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निर्मल वर्मा : जहाँ शब्द प्रार्थना हैं

प्रियंका दुबे
देश के उत्तर पूर्व तक खिंच आयी हिमलाय पर्वत शृंखला के सफेद पहाडों को देखते हुए हर रोज अपनी सुबह करने वाले आदिवासी गाँवों में भटक रही हूँ। यहाँ हर जगह मोबाइल नेटवर्क नहीं मिलता। लेकिन जहाँ मिलता है, वहाँ कई बार फोन कॉल के साथ साथ इंटरनेट भी फोर-जी पर मक्खन की तरह चल पडता है। सिक्किम में बिताए एक ऐसे ही अच्छे इंटरनेट वाले दिन साफ नीले आसमान में चमकते कंचनजंघा को देखते हुए मैंने आँखें खोली। और फिर थोडी ही देर बाद फोन-स्क्रीन पर रेंगते स्पॉटिफाई ऐप में जाकर प्ले का बटन दबा दिया। जिस स्पॉटिफाई ऐप पर मैं सुजान सौन्टैग और डेविड फॉस्टर वॉलिस जैसे अपने अन्य प्रिय लेखकों की आवाजें सालों से सुनती आ रही थी, उस पर अपनी भाषा के अपने सबसे प्रिय लेखक निर्मल वर्मा की आवाज सुनने का यह मौका मेरे लिए अभी नया नया ही था। निर्मलजी की प्रिय किताबों पर उनका एक पॉडकास्ट - वह पूरे पंद्रह मिनट का! कंचनजंघा को देख पाने की शीरी उनकी आवाज में घुलकर जैसे मेरी आँखों से कानों तक उतर रही थी।
टोलस्टोय की वार एंड पीस, प्रूस्त की रिमेम्बरेंस ऑफ थिंग्स पास्ट, टॉमस मान की डॉक्टर फाउस्ट और हमारी भाषा के उपन्यासकार रेणु का मैला आँचल- अपनी इन चार प्रिय किताबों के बारे में बात करते हुए निर्मलजी जिस भावनात्मक तरलता में भीग जाते हैं, उसी को सुनकर मेरे अन्दर यह कतरा भर साहस आया कि मैं इस लेख में उनके गद्य के अपने होने पर पडे दीर्घकालिक प्रभाव के बारे में दो टूटी पंक्तियाँ लिख सकूँ।
निर्मलजी के पठन-पाठन पर यूँ तो मैंने उनके कईं निबन्ध पढ रखे हैं। लेकिन यह पॉडकास्ट मेरे लिए खास इसलिए था क्योंकि इसको सुनते हुए मैं निर्मलजी की आवाज में उनके अपने प्रिय उपन्यासों के प्रति उनके निर्बाध प्रेम और लालित्य को महसूस कर पा रही थी।
वह किताबें आखिर क्या है अगर वह मन के भीतर की झील में जमी हुई बर्फ को कुदाली की तरह नहीं तोड देती - काफ्का के इस प्रसिद्ध वाक्य से उपन्यासों पर अपनी बातचीत शुरू करने वाले निर्मलजी की पाठकीय दृष्टि यहाँ भी गहरी और पैनी थी। लेकिन साथ ही हर क्षण कथ्य के प्रति विस्मय और करुणा से भरी हुई भी थी। उनकी पूरी बातचीत और आवाज में कथ्य के साथ साथ मनुष्य के भी संसार में होने से जुडा वही विस्मय है, जो मेरी करुणाविहीन पीढी से लगभग खोता-सा जा रहा है।
एक ओर रूढिवादी आलोचकीय दृष्टि कई बार किताबों के विश्लेषणात्मक विवेचना पर अत्यधिक जोर देने की पुरानी प्रक्रिया में टेक्स्ट के अन्य सभी सम्भव पाठों को इमप्रेशनिस्टिक के सीमित खाँचे समेटेने की कोशिश करती रही है। इस खाँचे के ठीक उलट निर्मलजी यहाँ इन महान उपन्यासों के अपने पाठ में उतने ही उत्सुक, उदार, संवेदनशील और विमोहित नजर आते हैं जितने वह खुद अपने टेक्स्ट में होते हैं। इन उपन्यासों का उनका उदार पाठ एक तरफ जहाँ पैशन से उपजने वाली पाठकीय आलोचना के लिए नए रास्ते खोलता है वहीं दूसरी ओर एक पाठक के तौर पर खुद मुझे भी निर्मलजी के लिखे को उसी आवेग से पढने और समझने की अनुमति भी देता है- बिना एक भावनात्मक पाठक होने की ग्लानि के बोझ के तले दबे हुए।
