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फैण्टेसी और मुक्तिबोध

विजयबहादुर सिंह
मानविकी परिभाषिक कोष के पृष्ठ एक सौ इक्कीस पर इस परिभाषिक पद (फेण्टेसी) है कि समीक्षाशास्त्र की समकालीन चिन्तना में इस शब्द ने विशिष्ट अर्थ ग्रहण कर लिया है। इसकी व्याख्या शब्द को व्युत्पत्ति और इतिहास के आधार पर करना अब असंभव है।
अपने काव्य-शास्त्र (पोयटिक्स) में अरस्तू ने कवियों-बुनियादी तौर पर नाटककारों को यह परामर्श दिया कि वे असंभाव्य संभावनाओं की अपेक्षा संभाव्य असंभावनाओं को प्राथमिकता दें। कोशकार ने इसे लोकग्राह्य बनाते हुए लिखा है कि हिन्दी में देवकीनन्दन खत्री आदि के उपन्यास भी इन्हीं संभावनाओं पर आधारित हैं। इन उपन्यासों की कथावस्तु, पात्र तथा वातावरण साधारण परिस्थितियों में असंभाव्य है, संभाव्य नहीं। इसे तभी कइयों ने स्वप*-चित्र मूलक साहित्य कहा है।
कोशकार ने यह टिप्पणी भी की है कि यदि साहित्य रूपों में अविश्वास को स्वैच्छिक निवृत्ति का आंशिक रूप में वर्तमान रहना आवश्यक है, तो स्वपज़चित्रमूलक साहित्य का तो इसके बिना अस्तित्व ही असंभव हो जाएगा।
इस काव्य-प्रकार के तीन प्रयोजन हो सकते हैं- पहला- मनोरंजन, दूसरा-यथार्थ से पलायन और अन्तिम सदोष मानव एवं उसके द्वारा निर्मित दोषयुक्त संसार के प्रति नया दृष्टिकोण उपस्थित करना। खत्री के उपन्यासों का मुख्य प्रयोजन तो मनोरंजन ही है। इसी तरह परियों की कहानियाँ बाल-हृदयों को यथार्थ जगत से दूर ले जाती हैं। छायावाद के विरोधी आलोचकों ने जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध कविता ले चल वहाँ भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे-धीरे को भी इसी आधार पर पलायन का गीत कहा है। वस्तुतः कवि ने यहाँ अपने समय और समाज को एक अभिनव संदेश-स्वप* देने की पहल की है। यह लोक तय करें कि यह ऐसे किसी संसार को कामना-रामराज्य जैसे, कल्पसूत राज्यों की तरह करना चाहता है या नहीं। है तो यह दोषयुक्त संसार के समानान्तर एक निर्दोष और मानव-हिकारी मानव-लोक की ही कामना और माँग।
पश्चिमी साहित्य में इसके कई उदाहरण हमें मिलते हैं- स्विफ्ट कृत गुलिवर्स टैवल्स वाल्टेर कृत काँदीद, बटलर कृत एँरेहवान तथा जार्ज आर्वेल कृत एनीमल फार्म इसी कोटी के सुपरिचित उपन्यास हैं।
निष्कर्षतः यह तो कहा ही जा सकता है कि यह एक प्रकार की स्वप*-कथा है। लेकिन मुक्तिबोध जहाँ भी फैण्टसी का उल्लेख करते हैं, वहाँ शायद ही कभी वे इस पद का प्रयोग के रूप में करते हो। इसकी जगत मनसचित्र यानी मानसिक बिम्ब पद का प्रयोग करते हैं। कामयनीः एक पुनर्विचार के सन्दर्भ में तो करते ही हैं, रचनावली के खण्ड पाँच के अपने लेख साहित्य में पौराणिक-ऐतिहासिक संदर्भ में प्रसादजी द्वारा रचे गए नाटकों में आए कथानकों, चरित्रों के सन्दर्भ में भी वे लिखते हैं- अतः प्राचीन भारतीय वातावरण के ये चित्र ऐतिहासिक तथ्यों के रूप में ही क्यों न अवतारेत हुए हों, अनन्तः वे वृहत् मनसचित्र (फेण्टसीज) हैं। यहाँ वे यह स्पष्ट करते हैं कि इनके द्वारा व्यभिचारी सांस्कृतिक उत्थान की आकांक्षाएँ और समस्याएँ प्रकट हुई हैं। इनकी लोकप्रियता और सर्वजन-संवेद्य सौन्दर्य का रहस्य यही है कि एक ओर वे नवीन व्यक्तिवादी सांस्कृतिक चेतना की आवश्यकताओं और मूल्यों को ग्रहण करते हैं, तो दूसरी ओर वे उन आवश्यकताओं और मूल्यों की न केवल प्राचीन युग के भव्य-गौरव-चित्रों के देह में आधुनिक आकांक्षाओं और समस्याओं की प्राण-प्रतिष्ठा कर देते हैं, वरन् वे इस युग के मूल्यों को उन वातावरण-चित्रों के द्वारा इस प्रकार उपस्थित करते हैं मानो ये आकांक्षाएँ और मूल्य आदिकाल से चली आ रही हों अर्थात् इस युग की आवयकता- आकांक्षाओं को नया ऐतिहासिक औचित्य प्रदान करते हैं।
