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कविता की अलग पगडण्डी

चन्द्रकुमार
वियोगी होगा पहला कवि /
आह से उपजा होगा गान
निकल कर आँखों से चुपचाप /
बही होगी कविता अनजान
सुमित्रानन्दन पन्त का यह बहु-उल्लेखित कवितांश यहाँ इसलिये मौजूँ है क्योंकि कविता क्या है, इस पर काव्यशास्त्रियों, अकादमिक आलोचकों और यहाँ तक भी कि खुद कवियों-लेखकों तक में कोई एक राय नहीं बन पाती है। तो फिर कविता दरअस्ल किसे कहा जाए? छन्द मुक्त होने के बाद तो यह प्रश्न और भी गहरा गया है। लेकिन इस लगातार चल रही बहस से - मेरी समझ में- जो एक तथ्य हासिल हुआ है उससे एक बात तो तय है कि कविता अन्ततः हमारे अनुभवों का (किंचित्) लयात्मक संप्रेषण है। कवि-आलोचक नन्दकिशोर आचार्य जिसे अनुभूत्यात्मक अन्वेषण कहते हैं, दरअस्ल कविता हमारे अनुभवों और संवेदनाओं के रास्ते हमारे यथार्थ या सत्य की खोज के अलावा और क्या होती होगी? लेकिन अन्ततः वह लोक तक कैसे पहुँचती है, समाज की संवेदनाओं को किस स्तर पर छूती या टटोलती है और समाज कविता के जरिये उन संवेदनाओं को कैसे और कितना आत्मसात् कर पाता है, यह उस कविता / रचना की श्रेष्ठता की कसौटियाँ है। वस्तुतः कविता -अपने किसी भी रूप में - संवेदनाओं के वाहक के रूप में ही हमारे सामने आती है। कविता का प्रभाव उससे गुजरते हुए और तत्पश्चात् अदृश्य बन कर हमारी सोच में उतरता है। तभी वह अपने मूल उद्देश्य तक पहुँचती है जो किसी कवि के अनुभव को पाठक का अनुभव भी बना दे, उसकी संवेदनाओं में छटपटाहट पैदा कर दे, और पाठक के आत्म में कुछ नया जोड दे। कविता अन्ततः अपने समय का दस्तावेज ही है जिसमें समय-देशकाल हमेशा ध्वनित होता है।
विनोद पदरज की कविताओं के बारे में बात करें तो हम पाएँगे कि अपने परिवेश के सटीक व मार्मिक चित्रण की बहुलता के कारण उन्हें सहज ही लोक का कवि या देशज संवेदनाओं के कवि के रूप में देखा जाता रहा है। लेकिन इस एकल खाँचे में उनका पूरा कविता-कर्म तो छोडिए, क्या उनका नया संग्रह आवाज अलग अलग है भी सही फिट बैठता है? कविता, बल्कि व्यापक अर्थों में किसी भी प्रकार का सृजनात्मक लेखन कर्म, दरअस्ल परकाया प्रवेश करने की विधा है। इसमें कवि-लेखक का मैं जब तक हम में रूपान्तरित नहीं होता, वह अकादमिक रूप से कविता या लेख तो हो सकता है, लेकिन सार्थक लेखन की कसौटी पर वह तब तक खरा नहीं उतरता जब तक उसमें अपने समाज की पीडा, वेदना, दुःख, करुणा या सुख समाहित नहीं होता। कालजयी कवि-लेखकों के यहाँ यह रूपान्तरण इतना सूक्ष्म और हृदयस्पर्शी होता -है कि वह लेखक की आवाज के साथ ही समाज का स्वर भी बन पाता है। यही कारण है कि उन की रचनाओं को हम सहज ही आत्मसात् करते हैं। विनोद पदरज के यहाँ भी अपने समय-देशकाल की वही टीस और वेदना प्रमुखता से झलकती है और इसी वजह से कुछ लोग उन्हें लोक जीवन का कवि कहने में संकोच नहीं करते। लेकिन यह उनके वृहद वितान वाले कविता-कर्म का एक आयाम मात्र है।
