारसी रंगमंच की अपनी पूरी तकनीक ब्रिटेन से मँगवायी। इसमें प्रोसेनियम स्टेज से लेकर बैक स्टेज की जटिल मशीनरी भी थी। लेकिन लोक रंगमंच-गीतों, नृत्यों परंपरागत लोक हास-परिहास के कुछ आवश्यक तत्त्वों और इनकी प्रारम्भ तथा अन्त की रवायतों को पारसी रंगमंच ने अपनी कथा कहने की शैली में शामिल कर लिया था। दो श्रेष्ठ परम्पराओं का यह संगम था और तमाम मंचीय प्रदर्शन पौराणिक विषयों पर होते थे, जिनमें परम्परागत गीतों और प्रभावी मंचीय युक्तियों का प्रयोग अधिक होता था। कथानक गढे हुए और मंचीय होते थे जिसमें भ्रमवश एक व्यक्ति को दूसरा समझा जाता था, घटनाओं में संयोग की भूमिका होती थी, जोशीले भाषण होते थे, चट्टानों से लटकने का रोमान्च होता था और अन्तिम क्षण में उनका बचाव किया जाता था। सच्चरित्र नायक की दुष्चरित्र खलनायक पर जीत दिखायी जाती थी और इन सभी को गीत-संगीत के साथ विश्वसनीय बनाया जाता था।
औपनिवेशिक काल में भारत के हिन्दी क्षेत्र के विशेष लोकप्रिय कला माध्यमों में आज के आधुनिक रंगमंच और फिल्मों की जगह आल्हा, कव्वाली मुख्य थे। लेकिन पारसी थियेटर आने के बाद दर्शकों में गाने के माध्यम से बहुत-सी बातें कहने की परम्परा चल पडी जो दर्शकों में लोकप्रिय होती चली गयी। बाद में 1930 के दशक में आवाज रिकॉर्ड करने की सुविधा शुरू हुई और फिल्मों में भी इस विरासत को नये तरह से अपना लिया गया। वर्ष 1853 में अपनी शुरुआत के बाद से पारसी थियेटर धीरे-धीरे एक चलित थियेटर का रूप लेता चला गया और लोग घूम-घूम कर नाटक देश के हर कोने में ले जाने लगे। पारसी थियेटर के अभिनय में मेलोड्रामा अहम तत्त्व था और संवाद अदायगी बडे नाटकीय तरीके से होती थी। उन्होंने कहा कि आज भी फिल्मों के अभिनय में पारसी नाटक के तत्त्व दिखाई देते हैं।
80 वर्ष तक पारसी रंगमंच और इसके अनेक उपरूपों ने मनोरंजन के क्षेत्र में अपना सिक्का जमाए रखा। फिल्म के आगमन के बाद पारसी रंगमंच ने विधिवत् अपनी परम्परा सिनेमा को सौंप दी। पेशेवर रंगमंच के अनेक नायक, नायिकाएँ सहयोगी कलाकार, गीतकार, निर्देशक, संगीतकार सिनेमा के क्षेत्र में आए। आर्देशिर ईरानी, वाजिया ब्रदर्स, पृथ्वीराज कपूर, सोहराब मोदी और अनेक महान दिग्गज रंगमंचकी प्रतिभाएँ थीं जिन्होंने शुरुआती तौर में भारतीय फिल्मों को समृद्ध किया।


पारसी रंगमंच की चार प्रमुख विशेषताएँ रहीं-
(1) पर्दों का नायाब प्रयोग - मंच पर हर दृश्य के लिए अलग अलग पर्दे प्रयोग मंर लाए जाते हैं ताकि दृश्यों में गहराई और विश्वसनीयता लाई जा सके। आजकल फिल्मों में अलग-अलग लोकेशन दिखाए जाते हैं। पारसी रंगमंच में ये काम पर्दों के सहारे होता है। इसलिए पारसी रंगमंच की मंच सज्जा का विधान बडा ही जटिल होता है।
(2) संगीत, नृत्य और गायन का प्रयोग - पारसी नाटकों में नृत्य और गायन का यही मेल हिन्दी फिल्मों में गया। इसी वजह से भारतीय फिल्में पश्चिमी फिल्मों से अलग होने लगीं।
(3) वस्त्र सज्जा (कॉस्ट्यूम) - पारसी रंगमच पर अभिनेता (या अभिनेत्री) जो कपडे पहनते हैं उसमें रंगों और अलंकरण का खास ध्यान रखा जाता है। चूँकि दर्शक बहुत पीछे तक बैठे होतें हैं, इसलिए उनको ध्यान में रखते हुए वस्त्रों और पात्रों के अलंकरण में रंगों की बहुतयात होती है।
(4) लम्बे संवाद - पारसी नाटकों के संवाद ऊँची आवाज में बोले जाते हैं, इसलिए संवादों में अति-नाटकीयता भी रहती है।
पारसी थियेटर में गाना एक अहम तत्त्व था और इसमें अभिनेता अपनी गूढ भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए गाने का सहारा लेते थे। पारसी थियेटर में एक अभिनेता के लिए एक अच्छा गायक होना बेहतर माना जाता था क्योंकि आधी कहानी गानों में ही चलती थी। पारसी थियेटर का ही प्रभाव है कि आज हमारे हिन्दी फिल्मों में गाने का भरपूर प्रयोग किया जाता है। गानों के बगैर आज भारतीय दर्शक फिल्म को अधूरा मानते हैं। हमारी आधुनिक हिन्दी फिल्में पश्चिम के रिएलिज्म से प्रभावित दिखने लगी है, लेकिन आज भी यह पारसी थियेटर की, गाना गाकर बात कहने की परम्परा को कायम रखे हुए हैं। हिन्दी फिल्मों की सफलता के लिए पासपोर्ट बन चुके आइटम सॉन्ग की जडें दरअसल पारसी थियेटर तक जाती है और आज भले ही सिनेमा और रंगमंच से इस प्राचीन शैली के अभिनय के तत्त्व गायब हो गये हों, लेकिन इस नाट्य शैली के गाने गाकर अपनी भावनाओं से दर्शकों को उद्वेलित करने की अदा आज भी कायम है।
