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मुहब्बत का कुबूलनामा ...तुम्हें भूल चुका हूँ

रवि शुक्ल
मौसिकी की दुनिया में अपना जलवा पेश करने के बाद जनाब अमित गोस्वामी ने जिस भी वजह से अपने अहसास को शाइरी में जाहिर करने का मंसूबा बनाया हो, वो अलग है, मगर अच्छी शाइरी के चाहने वालों के लिये बहुत ही नेक काम किया है। आप शुरुआती दौर से ही अदबी शौक और जौक रखते आए हैं और उस मुतालअ (अध्ययन) का ही नतीजा है कि आपका शाइरी की दुनिया में नक्श-ए-अव्वल ही कमाल की सूरत और सीरत लेकर मंजर-ए-आम पर आया है। किताब के हर वरक में मिसरों के दरमियान गोशानशीन उर्दू जबान से बेपनाह अकीदत और मुहब्बत करने वाला वो संजीदा शायर पोशीदा है, जिसकी शिनाख्त दुनिया-ए-अदब में अमित गोस्वामी के नाम से की जाती है। जबान-ए-उर्दू से अमित कितनी मुहब्बत करते हैं, ये उन के इस शेर से मालूम चल जाएगा :
मैंने चाहा है जिसे यूँ तो मुकम्मल है, मगर
इक कमी है कि उसे उर्दू नहीं आती है
शाइर ने दस्तकशी में ऐलान किया है -
इस मज्मूए को पढते वक्त अगर आपकी किसी किरदार से मुलाकात हो, और आपको लगे कि यह किरदार सिर्फ खयाली है तो यकीनन मैं कलम के साथ इन्साफ नहीं कर पाया। इसके बरअक्स अगर आपको कोई हकीकी किरदार नजर आ जाता है, तो मैं समझूँगा कि मेरा कलाम कामयाब हुआ।
इस बात से ही शाइर की पुरखुलूस हस्सास तबीयत और जिम्मेदारी का पता चलता है, कि वह अपने कलाम को लेकर संजीदा है। मज्मूए का उनवान महबूब को भूलने का एलान तो करता है मगर कामयाब गज़लें कहकर उनको यकजा कर के एक जगह किताब की शक्ल में ब उनवान तुम्हें भूल चुका हूँ रखकर तारीख में अपनी जगह बना लेता है।
मेरे सुखन की अलामत फकत ये दो मौजूअ
विसाल-ए-यार का इमकाँ फिराक-ए-यार का दुख
दस्तानों में कहीं जिसकी मेरा जिक्र न था
दास्तानें मेरी सारी उसी गुलफाम की हैं
इन गजलों और नज़्मों को किताब की शक्ल में लाने का मेरा मुसलसल इसरार अमित से रहा था और खुशी है कि उन्होंने मेरे इसरार का मान रखा और एक अरसा-ए-दराज के बाद बेहद पुरकशिश किताब के साथ अमित ने शाइरी की दुनिया में दस्तक दी है। मुझे यकीन है इस मज्मूए कि वरक गर्दानी करते हुए आप भी इस बात से मुतअस्सिर होंगे कि सरोद पर मौसिकी का जादू बिखेरने वाली उँगलियाँ जब कलम थाम कर गजल लिखती हैं तो उनके अल्फाज का जादू भी कुछ कम नहीं होता।
अमित और मैं एक ही शह्र के हैं, तो अदब के मुतअल्लिक तवील गुफ्तगू होती रहती है। इसलिए इनमें से बहुत सी गजलों के और उनके एक-एक शेर के होने का मैं गवाह रहा हूँ। जितनी नजाकत इन गजलों और नज़्मों में अपने महबूब के लिए खयालों को बयान करने में पिन्हां है उस से कहीं ज़याद-संगदिली एक-एक शेर और एक-एक गज़ल के इंतखाब में शाइर ने दिखाई है। बेहद सख्ती से काम लेते हुए शेर और कहीं-कहीं तो पूरी गज़ल ही खारिज कर दी गई है, तब कहीं जाकर एक मुकम्मल शेरी मज्मूआ मंजर-ए-आम पर आया है।