इस सन्दर्भ में स्वयं मुक्तिबोध की फैण्टीसीज को देखें, तो वे भी अपने युग को जटिल समस्याओं और आकांक्षाओं का ऐसा ही संभार लिए हैं। उनके यहाँ जो प्रश्न हैं, उलझने है, पीडाएँ और अन्तर्द्वन्द्व हैं, फिर भी उनके पार जाने को उनकी जो छटपटाहटें, बेचैनियाँ और सपने हैं, जब-तब ईमानदार आत्मालोचन और निश्छल आत्मधिकार है, वह जितना व्यक्तिगत है, उससे कई गुना लोकगत है।
यह भी ध्यान देने की बात है कि मुक्तिबोध कोरे सैद्धान्तिक माक्र्सवादी नहीं हैं, उनकी चेतना अनेकशः जातीय स्मृतियों, गहरी सामाजिक-राजनीतिक परछाइयों और क्रान्तिकरी पारम्परिक आदर्शों की तेजस्विता से निर्मित हुई है। उनकी फेण्टसियों की निर्मिति में इन सबका कितना योगदान है इसे ब्रह्मराक्षस, ओकाव्यात्मक फणिधर, अन्तःकरण का आयन और चम्बल की घाटी में जैसे देशज शीर्षकों से समझा जा सकता है।
मुक्तिबोध हिन्दी के कवि या लेखक भर नहीं हैं। वे हिन्दी के महाविद्यालयों में अध्यापक भी हैं। स्वभावतः उन्हें पूर्व और पश्चिम की काव्य-शास्त्रीय चिन्तना की भरपूर जानकारियाँ हैं। आश्चर्य फिर भी है कि वे अपनी चिन्तना में भारतीय काव्यशास्त्र परम्परा से पारिभाषिक पद ग्रहण न कर पश्चिमी पद फैण्टेसी को ग्रहण करते हैं। ऐसा वे किन जरूरतों के तहत करते हैं, यह विचारणीय है। कहीं ऐसा तो नहीं कि संस्कृत काव्य-शास्त्र में उपलब्ध काव्य-शास्त्रीय पदावली उन्हें अपने विचारों के वहन एवं सम्प्रेषण के लिए अपर्याप्त लगी हो? या फिर हिन्दी में बह रही आधुनिकता की हवा के चलते उन्होंने ऐसा किया हो। प्रश्न यह भी कि क्या मुक्तिबोध की चिन्ता आधुनिक होने और दिखने की है, या फिर उस जीवन-सत्य को जीवन-अनुभव के रूप में पहचानने और ग्रहण करने को जो उनके चतुर्दिक व्याप्त था, सो भी आक्रामण रूप में और यह सब वे फैण्टेसी पद के मार्फत कर सकते थे।
जो भी हो, इतना तो साफ है कि मुक्तिबोध ने यह पारिभाषिक पद पश्चिम के काव्यशास्त्रीय चिन्तन से ग्रहण किया। तार-सप्तक के उनके आत्मवक्तव्य से भी हमें यह खबर लगती ही है कि पश्चिम के कतिपय दर्शनों का अध्ययन उन्होंने किया था और एक हद तक वे सब उनकी चेतना के हिस्से बन चुके थे। फैण्टेसी के लिए जब-तब मनसचित्र जैसा काव्यपद अनूदित कर वे एक सूचित कर ही रहे थे कि अपनी काव्य-शास्त्रीय परम्परा के निकट रहने के लिए भी प्रयत्नशील हैं। इतना ही नहीं, कामायनीः एक पुनर्विचार के भूमिका भाग वाले पृष्ठों पर भी इस फैण्टेसी पद पर उन्होंने काफी विमर्श प्रस्तुत किया है।
फैण्टेसी क्या है? काव्य में इसके प्रयोग की जरूरत किन वजहों के चलते पडती है? इसका कोई समानार्थी शास्त्रीय पद भारतीय परम्परा में उपलब्ध है अथवा नहीं, उपलब्ध है, तो कितनी दूर तक वह मुक्तिबोध के आशयों की पूर्ति करता है, इस पर उन्होंने गम्भीर विचार किया है। उनकी यह विमर्श फैण्टेसी के अर्थ, भूमिका और महत्त्व को समझने में हमारी मदद करता है।
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कला-सृजन-प्रक्रिया के जिन तीन क्षणों की वे अपने मित्र और संवादकर्ता केशव से चर्चा करते हुए जिस एक पहले क्षण की बात करते हैं वह उत्कट अनुभव का क्षण है। पर यह सामान्य क्षण से भिन्न कोई खास, महत्त्वपूर्ण अनुभव-क्षण है जो कालान्तर में संवेदनात्मक रूप ग्रहण कर फैण्टेसी में ढल जाता है। इसका सरलीकरण यदि करें, तो वैयक्तिक अनुभव-क्षण अपनी विशिष्टता के चलते सर्वजनोपयोगी लगने लगता है और संवेदनात्मक स्वरूप ग्रहण करने की स्थिति में आ जाता है। इस संवेदनात्मक स्वरूप को मुक्तिबोध फैण्टेसी नाम से अभिहित करते हैं।
इस पूरे व्यापार को वे जिस गम्भीर शब्दावली में कईं-कईं वाक्यों में समझाते हैं, उनमें से कुछ इस प्रकार हैं-
