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अमिताभ चौधरी की कविताएँ

अमिताभ चौधरी
1. ध्वनियों के क्षय में

ध्वनियों के क्षय में मौन टूटता है।

जिह्वा सोख लेने को
लार
अविरल मुँह ले रही है।

एक युवती स्वसाक्षी
अपने प्रेमी की आँखों के अपलक रह जाने में
अपना रूप देखकर आगे बढ रही है,
इसलिए वह बूढी हो जाएगी।

दीमक लगे शहतीर के एक चित्र में
क्षीण होने के विषय से
अपनी समस्त चेष्टाओं के साथ
एक शव
प्रस्तुत है कि,
दाह से पूर्व उससे पूछा जाए! -

अनुमति का एक प्रश्न इस कोलाहल के बीच हो;
तो मैं कुछ कहूँ!

दुःख का बिम्ब बनाकर
मुझे भस्म किए जाने का उत्तर दो, जीव!

2. अतः
अतः -
यदि मैं आग हूँगा
तो इस हवा में धुआँ
मिलूँगा।
तुम साँस लोगे
तो देखोगे -
तुम्हारी आँखों में पानी भर आया है।
मुझे ढूँढते हुए तुम बार-बार पलकें झपकोगे।

जैसे तुम पलकें नहीं झपकोगे
तो मैं अपनी भस्म उडा दूँगा!
3. प्रसन्नता का विषय
एक
अकिञ्चन की स्वर्णिम कल्पना से
रोटी पर आग के चितके चिलक रहे हैं।
चूल्हे की खरोंचों से
उदर का रक्त अन्न लगा है।

कठिन पँक्तियों के नहीं खुल रहे अर्थ के आशय से
चन्द्रमा की ओर देखते हुए
मैं कहता हूँ, ईश्वर!

और आत्मा को पलकों पर रखकर देखता हूँ।

- अपनी अनुपस्थिति को व्यक्त करता अन्धकार
कहाँ नहीं है?

रिक्त छोडे गए पृष्ठ पर
नहीं लिखी गई कविता को पढते समय
यदि मैं रोया हूँ-तो
प्रस्तुत अनुपस्थितियों के लिए
यह प्रसन्नता का विषय है।

4. ऐसा करते हैं

ऐसा करते हैं-
मेरी बुशर्ट और तुम्हारे दुपट्टे के रंगीन धागे खोंसकर
एक रस्सी गाँठ लेते हैं,
ऐसी कि हमारा भार खे सके।

उसे कसकर बाँध देते हैं किसी कडी से।

इतना ऊँचे
कि हमारे पैर धरती पर न टिकें।

ऐसा करते हैं-
मुँह आमने-सामने करके
झूल जाते हैं।

जगती को पता होना चाहिए,
प्रेम में हमने आकाश छू लिया है।

5. जो पहाड से टकराकर लौटी है

मेरी पुकार-
मेरे समक्ष-क्या क्षीणकाय होती
मेरे यहाँ तक पहुँचने की मेरी पार्श्व-ध्वनि है?

- कि मैं
यह कहाँ पहुँच गया?

भटकने का मार्ग भी यदि अवसान हो गया है-
तो मैं यहाँ
किसी प्रस्तर-खण्ड पर बैठकर
पहाड के टूटने की प्रतीक्षा कैसे कर सकता हूँ?
जबकि, मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ।

मैं सोच रहा हूँ - यहाँ तक पहुँचने में
मैं ने इतनी नदियाँ पार की हैं-तो भी
मुझे डूबना नहीं आया है जैसे मैं अपने भार से
पानी को दबाने की छाती से जुटा हूँ।

तो मुझे आँखें पोंछकर रख लेनी चाहिए।


तुम्हारा अर्थ मुझे आश्चर्य में डालता है

निर्धूम अग्नि के ताप -
पँक्तिहीन कोष्ठक के शब्द,

जाओ!

तुम्हारा अर्थ मुझे आश्चर्य में डालता है।


सम्पर्क - ग्राम- थिरपाली छोटी
पोस्ट- थिरपाली बडी
तहसील- राजगढ
जिला- चुरू (राजस्थान) 331305