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किसान का चेहरा

मधु कांकरिया
किसान का चेहरा वह आईना है जिसमें सभ्यता का चेहरा झलकता है।
गाँव बलखडे!
आवभगत की बालासाहब ने जो गोविन्दजी के मित्र थे और बलखडे में रहते थे। तीन पक्के कमरे। एक खपरैल में बैल। बाहर के खुले आँगन में फुदकती मुर्गियाँ। खेत के पास बना हुआ घर। खेत के दूसरी तरफ ढेरों काजू और रामफल के पेड। बाहर सूखे पत्तों और सूखी लकडियों की बनी बाड जिससे भीतर के पौधों को कोई जानवर खा न सके। रास्ते में जो भी मिलता गोविन्दजी उसका परिचय करवाते - मानसी ताईचा मुलगा (मानसी ताई का बेटा)! हर कोई उससे उसका हाल पूछता!
हाल पूछ-पूछ कर बेहाल करने वाला देश है यह!
पहली बार झल्लाया वह, इस देश और अपनी अम्मा पर !
वाह अम्मा! जमाना हो गया था जमाना देखे हुए, तुमने अच्छा जमाना दिखाया! गाँव दिखाया!
उत्तरी भारत के किसी भी गाँव जैसा गाँव! सडक पर गिरे कुछ पत्थर। जगह जगह कचरे के ढेर, ढेर में मुँह मारते कुत्ते। रुन-झुन करती बैलों की जोडी। मीलों तक फैले सूखे हुए कपास के खेत। बीच-बीच में कहीं खेतों में बिखरा प्याज तो कहीं ज्वार के खेत।
थोडा और आगे बढे तो गन्ने के खेत। फिर मकई के खेत! सामने दुधना नदी। वह इलाके के भूगोल में रमा था। बालासाहब अपने खेत दिखाने में। पहली बार अविनाश किसी किसान से मिल रहा था। उसने पूछा, कैसे होती है किसानी? मौका मिला गोविन्दगिरी को। चालू हो गए वे- बहुत मेहनत का काम है किसानी। पहले धरती पर हल चलाते हैं। फिर धडकते दिल से बारिश का इन्तजार। फिर हल चलाकर धरती को नम करते हैं जिससे धरती बीज पकड सके। फिर बीज डालते हैं। फिर बारिश का इन्तजार। बीज डालने के सात दिन के भीतर यदि बारिश नहीं हुई तो फिर बीज का दुबारा खर्चा। कई बार चार चार बार तक बीज डालना पड जाता है। पन्द्रह दिन बाद बीज अँकुरित हो जाते हैं। फिर अनावश्यक घास को हटाने का काम। फिर कीटनाशक। काम ही काम। फिर खाद। फिर चार महीने इन्तजार। फिर महिलाएँ खुरपी से आसपास की घास काटती हैं। फिर फसल पकने तक स्प्रे मारती हैं कि कहीं कीडे न लग जाएँ। जून महीने में बीज डालते हैं, सितम्बर महीने में फसल तैयार हो जाती है... वे बोलते जा रहे थे और उसकी नजर गडी थी दो बैलों पर जो खरामा खरामा उनके आगे आगे शाही अन्दाज में चल रहे थे। बैलों की रुनझुन एक अलग तरह का संगीत रच रही थी। ये बैल किसके हैं? यूँ अकेले सडक पर? क्या काम आते हैं? हँसते हुए जवाब देते हैं गोविन्दजी ये खेत जुताने के काम आते हैं। बैलों को रास्ता पता होता है ,देखिएगा ये ठीक अपने मालिक के पास पहुँच जाएँगे।
अन्तरिक्ष में यान भेजनेवाले देश में अभी भी बैलों से खेती? जवाब नहीं मेरे देश का भी! वह मुस्कुराता है। मन फिर मुडता है नैंसी की तरफ-तुम्हें ताज्जुब होगा नैंसी कि गौ-पूजक इस धार्मिक देश में भगवान्, इन्सान और गाय बैल साथ साथ रहते हैं एक ही घर में, पर चरने के लिए यहाँ के मरियल गाय-बैलों को सडकों पर छोड दिया जाता है। घास के साथ कचरा, कूडा और प्लास्टिक खाने के लिए। हमारी तरह यहाँ शहरों से दूर अलग से गाय के चरने के लिए ऐसी कोई हरियाली और स्वच्छ भूमि ही नहीं हैं जहाँ गाय मस्ती में टहल सके। इसीलिए इन्सानों की तरह यहाँ के गायों की सेहत भी चिन्ताजनक है।
बैल मालिक के यहाँ पहुँचे या नहीं, नहीं पता पर शीघ्र ही वे पहुँच गए दिलीप उद्रराव काले के घर। नौ बाई दस की छोटी-सी कोठरी। उनके पहुँचते ही मानसी जी की दत्तक पुत्री शोभा परम आनन्दावस्था में आ गयी थीं। चुस्त कमांडो की सी फुर्ती से घर में दरी बिछा दी गयी। बिना खिडकी की छोटी-सी झोपडी में ढेर सारा अँधेरा। उसे चेहरा भी नहीं दिख रहा था। अविनाश ने मोबाइल की टॉर्च को जला दिया। मानसी ताई के बेटे के आने की सुनकर ही आसपास के कई लोग कोठी के बाहर खडे हो गए थे।
