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सोमेश शुक्ल की कविताएँ

सोमेश शुक्ल
1

मैं स्पेस पढते हुए शब्दों को फलाँग जाता हूँ
कहानी में
पेड और उसके हरे के बीच में भी एक दूरी होती है
एक अन्तराल, ध्वनि और उसके आन्दोलन के बीच में भी होता है

दो मध्य के मध्य एक स्मृति घुटती रहती है
कालांतर में एक नदी बहती रहती है अपने
पानी के बिना भी

अँधी आँखें मुँदी हों जैसे

कुछ नहीं सोचकर मैं
अपने शून्यचित्त में मुस्कुराता रहता हूँ

दिखता सब है देखता कुछ नहीं

दृष्टि अपने आप, पता नहीं कहाँ तक चली जाती है
पता नहीं क्या-क्या देख आती है

मुझे अन्तराल लुभाता है

वहाँ कोई विन्यास नहीं है

2

एक स्वप्न के स्वप्न में खडा हूँ
एक स्वप्न जितना ही अकेला
एक मौन जितना भीतरी
एक अदृश्य जितना स्पष्ट

बिना हिले,
एक ही जगह पर खडी हो रही है
बार-बार
एक खाली जगह,
एक स्पेस जो हमारे बीच पसरा है

और मैं तुम्हें चाहता हूँ
तुम्हें चाहे बिना भी।

3

सबसे अधिक करीब आकर
चीजों गुम जाती हैं

एक हमेशा दूसरे में लौटना चाहता है

मेरा विश्वास अब तक देखे गये
आकारों से बडा है

कुछ है जो आसमान को पृथ्वी तक झुकाता है
जो हर बात में आता है
ध्वनि में मौन के उत्सव की तरह

वह अँधेरों की तरह अपनी जगह से
प्रेम करता है
और लौटना भूल जाता है

4
हमसे सम्बन्धित हमारा एक हिस्सा हमेशा ही
अदृश्य रहता है
बहुत कुछ है इस घटने में
जो न होकर ही घट रहा है

हमारा सच हमारे भीतर हमारे ही विपरीत
खडा होता है

मैं रास्ते पर अपने होने से आगे-आगे चलता हूँ
जीवन से उकताहट ने मुझे
जीवन के मूल में लाकर दफना दिया है
मृत्यु और जीवन का आगाज
एक साथ ही तो होता है
होना, न होने का ही तो संकेत है,
मैं वस्तुओं की तरफ देखता हुआ
उन्हें कभी नहीं सोचता
क्योंकि वे पीछे-पीछे चल देती हैं

हमारा अतीत हमें ढूँढता हुआ
वहाँ तक आता है जहाँ अन्त में हम नहीं होते
वह हमारी वहीं प्रतीक्षा करता है, कल्प बनकर
ऐसे अतीतों से भरे इस संसार को
मैं बन्द आँखों से भी देख सकता हूँ

हर जगह, किसी न किसी के अतीत में
सिकुड रही है
जैसे इस कमरे की दीवारें
निरन्तरता में मेरी तरफ बढ रही हैं
ठीक उसी रफ्तार में,
मैं अपनी तरफ लौट रहा हूँ
बीच में, एक दूरी निश्चित होकर गतिमान है।

5
मैं उतना दूर पहुँचना चाहता था
जितनी दूर तक मेरी दृष्टि
आजीवन का भटकाव है
मैं अपनी ही दृष्टि तक नहीं पहुँच पाता,
जो कुछ मेरी पहुँच में है वह सब अदृश्य है
जो मेरी पहुँच में नहीं, वह दृश्य है
जो नहीं है वह सब मेरा है,
जो कुछ है वह मेरा नहीं
सबसे स्थिर प्रेम उसी से हो सकता है
वह जो हमारी पहुँच में नहीं
बारिश से, न कि बून्दों से
खुशबू से, न कि उसके होने से
जीवित स्मृतियों से, न कि उन्हें याद करने से
सब तरफ एक विपरीत है
सबकुछ मेरे विरोध में है
और मैं यहाँ अन्तरिक्ष पहने हुये जीता हूँ।
किसी चीज को खत्म कर देने के
बाद का संसार हो
समय में न रहे अनुभाव न रहे समय का
चूक जाने पर सिर्फ चूक जाने वाला ही बचे
शान्ति इतनी हो कि उसे शान्त रहने वाला भी न हो
मैंने यह चाहने के लिये नहीं चाहा
पर इच्छा न रही तो चीजों मुझ से गिरीं
और सब गिरे के ऊपर गिरने की जगह भी गिरी
गिरने से बनी एक खाली इमारत
अकेली खडी रह गई

सम्पर्क - नागला केहराई मोड, शंहशाहबाद मार्ग, आगरा - 282001
मो. - 9810213637