उनकी कविताओं में स्त्री-चित्रण (मैं जानबूझकर यहाँ स्त्री-विमर्श के प्रयोग से बच रहा हूँ) बहुत मुखर है; हालाँकि कवि स्त्री जीवन की जद्दोजहद को सप्रयास अपनी कविताओं में लाते हों, ऐसा कहीं प्रतीत नहीं होता। जितनी सहजता से वह स्त्रियों की व्यथा-कथा, उनकी विवशता और जीवन के जंजाल को कविताओं में पिरोते हैं, वह गहन संवेदना और आत्मानुभव के बिना संभव ही नहीं है। उनकी कविताओं में स्त्री दशा का कोई एकाकी स्थूल चित्र नहीं बनता बल्कि कविता पढते हुए पाठक की नम आँखों के सामने वह सजीव दृश्यों की तरह महसूस होती है, जिस में पात्र, जो कि आसपास के जीवन से ही हैं, थमें नहीं है वरन् कालचक्र की धीमी गति से धीरे-धीरे ओझल होने की जगह हमारे कलेजे में धँसते चले जाते हैं और स्थायी रूप से वहीं बस जाते हैं। संग्रह की पहली कविता गाडी में गृहस्थी कुछ इस तरह पूर्ण होती हैः
तिरपाल ढँकी गाडी के नीचे /
किसी अन्तरँग क्षण में /
धराणी से कहा होगा /
तुम्हें कडे घडाऊँगा इस साल।
इसी तरह शुरुआत कविता की ये पंक्तियाँ किसी भी समाज में अन्ततः स्त्री को उसकी जगह बताने से गुरेज न करने वाली स्थितियों का चित्रण हैः
उसे कहाँ मालूम था / कि यह तो शुरुआत थी
गैबी के मर्द होने की / उसके औरत होने की।
विस्थापन कविता में स्त्री के भाग्य से बँधी जद्दोजहद और उसकी अपनी पहचान का संघर्ष बहुत ही मार्मिक तरीके से बयाँ होता हैः वे वंशज नहीं हैं / वंश वाहिकाएँ हैं।
इसी तरह संग्रह की कुछ अन्य कविताओं जैसे स्त्रियाँ, चींटियाँ, आँधी में झाडू, जिसने प्रेम किया, और दादी इत्यादि कविताओं से गुजरते हुए महसूस होता है कि स्त्री-जीवन के कितने आयाम हैं जिन्हें मुख्यधारा में शायद जगह न मिली हो, लेकिन विनोद पदरज की कविताओं में उनके आख्यान किसी निजी अनुभव सरीखे हैं जिनमें उनके भीतर का मनुष्य किसी अदृश्य विवशता से लगातार जूझते हुए महज बयान ही नहीं कर रहा वरन् देख-सुन-सह भी रहा है। यह उनकी कविता के ठेठ स्थानिक होने के साथ ही उनके मानवीय पक्ष का आईना भी प्रतीत होता है जिसमें बिम्ब समान उभर आये दृश्य उनकी संवेदनाओं के धागों से बँध कर एक माला के रूप में पाठकों के सामने आते हैं। छोटे आख्यान रूपी कविताएँ लेकिन हर कविता में वही दर्द, चिन्ता और अन्ततः मानवीय क्षोभ।
कविता की व्याख्या के सन्दर्भ में काव्यशास्त्रियों और आलोचकों द्वारा यह देखा जाता है कि क्या कवि अपनी भाषा, भाव, शिल्प, कथ्य और अनुभव से कुछ नया जोड रहा है? कविता विचार नहीं होती, लेकिन किसी विचार को पोषित करे, तो कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। दरअसल कविता में विचार पानी पर बने किसी अक्स सरीखा होना चाहिए- मौजूद भी हो और बिना किसी आहट या बेवजह दखलंदाजी से मुक्त। कविता कोई आख्यान भी नहीं होती। लेकिन जब आप विनोद पदरज के कविता संसार से गुजरते हैं, तो आपको बहुत से बन्धनों से बाहर आना पडेगा। लेकिन तब भी, उनकी कविता का संप्रेषण इतना तीक्ष्ण होता है कि आप देर तक उन कविताओं को अपने साथ पाते हैं। साधारण-सी महसूस होने वाली बातें जब विनोद पदरज की कविता में मुख्य कथ्य बनती है तो पाठक ठिठकता है कि इतनी सहज बात जो उसके सामने लगातार घट रही है, वह उसे आखरि सोच क्यों नहीं पा रहा था। एक कवि के रूप में किसी भी सर्जक का अन्तिम तो नहीं, किन्तु मूल प्रयास यही होना चाहिए कि पाठक उसकी रचना को ऐसे देखे जैसे कवि का अनुभव खुद उसके भीतर उमडा हो। विनोद पदरज की कविताएँ पढते हुए पाठक यह अनुभूति बार-बार करेगा।