अब वह था और उसके सामने थी शोभा और उसकी उजडी उखडी दुनिया जिसमें शोभा के वृद्ध श्वसुर और दो बेटियाँ थीं। हर्षित लेकिन सिमटी सकुचाती शोभा को देख उसने थोडा असहज महसूस किया जैसे कोई पत्ता खडका, अम्मा ने गोद लिया भी तो किसे? और कहाँ जाकर? क्या बन पाएगी यह अम्मा का सहारा? आखिर पूछ ही बैठता है।
- आप अम्मा से कब मिली? जवाब देते हैं बालासाहब, पहली मुलाकात हुई थी करीब डेढ साल पूर्व, जब इनके पति दिलीप उद्रराव ने आत्महत्या कर ली थी, फिर.... बात को बीच में ही काट पूछता है अविनाश-
- क्या? आत्महत्या? क्या कह रहे हैं?
- हाँ ! सही कह रहा हूँ। यही हुआ था।
- पर क्यों ?
एकाएक आँखें पीछे घूम जाती हैं बालासाहब की। पतझड के झडते पत्तों की तरह झरने लगते हैं पीले पीले शब्द-पाँच एकड जमीन थी दिलीप उद्रराव जी के पास। रोते झींकते ही सही उस पाँच एकड जमीन पर सोयाबीन और कपास की खेती के सहारे जिन्दगी के पहाड पर चढते रहे वे, किसी प्रकार साँसें लेते रहे, कि एक दिन सब खत्म हो गया। वे हार गए। अपने हालात के मारे उस ने हारकर अन्तिम उपाय के रूप में मौत को चुन लिया और खामोश हो गए। मेहनत पर भरोसा था पर वह भी काम ना आई। दिलीपजी के पिता राजमिस्त्री थे और खुद शोभा दो बच्चियों को सम्भालते हुए भी खेत में सिंचाई और कटाई में पति को भरपूर सहायता दे रही थी।
- पर ऐसी स्थिति आई कैसे?
दोनों के संवाद सुनती शोभा की नम आँखों में कुछ हलचल-सी हुई। एक पूरी दुनिया उसके भीतर हाहाकार मचा रही थी। उसके ओंठ फडफडाए भर कि तभी पुराने भोजपत्र से चेहरे वाले सरपंच काशीनाथ नारायण जी बतलाने लगे - साढे चार लाख का कर्जा हो गया था। मेधा बैंक प्राइवेट लिमिटेड से लिया था कर्जा। तेरह प्रतिशत ब्याज पर। बैंक के लोन से ट्रेक्टर खरीदा था। कर्ज दिलीपजी के पिता के नाम पर था। उम्मीद थी कि धीरे-धीरे किस्त भर देंगे पर दो साल से लगातार घाटा हो रहा था, इसी बात को लेकर बाप बेटे में रोज घमासान होने लगा था।
सस्ती छींट का ब्लाउज और नायलोन की हरी साडी में लिपटी दुबली पतली खुलते रंग की शोभा सिर झुकाए सुन रही थी सारी बातचीत कि तभी उसकी छोटी बेटी उसकी गोद में आकर बैठ गयी। उदासी पुता चेहरा। गोबर पुता आँगन। पलस्तर उखडी दीवारें। चहुँ ओर रसोई का समान। मसालों से भरी शीशियाँ लकडी की खुली आलमारी में सजायी हुई। कहीं स्टील के कुछ बर्तन, एल्युमीनियम के डब्बे, एक छोटा-सा कूकर, चाय छकनी और प्लास्टिक की बाल्टी। सभी एक रैक में। बीच में भगवान् गणेश-लक्ष्मीजी का आलया। कोने में सिलाई मशीन। मशीन की टेबल पर रखी बच्ची की स्लेट। दीवार से सट कर टँगी मूंज की रस्सी पर सूखते कुछ मैले, कुछ धुले कपडे। दरवाजे पर बन्धी दो बकरियाँ।
एक ही कमरे में कितनी सारी दुनिया! एक कमरे की कथा में कितनी सारी उपकथाएँ! यही है विश्व शक्ति का स्वप्न देखने वाले भारत के किसान की तस्वीर! पर भारत ही क्यों, इस धरती पर किसान शायद दुनिया में कहीं भी प्रसन्न नहीं हैं। पूरी दुनिया में इस मरती हुई प्रजाति का नाम है किसान। सोचने लगा अविनाश- तो अम्मा इनका सहारा बनने आयी होंगी। लेकिन अम्मा ने इनके बारे में जाना कैसे होगा? क्या अम्मा का यहाँ जाना आना रहता था? इनकी सहायता के लिए पैसे कहाँ से आते होंगे अम्मा के पास। एक दो बार उसने अम्मा को पैसे भेजने की कोशिश भी की थी पर अम्मा ने मना कर दिया था। जिस बेटे को पिछले बीस साल में देखा तक नहीं उसके दिए पैसों को भी क्या देखना?