(क) मैंने जवाब दिया- कला का पहला क्षण है जीवन का उत्कट तीव्र अनुभव-क्षण। दूसरा क्षण है इस अनुभव का अपने कसकते-दुखते हुए मूल्यों से पृथक हो जाता और एक फैण्टेसी का रूप धारण कर लेना, मानो वह फैण्टेसी आँखों के सामने खडी हो। तीसरा और अन्तिम क्षण है इस फैण्टेसी के शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया का आरम्भ और उस प्रक्रिया की परिपूर्णावस्था तक की गतिमानता। शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया के भीतर जो प्रवाह जारी रहता है वह समस्य व्यक्तित्व और जीवन का ही प्रवाह होता है। प्रवाह में वह फैण्टेसी अनवरत रूप से विकसित परिवर्तित होती हुई आगे बढती जाती है। इस प्रकार वह अपने मूल रूप को बहुत कुद त्यागती हुई नवीन रूप धारण करती चलती है। इसके आगे वे फिर एक और विचारणीय कथन करते हैं- जिस फैण्टेसी को शब्दबद्ध करने का प्रयत्न किया जा रहा है वह फैण्टेसी अपने मूल रूप से इतनी अधिक दूर चली जाती है कि यह कहना कठिन है कि फैण्टेसी का यह नया रूप अपने मूल रूप की प्रतिकृति है। फैण्टेसी को शब्द-बद्ध करने की प्रक्रिया के दौरान जो-जो सृजन होता है- जिसके कारण कृति क्रमशः विकसित होती जाती है- वही कला का तीसरा और अन्तिम क्षण है। प्रथम क्षण निःसन्देह अनुभव का क्षण है।1
आगे वे और एक बात करहते हैं शायद अपने को और सुस्पष्ट करने के लिए- और शब्दबद्ध होने पर अथवा चित्रित होने पर जो कृति या रचना तैयार होती है, वह कृति या रचना कला के दूसरे क्षण की फैण्टेसी की पुत्री है, प्रतिकृति नहीं। इसलिए मूल फैण्टेसी से उसका व्यक्तित्व स्वतन्त्र, विचित्र और पृथक है। कला का यह तीसरा या अन्तिम क्षण है। अर्थात् बीज रूप फैण्टेसी क्रमशः स्वतन्त्र विकास करती हुई अपना एक अलग चेहरा मोहरा पा लेती है। मुक्तिबोध के इस कथन से एक और जो बाह ग्रहण में आती है, वह यह कि कला के दूसरे क्षण में जो फैण्टेसी स्वरूप ग्रहण करती है वह निरन्तर विकासमान और गतिशील रहने के कारण हूबहू अपने मूल रूप में न रह काफी बदल चुकी होती है। संभवतः इसीलिए वे विचित्र शब्द का प्रयोग करते हैं। सोचना यह है कि फैण्टेसी अगर रूप ग्रहण करने की प्रक्रिया है, तो इस फैण्टेसी और कल्पना-व्यापार का फर्क क्या है? पर इस सवाल पर हम आगे आएँगे फिलहाल जरूरी समझते हुए संवादवृत्त मित्र केशव का यह कथन- तुम में और मुझ में एक बडा भेद है। विचार मुझे उत्तेजित कर क्रियावान कर देते हैं। विचारों को तुम तुरन्त ही संवेदनाओं में परिणत कर देते हो। फिर उन्हीं संवेदनाओं के तुम चित्र बनाते हो। विचारों की परिणति संवदेनाओं में और संवदनाओं के चित्रों में इस प्रकार तुम में ये दो परिणतियाँ हैं। अगर तुम्हारी कविताएँ किसी को उलझी हुई मालूम हो, तो तुम्हें हताश नहीं होना चाहिए।
मुक्तिबोध की कविताओं की यह उलझन कहीं उनकी मूल फैण्टेसियों की उलझन तो नहीं है, जो अपनी निरन्तर या अबाध गति मानता के चलते प्रत्येक पल स्वतन्त्र दिशा और रूप ग्रहण करती चलती है? मित्र केशव के मतानुसार ऐसा कॉण्टेण्ट या काव्य-तत्त्व के चलते होता है। यानी एक ही फैण्टेसी में ढेर सारे विचारों और संबद्ध संवेदनाओं की प्रचुरता के चलते और वह मानता है कि सफाई के नाम पर सफाई के लिए काण्टेण्ट (काव्य तत्त्व) की बलि देना कैसे भी समर्थनीय नहीं है।3
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मुक्तिबोध अपने इस फैण्टेसी व्यापार का व्यावहारिक प्रयोग कामायनी : एक पुनर्विचार के शुरूआती पन्नों पर करते हैं। कामयानी (प्रसाद) को वे एक फैण्टेसी कहते हैं- कामयानी उस अर्थ में कथा काव्य नहीं है जिस आर्थ में साकेत है। कामायनी को कथा केवल एक फैण्टेसी है। जिस प्रकार एक फैण्टेसी में मन की निगूढ वृत्तियों का, अनुभूत जीवन-समस्याओं का, इच्छित विश्वासों और इच्छित जीवन-स्थितियों का प्रक्षेप होता है, उसी प्रकार कामायनी में भी हुआ है।4
