fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

विजय सिंह नाहटा की कविताएँ

विजय सिंह नाहटा
रोशनी फिर उठी क्षितिज तक
जब पहले पहल एक चाह ने जन्म लिया
कोई कोंपल अभी नहीं फूटी थी धरा को चीरकर
यह एक नयी यात्रा की शुरुआत थी
सब कुछ ध्वस्त होने के बाद एक उजली सुबह
आकाँक्षाएँ दब गयी थी मलबे में
तमाम वृत्तियाँ चुप हलचल विहीन
दमघोंटू था समय
एक आर्तनाद की तरह
लेकिन अबोला और गूँगा
उस वक्त जीने के कगार पर
कुछ शब्द दाखिल हुए
मसीहा की तरह
घुल गये रक्त में इमदाद बन
अँधेरा छटपटाता रहा
और, देखते ही देखते--
रोशनी फिर उठी दूर क्षितिज तक।

बचाए रखेगा
जब सभी कुछ तिरोहित होने लगेगा
इस दुनिया को महज विश्वास बचाए रखेगा
वही जाएगा अँधेरे के भीतर
खींच लाएगा जीवन की अथाह शक्ति बाहर
और, फिर किसी विकट क्षण
छितरा देगा सुदूर क्षितिज तक
गोया विश्वास ही ईश्वर जो ठहरा
जो चलने को मचल उठे
पहले कदमों को पोसता
साहस की तहों में लिपटा होगा अदृश्य
मृत्यु के दरमियाँ भी
जीवन की किलकारियों में गूँजती
एक अस्फुट सी स्वर लहरी में
करता रहेगा बसेरा
जब सभी कह चुके होंगे अलविदा
केवल वही हमारे संग जाएगा अन्त तक
शुद्ध मुनाफे की तरह
एक एक कर -
जब सभी कुछ छूटने लगेगा
छा जायेगा घना कुहरा ---
विश्वास को बचाए रखेगा महज विश्वास ही।

कवयित्री क्रिस्टीना रोजेटी को पढते हुए
अपने आभिजात्य की कठोर चट्टान पर
ऊँचाई पर बैठे हुए तुम नहीं जानते
मौन कोलाहल से चहुँओर घिरे हुए
मूक छलनाएँ तुम्हारा सत्त्व छीन रही है।
उतर आओ! नीचे खुलते हुए प्रान्तर में
घुला दो इस रेत में तुम्हारी अस्मिता के रंग
रोप दो एक बीज की अदृश्य शक्ति
हृदय का आत्मीय संगीत खरा है
जो नीचे धरातल पर बज रहा आम दिनों की तरह
आडम्बर से दूर-; आत्मीय
बहते जल सा निर्मल-; तेजस्वी
झिलमिलाती अमरता
यहीं घूमती हवा में उत्कण्ठित-सी
सोख लो !
इस अथाह को निज चैतन्य के आगार में
अभी चुका नहीं पौरुष-
- गर, जरा देर हुई, पर इतनी भी नहीं

बारिश
न जल बहता- न आवेग ही
- न बहता कोरा उद्वेग
हृदय को प्लावित करता
महज बहता अखण्ड प्रेम- सृष्टि को घेरता
- और ; रह-रह बहता अनन्त मन?

महत्त्व
- महत्त्वपूर्ण क्या है?
चलने के दरमियां
- यात्रा, पडाव या मंजिल ?
मैंने पूछा कुतूहल से
महज- संगति
उसने जवाब दिया
मैंने दिया प्रत्युत्तर- धैर्य?
वो फुसफुसाई हौले-से
उसने कहा-;
जो, कदमों में भरता अमित गति
निर्भय खींचता पथ की ओर
-परम्परा सा सम्मोहक
बेहद दोस्ताना
चिर प्रवहमान
होगा वही कोई -;
- अमोघ प्रेम ।


सवाल
विदा कर चुका
पेड पत्तियों को पतझड में
भला,
पेड की सूखी
टहनियों के सम्पुट में
कहाँ छिपी रहती
हरीतिमा?
इंतजार

सब कुछ होने की
जद्दोजहद में
- सभ्य होने के मायाजाल में
मनुष्य का महज मनुष्य होना-
अभी बाकी है ।
मेरी कविता में
उस सुबह का
मुझे इंतजार है ।

शब्द में हूँ विदेह

देह नहीं कोरा -
हूँ शब्द में विदेह -
आकाशगंगाओं के अनन्त विस्तार में
फैला हुआ उडता विचार
और हूँ निर्विचार दूसरे ही छोर
फूल नहीं डाली पर झूमता-;
महज खुशबू हूँ दिगंत में फैली
उसी पल; ज्वलंत अहसास-सा तैरता रगों में
कि जिसे सीमारेखाओं में बाँधना असाध्य है
और; इसीलिए कविता में
पिरोया जाकर उदित औ- साकार हूँ-
-और हूँ सीमातीत : बँधनहीन

सम्पर्क -
बी -92, स्कीम 10बी
गोपालपुरा बाईपास
जयपुर 302018
राजस्थान, भारत
मोबाइल-7850873701