निर्मलजी के गद्य से मेरा पहला परिचय यूनिवर्सिटी के पहले साल के दौरान भोपाल में हुआ था। 2005 की सर्दियाँ में वे दिन की एक पुरानी प्रति मेरे हाथ में आयी और फिर जैसे कभी हाथों से पूरी तरह उतरी ही नहीं। आने वाले सालों में एक रिपोर्टर के तौर पर देश के भीहड कोनों में भटकते हुए ऊपर से नजर आने वाला मेरा सार्वजनिक जीवन यूँ तो भीड से भरने लगा था, लेकिन अन्दर ही अन्दर मेरी होना और *यादा जख्मी और अकेला होता जा रहा था। यहाँ एकान्त-प्रिय एकाकी की जगह अकेले शब्द का प्रयोग सोच समझ कर रही हूँ, क्योंकि दोनों शब्दों की अनुगूँजों के साथ साथ मेरा उनको जीना भी बिल्कुल अलग अलग है। अपना एकान्त मुझे भाता है, बल्कि बहुत प्रिय है। असल में वह एक दुर्लभ स्पेस जिसे मैंने जी-तोड मेहनत से अपने जीवन में अर्जित किया है वह मेरा एकांत ही है। लेकिन अकेलापन इस एकान्त को जीने जितना सरल और समृद्ध करने वाला कभी नहीं रहा।
मुझे अभी तक अपने अकेलेपन की ठीक ठीक समझ नहीं है। लेकिन जो भी सीमित समझ है उसमें मुझे लगता है कि यह लगतार एक काली खोह में गिरने जैसी भावना मेरे पेट में न समझे जाने की वजह से सबसे *यादा उपजती है। साथ ही यह भी कि मैं उस दुर्भाग्यपूर्ण पीढी में भी बडी हो रही थी जो स्मार्ट फोन और सोशल मीडिया की बीस खुली हुई खिडकियों के बीच में खडी होकर लगातार बढते बाजारवाद, जातिवाद, और हर तरह की हिंसा से लगातार जूझ रही है। सोशल मीडिया पर कनेक्टेड रहने के आभास ने शायद हमें पहले से *यादा अकेला बना दिया था। सत्ताईस बरस की उम्र तक आते आते मैं शहरों के जीवन से इतना आजिज आ चुकी थी कि हरी घास के मैदान देखकर देर तक रोती। ऐसा शायद इसलिए भी हो रहा था क्योंकि 2000 के उस दशक में स्कूल जाने वाले किशोरों को अवसाद ढूँढना नहीं पडता था। अवसाद खुद हमें ढूँढता हुआ हमारे पास चला आता था- और फिर हमारे मन पर यूं कब्जा जमा के बैठ जाता जैसे हमारा मन हमारा नहीं, अवसाद का हो।
मेरे काम और जीवन में मौजूद हिंसा मुझे निर्मलजी के टेक्स्ट के और करीब लेकर आयी। हाल ही में मैंने बेंजामिन मोजर द्वारा लिखी गई सुजान सौन्टैग की जीवनी में पढा था कि सुजान को जब भी उदासी होती, तो वह अपनी किताबों और जेहन के सुरक्षा घेरे में खुद को छिपा लेती.... आई फ्लाई टू द सेफ्टी ऑफ माई माइण्ड। मेरे लिए बहुत बरसों तक यह सुरक्षा घेरा निर्मलजी के गद्य ने खींचा। वे दिन, एक चिथडा सुख, रात का रिपोर्टर, अन्तिम अरण्य, चीडों पर चाँदनी, धुंध से उठती धुन के साथ-साथ उनके पत्रों और कहानी संग्रहों भी सारी किताबें मेरा निजी सुरक्षा घेरा थीं। आज भी हैं।
जब भी मैं शब्दों में इक्कीसवीं सदी के भारत के भारत में बडी हो एक लडकी की पीडा का अनुवाद नहीं कर पाती और सामाजिक बदवाल लाने के साथ साथ प्रेम के निजी मोर्चे पर भी खुद को हारा हुआ पाती तब निर्मलजी किताबें मेरे युवा नाजुक मन के लिए उन जख्मों का अनुवाद कर देतीं। मुझे शायद उनकी किताबों में वह दोस्त मिल गया था जिसको मैं सारी दुनिया में ढूँढती फिरती थी और हर बार सिर्फ सिफर हाथ में लेकर लौटती थी। उन किताबों और उनके किरदारों में मेरी न समझे जाने की पीडा जैसे फैल कर बँट जाती थी।