मंगलेश डबराल कहते थे कि सरल होना साधारण होना नहीं है। जब पाठक विनोद पदरज के कविता-संग्रह आवाज अलग-अलग है से रूबरू होते हैं, तो मंगलेशजी का यह कथन बार-बार मन में कौंधेगा। भाषा में कहीं कोई अमूर्तन नहीं, बिम्ब और प्रतीक ऐसे जो संस्कृति के बिल्कुल बीच में विद्यमान है, और भाषा की सहजता ऐसी कि एक बार पढना शुरू करें तो खत्म कर के ही मन माने। हाँ, अपनी चिर-परिचित लय में सोचते - गुनते वह कई गूढ देशज या स्थानिक शब्दों का प्रयोग करते हैं ताकि उनके भाव और सृजन की तारतम्यता बनी रहे। यह कुछ पाठकों को शायद कविता के मूल मर्म तक जाने में परेशानियाँ पैदा करें, लेकिन तब भी, उनका सहज कथ्य व उनके बिम्ब के जरिये पाठक उस मर्म के पास पहुँच ही जाता है। चूँकि कोई भी रचनाकार जब कुछ रच रहा होता है, तब वह इस पर कम विचारता है लेकिन उम्मीद करनी चाहिए कि उनके आगामी संग्रहों में, पाठकों की सुविधा के लिये, देशज व स्थानीय शब्दों के मानक हिन्दी अर्थ भी साथ हों ताकि रचना के पाठकों का फलक विस्तार पाये। हालाँकि अज्ञेय ने अपनी डायरी में कभी यह यक्ष प्रश्न अंकित किया था कि क्या भाषा और संवेदना अलग-अलग हो सकती है? जाहिर है, कवि अपनी संवेदना अपनी भाषा में ही संप्रेषित करेगा लेकिन वृहद पाठक समाज की सुविधा के लिये उनसे यह अपेक्षा की जा सकती है कि कुछ शब्दों के मानक हिन्दी अर्थ भी पाठकों को उपलब्ध करवाएं। इससे कविता की पहुँच ही बढेगी।
कविता में सहजता-सरलता और सपाट बयानी में बहुत ही महीन फर्क होता है। कविता वक्तव्य है या विचार, या संवेदना का प्रभावी संप्रेषण, इस पर बहुत कहा जा चुका है। कविता को नयी ऊर्जा देने वाले कवि धूमिल तक अपने आरंभिक काल में यह मानते थे कि कविता पहले एक सार्थक वक्तव्य होता है। लेकिन वक्तव्य भी संवेदना और भावपूर्ण होते हैं जब वे कविता में ढलते हैं। विनोद पदरज की कविताएँ छोटे-छोटे वक्तव्यों वाले आख्यान सरीखी दिखती है, लेकिन यह उपजाऊ जमीन पर अचानक तेज धूप से आयी पपडी के समान है जो ऊपर तो सख्त दिखती है, लेकिन उसी सख्त परत के नीचे की जमीन नमी से पूर्ण है। उनके यहाँ आख्यान-सरीखी कविताएँ सहजता से अपने विभिन्न अर्थ खोलती हैं। यही कारण है कि सहज होने के बावजूद उनकी कविताओं के संकेत काफी गहरे होते हैं। जैसे तीसरा पहर बीत गया कविता में गाँव के वरिष्ठ जनों की दशा में उनकी यह मारक पंक्ति- उनकी भाषा के पँख झड गये हैं। इसी तरह की सहज लेकिन मारक पंक्तियाँ उनकी आख्यान-सी कविताओं के बीज बन कर पाठक के लिये बहुत से दरवाजे खोलती है जिससे वह लोक जीवन और लोक चेतना में प्रवेश करता है। दरअस्ल यही सरल और सपाट कविता का मूल भेद है कि सरल होते हुए भी उनकी कविता सपाट बयानी नहीं है क्योंकि वे अपने अनुभवों को गहरे तक पैठने देते हैं और तब ही उनके अनुभव कविता बन कर व्यक्त होते है। यह उनकी कविता की खूबी है कि सरल होने के बावजूद वृहद समाज की टीस और उनके मन में जो अन्तर्द्वन्द्व पनपते हैं, वे सहजता से कविता में आ बसते हैं। यह सहजता ही उन्हें लोक चेतना का स्वर बनाती है। उनकी कविताओं से गुजरते हुए पाठक अपने को समृद्ध होता पाता है। वह महसूस करता है कि अपने परिवेश से वह इतना कटा हुआ कैसे रह गया जिसे कवि ने अपनी दृष्टि से देख कर उसके खालीपन को भर दिया है। कविताओं से रूबरू न होता तो वह कितना कुछ खो चुका था।
