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प्रेम तत्त्व और नाट्यशास्त्र : विचार का व्यवहार

प्रवीण पाण्डया
प्रेम ढाई आखर है और इन ढाई आखर को पढे बिना जीवन जीने का पाण्डित्य नहीं सध पाता है। कबीर की इस उक्ति में कथनभंगिमा का चमत्कार मात्र नहीं है। इसमें जीवन जीने के एक दृष्टिकोण की पूरी परम्परा की अनुगूँज है। प्रेम को महान् पुरुषार्थ कहना हो या प्रेमगली में दो के समाने की बात हो, इनमें काव्य है और काव्य अनिवार्यतः परम्परा होता है। कारण कि वाक्य इकहरा हो सकता है, प्रायः होता है, किन्तु काव्य में यह सम्भव नहीं है।
डॉ. रमाकान्त पाण्डेय की पुस्तक प्रेमतत्त्व : द्वैत से अद्वैत की यात्रा प्रेम के तत्त्व और उसके प्रसार-दोनों पर विचार करती है। तत्त्व को जतलाने के लिए वह भावप्रकाश और उज्ज्वलनीलमणि जैसे शास्त्रीय ग्रन्थों की ओर जाते हैं तो प्रसार को पकडने के लिए वाल्मीकि, व्यास, भास, कालिदास, भवभूति, बाणभट्ट, अमरूक, जायसी, तुलसीदास, असमिया कवि शंकरदेव आदि कवियों तक की यात्रा अपनी छोटी-सी पुस्तक में करते हैं। डॉ. पाण्डेय संस्कृत साहित्यशास्त्र और साहित्य के प्रतिष्ठित विद्वान् हैं। अतएव प्रेमतत्त्व की परख में काव्यशास्त्रीय चिन्तन समाया हुआ है और रामानुज, वल्लभ आदि दार्शनिकों की स्थापनाओं पर भी विचार हुआ है। प्रेम को परिभाषित करते हुए पाण्डेय लिखते हैं-वस्तुतः, प्रेम द्वैतभावापन्न परमेश्वर का भावात्मक बन्धन है। (पृ.2) प्रेम को भावात्मक बन्धन कहा गया है और इसमें बन्धने वालों को द्वैत भाव को प्राप्त हुआ भगवान् बताया है।
स्नेह, अनुराग, श्रद्धा, स्त्री-पुरुष रति-ये सभी प्रेम के रूप हैं। प्रेम व्यापक है। स्त्री और पुरुष के बीच का आकर्षण ही प्रेम नहीं है, किन्तु वह भी प्रेम है ही, यदि वह भावात्मक बन्धन है। रूप गोस्वामी के उज्ज्वलनीलमणि को लेखक उद्धृत करते हैं-
सर्वथा ध्वंसरहितं सत्यपि ध्वंसकारणे।
यद्भावबन्धनं यूनोः स प्रेमा परिकीर्तितः।।
ध्वंस कारण के विद्यमान होने पर भी जो कभी नष्ट नहीं होता, युवक और युवती का वह पारस्परिक भावबन्धन प्रेम कहलाता है। (पृ.2-3)
यह प्रेम द्वैत से आरम्भ होता है और अपनी परिणति में अद्वैत तक पहुँचता है। युगल यदि एकमेक नहीं हो पाता है और दो की आभिमानिक सत्ता बनी रहती है तो यह प्रेम का कच्चा रह जाना है। लेखक स्पष्ट करते हैं कि पारस्परिक विनिमय और पारस्परिक भावबन्धन-दो भिन्न वस्तुएँ हैं-

वासना विनिमय पर केन्द्रित होती है, जबकि प्रेम समर्पण पर। प्रेम मानव के उत्कर्ष का मार्ग है, वासना उसके अधःपतन का। वासना इन्द्रियतृप्ति का साधन है किन्तु प्रेम आत्मानन्द का प्रशस्त मार्ग है। आत्मानन्दात्मक प्रेम भक्ति है। (पृ.13)
भक्ति काव्य की पडताल करते हुए लेखक जीवन की उपादेय दृष्टि को रेखांकित करते हैं-
काव्य लोक का परित्याग कर शास्त्र की भाँति केवल आध्यात्मिक फल का झाँसा नहीं देता। उसकी दृष्टि में लोक और अध्यात्म दोनों समान हैं। लौकिक सुखों की कामना उतनी ही प्रामाणिक है जितनी आध्यात्मिक फल की। लौकिक सुख का अपलाप कर केवल अध्यात्म के सहारे जीवन चक्र चलाना अति कठिन और अविश्वसनीय है। (पृ. 31)
यहाँ लेखक की यह बात ठीक है कि काव्य लौकिक और अलौकिक के बीच समन्वय करता है। परन्तु न तो प्रत्येक शास्त्र लोक के परित्याग की बात करता है और न प्रत्येक काव्य इस समन्वय को साधता है। काव्य और शास्त्र की यह तुलना पुनर्विचारणीय है।