बीते दिनों सिक्किम की बौद्ध मोनेस्ट्रियों में फिरते हुए मेरी कई बौद्ध भिक्षुओं से लम्बी चर्चाएँ होती रही। सभी ने एक सुर लागाकर बातचीत के दौरन किसी भी साधना में गुरु के महत्व पर जोर दिया। एक घुँघराले बालों वाले युवा भिक्षु तो अक्सर कहते कि बहुत कोशिश करने पर बिना गुरु के आप खुद को संयमित तो कर लेंगी। लेकिन यदि खुद अपने होने और अपने लिखने में खुद को ट्रांसेंड करना चाहती हैं या खुद से पार पाना चाहती हैं तो शायद वह बिना गुरु के सम्भव न हो पाएगा।
इस पर जब मैं हमेशा से अपनी प्रेरणा रहे महाभारत के पात्र एकलव्य का सन्दर्भ छेडती तो वह आगे जोडते कि अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, एकलव्य ने भी तो द्रोणाचार्य को अपना गुरु माना ही था। दिन पर दिन इस बारे में सोचती और गुनती तो एक ही नाम मन में बार बार सिर उठाता। निर्मलजी का नाम।
इस बात में कोई शुबहा ही नहीं है कि एक मनुष्य के तौर पर निर्मलजी के गद्य से मैं लगातार शिक्षित होती रही हूँ। लेकिन एक इतने मेहनती और समर्पित लेखक का शिष्य कहलाने की पात्रता और योग्यता अर्जित करना मेरे जैसे संघर्षरत व्यक्ति के लिए अभी दूर की कौडी है। सहमति-असहमति से परे निर्मल वर्मा एक बहुत मेहनती, अनुशासित और असाधारण संकल्पशक्ति वाले लेखक थे। वह जिन्होंने सारा जीवन शब्द को समर्पित कर दिया।
जब तक हर रोज बिना नागा के चौदह से सोलह घण्टे पढाई लिखाई को समर्पित नहीं करेंगे, एक सादे-सच्चे मितव्ययी लेखकीय जीवन की ओर नहीं बढेंगे, विनम्रता के साथ साथ संशय और उत्सुकता को भी जीवन में स्थान नहीं देंगे और जब तक शब्द को प्रार्थना की तरह नहीं बरतेंगे तब तक निर्मलजी के साहित्यिक शिष्य होने की पात्रता कैसे अर्जित की जा सकती है ?
उनका शिष्य होने भर के लिए भी मैं अभी त्रुटियों का पुलिन्दा हूँ । मुझमें न वह संकल्प शक्ति है और न ही वह सोलह घण्टे प्रतिदिन पढने लिखने का अनुशासन जिसे हम निर्मलजी से सीख सकते हैं।
फिर कभी कभी सोचती हूँ - जिस लेखक के गद्य ने कई साल पहले मरने से बचा लिया था मुझे, अब उन्हें गुरु भी बनाना है मुझे! आखिर क्यों? उन दिनों जब अन्धेरे में डूबती उतरती हुई रोज मर जाने की इच्छा में डूबी रहा करती थी तब तो दिमाग में इतना कोहरा जमा हो गया था कि गुरु के महत्त्व पर भी ठीक से अपना मन टटोल नहीं पाती। अब जब साँस बच गयी, तो यह नहीं की सब्र कर लूँ थोडा। जो जीवन मिला है इसको बोनस के साल समझ कर शुक्र मनाऊँ लूँ पर पढ लिख लूं दो अक्षर। लेकिन इसकी बजाय मेरा मन निर्मलजी का शिष्य बन पाने की पात्रता में पीछे रह जाने पर ही अँधेरों में घिर जाता है।
कभी कभी यह सोच कर विस्मय होता है मुझे कि एक मरती हुई लडकी भी जब निर्मल वर्मा के लिखे गद्य जैसा कोई दुर्लभ गद्य पढकर जान से जाते जाते बच जाती है तो कैसे-कैसे सपने देखने लगती है ! कोई सीमा है मनुष्य के लालच की ?
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