पैंसठ कविताओं वाले इस संग्रह में बीच-बीच में कुछ कवितांश डाल कर चार उपखण्डों में विन्यासित किया गया है। हर उपखण्ड में लगभग एक स्वभाव की कविताएँ शामिल है। संग्रह की सभी कविताओं की बात करना तो यहाँ संभव नहीं है, लेकिन एक पाठक के नाते समुद्र किनारे, पहला प्रसव, बया, पानी, तीसरा पहर बीत गया, कटण, चैत्र, कृषकमेघ व कृषकमेघ-2, दिन, बुरे से बुरा आना बाकी है, और अन्तिम उपखण्ड में मानवीय रिश्तों की दशा-दिशा बयान करती कविताएँ जैसे माँ, बेटी, माँ और पिता, मिट्टी, छडी, और जगर मगर अँधेरा इत्यादि कविताएँ निश्चय ही पाठकों की संवेदनाओं के तार झकझोरेंगी। कविता संग्रह की अन्तिम कविता जीवन हमारे चक्रीय जीवन के तमाम पक्षों को पल भर में हमारे सामने रखती है। वास्तव में संग्रह में शामिल कविताएँ एक तरह से कवि विनोद पदरज की बडी रेंज से हमारा परिचय करवाती है जिसमें अपनी संस्कृति, समाज, परिवेश, देश-काल और मानवीय रिश्तों की संवेदनाओं को बारीकी से पेश किया गया है।
कवि विनोद पदरज के काव्य-संसार की पडताल में बहुधा सहज और सरल कविता का जिक्र होगा जिसमें लोक जीवन बसता है। यहाँ लेखन में सरलता और इग्नोरेंस में भेद की बात करना भी बहुत जरूरी है ताकि कोई भ्रम न पैदा हो। सरलता से अपनी बात पाठक तक पहुँचाना हर कवि-लेखक का स्वप्न होता है, लेकिन यह सरलता दरअसल सब कुछ जानने के पश्चात प्राप्त किसी सिद्धी सरीखा होता है। इसे कोई यों ही हासिल नहीं कर सकता। यह संप्रेषण का वह उत्कृष्ट रूप है जो आपकी बात सहजता से संप्रेषित करने में सक्षम होता है। यहाँ शब्द बेवजह खर्च नहीं होते और भाषा की सहजता-सरलता कथ्य को सीधे अन्तर्मन तक ले जाती है। एक तरह से जीवन के खाँटी अनुभवों और विभिन्न ज्ञानानुशासनों में दीक्षित होने के बाद उपजा लेखन भाषा को निराकार करने सरीखा होता है जहाँ शब्द और अर्थ के बीच कुछ और है ही नहीं। विनोद पदरज की कविताएँ उसी पथ पर अग्रसित है जहाँ लोक जीवन के उनके अनुभव पाठक में लोक चेतना के प्रति सजगता पैदा करने में सफल होती है। वह कह सकते हैं कि आवाज अलग-अलग है, लेकिन उनकी कविता एक समवेत स्वर है। संभावना प्रकाशन से प्रकाशित यह कविता संग्रह अपने श्वेत-श्याम चित्र से बने आवरण से ही पाठक को अन्दर खींचते दिखता है लेकिन भीतर विनोद पदरज की दिपदिपाती कविताओं से रोशन संसार है जो हमारे चारों ओर विद्यमान है, किन्तु जिसे हम लगभग अनदेखा करते हुए चलते हैं।

पुस्तक : आवाज अलग अलग है (2021)
लेखक : विनोद पदरज
प्रकाशक : संभावना प्रकाशन, हापुड
मूल्य : 150/-
विद्या : कविता

सम्पर्क : ७०२, एमराल्ड, यूडीबी, नन्दपुरी अण्डरपास, अशोक विहार, मालवीय नगर,
--जयपुर - ३०२०१७ (राज.) मो. ९९२८२६१४७०