इस सिलसिले को आगे बढाते हुए वे क्रमशः कई और महत्त्वपूर्ण कथन करते हैं-
1. कलाकृति स्वानुभूत जीवन की कल्पना द्वारा पुनर्रचना है।

2. फैण्टेसी के अन्तर्गत कल्पना का मूल कार्य, मन के निगूढ तत्त्वों को प्रोद्भाषित करते हुए विभिन्न रंगों में उन्हें अपने समस्त सौन्दर्य के साथ उद्घाटित करना रहता है।
3. दूसरे शब्दों में प्रसादजी ने कामायनी में एक विशाल फैण्टेसी के अन्तर्गत स्वानुभूत जीवन-समस्या को एक परिवेश से संलग्न कर उपस्थित किया है, तथा उस जीवन-समस्या का स्व-चिन्तित दार्शनिक निदान प्रस्तुत किया है।5 (मुक्तिबोध के इस कथन को हिन्दी के अन्य आलोचक शायद ही स्वीकारें।) मुक्तिबोध अपने कथन में आगे बढते हैं- यह जीवन-समस्या, फैण्टेसी-रूप में उपस्थित होकर, फैण्टेसी के नियमों में बँधकर - यानी स्वतन्त्र विकासात्मक रूपरूप और आबाध गतिमानतजा पाकर अपने मूल वास्तविक जीवन-सन्दर्भ को अर्थात् अपने मूल वास्तविक मानव सम्बन्ध क्षेत्र को - जिससे कि वह आवयविक सम्बन्ध रखती है- भूमिग्रत बन चुकी है-उस क्षेत्र को नेपथ्य में डालकर ही वह समस्या कल्पना-चित्रों के रूप में उद्घाटित हुई है और कल्पना के गति-नियमों में बँध कई है।6
अब मुक्तिबोध फैण्टेसी को एक ओर करके कल्पना पर आते हैं- साहित्यिक कलाकार अपनी विधायक कल्पना द्वारा जीवन की पुनर्रचना करता है। जीवन की यह पुनर्रचना ही कलाकृति बनाती है।7 कला में जीवन की जो पुनर्रचना होती है, वह सारतः उस जीवन का प्रतिनिधित्व करती है, कि जो जीवन इस जगत में वस्तुतः जिया और भोगा जाता है- स्वयं द्वारा तथा अन्यों द्वारा। यह जब कल्पना द्वारा पुनर्रचित होता है, तब उस पुनर्रचित जीवन में तथा वास्तविक जगत क्षेत्र में जिये और भोगे जाने वाले जीवन की गुणात्मक अन्तर उत्पन्न हो जाता है। पुनर्रचित जीवन जिये और भोगे गए जीवन से सारतः एक होते हुए भी स्वरूपतः भिन्न होता है।8
मुक्तिबोध यहाँ जिस विधायक कल्पना की बात कर रहे हैं वह वही है जिसे कोलरिज सैकण्डरी या उत्तरजात कल्पना कहते हैं, जो मौलिक कल्पना से उत्पन्न होकर भी उससे भिन्न होती है। सुप्रसिद्ध विद्वान डॉ. रामअवध द्विेवेदी ने अपनी प्रसिद्ध कृति साहित्य-सिद्धान्त में इसकी चर्चा करते हुए लिखा है किन्तु दोनों में कुछ तात्त्विक अन्तर भी होता है। उत्तर जात कल्पना में मानव- इच्छा और चेष्टा का अंश अपेक्षाकृत अधिक रहता है तथा मौलिक कल्पना की तुलना में वह अधिक सजीव और सक्रिय होती है। वह पदार्थों के बाह्य आवरण का भेदन करके उनकी अन्तरआत्मा में प्रविष्ट होने की शक्ति रखती है और नवनिर्माण के पूर्व परम्परागत रूप और व्यवस्था को विनष्ट और विकीर्ण करने में समर्थ है।.... यह स्पष्ट है कि कलात्मक निर्माण के लिए उत्तरजात कल्पना आधार तैयार करती है। कला में जो एकता क्रमिकता और रूपविधान की विशेषताएँ मिलती हैं, उनका सीधा सम्बन्ध इसी उत्तर जात कल्पना से है।
डॉ. द्विवेदी आगे एक और ध्यान देने योग्य बात कॉलरिज के हवाले सेकरते हैं-मानव-मन की सर्जनात्मक शक्ति से भिन्न संयोगात्मक शक्ति को कॉलरिज ने फैन्सी नाम दिया है। वड्र्सवर्थ और कॉलरिज को श्रेय है कि उन लोगों ने फैन्सी शब्द को नये अर्थ में समन्वित किया।9
तब क्या यह माना जाए कि मुक्तिबोध अपने कलाव्यापार में जिस फैण्टेसी की केन्द्रीयता रेखांकित कर रहे हैं यह वही संयोगात्मक शक्ति है, मुक्तिबोध के अनुसार जिसके अन्तर्गत कल्पना का मूल कार्य मन के निगूढ तत्त्वों को प्रोद्भाषित करते हुए विभिन्न रंगों में उन्हें अपने समस्त सौन्दर्य के साथ उद्घाटित करना है।