वह समझ कर भी नहीं समझ पाया अम्मा के दुःख को!
सवाल दर सवाल !
नजरें फिर टकराई शोभा से। उसके चेहरे पर उगने लगता है बीता भयावह वक्त। उसकी नजर एकाएक टकराती है बीच दीवार पर माला पहने दिलीपजी की तस्वीर पर।
जाने क्या सोचते हुए पूछ डालता है वह- क्या आपको अन्देशा था कि दिलीपजी ऐसा कोई कदम उठा सकते हैं?
भारी पलकें झपकती हैं शोभा की।
आँखें ऊपर उठती हैं।
पूरी ऊपर।
- नहीं, सबकुछ अचानक हुआ। दीपावली का दिन था... वह बोल रही थी कि तभी अचानक से बत्ती आ गयी। छोटा-सा मरियल लट्टू चुफ से जल उठा।
- फिर क्या हुआ? दुखों का थान खुलने लगता है धीरे-धीरे, आवाज से टपकता लहू।
- मैं अपने माहेर (मैके) में थी। यहाँ से गयी थी तब वे थोडे परेशान जरूर थे, खराब फसल की वजह से कपास बहुत कम उतरा था। लेकिन शादी के सात साल बाद से मैंने उन्हें हमेशा काम करते, पाई-पाई का हिसाब रखते, पसीना पोंछते, झल्लाते और परेशान रहते ही देखा था। हर रात कभी कर्जा तो कभी सूखा की चिन्ता, सुबह उठते तो फिर वही चिन्ता क्या होगा! खेत, पानी और कज़र् के अलावा कभी कोई बात ही नहीं। हमेशा ये ही सब बातें करना जैसे बात करने भर से टल जाएगा सूखे का खतरा। कभी खुलकर न हँसते देखा न जीते। जब भी देखा, खेत में कुदाल चलाते या चिन्ता करते, इसलिए मुझे कोई शक ही नहीं हुआ। मैं जिस दिन गयी थी उसी दिन बैंक की नोटिस आ गयी थी। नोटिस क्या मौत का फरमान थी वह। एक गहरी साँस ले रुक-रुक कर भींगे गले से बोलती जा रही है शोभा- उस नोटिस ने बहुत ही डरा दिया था उन्हें। लगा रही-सही इज्जत भी अब गयी, बची-खुची जमीन भी गयी क्योंकि जमीन बैंक के पास गिरवी रखी थी। उस दिन वे मुझसे बहुत कम बोले थे, खाना भी नहीं खाया था। पर रोज की अपेक्षा शांत थे। मैंने पूछा भी था। क्या मैं जाऊँ तो सर हिला कर धीरे से बोले भी थे- निगुण जा (चली जा)। बहुत दिनों बाद उन्होंने छोटी मुलगी को गोद में उठाया और भरी आँखों से जाने कितनी देर तक चिपकाए रखा उसे, दोनों मुलगी के लिए पहली बार लेमनचूस लाए, तब भी मुझे शक नहीं हुआ, अब समझ में आता है कि वे जाने के पहले का अंतिम प्यार कर रहे थे। मैं घर से निकल रही थी तो फिर आवाज दे बुलाया। बोले कुछ नहीं बस देखते रहे, मुझे लगा जाते न जाते कहीं रोक न दे। इसलिए बिना बात आगे बढाए निकल गयी झट से। उफ! बडी भूल हुई मुझसे। सारे संकेत उनके जाने के मिल रहे थे, नोटिस फिर लेमनचूस.... मुझे जरा भी शक होता तो हरगिज नहीं जाती लेकिन बेटियाँ जिद कर रही थीं। मैंने भी सोचा कि बेटियाँ खुश हो जाएँगी। यहाँ के माहौल में बाप बेटे के झगडों को देख देख वे भी घुट रही थीं। मैं चली गयी। दिवाली के ही दो दिन पहले। वैसे भी इन दिनों क्या दिवाली क्या होली। हर वक्त बाप-बेटे के बीच झमेला चलता रहता था। दूसरे दिन खेत में ही चूहे मारने की दवा पी ली थी... कपास ही मौत का फंदा बन गया। बोलते-बोलते आँखें छलछला गयी थी उसकी।
कुछ मूक बोझिल थरथराते पल... कंफपाते ओंठ...