सबसे महत्त्वपूर्ण है कि लेखक भक्ति और श्रृंगार के बीच अन्तः सम्बन्धों पर विचार करता है। संयोग और वियोग-दोनों श्रृंगार समर्पण, प्रदान तथा त्याग से उज्ज्वल है। विरह तभी सम्भव होता है कि जबकि व्यक्ति वासना से ऊपर उठकर प्रेम की आग में तप जाए। डॉ. पाण्डेय के अनुसार सम्पूर्ण भागवत महापुराण भक्ति का ही काव्यात्मक रूप है। (पृ.32) अर्थात् भागवत एक साथ महाकाव्य और भक्तिशास्त्र-दोनों है। भागवत श्रीकृष्ण की आराधना के लिए भक्ति की शास्त्रीय प्रतिष्ठा करता है-
श्रीमद्भागवत भक्तिरस से परिपूर्ण पुराण है। यहाँ भक्ति और कविता परस्पर ऐसे ओत-प्रोत हैं कि दोनों में पार्थक्य कर पाना भी कठिन हो जाता है। भक्तिप्रवण व्यास की वचनावली रस और शास्त्रीय तत्त्वों की समन्वित त्रिवेणी है। अनेक वैदिक सूक्त और श्रुतिवचन भागवत की कविता में सहज होकर प्रवहमान दृष्टिगोचर होते हैं। निर्गुण ब्रह्म की सगुणता की भाँति यहाँ काव्यनिष्ठ भक्ति का आस्वाद चमत्कृत और भावविह्वल कर देता है। (पृ. 31)
पुस्तक संपादक संजय झाला ने अपने सम्पादकीय का शीर्षक रखा है-प्रेमः देह से विदेह हो जाने की यात्रा। वह लिखते हैं-यह सही है कि प्रेम का जन्म भौतिक धरातल, देह के धरातल पर होता है लेकिन उसकी सार्थकता तब है, जबकि वह आध्यात्मिक धरातल को प्रभावित करे। रमाकान्त पाण्डेय अपनी 47 पृष्ठों की इस पुस्तक में देह से आरम्भ करते हैं और विदेह तक की व्याप्ति तक का एक पूरा प्रबन्धात्मक आलेखन करते हैं। प्रेम तत्त्व पर यह पुस्तक गंभीर चर्चा की प्रस्तावना है। लेखक की बडी व्याप्ति के साथ प्रेमतत्त्व पर लेखनी चलायी है।
नाट्यशास्त्र के संक्षिप्त पाठ का हिन्दी अनुवाद
भारत की अनेक परम्पराएँ हैं और उनमें कुछ जाग्रत्, कुछ सुप्त हैं। नाट्यशास्त्र एक ऐसी परम्परा है, जो विविध स्तरों पर है और अपने समग्र तथा विराट् रूप में अभी पूर्णतः प्रकट नहीं है। अन्य रंगमंचों और फिल्म से इसकी अपनी निजता है और उसे ठीक-ठीक पहचाना नहीं गया है। राधावल्लभ त्रिपाठी हमारे समय के बडे अध्यवसायी और आचार्य हैं। करीबन चालीस वर्षों से वह नाट्यशास्त्र के चिन्तन-मनन और अध्ययन-अध्यापन से जुडे हुए हैं। नाट्यशास्त्र के गिने-चुने विद्वानों में वह विशिष्ट हैं। नाट्यशास्त्र की गम्भीरता की थाह उन्होंने ली है और उनके अनुसार भारतीय सांस्कृतिक गुरुता के पाँच ग्रन्थों के नाम बताए जाने हो तो उनमें एक नाट्यशास्त्र है। समीक्ष्यमाण पुस्तक की महत्ता यह है कि इसका निर्माण आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी द्वारा राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय स्तर की कार्यशालाओं में नाट्यशास्त्र पाठन के लिए किया गया है।
यह पुस्तक का नाट्यशास्त्र का चयनित पाठ नहीं कहकर संक्षिप्त पाठ कहा गया है। चयनित पाठ विशिष्ट पाठ होता है और वह प्रायः अधूरा होता है। संक्षेप में पाठ पूरा होता है। यह संक्षिप्त पाठ का हिन्दी अनुवाद है। इसमें मूल नहीं दिया गया है। इसके अगले संस्करण में मूल पाठ को पाद टिप्पणी या परिशिष्ट में शामिल कर दिया जाए तो ग्रन्थ अधिक उपादेय होगा। पाठ का संक्षेप संस्कृत शास्त्र परम्परा दो तरह से करती है-एक, मूल पाठ में से ही विस्तारार्थक पाठ को छोडते हुए चयन द्वारा और दूसरा, स्वयं रचित श्लोकों में संक्षेपण करते हुए। यहाँ प्रथम तरीके से संक्षिप्त पाठ बनाया गया है। इस पुस्तक की भूमिका में संक्षेपकर्ता आचार्य का कथन पुस्तक की विशिष्टता को प्रकाशित करता है-