पारसी रंगमंच शुरूआत में साधन-विहीन था, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने रंगमंच के सभी उपकरण खरीद लिए। इन कंपनियों के पास विशेष प्रकार के यंत्र होते थे जिनके द्वारा देवों को हवा में उडता हुआ दिखाया जाता था, नायक को महल की दीवार से नदी में छलाँग लगाते हुए दिखाया जाता था, परियों को आकाश से उतरते हुए दिखाया जाता था। चमत्कारिक दृश्य दिखाकर दर्शकों को मनोरंजन पैदा करते थे। इस तरह का यन्त्र का निर्माण उन्नीसवीं शताब्दी के लंदन डूरीलेन थियेटर में दिखाया जाता था। इसका ही अनुकरण पारसी थियेटर ने किया है।
पारसी थिएतर कम्पनियों के पास स्वतंत्र नाटककार और रंग-निर्देशक थे। स्त्री पात्र का अभिनय पुरुष पात्र ही करते थे कुछ दिनों के बाद नर्तकियाँ और वेश्याएँ भी सहभाग लेने लगी। पहले इस कंपनियों ने शेक्सपीयर के नाटक अंग्रेजी एवं गुजराती में प्रस्तुत किए। ईरानी नाटकों के फारसी गीतों को मराठी के लय या शैली में प्रस्तुत किए गए। पारसी थियेटर में क्रांति लाने वाले दादाभाई पटेल ने सन् 1870 ई. में फारसी गानों को हिंदी राग-रागिनियों में पेश किया। इस कम्पनियों की नाटकों की भाषा साहित्यिक दृष्टि से परिनिष्ठित नहीं थी क्योंकि उसमें हिंदी, उर्दू एवं फारसी का मिश्रण रहता था। शैली सशक्त, कार्य-व्यापार प्रभावशाली एवं तीव्र था, संवाद चुस्त रहते थे। नाटकों में हास्य अभिनय का प्रयोग अधिक मात्रा में रहता और नाटकों का विभाजन तीन-चार अंकों में होता था।
पारसी कम्पनियों के नाटक रात के 10 बजे से सुबह 3-4 बजे तक चलते थे। नाटक की शुरूआत सामूहिक मंगलाचरण से होती थी। इन नाटकों में सुख-दुख का समन्वय रहता था। नाटकों में संगीत के लिए तबला, हारमोनियम, वायलिन का भी प्रयोग होता था। मार-पीट, हत्या, प्रेम-प्रसंग, युद्ध का वर्णन अत्यन्त मार्मिक ढंग से किया जाता था। नाटक देखने वाले दर्शक पहले से ही अभिनेता के बारे में जान लेते थे, तभी दर्शक भीड जमा करते थे। सफल नाटक एक-एक महीनों तक चलता था।
व्यावसायिक रंगमंच होने के कारण, जनसमुदाय अधिक आकर्षित करने के लिए, मनोरंजन के नाम पर पारसी रंगमंच अधिकाधिक तडकीला-भडकीला और फूहड दृश्य दिखाते गए। इसके कारण सभ्य, सुसंस्कृत समाज उससे कटता गया। कुछ विद्वानों ने उसे घटिया, बाजारू और अश्लील भी कहा गया।
पारसी थिएटर की प्रमुख मण्डलियाँ
हिन्दू ड्रैमैटिक कोर -1853
पारसी थिएट्रिकल कम्पनी -1853
विक्टोरिया नाटक मण्डली -1862
अल्फ्रेड नाटक मण्डली -1871
ओरिजिनल विक्टोरिया नाटक मण्डली - 1877
हिन्दी नाटक मण्डली
रामहाल (राममहाल) नाटक मण्डली -1900
व्याकुल भारत नाटक कम्पनी - 1921
द पारसी नाटक मण्डली - 1903
मूनलाइट थिएटर्स - 1939
पारसी थियेटर के लिए प्रमुख नाटककार एवं उनका नाट्य साहित्य
(1)आगा हश्र कश्मीरी - शहीदे नाज, सफेद
खून, ख्वाबे हस्ती, सैदे-हबस, बिल्वमंगल, आँख का नसा आदि।
(2) नारायण प्रसाद बेताब- गोरखधन्धा, महाभास, कृष्णा सुदामा, रामायण आदि।
(3) राधेश्याम कथावाचक- वीर अभिमन्यु, कृष्णावतार, श्रवणकुमार, मशरिकी हुर आदि।
(4) किशनचन्द्र जेबा - शहीद संन्यासी, जख्मी हिन्दू आदि।
(5) तुलसीदत्त शैदा- जनक नंदनी।
(6) जमुनादास मेहरा -कन्या विक्रय, देवयानी, आदर्श बन्ध।
(7) मास्टर फिदा हुसैन - नरसी भगत, शाही फकीर आदि।
रामायण, मस्ताना, डाकू का लडका जैसी फिल्मों में उन्होंने अभिनय किया और गाने भी गाए।
इनके आगे का विकास मूवी थिएटर और सेलुलाईड फिल्मों में देखा जा सकता है।

सम्पर्क - 34/242, सेक्टर -3, प्रताप नगर,
जयपुर 302033 मो. 7838897877