अपनी आत्मा के अंश-अंश से निःशब्द रो रही थी अब वह!
लेकिन आँखों से आँसू नहीं भाप उड रही थी!
चले गए थे वे पर पत्नी की यादों में रह रह कर झलक रहे थे !
एक मन के भीतर छिपे रहते हैं कितने मन। चौबीस घण्टे साथ रहने वाली पत्नी तक को उनके मन की थाह नहीं मिल सकी कि मौत उनके सिरहाने खडी है। कुछ ऐसा था जो सामने दिखते हुए समय के पार घट रहा था जिसे शोभा देख नहीं पायी और आज तक पोलीथिन-सी वे यादें जो न गली, न जली, न मिटी उसे अपने एकान्त पलों में झुलसा रही थी। विचारों की कोंपलें उगने लगी थी अविनाश के भीतर। तभी दिमाग में कौंधा, अम्मा ने एक बार महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या का जिक्र किया था पर यह कभी नहीं बताया कि वह खुद भी वहाँ जाती आती रहती थी। क्यों नहीं बताया अम्मा ने? पर मैंने भी कहाँ पूछा था? शायद इसीलिए नहीं बताया होगा कि अम्मा को विश्वास नहीं था कि मुझे अम्मा की दिनचर्या में कोई दिलचस्पी बची है। फिर लिखा क्यों? शायद इस उम्मीद में लिखा हो कि मैं कुछ दिलचस्पी दिखाऊँ तो वे उनके लिए कुछ आर्थिक मदद का प्रस्ताव रख सकें। उफ!, मेरी स्वाभिमानी अम्मा! अपने ही सवालों जवाबों में उलझा रहा अविनाश कि बाहर खडे लोगों में से किसी ने अविनाश को पानी की ग्लास पकडाई। भीतर की उलझन से बाहर निकल पूछा उसने-
- सरकार से कुछ मिला?
जवाब गोविन्दजी की तरफ से आया। भींगी बिल्ली की तरह अभी तक दुबका बैठा उनका आक्रोश फडफडाया - अभी तक तो नहीं मिला। उम्मीद तो है लेकिन मिलना मुश्किल लगता है। क्या कहा जाए इस बेरहम सरकार को जो मरे हुए किसान की भी मिट्टी पलीद करने पर तुली है। सारा गाँव जानता है, सरपंच जानते हैं कि इस घर में आत्महत्या हुई है लेकिन फिर भी उन्हें प्रमाण चाहिए, क्योंकि जमीन और कर्जा दिलीपजी के पिता के नाम था जबकि आत्महत्या पुत्र ने की। हमारे ही बाबुलतारा गाँव में पिछले साल आनन्द कामडे ने की थी आत्महत्या लेकिन सरकार ने कुछ भी नहीं दिया क्योंकि उसका जमीन पर कोई कर्जा नहीं लिया हुआ था। अब बताओ कर्जा तो कर्जा है और मौत तो मौत ही है लेकिन सरकार इसमें भी पात्र-कुपात्र खोजती है।
सरपंच काशीनाथ नारायण जो अभी तक चुप थे पहली बार फनफनाए-सरकार को तो नहीं देने का बहाना चाहिए जी... ऐसे कई केस हैं जहाँ आत्महत्या हुई लेकिन कुछ नहीं मिला। यहाँ मराठवाडा के अनन्तपुर जिले में एक महिला किसान थी सुधा मणि। उसने आत्महत्या की, लेकिन उसकी बेटी को आजतक कोई मुआवजा नहीं मिला क्योंकि वह एक औरत थी इसलिए कोई उसे किसान ही नहीं मानता। एक औरत किसान की पत्नी हो सकती है खुद किसान नहीं।

बातें और बातें कि तभी आसमान में उडते ढेर सारे कौओं की संयुक्त काँव-काँव ने ध्यान खींचा अविनाश का। ऊपर की ओर देखने लगा वह कि तभी सरपंच के साथ आये किसी मसखरे ने तंज मारा-राष्ट्रीय शर्म में डूबे ये कौवे भी इन किसानों की आत्महत्या पर शोक प्रकट कर रहे हैं। उन बोझिल पलों में भी सबके चेहरों पर मुस्कान तैर गयी।
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वह जो आपकी कमीज है
किसी खेत में खिला
एक कपास का फूल है।
दुःख की भट्टी में एक हो चुके हरेक किसान की अपनी एक कहानी! सोचते हुए पूछता है वह,
- गुजारा कैसे होता है दिलीपजी के परिवार वालों का?
