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शहर पर ताले

संदीप मील
तीन दिन से बरसात जिस गति से हो रही थी उससे साफ लग रहा था कि वह चन्द रोज और रुकने वाली नहीं है। बरसात के इन्तज़ार में यह शहर कभी नहीं रुकता है। लोग हाथ में छाता रखते हैं और अपने रुटीन कामों में लग जाते हैं। फिर भी इस शहर को रोज होने वाली बरसात से तकलीफ तो होती है क्योंकि यह मुम्बई नहीं था। यह एक रेगिस्तानी का शहर था, जहाँ पर बरसात के लिए लोगों को मिन्नतें माँगते बरस गुजर जाते थे। पानी के लिए आँखें तरस जाती थीं और छाते लोग सिर्फ तेज गर्मी के दिनों में इस्तेमाल किया करते थे। ऐसे शहर पर बादलों की ऐसी मुहब्बत हुई जैसे कि वे समन्दर से भरकर सीधे उस पर छलनी से बरसा रहे हों।
लोगों के घरों का पानी बाकायदा नालियों से बहकर शहर के बाहरी इलाके में जा रहा था, जहाँ पर थोडे समय में सूख जाता। अमूमन लोगों के घरों में खाने-पीने का सामान जमा किया हुआ था। वे इन बरसों में बरसात के स्वभाव को समझ चुके थे। हर घर में प्रत्येक सदस्य के हिसाब से छातों की संख्या भी बढ चुकी थी। लोग दिन में सारे काम निपटा कर रात को जल्दी ही घरों में सो जाते। खाना तो सूरज ढलने से पहले खा लिया जाता। आजकल तो सूरज बादलों में छुप गया था, तो अंदाजे से उसके ढलने का हिसाब लगाया जाता। रात को पुलिस भी शहर के कुछ नाकों को छोडकर बाकी जगहों से नदारद ही दिखाई देती। ऐसी हालात में रौनक नामक उस नौजवान लडकी का घर से रात के दस बजे बाहर निकलना वहाँ पर असामान्य था।
बरसात की रातों में रोशनी के पास कीट-पतंगों की भरमार होने के कारण शहर के लोगों ने आज भी घरों की सारी लाईटें बंद कर रखी थीं। सिर्फ शहर के चैराहों और गलियों की मोडों पर चन्द लाईटें चमक रही थीं जिनकी रोशनी बरसात की बूँदों में रात के अँधेरे में अपनी सतरंगी छटाएँ बिखेर रही थीं। जब रौनक घर से निकली तो उसके पास कुछ भी सामान नहीं था। न छतरी, न पैसा और न ही मोबाइल। वह हल्के कथई रंग का पाजामा और पीली टीशर्ट पहने हुई थी। यह ऐसा पहला मौका था जब वह अकेली रात को शहर में निकली थी। इससे पहले उसके साथ हमेशा माँ, बाप और भाई में से कोई होता था। वे सब ऐसा व्यवहार करते थे जैसे कि उसकी सुरक्षा कर रहे हों और इसका अहसान भी जताते ऊपर से।
गली से बाएँ तरफ जब वह पुल पर चढने के लिए मुडी तो उसका सामना उन कुत्तों से हुआ जो दिन में भी इंसानों को देखकर हमेशा भौंकते रहते हैं। इनके भौंकने का ख्याल उसके दिमाग में था, लेकिन डर नहीं था। मजेदार बात तो यह हुई कि कुत्ते भौंकने की बजाय बन्द पडी चाय की थडी पर जाकर बैठ गए। उनकी आँखें साफ कह रही थी कि उसे डरने की जरूरत बिल्कुल नहीं है। शायद वे समझते थे कि कौन उन्हें नुकसान पहुँचा सकता है और कौन नहीं। रौनक जब पुल पर चढी, तो शहर एक भीगी हुई ठण्डी रात में सो रहा था। कहीं कोई आवाज नहीं सुन रही थी, सिवाय दूर एक रुकी हुई रेल की आवाज के। वह सिग्नल