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संवाद निरन्तर

बौद्धिक विवेक की सम्पादन दृष्टि
प्रभात रंजन
राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका मधुमती से मेरा विशेष जुडाव रहा है। 1998 में मेरा एक लेख इस पत्रिका में प्रकाशित हुआ था जो नंदकिशोर आचार्य की कविता पर था। संयोग से यह मेरा पहला आलोचनात्मक लेख था। इसलिए यह पत्रिका हमेशा मेरी मधुर यादों का हिस्सा रही है। यह बात जरूर है बतौर लेखक ही नहीं बतौर पाठक भी इस पत्रिका से वह जुडाव नहीं रह गया था। लेकिन हाल के वर्षों में मधुमती ने, काम किए हैं वह बडी व्यावसायिक पत्रिकाएँ भी नहीं कर पाई हैं। मधुमती ने अपने आपको शोध और विचार की गम्भीर पत्रिका के रूप में स्थापित किया है और हिंदी जगत में व्याप्त एक बडे शून्य को भरने का काम किया है। सबसे पीछे सूत्रधार के रूप में रहे हैं युवा संपादक ब्रजरतन जोशी।
अब कुछ बातें पत्रिका के उन अंकों की करते हैं जिनके आधार पर मैंने उपरोक्त टिप्पणी की है। वैसे तो हर अंक में एक से अधिक पठनीय रचनाएँ होती हैं। जिनके कारण पत्रिका के अंकों को हम सहेज कर रखने लगे हैं। जो नई बात आकर्षित करती है मधुमती की ओर वह है इसके हर अंक में भाषा, साहित्य, दर्शन, इतिहास के मूर्धन्यों का स्मरण किया जाता है। उनको लेकर गम्भीर लेख प्रकाशित किए जाते हैं। जैसे अक्टूबर 2021 के अंक की बात करते हैं। इस एक अंक में रामविलास शर्मा के इतिहास दर्शन और उनके देशाभिमान को लेकर प्रकाश मनु का लेख है, डी. डी. कोशांबी की इतिहास दृष्टि को लेकर हितेंद्र पटेल का लेख है, आनंद कुमारस्वामी और भारतीय बहुलता की अवधारणा को लेकर लेख है। इसके अलावा भी बहुत सारे लेख हैं। लेकिन मैं जिस बात को रेखांकित करना चाह रहा हूँ वह यह है कि मधुमती के प्रत्येक अंक में ऐसे विद्वानों के विचारों को लेकर चर्चा होती है जिनको हिंदी परिदृश्य पर भुला दिया गया है।
इस संदर्भ में इसके विशेषांकों की चर्चा भी जरूर करना चाहूँगा। अभी हाल में ही हिंदी सिनेमा के अप्रतिम गीतकार भरत व्यास पर एक यादगार अंक आया जो सच में संग्रहणीय है। ऐ मालिक तेरे बंदे हम, जोत से जोत जगाते चलो/ प्रेम की गंगा बहाते चलो जैसे गीतों को कौन भूल सकता है, लेकिन भरत व्यास को लोग भूलने लगे थे। उनकी स्मृति को लेकर इतना संपूर्ण अंक देखकर अपनी भाषा के इस अमर गीतकार के ऊपर गर्व भी हुआ और संपादकीय दृष्टि और श्रम को देखकर अचरज भी हुआ। इस अंक में भरत व्यासजी पर उनके भाई और गुजरे जमाने के अभिनेता बी. एम व्यास, फिल्म निर्माता निर्देशक वी शांताराम, अमीन सायानी के लेख हैं तो भरत व्यास के नाटकों पर पृथ्वीराज कपूर का भी लेख है। इसी पत्रिका से पता चला कि किसी जमाने में भरत व्यास अभिनंदन ग्रंथ भी प्रकाशित हुआ था और एक गीतकार के रूप में उनका सम्मान उसी तरह से था