- मानसीजी ने ही आधारबड वालों से सम्पर्क कर उसे एक सिलाई मशीन और दो बकरियाँ दिलवा दी हैं। कपडों को सीकर और बकरियों का दूध बेचकर फिलहाल पेट का गड्ढा भर जाता है। बच्ची के लिए आपकी आई (आपकी माँ) उसके नाम कुछ फिक्स्ड डिपाजिट कर गयी है।
- अम्मा ने ?
- हाँ ! ताई कभी कुछ बोलती नहीं थी, बस सूखे में बादल ले आती थी। जब यहाँ आयी और शोभा से मिली तब भी कुछ नहीं कहा बस देखती रही फिर मुंबई लौट गयी। फिर आयी और सारा इंतजाम किया।
जाते-जाते अविनाश ने उसकी पाँच वर्षीय बच्ची को चोकलेट दिखाई इस उम्मीद में कि वह हाथ आगे बढाएगी, पर वह अपनी माँ से ही चिपकी उसे टुकुर टुकुर ताकती रही। शायद उसकी मासूमियत और बचपने पर भी चीलें मण्डरा रही थी। दरवाजे से बाहर निकलते वक्त असंख्य झुर्रियों से भरे धनुष की तरह झुके पीठवाले, कई छेदों वाला बनियान पहने एक काँपते चेहरे ने हाथ जोडे। कौन हैं ये? पूछा अविनाश ने। दिलीपजी के पिता हैं। गोविन्दजी ने धीमे से जवाब दिया।
बाहर निकलते हुए कई महिलाओं को देखा उसने। लगभग सभी उम्र की। शान्त सौम्य, सुन्दर, किसी चलचित्र-सी चलती रही वे छवियाँ। सोचता रहा वह - युवा उम्र। सुन्दर चेहरा पर कोई साज श्रृंगार तक नहीं। एकाएक आँखों के आगे घूम गयी स्विट्जरलैंड की बूढियाँ - बिखरे मन को नहीं सँवार पाती तो क्या बिखरे तन को तो खूब-खूब सँवार लेती थी वे। पेट में आन्त नहीं, मुँह में दाँत नहीं। पार्टनर (पति तो वहाँ बहुत कम को नसीब होते हैं) भी दीवार पर टँग गया हो, पर एकदम टनाटन मेकअप, फरर, फरर करती ड्रेस। शुरू में तो वह झुर्रियों से भरी थैले-सी लटकी उनकी गोरी गर्दन पर मोतियों की माला को देख चमत्कृत होता रहता था। कहाँ से आती है इतनी ऊर्जा? लेकिन एक बार जब अस्सीवर्षीया उसकी मकान मालकिन ने सुबह-सुबह ही फोन कर बेहद सकुचाते हुए उससे कहा कि उसकी बडी बहन गिर पडी है, उठ नहीं पा रही है, उसने एम्बुलेंस को तो फोन कर दिया है लेकिन बहन को उठा नहीं पा रही है, वह कृपा कर ऊपर आकर उसे मदद करे। कितनी दयनीय और लाचार थीं वे दोनों अकेली बुढिया लेकिन जब वे ही बाहर निकलती थी तो लगता था जैसे वे दुनिया की सबसे शानदार और अपने जीवन से बेहद खुश कडक बुढिया हों। वैसे ही कई बार सूटेड-बूटेड लेकिन कंफपाते हाथों से स्टीयरिंग सम्भालते बूढों को देखते करुणा से भर जाता था वह। क्या तालमेल था इस बाहरी साज श्रृंगार का भीतर की भाव तरंग के साथ? शायद इंसान जो है वह दिखना नहीं चाहता। बुढापा दयनीय दिखना नहीं चाहता इसलिए टनाटन दिखता है। सच्चाई यह कि वहाँ अकेलापन सोख रहा है सबके उल्लास और उमंग को। लेकिन वह बार-बार स्विट्ज़रलैंड से तुलना क्यों करने लगा है? उसने गर्दन को एक जोरदार झटका दिया।
मन ने फिर पूछा मन से- क्यों मौत को गले लगाता है किसान। कब लगाता है? शायद तभी जब उम्मीद से भी उम्मीद नहीं रह जाती होगी। जब मन - प्राण - आत्मा, ईश्वर-प्रार्थना... वर्तमान-भविष्य.. और सारी अंतःशक्तियाँ साथ छोड देती होंगी, जब उबलती भूख एकदम से घर के अन्दर घुस जाती होगी, बच्चों को जकड लेती होगी, बस तभी हथियार डाल देता होगा वह। तभी बिल्ली पँजा मार देती होगी। तभी काया के चोले से भी रिश्ता टूट जाता होगा।
कानों में फिर गूँजता है कपास ही कफन बन गया था। बालासाहब से पूछता है अविनाश- क्या कोई सुसाइड नोट छोडा था उसने?
