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मनोज कुमार झा की कविताएँ

मनोज कुमार झा
ये क्या हुआ
एक चुप्पी है अब्दुल के यहाँ
घर में चाय के लिये बोलने में वो खनक नहीं थी
हम लोग जाडे के बारे में बतियाये
धान की फसल के बारे में
अब्दुल ने कहा कि क्या फर्क पडता है
कौन सोचता है जाडा और फसल के बारे में
कुछ लोग न्यूज दिखाते हैं, बहुत लोग न्यूज देखते हैं
इसी बीच फसल को पाला मार जाता है
अच्छा मनोज कितने खेत होंगे इस देश में!
आज सब्जीफरोश औरतें आईं तो कम हुज्जत की
सिर्फ सब्जियों के बारे में बात की
गाँव के रिश्ते से जो भाभी लगती थी
उससे भी मजाक नहीं किया
मुझे डर लगा कि क्या मेरे आँगन में कोई खोट आ गई
गालिब के शहर से तुलसी के गरीबनवाज के बारे में खबर आती है
और तेरे आँगन में तेरी माँ की सहेली डरती है
तुझे सोचना चाहिए मनोज।

हुनर

वह सैकडों तरीके से परेशान कर सकता है
पानी का लोटा छीनकर
छप्पर में छेद कर के
बहन की दवा की शीशी की
एक्सपायरी डेट बदलकर

वह पदार्थ के उपयोग से नष्ट कर सकता है
नष्ट कर सकता है शब्दों के द्वारा

ताकतवर के सामने जब भी जाओ
बचने का हुनर साथ रखो।

जरूरत

जिसका एक पाँव कटा है
एक हाथ भी
बैठा है द्वार पर मन्दिर की तरफ पीठ किए
कुत्ता होता तो पेट भर लेता
इधर-उधर मुँह मारकर
आदमी होने से कोई सुभीता नहीं
ट्रेजडी कि आत्मा पर भी बोझ
उसे दया नहीं सिक्के चाहिए
और मिल सके तो थोडा सा न्याय
जिस पर टिका सके वो अपनी पीठ।

सीमा

रात में शेर चिंघाडता है
पूरा जँगल भयाक्रांत
रात में गिरता है साही का काँटा
काँपता है मेड पर का घास

सबका अपना-अपना ढब है
अपनी-अपनी सीमा।

सम्पर्क - दीवानी तकिया, करहलबडी, दरभंगा,
बिहार-84600 मो. 76548-90592