उर्दू अदब में इस शेरी मज्मूए के साथ जनाब अमित गोस्वामी ने तुम्हें भूल चुका हूँ के साथ जो दस्तक दी है वह यकीनी तौर पर उनके अदबी जौक के बरअक्स उनके मुस्तकबिल के लिये मुत्मईन करती है। किताब की किताबत, वरक, लिखावट भी बहुत खूब है, छपाई पुरअसर और दीदाजेब है। कवर पेज मुहतरमा अपरा जी ने डिजाइन किया है जो किताब के उनवान के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा है, जिसमें गैब से नजर आती एक परछाईं है, तो उसका इंतज़ार भी है। सारा माहौल अपने महबूब के साथ मुखातिब होता हुआ। यह मज्मूआ बोधि प्रकाशन, जयपुर ने शाया किया है।
मज्मूए में तीन हिस्से हैं- गज़लें, नज़्म और कतआत हैं। ज़ाती तौर पर मुझे गज़लें ही ज़यादा पसन्द आती हैं। मगर ईमानदारी से कहूँ, तो अमित को मैं नज़्मों का शाइर मानता हूँ। उनकी गज़लों की ही तरह उनकी नज़्में भी बेहद खूबसूरत हैं, और इस किताब में भी उन्होंने नज़्मों के साथ पूरा इंसाफ किया है। तमाम नज़्में न केवल अपने मौजू को लेकर शानदार हुई हैं, बल्कि फन्नी एतबार से भी कोई कमी नजर नहीं आती है।
एक खास बात जो आपको हर जगह समझ आएगी वो ये है कि अमित के कलाम में सब जगह एक जाहिराना अन्दाज पोशीदा है, जो महबूब को सब कुछ बता देना चाहता है, मगर इशारों में। शाइरी इशारों का ही सिन्फ है, तो उनकी ये कोशिश कामयाब भी हुई है। मिसाल के तौर पर उनकी नज़्म का एक हिस्सा जो उन्होंने इन्तिसाब के वरक पर इस्तेमाल किया है मुलाहिजा फर्माएँ -
उसी के नाम
जिसका नाम
इन गज़लों में, नज़्मों में
छुपा भी है
नुमायाँ भी
अमित गालिब, फैज और फराज़ के तसव्वुर और खयाल से बेहद मुतअस्सिर हैं। जो कि उनके हर अगले वरक की खूबसूरत गज़लें, नज़्मों, और कतआत में महसूस होता है ।
इस किताब के इंतिसाब के चंद अल्फाज़ से ही एक रास्ता खुल जाता है, कि हम इस मज्मूए को पढते हुए शाइर के साथ किस सफर पर गामज़न होंगे। आप जब अमित गोस्वामी की शाइरी से इस मज्मूए के मार्फत वाबस्ता होंगे तो आप महसूस करेंगे कि शाइर ने मुहब्बत की तर्जुमानी के लिए न सिर्फ बहुत ही नज़ाकत से अल्फाज़ का इन्तिखाब किया है बल्कि रंग-ए-तगज्जूल को खूबसूरती से निभाया भी है। यह एहसास मुसलसल आफ ज़ह्न-ओ-दिल को अपनी आगोश में लिये रहते हैं और शाइर की कुव्वत-ए-गोयाई की तस्दीक करते हैं। मिसाल के तौर पर चंद अशआर मुलाहिजा फरमाएँ -
बदन दरीदा हूँ या तक कि अब तो जाता रहा
कबा-ए-चाक-ओ-गिरेबान-ए-तार तार का दुख
तल्खियाँ दिन भर की बोझिल शाम शब के रतजगे
ज़ंदगी मुश्किल तो थी नामेहरबाँ ऐसी न थी
मैं एक आहनी पुज़ार् हूँ ज़ंग-आलूदा
तू मिकनातीस तेरी दस्तरस की कैद में हूँ