शायद उसे नहीं पूछना था !
बेबस निगाह से घूरते हैं बालासाहब... फिर एक गहरी साँस ले बोलते हैं- वह क्या पढा लिखा था? फिर दलदल में धँसा किसान क्या एक दिन मरता है? मौसम क्या एक दिन में बिगडता है? हर दिन वह थोडा-थोडा मरता है। उसकी जमीन उसका कवच कुंडल होती है, जिस दिन वह निकल गयी हाथ से, समझो उलटी गिनती शुरू हो गयी। अरे आज किसान हिम्मत कर बैंक के अन्दर तो घुसता है ,नहीं तो एक समय ऐसा था जब ये किसान अदना से अदना सरकारी परिंदा और पुलिस को देखकर ही काँपने लगते थे। खुद मुझे बडे बैंक में घुसते ही असुरक्षा की भावना घेर लेती थी। ऐसे में यदि सरकारी नोटिस आ जाए तो सोचिए उनकी दिमागी हालत क्या होती है। दरअसल ये सारा सिस्टम ही छोटे लोगों को आदमी नहीं समझता है, उन्हें विश्वास में नहीं ले पाता है। उन्हें मूर्ख और जाहिल समझता है। इसलिए किसान इस सिस्टम के साथ सहज नहीं रह पाते हैं। उन्हें लगता है वे कुछ नहीं जानते हैं। असफलता से किसान नहीं डरता है, वह हिम्मत हार जाता है जब वह अपनी क्षमता पर विश्वास खो देता है। जब उसे लगता है कि अब वह कुछ काम का नहीं रह गया है। हमारा यह सिस्टम किसान को लगातार यही अहसास करवा रहा है।
पास के गाँव में एक शेतकरी (किसान) था.. नाम था काशी विश्वेश्वर राव। उसकी आत्महत्या ने पूरे जिले को हिलाकर रख दिया। इज्जत ढाँपने के लिए चार खाने की जो लूँगी पहनता था उसी से खा ली उसने फाँसी। क्या आप सोच सकते हैं कि उस बन्दे को प्रोग्रेसिव फार्मर ऑफ दी इयर का अवार्ड मिला था। हर वक्त खुरपी कुदाल उसके हाथों में रहती थी, अपने खेत की मेड पर खडा इंच-इंच जमीन को तराशता रहता था वह। उसे देख लगता जैसे माँ के पेट से वह खुरपी कुदाल के साथ ही पैदा हुआ था। वह अपने दोस्तों को कहता था, मर्द हो मुकाबला करो, रोने धोने और मरने से क्या हालात बदल जाएँगे। शेती (खेती ) हमारे खून में है। यह हमारे लिए धन्धा नहीं, हमारी जीवन शैली है। हमें आत्महत्या नहीं जीवन के लिए सोचना चाहिए। उस पर बैंक का लोन था, कुछ सोसाइटी का भी कर्जा था। बडा जीवट वाला बन्दा था। उसने भी एक दिन अचानक कर ली आत्महत्या। मर्द था इसलिए रोया नहीं बस मर गया। उसकी मौत के बाद तो यकीन उठ गया जिन्दगी से। क्यों की? कैसे टूट गया वह सख्त पर्वत? किसने तोडी उसकी हिम्मत?
बाहर के सूखे ने भीतर के पानी को भी सोख लिया होगा और कर दिए होंगे जीने के सारे रास्ते बन्द। मन ही मन अनुमान लगाता है वह कि एक गहरी साँस छोड धीमे से बोलते हैं गोविन्दजी - चुपचाप आती है आत्महत्या और सबको दहाडे मारता छोड जाती है। सारे सवाल उसी के साथ दफन हो जाते हैं। जब उस जैसी सोच का बन्दा भी कर सकता है आत्महत्या तो फिर ये लोग तो उसके आगे कहीं नहीं ठहरते हैं। हर दिन दिल धडकता है कि अब कौन मरा ?