प्रस्तुत पुस्तक में भरतमुनिप्रणीत नाट्यशास्त्र के समस्त सैंतीस अध्यायों में मूल पाठ्य अँश का चुनाव इस प्रकार किया गया है कि नाट्यशास्त्र का उसकी समग्रता में अध्ययन किया जा सके। यद्यपि इसी दृष्टि से मेरे द्वारा निर्मित संक्षिप्त के दो संस्करण पूर्व में प्रकाशित हैं। पर संक्षिप्त नाट्यशास्त्र में अध्यायों का क्रम मूल ग्रन्थ के अनुसार नहीं है, तथा विषय प्रतिपादन की दृष्टि से विभिन्न अध्यायों के पाठ किसी एक अध्याय में भी संयोजित कर दिये गये हैं। प्रस्तुत अनुवाद में न केवल मूल नाट्यशास्त्र के प्रत्येक अध्याय से मुख्य पाठ का चयन उसी ऋम से किया गया है, प्रत्येक अध्याय में श्लोकों का क्रमांक भी वही रखा गया है, जो वडोदरा से प्रकाशित समीक्षित पाठ वाले संस्करण में है। आशा है कि यह ग्रन्थ उन सभी जिज्ञासुओं, रंगकर्मियों, कलासाधकों तथा साहित्यप्रेमियों के लिये उपादेय होगा, जिनकी हिन्दी अनुवाद के माध्यम से सम्पूर्ण मूल ग्रन्थ के अध्ययन में रुचि है।
नाट्यशास्त्र का यह संक्षिप्त पाठ है। अतएव एक विशाल मूल ग्रन्थ को नहीं पढ सकने वाले सम्पूर्ण नाट्यशास्त्र को इसके माध्यम से जान सकते हैं। इसमें नाट्यशास्त्र के समस्त सैंतीस अध्याय हैं और किसी भी विषय को छोडा नहीं गया है। नाट्यशास्त्र भारत की राष्ट्रव्यापी परम्परा है। यह भारत के सांस्कृतिक राष्ट्र होने का सबसे बडा प्रमाण है। नाट्यशास्त्र भारत की विविध देशीयताओं को सहेजता है और समेटता है। अनेक शास्त्र इसमें शामिल हैं। नाट्य का चारीविधान और मण्डलविधान इत्यादि अध्याय प्राचीन युद्धशास्त्र और नृत्तशास्त्र-दोनों को लिए हुए हैं। पाठ्य के विचार में पूरा काव्यशास्त्र आ गया है तो रंगमण्डप बनाने में वास्तुविज्ञान और आतोद्यविधान, ध्रुवाजातिविचार, सुषिर विधान, घनवाद्यविधान आदि अध्यायों में संगीतशास्त्र समा गया है। वस्तुतः, नाट्यशास्त्र के समाहार को दृष्टि में समा लेना एक कठिन कार्य है। वह अपार समुद्र है, काव्यशास्त्र आदि शास्त्रों की अपेक्षा से। इस समाहार के अपने आप में बडे निहितार्थ हैं। इतने बडे कि एक राष्ट्र की व्याख्या इनसे की जा सकती है। मन्दिरों और मूर्तियों में नाट्यशास्त्र किस तरह जीवन्त हुआ है और किस तरह यह शास्त्र रंगमंच पर भौतिक यथार्थ से आगे बढता है, इस पर अभी राधावल्लभ जी जैसे गिने चुने विद्वान् हैं। राधावल्लभजी ने नाट्यशास्त्र पर विचार के अनेक ग्रन्थ व आलेख लिखे हैं, जो इस दृष्टि से पठनीय है। प्रबन्ध सम्पादक संजय झाला की टिप्पणी है कि किसी भी शास्त्र का ध्येय सत्य का प्रदर्शन होता है, किन्तु यह पहला और अन्तिम शास्त्र है, जिसका ध्येय सत्य के साथ आनंद का भी प्रदर्शन है और आनन्द के साथ कल्याण की कामना भी। नाट्यशास्त्र की महत्ता पर यह समर्थ टिप्पणी है और प्रस्तुत ग्रन्थ इसी विषय से जुडा होने से उसकी भी वही महत्ता है। निस्संदेह, यह रंगनिर्देशकों, अभिनेताओं और नाट्यशास्त्र के जिज्ञासुओं के लिए उपादेय पुस्तक है। पुस्तक के पृष्ठ और छपाई अच्छी है किन्तु मुद्रण सेटिंग ठीक नहीं है।
पुस्तक :प्रेमतत्त्वः द्वैत से अद्वैत तक की यात्रा
लेखक : प्रो. रमाकान्त पाण्डेय
सम्पादक : संजय झाला
प्रकाशक : राजस्थान संस्कृत अकादमी
पृष्ठ : 47
मूल्य : 100 रुपये।


पुस्तक : भरतमुनिप्रणीत नाट्यशास्त्रः संक्षिप्त
पाठ का सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद
सम्पादन
तथा अनुवाद : प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी
प्रकाशक : राजस्थान संस्कृत अकादमी
पृष्ठ : 188
मूल्य : 300 रुपये।

सम्पर्क - १७३, शास्त्री नगर, सांचौर,
जिला सांचौर- पिन ३४३०११
मो. 9602081280