इसी क्रम में वे भारतीय काव्य चिन्तन परम्परा की ओर भी लौटते हैं और कहते हैं - संक्षेप में, फैण्टेसी के अन्तर्गत भाव-पक्ष प्रधान ओर विभाव-पक्ष गौण और प्रच्छन्न तो होता ही है, साथ ही यह भाव-पक्ष, कल्पना को उत्तेजित करनके बिम्बों की रचना करते हुए एक ऐसा मूर्तविधान उपस्थित करता है- कि जिस विधान में उस विधान ही के नियम लागू होते हैं। इस मूर्तविधान में विभाव-पक्ष मात्र सूचित होता है, मात्र ध्वनित होता है। किन्तु उस नेपथ्यवासी मूलाधार के बिना, उस अण्डर ग्राउण्ड-भूमिगत-विभाव-पक्ष के बिना, उस मूर्त-विधान का जीवन-महत्त्व प्राद्भाषित ही नहीं हो सकता।10
इस कथन को सरलीकृत करके कहें, तो फैण्टेसी का मूल सम्बन्ध और विकास कृति के भाव-पक्ष के साथ ही होता है। इसका अर्थ तब संवेदनात्मक ज्ञान के साथ ज्ञानात्मक स्वरूप ग्रहण कर पाएगा। यहाँ बकौल मुक्तिबोध मन की निगूढ वृत्तियों, सर्जक की अनुभूत जीवन-समस्या, इच्छित विश्वास और इच्छित जीवन-स्थितियों का प्रक्षेपण शुरू हो जाता है।11 यह प्रक्षेपण बगैर कल्पना शक्ति के असम्भव है। संभवतः इसीलिए मुक्तिबोध कल्पना-शक्ति को फैण्टेसी-व्यापार के अन्तर्गत ग्रहण करते हैं। यहाँ पहुँचकर यह निष्कर्ष तो लिया जा सकता है कि फैण्टेसी- कवि की सृजन-प्रक्रिया और शक्ति का ही नाम है। अन्य कुछ नहीं। दूसरे यह कल्पना व्यापार से पहले की प्रक्रिया है जो किसी महत्त्वपूर्ण अनुभव-क्षण को रचनात्मक स्वरूप ग्रहण करने के लिए सारे सरंजाम जुटाती है। इन सरंजामों का उल्लेख पहले किया जा चुका है। इस रूप में यह एक संयोजिका शक्ति है। कोलरिज और वर्ड्सवर्थ इस ओर इशारा कर चुके हैं।
प्रश्न यह है कि क्या समस्त काव्य-व्यापार में इसे एक निर्णायक, मेरुदण्डनुमा-कोई काव्य-तत्त्व माना जाए? क्या बगैर फैण्टेसी के काव्य रचना अथवा रचना संभव है? इसका उत्तर मुक्तिबोध यह कहकर पहले ही दे चुके हैं कि साकेत और प्रियप्रवास कथा-काव्य होने के नाते कामायनी जैसे फैण्टेसी काव्य नहीं हैं। उनके ही शब्द हैं- कामायनी में प्रधान हैं लेखक के जीवन निष्कर्ष और जीवन-अनुभव, न कि कथावस्तु और पात्र। इससे यह अर्थ भी निकलता है कि फैण्टेसी में यजीवन-अनुभव और जीवन-निष्कर्ष यानी भाव-पक्ष (काव्य-वस्तु) प्रधान या अहम है। वे इसे समझाते हुए लिखते हैं साधारण कथावस्तु के भीतर पात्र अपने व्यक्तित्व-चरित्र का स्वतन्त्र रूप से विकास किया करते हैं, अर्थात लेखक की अपनी श्यता से स्वतन्त्र होकर पात्र-चरित्र विकसित होते हैं। किन्तु कामायनी में पात्र और घटनाएँ लेखक की भावना के अधीन हैं। कथानक घटनाएँ पात्र आदि तो वे विशेष सुविधा-रूप हैं कि जो सुविधा रूप लेखक यको अपने भाव प्रकट करने के लिए चाहिए। इसलिए कामायनी में कथावस्तु फैण्टेसी के रूप में उपस्थित हुई है और उस फैण्टेसी के माध्यम से लेखक आत्मजीवन को और उस आत्म-जीवन के प्रतिबिम्बबित जीवन-जगत के बिम्बों को और तत्सम्बन्धी अपने चिन्ता को, अपने जीवन-निष्कर्षों को प्रकट कर रहा है।13
इस कथन से एक मुख्य बात जो छनकर आती है वह यह कि फैण्टेसी में कवि या लेखक का सम्पूर्ण व्यक्तित्व अहम रोल अदा करता है। इस में उसके जीवनानुभव, लोकानुभव, उसकी इच्छाएँ, सपने और द्वन्द्व आदि परस्पर घात-प्रतिघात करते हुए कतिपय ऐसे सुविधाजनक प्रतीकों का चयन एवं सक्षेपण करते हैं जो कल्पना की मदद से ही संभव होते हैं।
सम्भवतः इसीलिए मुक्तिबोध भाव-पक्ष को फैण्टेसी के अन्तर्गत प्रधान और विभाव-पक्ष को गौण और प्रच्छन्न मानते हैं।
काव्य-कला में भाव-पक्ष प्रधान होता है, इस पर तो कोई विवाद ही नहीं, किन्तु क्या यह भाव-पक्ष बगैर विभव-पक्ष के प्रकट हो सकता है? अगर होता है तो उसमें कितनी कला संभव हो पाएगी? बगैर सम्मूर्तन के- जो कि विभाव का कार्य ही है, और कला-मात्र का विशिष्ट लक्षण और चरित्र है। मुक्तिबोध फैण्टबेसी को प्रधान या मुख्य माते हुए यह सब जो कह रहे हैं, क्या पश्चिम और पूर्व के कला और साहित्य-चिन्तक स्वीकार करने को तैयार हैं? अगर वे समस्त सृजन-व्यापार को फैण्टेसी कह रहे हैं, तब तो बात अलग है?