जिस तरह से नरेंद्र शर्मा का था। अनेक कवियों ने हिंदी फिल्मों के लिए गीत लिखे, लेकिन फिल्मी दुनिया में बहुत कम लोगों को वह सम्मान मिला जो भरत व्यास जी को मिला। इस अंक में भरत व्यास जी के गीतों पर राजेंद्र बोडा और मालचंद्र तिवाडी के लेख भी पठनीय हैं।
बात विशेषांकों की चल रही है, तो याद आया कि मधुमती ने दिसंबर 2021 के अंक में दिवंगत लेखिका मन्नू भंडारी को श्रद्धांजलि स्वरूप कईं लेख प्रकाशित किए। प्रियदर्शन, मधु कांकरिया, सुधा अरोडा, हेतु भारद्वाज के लेखों से मन्नूजी संपूर्णता में समझने में मदद मिलती है। इसके अलावा भी मन्नूजी के लेखन पर कुछ लेख हैं। मुझे याद नहीं आ रहा है कि मन्नू के निधन के बाद किसी और पत्रिका ने उनके साहित्यिक अवदान को लेकर इतना विस्तृत अंक निकाला हो। इस तरह के आयोजन बिना गहरी साहित्यिक सूझबूझ के संभव नहीं हो सकता। इसी अंक में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पर कनक तिवारी का लेख पढे जाने लायक है। किस तरह बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में अपने लेखन और संपादन के द्वारा उन्होंने हिंदी का कैनन बनाने का काम किया। यह लेख उनकी साहित्यिक यात्रा को समझने में बहुत मददगार है। इसी अंक में पंकज पराशर का लेख है हिंदुस्तानी संगीत और गाँधीजी जो कमाल का लेख है। इससे पहले गाँधी और संगीत को लेकर मैंने कभी नहीं पढा था। इतने शोधपूर्वक और श्रमपूर्वक यह लेख लिखा गया है कि इसको पढकर ही समझा जा सकता है। उसी तरह जिस तरह संगीत का आनंद सिर्फ सुनकर ही लिया जा सकता है। मुझे याद नहीं आता है इससे पहले किस पत्रिका के एक अंक में इतनी सारी पठनीय सामग्री एक साथ पढी थी। यह अंक मैंने अपने पास जिल्द करवाकर रख ली है।
वास्तव में किसी पत्रिका की एक दृष्टि होती है उसका एक मकसद होता है। इस समय हिंदी की किसी भी पत्रिका के सामने यह मकसद होना चाहिए कि हिंदी में बडे पैमाने पर नए बनते पाठक वर्ग की रूचि की सामग्री का प्रकाशन ही न करे बल्कि उस नए बनते पाठक वर्ग को हिंदी की साहित्य और संस्कृति की विराट परम्परा से जोडने का काम भी करे। हिंदी का इस समय अनेक रूपों में विस्तार हो रहा है। नयेपन की माँग बहुत बढी है। नई-नई तरह की विधाओं में लेखन हो रहा है। लेकिन इस नयेपन को बुनियाद से जोडे रखने का काम भी ऐसे दौर में सबसे जरूरी है। नहीं तो तमाम माध्यमों, विधाओं की उपस्थिति के कारण डिजिटल मीडिया की सक्रियता के कारण हमारे गौरवपूर्ण साहित्य-संस्कृति को लोग भूलने लग सकते हैं। उनकी याद लगातार दिलाते रहना इस समय की सबसे बडी जरूरत है। मुझे यह कहने में किसी तरह का संकोच नहीं है कि मधुमती पत्रिका ने अपनी इस जिम्मेदारी को बहुत अच्छी तरह से समझा और पूरी जिम्मेदारी के साथ उसका निर्वहन भी किया है। आप पत्रिका का कोई भी अंक उठा लें आपको मेरी बात पुष्ट होती लगेगी। हर अंक के पीछे पूरी तैयारी होती है और संपादकीय दृष्टि एवं विवेक का परिचय मिलता है।