लहजे की नज़ाकत और तस्वीरी सिफत वाले अशआर बहुत ही खूबसूरती से बयाँ हुए हैं। इनकी मंजरकशी शाइरी के मकसद को पूरा करती है और शेर-ओ-सुखन के चाहने वालों के सामने शाइरी के पैकार से नजर आते हैं। चंद अशआर देखिये-
वफा, तुम्हीं से वफा, फिर तुम्हीं से अहद-ए-वफा
यही खता है जो मैं बार-बार करता रहा

कोई गिनता रहे रातों को सितारे कब तक
ताक से सूखे हुए ख्वाब उतारे कब तक
लबों पर हँसी है दिल में उदासी के बावजूद
वो यूँ कि तेरा नाम गज़ल में फिर आ गया
अमित गोस्वामी की शाइरी में जो एक खास बात आप को देखने को मिलेगी वह है फन्नी खूबसूरती। गज़ल में कहीं भी भर्ती के अल्फाज़ या शेर नज़र नहीं आते हैं इसीलिये शायद कुछ अशआर जो गजल होने से रह गये, कतआत की शक्ल में इस किताब में शुमार किये गये हैं। एक-एक लफ्ज़ बडी किफायत से और सलीके से कतआत में आपने इस्तेमाल किया है। इस लिहाज से आप एक कामयाब शाइर है और आपकी शाइरी में एहसास-ओ-अफ्कार की तर्जुमानी बडी खूबसूरती के साथ हुई है,
खयाल-ए-फुरकत-ए-जानाँ से काँप जाता हूँ
तसव्वुर-ए-गम-ए-हिजराँ से काँप जाता हूँ
उसे मैं पा न सका आज तक मगर फिर भी
मैं उसके खोने के इम्काँ से काँप जाता हूँ
अमित का कलाम पढते हुए हम अपने आप से करीबतर होते जाते हैं, और हम अपने महबूब से गुफ्तगू करते हुए से लगते हैं, और लगता है कि यह तो हमारी ही बात की जा रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि आम इंसान खयाल तक महदूद रह जाता है और शाइर शेर की शक्ल में कागज पर उतार देता है। जनाब अमित गोस्वामी ने यही काम ईमानदारी के किया है
दुख अपने बता दूँगा तो अच्छा नहीं होगा
सब ज़ख्म दिखा दूँगा तो अच्छा नहीं होगा
कुछ तेरी नजाकत के हवाले हैं गज़ल में
महफिल में सुना दूँगा तो अच्छा नहीं होगा
बहुत ही कम वक्त में आपने शाइरी में आला मुकाम हासिल किया है। आप तखलीकी एतबार से रवाँ दवाँ और सरगर्म हैं, इसलिये उन्हीं का एक शेर आप के हवाले कर रहा हूँ -
उम्मीद-ए-आमद-ए-शाइस्ता गाम से तेरी
चमन में कलियाँ चटखने लगी हैं सिलसिलेवार
अदब की दुनिया में इस पहले कदम के लिये मैं अमित गोस्वामी को तह-ए-दिल से मुबारकबाद पेश करता हूँ। अल्लाह उन के हौसले को दोबाला करे। मैं दुआगो हूँ कि आने वाले वक्त में उनके जरीए ऐसे और बेशकीमती कलाम काराईन तक पहुँचे और लगातार पहुँचते रहें। इल्म-ओ-अदब में आप का मर्तबा और वसीअ हो। तुम्हें भूल चुका हूँ बावजूद अपने उनवान के आप सबके जह्न-ओ-दिल में हमेशा बना रहे और मंजर-ए-आम पर कामयाबी की मिसाल बने। आमीन।

पुस्तक का नाम : तुम्हें भूल चुका हूँ
लेखक : अमित गोस्वामी
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर
प्रकाशन : वर्ष 2021
मूल्य : 150 रुपये मात्र
विधा : कविता

ग्राम व पोस्ट ऊदासर,
जिला बीकानेर ।
पिन 334022
फोन नं - 9024323219