एक सवाल यह भी है कि वे उत्कट अनुभव-क्षण को कला का पहला चरण मानते हुए भी उसे फैण्टेसी से बाहर रखते हैं और उसकी शुरुआत दूसरे क्षण से मानते हैं- दूसरा क्षण है, इस अनुभव का अपने कसकते- दुखते हुए मूलों से पृथक हो जाना और एक ऐसी फैण्टेसी का रूप धारण कर लेना, मानो वह फैण्टेसी अपनी आँखों के सामने खडी हो।14 प्रश्न है कि क्या प्रथम क्षण मात्र स्विच-ऑन जैसी प्रक्रिया है जिसे रोमाण्टिकों ने प्रेरणाके सिद्धान्त के रूप में व्यक्त किया है? किन्तु यह तो सम्पूर्ण कला-व्यापार में प्रवाहित रक्त की तरह जकडता रहता है और तब तक निःशेष नहीं होता जब तक कि सर्जना अपना पूर्ण स्वरूप प्राप्त नहीं कर लेती।
मुक्तिबोध के यहाँ क्या ऐसी अहमियत इस पहले क्षण को मिली हुई है? उत्तर नहीं में ही होगा।
दूसरे क्षण में मानो वह फैण्टेसी अपनी आँखों के सामने ही खडी हो में मुक्तिबोध जो उत्प्रेक्षा करते हैं, उसका मतलब किसी मानसिक धुँधलेपन से है क्या? अन्यथा मानो लगाने की जरूरत क्यों?
तीसरे क्षण में जब शब्द-बद्ध होने की प्रक्रिया शुरू होती है- यानी कला का अभिव्यक्ति-प्यापार शुरू होता है, तब वह फैण्टेसी अपने मूल रूप को बहुत कुछ त्यागती हुई नवीन रूप धारण करती है, उनके अनुसार प्रथमक्षण निस्सन्देह अनुभव का क्षण है। उसके बिना आवेग और आगे की गति असम्भव है।
इन बातों को दुहराते हुए मैं यह समझना और जानना भी चाहता हूँ कि इस पूरी सृजन-प्रक्रिया में पाठक कहाँ है? क्या कलाकार द्वारा प्रयुक्त शब्द बगैर किसी समाज-बोध के हैं? तब मुक्तिबोध ने इस चौथे- यानी कला की प्रयोजनीयता वाले क्षण की चर्चा क्यों यनहीं की?
प्रश्न यह भी है कि हिन्दी के कवि-चिन्तक मुक्तिबोध जहाँ या जिस परम्परा से फैण्टेसी शब्द या पारिभाषिक पद उठाते हैं वहाँ क्या यह शब्द उसी रूप में ग्रहण किया जाता और इसी अर्थ में माना जाता है? इन सवालों पर विचार करने मुक्तिबोध फंतासी और रचना-प्रक्रिया के लेखक डॉ. एस.श्यामराव इसे सृजन-शिल्प करार देते हैं। यह अलग बात है कि यह शिल्प उनके कथ्य से मिलकर ऐसा एकीभूत हो चुका है कि नींद, सपना और उसे देखने और भोगने वाली सारे घटक गिरा अरथ जल बीचि सम हो गए हैं। तभी तो नामवरसिंह इसे स्वप*-कथा कहते हैं। इस स्वप* का कितना अर्थ मनोवैज्ञानिक है, कितना समाज-शास्त्रीय - यह विचारणीय है।
मुक्तिबोध की काव्य-प्रतिभा के जाने-माने मुरीद कवि- आलोचक अशोक वाजपेयी अपनी पुस्तक कविता के तीन दरवा*ो के पृष्ठ दौ सौ आठ पर लिखते हैं - उनका फैंटेसी का सिद्धान्त प्रसिद्ध है, पर उसकी पूरी चरितार्थकता उनकी कविता में नहीं हो पाई है। जिस तीसरे क्षण की प्रस्तावना करते हैं वे तीसरे क्षण उनकी कविता में कम ही आ पाए है। आगे की पंक्तियों में वे यह भी कहे बगैर नहीं रहते कि सिद्धान्त और कविता के बीच एक दूरी बनी रहना लगभग अनिवार्य है। मुक्तिबोध के अनुभव, सचाई और वैचारिकी के बीच फाँक है और इसे लेकर उनका अहसास तीखा-गहरा है।
श्री वाजपेयी फैण्टेसी सिद्वान्त पर कनखियों से देखते हुए मुक्तिबोध के काव्य और फैण्टेसी के सम्बन्धों की स्थिति की ओर मुड गए हैं। मुक्तिबोध के पहले से उलझे हुए सिद्धान्त से उलझना शायद उन्हें और भी उलझनपूर्ण लगा होगा। तब भी वे मुक्तिबोध की ईमानदारी, संवेदन-शक्ति और विचार निष्ठ के कायल रहे। इसी सन्दर्भ में आगे के पैरा में वे और बात लिखते हैं -मुक्तिबोध ने तीन संघर्ष एक साथ होने की बात की है : तत्त्व के लिए संघर्ष, अभिव्यक्ति को सक्षम बनाने के लिए संघर्ष और दृश्टि विकास के लिए संघर्ष। 16 तब भी निष्कर्ष पर आने के क्षणों में वे यह कहना जरूरी मानते हैं कि उनके द्वारा प्रस्तावित फैण्टेसी की प्रक्रिया स्वयं उनकी कविता में ही कई बार फलीभूत नहीं होती। और उसे दूसरे कवितयों की प्रक्रिया समझने में मददगार नहीं जाना या पाया जा सकता।17