गोविन्दजी अपने ही प्रवाह में बोलते जा रहे हैं। उनके चेहरे के नीचे लटके बडे से मस्से पर नजरें अटक जाती हैं अविनाश की और उसके आगे घूम जाती है अपने ही देश स्विट्जरलैंड की तस्वीर जहाँ उसने देखा था। इसी प्रकार प्रेयसी की तरह मौत को गले लगाते लोग।
नैंसी के सामने फिर खोलता है वह अपना मन- देखा आज राइज होते इण्डिया में अस्त होते भारत की काली तस्वीर ! तुम कल्पना भी नहीं कर सकती नैंसी कि कैसी बदरंग कहानियाँ बुन रही है यहाँ की गरीबी। बच्चे हैं बचपना गायब है। पारतुल में देखा था कि रिश्तों की चाँदनी खिली हुई थी। लेकिन आज देखा, लोग हैं लेकिन लगाव गायब है क्योंकि गरीबी ने सभी मानवीय भावनाओं पर पोंछा लगा दिया है। नहीं तो कैसे मुमकिन है कि कोई पत्नी और दो-दो बच्चियों के रहते अपनी जान ले ले। अभी-अभी उस परिवार से मिलकर आया हूँ, जहाँ एक किसान ने भूख से लडते-लडते मौत को गले लगा लिया लेकिन उसकी पत्नी अभी भी डटी हुई है मोर्चे पर अपनी दोनों मासूम बच्चियों के साथ। अजीब है ये देश जहाँ अन्धकार और प्रकाश साथ-साथ बह रहे हैं। इस परिवार की कहानी ने मुझे हिला कर रख दिया है। मैंने देखा, उसके घर में एक रैक है जिसमें रोजमर्रा की पहनी जाने वाली रबड की सस्ती पहनी हुई चप्पल तक सहेज कर पोलिथिन बैग में रखी हुई थी, जैसे कितनी कीमती चीज हो। दुनिया के सबसे धनी देश में इतने सालों में रहते हुए मैं तो जैसे भूल ही गया था कि धरती का अधिकाँश भाग आज भी भुखमरी, जिल्लत और गरीबी से जूझ रहा है। मैं तो जैसे भूल ही गया था कि मैं खुद इसी भुखमरी, गरीबी और बेकारी से घबडाकर भागा था। नैंसी हवाओं में उडते इस अविनाश को बाबुलतारा और बलखडे गाँव ने फिर धरती पर ला पटका है। मैं सोचता था कि मैंने आधी से ज्यादा दुनिया घूम ली है पर यहाँ आकर एक परिवार को थोडा निकट से देखने पर पहली बार अहसास हुआ कि उफ कितना कम देखा है मैंने दुनिया को! कितना कम जाना है दुनिया को और अपनी माँ को भी। स्विट्जरलैंड में पहली बार मैंने देखे थे नीले फूल और सूँघा था उन्हें। यहाँ आज पहलीबार मिली वह गंध जिसे कहते हैं - माटी और मानुष की गंध !
मौत, बल्कि आत्महत्या तो अपने यहाँ भी है। बल्कि दुनिया का इकलौता देश है अपना देश स्विट्जरलैंड जहाँ आत्महत्या सबसे ज्यादा होती है। पर वहाँ और यहाँ की आत्महत्याओं में एक बुनियादी अन्तर है। याद है इंका के पिता की आत्महत्या। उनकी आत्महत्या का कारण जीवन के जानलेवा अभाव नहीं थे बल्कि जीवन के अत्यधिक रंगों के कारण बदरंग हुआ जीवन था! जीवन के अन्तिम पहर में अपनी उदासी और जानलेवा अकेलेपन से निजात पाने के लिए उन्होंने कुछ दिनों तक टॉमी (कुत्ता) को भी पाला (जैसा कि हमारे यहाँ अधिकाँश अकेले बूढे करते हैं कुत्ता या बिल्ली पाल लेते हैं) याद है किस प्रकार दिन भर यूट्यूब में उसके खानपान को ही पढते रहते थे वे। बिना चूके सारे वेक्सिनेशन उसे दिलवाए। हर शाम पिंजरे में ले जाते उसे घुमाने कि कहीं उसे संक्रमण नहीं हो जाए। हर सप्ताह उसका वजन चेक करते कि कहीं ओवरवेट नहीं हो जाए। लेकिन कितने दिन टॉमी के भरोसे जी पाए वे? महज साल भर फिर उखड गए। कुछ भी ऐसा न था जो जीने का हौसला पैदा कर सकता उनमें और एक मनहूस सुबह वे भी। यही नियति है सामाजिक मूल्यबोध से रहित एक आत्मकेन्द्रित समाज के बाशिंदों की। वहाँ मौत का कारण था जिन्दगी का दर्द से रिश्ता ना जुडना... जरूरत से ज्यादा सबकुछ का होना ! मैंने ध्यान से देखा शोभा और उसके जीवन को, कितना संघर्ष, भुखमरी, कितना दर्द है। जिन्दगी की चादर छेदों से भरी है उसकी, लेकिन हार नहीं मान रही, जी रही है वह क्योंकि जीना है