उदाहरण के लिए फरवरी अंक में ही देख लीजिए। यह कोई विशेषांक नहीं है। एक सामान्य अंक है। लेकिन इस अंक में नेहरु का समाजवाद और आधुनिक भारत लेख है, जिसके लेखक हैं प्रेम बहुखण्डी। इस लेख में नेहरु के विजन का बहुत गहरा और विस्तृत मूल्यांकन लेखक ने किया है। इस तरह का लेखन हिंदी में मौलिक रूप से हो सकता है यह बात आश्वस्तिकारक है। इसी तरह मिथिलेश कुमार तिवारी का लेख महामारी और मानवाधिकार का विमर्श संदर्भः कोविड 19 महामारी को बिलकुल अलग तरह से देखने वाला लेख है। बात फरवरी अंक की चल रही है तो त्र्यम्बक नाथ त्रिपाठी के लेख महाभारत : क्लोज रीडिंग की चर्चा जरूर की जानी चाहिए। इस लेख में लेखक ने लेखक ने यह महत्वपूर्ण स्थापना की है कि जय, भारत और महाभारत तीनों अलग अलग नैरेटिव हैं। इस तथ्य को सामने रखने के पीछे जो कारण मौजूद हैं उनका सबका संकेत आज हमारे सामने प्राप्त महाभारत पाठ में है। विचार के ऋम
में मेरा मानना है कि इसको काव्य, महाकाव्य, इतिहास, आख्यान आदि न कहकर पाठ के रूप में देखना ठीक रहेगा। यह बहुत अलग तरह की स्थापना है। सहमति-असहमति अपनी जगह है, लेकिन इस प्रकार की रीडिंग हमारे गौरव ग्रंथों को समकालीन बौद्धिक परिवेश से जोडने का काम करते हैं। इस साहसिक और श्रेष्ठ बौद्धिक प्रयास के लिए लेखक बधाई के पात्र हैं।
मधुमती के हर अंक पर विस्तार से लेख लिखा जा सकता है, लेकिन फिलहाल अधिक न लिखते हुए नवंबर 2021 में प्रकाशित पुरुषोत्तम अग्रवाल के लेख नेहरु क्यों? की चर्चा करना चाहूँगा। यह लेख पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक कौन हैं भारतमाता की भूमिका का संक्षिप्त रूप है। कहने की जरूरत नहीं है कि नेहरु के विचारों को संपूर्णता में समझने के लिए यह एक उपयोगी लेख है। ऐसे समय में जब देश में बौद्धिकता को लगातार प्रश्नित किया जा रहा है, मधुमती लगातार बौद्धिक परिदृश्य को बनाए रखने का काम मजबूती के साथ कर रही है। जिस पत्रिका ने मुझे लेखक के रूप में आरम्भिक पहचान दी आज वही पत्रिका युवाओं को नई तरह से जोडने का काम कर रही है, उनको बुद्धि और विचार संपन्न बनाने के मुहिम में लगी हुई है। इसके लिए संपादक ब्रजरतन जोशी और उनकी टीम बधाई की पात्र है। राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका होते हुए भी इस पत्रिका ने एक राष्ट्रीय दृष्टि बनाने का काम किया है। मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि इस समय हिंदी में जितनी पत्रिकाएँ नियमित रूप से निकल रही हैं उनमें मधुमती का स्थान अव्वल है। यह राष्ट्रीय समझी जाने वाली पत्रिकाओं के अवसान का काल है। केंद्र के विघटन का दौर और परिधि के विस्तार का। इस संक्रमण को मधुमती ने बडे विवेकपूर्ण ढंग से समझा और एक बडे शून्य को भरने का काम किया है। नई पुरानी रचनाशीलता का ऐसा समन्वय दुर्लभ है। यह निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है।

* सुख्यात रचनाकार प्रभात जानकीपुल के सम्पादक हैं।