के इंतजार में शहर से बाहर रुकी हुई थी। कोई रेल घण्टों लेट हो जाए लेकिन मुसाफिरों के शहर के बाहर चन्द मिनट भी रुक जाए तो उनके घर जाने का उतावलापन हूक मारने लगता है। उसे यह रात तमाम देखी हुई रातों से अलहदा दिखाई दे रही थी। इमारतें अपने पूरे वजूद में अँधरे में एक-दूसरी इमारत के शायों पर मिल रही थी। उन सब का अतीत रौनक कल्पित कर पा रही थी। उसे लग रहा था कि दुनिया को जिस नजर से अकेले और स्वतंत्र रूप से देखा जा सकता है, वैसा किसी दूसरे की नजर और संरक्षण में नहीं देखा जा सकता है।
यह जवान लडकी अब कुछ गुनगुनाने लग गई थी जो शायद किसी पंजाबी लोकगीत का एक मुखडा था। बरसात की बूँदें उसके सर पर गिर रही थीं। भीगी हुई जुल्फें मन्द चल रही हवा में उडने की कोशिश कर रही थीं लेकिन आपस में इतनी उलझी हुई थीं कि उडना मुमकिन नहीं हुआ। पानी उसके चेहरे से होता हुआ पूरे जिस्म को धोकर ऐडी के रास्ते सडक पर गिर रहा था। हमेशा घर वाले उसे कहते थे कि छता ले लो, बरसात में भीग जाओगी। जैसे कि वह मिट्टी की गुडिया है और बरसात में भीगते ही पिघल जाएगी।
पुल पार करके वह उसके नीचे उतरी, तो उसकी आँखें खुली रह गईं। कितने दिनों से वह पुल पार करती रही लेकिन कभी नहीं देखा कि इसके नीचे भी एक दुनिया रहती है। यह लोगों का आशियाना है। औरतें-मर्द गहरी नींद में सोये हुए थे। दिनभर की मेहनत ने उनके जिस्म को इतना थका दिया था कि आसमान में कडकडाती बिजली की आवाज भी उनकी नींद को नहीं तोड पा रही थी। छोटे बच्चे अपनी माँओं से चिफ हुए थे। वे जब खाँसते थे तो उनके नाक और फेफडों में जुकाम के कारण जमे हुए पानी की आवाज सुनाई देती थी। चूल्हे के नाम पर कुछ ईंटों को रखा गया था जिसके एक तरफ एक तवा और दूसरी तरफ परात टिके हुए थे।
अब वह घूमती हुई शहर के उस चौराहे पर आ गई थी जिसे दिन में पैदल पार करना बडा मुश्किल माना जाता है। बिल्कुल सुनसान चौराहा था जिसके एक कोने पर लौहे के छोटे-से बने हुए मकान में चन्द पुलिस के सिपाही बैठे थे। एक सिपाही की नजर जब रौनक पर पडी तो उसने दूसरे को इशारा किया। कुछ देर तक वे दोनों एक-दूसरे को देखते रहे जैसे कि सामने कोई अजूबा आ रहा हो। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि रात को शहर की सडकों पर कोई अकेली लडकी भी घूम सकती है। चंद पलों की चुप्पी के बाद एक सिपाही बाहर आया। उसने सर पर कोई पुराना बैनर ओढ रखा था जो इसे चौराहे पर कभी किसी नेता के जन्मदिन की बधाई के लिए उसके समर्थकों ने टँगवाया था। चूँकि इस सिपाही ने बैनर को उतारा तो वह फट गया था जिसमें नेता के पेट के ऊपर वाला हिस्सा कट गया था। नीचे के हिस्से में सफेद पाजामे में दो टाँगें दिख रही थीं जिन्होंने जूते पहन रखे थे। इन जूतों से कोई भी अंदाज नहीं लगा सकता है कि फलाँ नेता का बैनर है। सिपाही ने आवाज दी, कौन हो तुम ?
एक लडकी। रौनक ने जवाब दिया।
सिपाही ने फिर पूछा, इतनी रात को अकेली क्यों घूम रही हो?