वाजपेयी भले ही मुक्तिबोध की कविता में फैण्टेसी को फलीभूत होते न पाते हों, किन्तु शमशेर चाँद का मुँह टेढा है की भूमिका एक विलक्षण प्रतिभा शीर्षक से लिखते हए अपना यह स्पष्ट अभिमत रखते हैं कि मुक्तिबोध की शक्तिशाली मानवतावादी रोमानियत में अमूर्त का सविस्तार मूर्तिकरण, समाजवाद के धरातल पर प्रतिष्ठित किए जाने के कारण एक ऐसी प्रखर स्पष्टता धारण कर लेता है कि जिसमें भयानक से भयानक विदू*प से विद्रूप और कोमल से कोमल भी, फैण्टेसी को हम मानो अपनी साँस में पहसूस कर सकते हैं।18 यह भी उनका ही वाक्य है उनके भावों के ज्वार के पीछे विचरों का दीर्घ दोहन है।19
सच तो यह कि मुक्तिबोध द्वारा प्रतिपादित जो कला का दूसरा क्षण है, वही फैण्टेसी का पिता भी है और अभिभावक भी। उसे अगर अज्ञेय के कथन से समझना चाहें तो शायद आसानी हो- मेरे लेखन में यह चीज़ स्पष्ट है ही कि घटना जो सिर्फ बाहर दीखती है और कोई भी दृश्य लक्षण उसका नहीं होता। यह सम्भव है कि उसके बाद कोई कर्म ऐसा हो जिससे कि आप सोच सकें कि इसके पीछे जरूर ऐसा अभ्यंतर कर्म रहा होगा। लेकिन असल घटना तो वह अभ्यंतर घटना होती है। लेकिन अब सोचता हूँ कि इसके आगे जिसको आज बहुत से लोग फैंटेसी या कि फंतासी की बात करके अपने लिए रास्ता बनाते हैं। एक तरफ तो यथार्थवादी होने का आग्रह करते हैं और दूसरी तरफ फंतासी की रचना करते हैं और अपने सामने यह प्रश्न नहीं रखते कि अगर इसमें एक अन्तर्विरोध होगा तो उसका क्या जवाब हमारे पास है। मेरे लिए तो जवाब कम कठिन है, क्योंकि मैं फैण्टेसी को यथार्थ से अलग नहीं करता हूँ।
प्रश्नकर्ता गोपालदास अगला सवाल करते हैं- स्वप* को 2. अज्ञेय कहते हैं - स्वप* को भी उससे अलग नहीं करता हूँ। और अलग जो कर्म हम करते हैं कर्म प्रेरणा का उसमें महत्त्व है तो उसकी बहुत-सी पहचान क्योंकि हमें स्वप* या कि फैंटेसी के माध्यम से होती है, इसलिए कर्म का सही मूल्यांकन करने के लिए वहाँ तक जाना, मैं तो अनिवार्य भी मान सकता हूँ।19
अज्ञेय के इस कथन से यह बात प्रकट होती है कि फैण्टेसी एक अन्तर्विरोध की कला है जहाँ रचनाकार का बाह्य और अभ्यन्तन एक-दूसरे से लय हो जाने की साधना करते हैं और अन्ततः एक ऐसी वैचारिक यात्रा पर निकल पडते हैं जिसमें सर्जक का आत्म और पर प्रायः टकराते हुए दिखते हैं। निश्चय ही मुक्तिबोध अपने आत्म से उस तरह विलग नहीं हो पाते जैसा कि एक यथार्थवादी के लिए सम्भव है। वे भोक्ता के रूप में तो दर्शक की भूमिका में रहते ही हैं दर्शक की भूमिका में पहुँच कर भी वे भोक्ता के आकर्षण को त्याग नहीं पाते। इसलिए यह कह पाना बेहद कठिन है कि वे कितने यथार्थवादी हैं कितने आवेग कुबेर रोमान्टिक। उनकी कविता चाहे जहाँ से होकर गुजरे, चाहे जिन बीहड रास्तों से गुजरे उनका आवेग-समृद्ध व्यक्तित्व उनके जटिल और भयावह अंधकारग्रस्त रास्तों पर उनका बाँह अनवरत गहे रहता है। केवल यात्रा का प्रकाश ही नहीं, सर्जना की दीप्ति बनकर वह हमेश उनका पथ-प्रशस्त करता रहता है।
फैण्टेसी के सन्दर्भ में जिस मनोस्वप* की बात बार-बार की जाती है, वह जितना मनोवैज्ञानिक है, उनका ही सांस्कृतिक और दर्शनिक भी है। इसी लिए मुक्तिबोध की फैण्टेसियाँ बेहद जटिल और उलझी हुई है और वे इसे छिपाते भी नहीं बल्कि किसी अदृश्य भविष्य की ओर इशारा करते हुए करहते हैं -