शहर को देख रही हूँ। रौनक के सामने से एक बस गुजरी जो लम्बे रूट के कारण रात को पहुँची थी।
तुम्हें कुछ हो गया तो जिम्मेदार कौन होगा? सिपाही ने कहा।
मैं खुद। आप चिंता न करें। रौनक सिपाही के सामने से गुजर गई।
सिपाही बडबडाता हुआ वापस उस लौहे के मकान में घुस गया। तभी उस लौहे के मकान से तेज ठहाकों की आवाजें गूँजी, शायद उसने बाकी के सिपाहियों को बताया होगा उस लडकी के बारे में। हो सकता है वे उसे पागल समझकर हँसे, सिरफिरी समझा या कुछ और। लेकिन इतना जरूर तय था कि उन्होंने उसे एक सामान्य लडकी नहीं समझा होगा।
रौनक का कोई गंतव्य नहीं था। बारिश रुक गई थी और हवा की गति बढ गई थी। ठण्डी-ठण्डी हवा लगने से जैसे उसे पैर लग गए हों और वह वीरान सडकों पर उड रही हो। सडक के चारों और बन्द दुकानों में वह दिन में परिवार के साथ कई बार खरीददारी के लिए आई थी। अब तक उसे वे दुकानें बडी और खुद छोटी नजर आती थी क्योंकि वे जितनी चीजों को खरीदने का मन करती उतनी की इजाजत उसके परिवार की जेब नहीं देती थी। अब उसे दुकानें छोटी और खुद बडी दिखाई दे रही थी क्योंकि इस समय वह खरीददार नहीं थी। खाली जेबों के बावजूद भी उसके साहस ने बाजार में उसका कद बढा दिया था। एक दुकान के छज्जे के नीचे एक बंदा बैठा था जिसकी उमर अस्सी के आसपास रही होगी। लम्बी दाडी और लम्बे बेतरतीब बाल इस तरह से बिखरे थे जैसे कि पैदा होने के बाद उनके हाथ और पानी दोनों ही नहीं लगाए गए हों। दाँत सारे टूट चूके थे और चेहरे पर आई सलवटों के बीच की खाली जगहों पर पसीना जम गया था। वह सोचने लगी कि यह बुढा कम से कम बारिश में तो नहा ही सकता है। लेकिन जब नजर उसके बदन के निचले हिस्से पर गई, तो समझ में आ गया कि उसकी पँसलियाँ तो हवा का एक झोंका सहने के काबिल भी नहीं हैं।
सामने से बाइक की लाईट दिखाई दी जो धीरे-धीरे पास आ रही थी। उसे आज न अँधेरे से और न ही रौशनी से डर था। वह अपनी गति में चली जा रही था। कुछ देर में बाइक उसके पास आकर रुकी जिस पर दो नौजवान सवार थे। दोनों की उम्र कोई पच्चीस बरस के आसपास थी। एक के हल्की दाडी थी, तो दूसरे ने कानों में बालियाँ पहन रखी थीं। इन्हें देखकर वह भी रुक गई। इस दौरान न तो उन नौजवानों के मुँह से कुछ निकला और न ही रौनक की जबान खुली। वे एक-दूसरे को देखते रहे। अन्त में नौजवान थोडे से झेंपे और बाइक लेकर निकल गए। वह अपने रास्ते पर चलती रही। चन्द की कदम चली थी कि पीछे से वे ही नौजवान बाइक लेकर वापस आ गए। शायद इस बार बोलने का साहस बटोरकर आए थे। बाइक रोकते ही एक ने कहा, कहाँ जाना है?
कहीं नहीं। रौनक ने सहजता से जवाब दिया।
फिर इस समय सडक पर क्यों घूम रही हो? दूसरे नौजवान ने पूछा।
मेरी मर्जी है। शहर देख रही हूँ। रौनक थोडी तनकर खडी हो गई थी।
हम भी शहर ही देख रहे हैं। पहले नौजवान ने शर्माते हुए कहा।
फिर पीछे हटो। बाइक मैं चलाती हूँ। शहर भी दिखाती हूँ। रौनक ने बाइक का स्टेरिंग पकड लिया था।
इन नौजवानों को यह तो अन्देशा ही नहीं था कि यह लडकी इस तरह से उनके साथ बाइक पर सवार हो जाएगी। वे कुछ समझ नहीं पा रहे थे कि क्या कहें। पीछे वाला नौजवान बाइक पर पीछे किसक गया। दूसरे ने भी वही किया। रौनक बाइक चलाने लगी। उसकी रफ्तार काफी तेज थी जिसकी वजह से वे दोनों नौजवान डर रहे थे, लेकिन अपने डर को जाहिर नहीं होने दे रहे थे। सबसे पीछे वाले ने तो बीच वाले की कमर में हाथ डालकर पकड लिया था, लेकिन बीच वाले के पास ऐसा विकल्प नहीं था। वह तो पीछे की तरफ तनकर बैठा था कि कहीं रौनक को छू ना जाए।
रौनक अपनी मर्जी से चली जा रही थी। न उसे मालूम था कि कहाँ जाना है और न पीछे वालों को। बाइक पर एकदम चुप्पी छाई हुई थी। नौजवानों को तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि इस लडकी से क्या बात की जाए! अन्त में रौनक ने ही उस खामोशी को तोडते हुए पूछा, तुम लोगों को गाना-वाना नहीं आता?
मैडम, मुझे तो भजन आता है। बीच वाला नौजवान बोला।
चल वही सुना दे। मन ही मन में हँसती हुए रौनक ने कहा।
बीच वाले नौजवान ने एक लम्बी-सी टेर ली और भजन गाने लगा। हालाँकि भजन तो वह नहीं समझ पा रही थी, लेकिन बन्दे का सुर ठीक होने की वजह से उससे सुनने में कोई दिक्कत नहीं हुई। बंदे ने भजन गाकर खतम किया, तो उसे दोनों लोगों की राय का इंतजार था। अब उन लोगों के बीच बातचीत होने लगी थी। दोनों नौजवानों ने बताया कि वे बाइक चोर हैं और यह बाइक जिसे अभी रौनक चला रही है, वह भी चोरी की है। उन्हें लग रहा था कि यह लडकी चोरी की बाइक सुनते ही उछल पडेगी और शायद उन्हें वहीं छोड दे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। रौनक ने धीरे-धीरे उनके बारे में सभी जानकारियाँ हासिल कर रही थी।
वे तीनों शहर के किनारे पर पहुँच चुके थे जहाँ पर एक पुराना-सा तालाब था। तालाब के बीच में एक महल दिख रहा था जिसके किनारे बडा-सा पीपल का पेड खडा था। रात ढल चुकी थी और आसमान में सूरज आने से पूर्व की रोशनी दिखाई देने लगी थी। कई बार पूछने पर भी नौजवानों ने अपने नाम नहीं बताए थे। वे बात को किसी तरह से टाल जाते थे। शायद बाइक चोरी करने के कारण सच नाम बताने से डर रहे हों और झूठा नाम बताना नहीं चाह रहे हों। ज्यों-ज्यों दिन ढल रहा था त्यों-त्यों उन दोनों की बैचेनी बढ रही थी। उन्हें किसी के देखने और पुलिस के पकडे जाने का भय सता रहा था। एक नौजवान पेशाब करने के बहाने दूर झाडियों की तरफ गया हुआ था। काफी देर से नहीं आया, तो दूसरा उसे खोजने गया। रौनक इन्तजार करती रही, लेकिन दोनों वापस नहीं आए। वह समझ नहीं पा रही थी कि इन हालातों में क्या किया जाना चाहिए। अंततः उसने बाइक उठाई और वापस शहर की तरफ रवाना हुई। इस समय तक शहर में थोडी चहल-पहल होने लगी थी। सडकों पर दूध की गाडियाँ और साइकिल वाले चलने लगे थे।
वह अपने घर से बाहर वाले पुल के पास बाइक को खडा करके इधर-उधर देखने लगी। आसपास कोई दिखाई नहीं दिया, तो बाइक को वहीं पर छोडकर पैदल रवाना हो गई। जब घर पहुँची, तो सारे लोग जग चुके थे। घरवालों ने उससे खूब सवाल किए, लेकिन वह सहजता से यही कहती रही कि शहर देखने गई थी। कई तरह की हिदायतें भी दी गईं और कसम खिलाई गई कि फिर कभी नहीं जाएगी। कुछ दिन तक तो घरवालों ने रात को उसकी रखवाली भी की। उसके कमरे के बाहर रात को ताला लगाया जाने लगा। लेकिन धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो गया। घरवाले ताला देना भी बंद कर चुके थे।
उसके बाद जब भी रात को बारिश हुई, तो वह घर से निकलकर शहर घूमती थी। शहर के लोग कहते थे कि एक जवान लडकी रात को बारिश में अकेली शहर में घूमती है, फिर कहने लगे कि एक जवान औरत बारिश में अकेली शहर में घूमती है और उसके बाद यह कहा गया कि एक बुढी औरत बारिश में अकेली शहर में घूमती है। कई दिनों से बरसात हो रही है, लेकिन रात को शहर की सडकों पर कोई अकेली औरत नहीं नजर आती है। अँधेरी रात में भी बारिश में शहर के हर घर पर चमकते ताले दिखाई दे रहे हैं।

सम्पर्क - गाँव - पोसानी वाया-कूदन, जिला सीकर, राजस्थान - 332040 मो. 91160-38790