यहाँ मिल सके मुझे
मेरी वह खोयी हुई
परम अभिव्यक्ति अनिवार
आत्म-सम्यवा।
उनकी फैण्टेसियों में अगर प्राणमय अनबन है, तो इसी कारण है।
मुक्तिबोध के द्वारा प्रस्तावित कला के इन तीन क्षणों को अगर सृजन-प्रक्रिया व्यापार माना जाता है, जोकि हैं ही तब इस सन्दर्भ में भारतीय टीकाकार समुद्रबन्ध की टीका अलंकारसर्वस्व की याद आना स्वाभाविक है। भाभह के शब्दार्थी साहेतौ काव्यम् के सन्दर्भ में समुद्रबन्ध शब्दार्थ साहित्य की टीका करते हुए तीन काव्य-प्रक्रियाओं का कथन करते हैं 1. धर्ममुख, 2. व्यापार मुख और 3. व्यंग्यमुख।20
इसकी व्याख्या करते हुए नया साहित्य नए प्रश्ा* शीर्षक अपने आलोचनात्मक ग्रन्थ में आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी लिखते हैं - काव्य की मीमांसा प्रमुखतः तीन भूमियोंपर होती है। पहली भूमि कल्पना-तत्त्व से सम्बन्धित है। इसे ही आधुनिक शब्दावली में सृजन-प्रक्रिया कहा जाता है।
मुक्तिबोध के अनुसार सम्भवतः यही कला का दूसरा क्षण है जहाँ अनुभवात्मक सामग्री हृय धारण करने की स्थिति में आती है। सृजन की इस प्रक्रिया का सक्रिय हो उठना ही मेरी अपनी दृष्टि में फैण्टेसी है। कारण यह कि इसमें रूप भी है और रूप को चरितार्थता प्रदान करने की सामर्थ्य भी। रूप को यह चरिताथर्ता बगैर उस समग्र काव्यानुभव के संभव न हो सकेगी जिसके अन्तर्गत संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदन आते हैं। ऐसी स्थिति में अशोक वाजपेयी के इस कथन से सहमत होना कठिन है कि वे तीसरे क्षण उनकी कविता में कम ही आ पाए हैं।
सामान्य जो निष्कर्ष यहाँ पहुँच सोचा जा सकता है वह यही कि मुक्तिबोध केवल जटिल युग-बोध के नहीं संदिग्ध मूल्यबोध के भी कवि हैं। तुलसी, प्रसाद और निराला की तरह वे द्वन्द्वमुक्त व्यक्तित्व के नहीं द्वन्द्व रहित व्यक्तित्व के कवि हैं। केवल सत्य और यथार्थ नहीं बल्कि सत्य और सत्य के बीचद वे एक बीहड सत्यान्वेषी की तरह हलाकान दिखते हैं। इसलिए असमंजस और गैर समझौता परस्ती उनके ईमान के दो छोर हैं जिनके बीच उनकी संघर्षपूर्ण यात्रा जारी रहती है। यह यात्रा यद्यपि किसी अदृश्य लक्ष्य की प्राप्ति के लिए है, किन्तु बाहय परिस्थितियाँ इसके सर्वथा प्रतिकूल हैं। अकरण नहीं कि वे स्वयं और उनके आलोचक यह स्वीकार करते हैं कि वे अधूरी कविताओं के विरल सर्जक और शिल्पी हैं।
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सन्दर्भ
1. मुक्तिबोध रचनावली : चार पृष्ठ ८४-८५
2. मुक्तिबोध रचनावली : चार, पृ. ८५
3. सन्दर्भों के लिए देखें- मुक्तिबोध रचनावली : चार, पृ. 84 से 88 तक
4. सन्दर्भों के लिए देखें- मुक्तिबोध रचनावली : चार, पृ. 194
5. मुक्तिबोध रचनावली : चार, पेपरबैक, पृ. 195
6. वहीं पृ. 196
7. स्मरणीय अरस्तू का अनुकरण सिद्धान्त-कला नकल नहीं पुनर्रचना है।
8. मुक्तिबोध रचनावली : चार, पृ. 196
9. डॉ. रामअवध द्विवेदी- साहित्य सिद्धान्त, पृ. 108-110
10. मुक्तिबोध रचनावली : चार (कामायनी विवेचन) पृ. 195
11. मुक्तिबोध रचनावली : चार (कामायनी विवेचन) पृ. 200
12. वहीं, पृ. 200
13. मुक्तिबोध रचनावाली : चार- पृ- 200-201
14. वही, पृ. 85
15. मुक्तिबोध फंतासी और रचना प्रक्रिया, पृ. 113
16. कविता के तीन दरवाजे-अशोक वाजपेयी, पृ. 209
17. वही. पृ. 261-102
18. चाँद का मुँह टेढा है, मुक्तिबोध, पृ. 27
19. अज्ञेय अपने बारे में - आकाशवाणी प्रकाशन, पृ. 70
20. भारतीय साहित्यशास्त्र- डॉ. गणेशत्र्यंबक देशपाण्डे, पृ. 128

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