उसे अपनी दो-दो बेटियों के लिए।... ऐसा कोई मकसद इंका के पिता के सामने होता तो वे भी शायद आज जी रहे होते ! मैं तो यह जानकर आसमान से गिरा था जब मेरे भारतीय दोस्त दिव्य कुमार ने मुझे बताया कि दुनिया का पहला देश है स्विट्जरलैंड जहाँ आत्महत्याओं की दर सबसे ज्यादा है, जहाँ युथेनेशिया (मर्सी किलिंग) वैधानिक है। कई लोग विदेश से यहाँ आते हैं सिर्फ इसलिए कि युथेनेशिया से मर सके। युथेनेशिया के यहाँ बाकायदा क्लिनिक खुले हुए हैं, जहाँ कोर्ट से ऑर्डर लेकर आप दाखिला ले सकते हैं।

सोचो नैंसी, स्विट्जरलैंड शायद दुनिया का इकलौता देश है जिसके गलियारे में गरीबी, बेकारी, अभाव, भुखमरी, बीमारी... जैसे दुखों ने झाँका भी न होगा। पिछले 800 सालों के इतिहास में स्विट्जरलैंड में एक भी युद्ध नहीं हुआ। स्विस लोग नहीं जानते कि बत्ती गुल होना क्या होता है। शोभा के घर में बत्ती गुल नहीं होती तो क्या मैं भी जान पाता? उसके पति की आत्महत्या ने जिन्दगी का नकाब उलटा दिया। मैंने जाना। पानी की, बिजली की कमी क्या होती है। सूखा क्या होता है, अकाल क्या होता है। महँगाई क्या होती है। भुखमरी क्या होती है।
हर वक्त प्रेम और माँसलता में डूबे, भोग के अतिरेक में धँसे, सुख से ऊबे हमारे स्विस लोगों को मौत भी जिन्दगी की तरह लुभाती है क्योंकि हताशा के पलों से लडना, जिन्दगी की चुनौतियों का सामना करते हुए जीना इन्हें नहीं आता है। जिसने दुःख नहीं देखा वह सबसे बडा दुखियारा। इसलिए जिस्म का जादू ढलने पर वह अकेला द्वीप हो जाता है। सबसे बडा दुखियारा हो जाता है। सांय-सांय करता सूना घर, आत्मा से दूर छिटकी देह और कच्चा बेकाबू मन। संसार के, ईश्वर के, सारे दरवाजे बन्द। जीवन के प्रति न विशेष सम्मान, न कोई जिम्मेदारी, न कोई उद्देश्य, न कोई स्वप्न और न ही जीवन संघर्ष का माधुर्य। ऐसा कुछ नहीं जो दे कोई है का आश्वासन। ऐसे में आत्महत्या उसे प्रेयसी की तरह लुभाती है। विशेषकर जब एक पार्टनर मर जाता है, तो दूसरे का अवसाद भी इतना गाढा हो जाता है कि वह आत्महत्या के उपाय की सोचता है, जीने के उपाय पर ध्यान नहीं जाता है उसका। देश हो या व्यक्ति या परिवार, खुशहाली शायद तभी सम्भव है जब हम उन चीज़ों को आपस में बाँट लें, जो हमारे पास जरूरत से ज्यादा है। विचारों के प्रवाह में बहता जा रहा है अविनाश कि सामने दीखते हैं प्याज के फैले खेत... वह कुछ प्याज उठाने को होता है कि बालासाहब रोक देते हैं- ना-ना ये खाने के कांदा नहीं हैं इनके बीज निकले हुए हैं।
साइकिल पर सवार कोई युवक। ऊपर उडते कुछ कबूतर। मन में फिर उडते कुछ सवाल.. सवालों की नोक पर टँगा आदत से मजबूर वह करने लगता है विचारों की जुगाली।... कहाँ स्विट्जरलैंड जहाँ निजता और मानवीय गरिमा एक मूल्य की तरह है कुछ इस तरह कि दिन में भी कोई किसी के बैडरूम में नहीं घुसता है, सालों बाद मिलने पर भी यह तक नहीं पूछता कि पत्नी कैसी है कि इस बीच कहीं दोनों के बीच तलाक न हो गया हो। व्यक्ति स्वातन्त्र्य तो इस चरम पर कि मुझे लगता है कि कभी आत्महत्या करने की मैं सोचूँ भी तो मेरे स्विस दोस्त शायद सोचें कि मुझे रोकें या नहीं, कि कहीं मेरे दुखों की मुक्ति के रास्तों में उनके द्वारा अवरोध न पैदा हो जाए। मेरे प्रति उदासीनता नहीं वरन् उनका जीवन दर्शन ही उन्हें ऐसा करने से रोकेगा।
और वहाँ की निजता के विपरीत यहाँ की सामूहिकता! इतिहास के किसी कोने में खडे यहाँ के किसान? उन की जिन्दगी, जिन्दगी की सुबह शाम, तुम सोच भी नहीं सकती नैंसी कि यहाँ सबकुछ खुला और सार्वजनिक है। यहाँ निजता और गरिमा का कोई स्थान ही नहीं हैं, जिन्दगी का सारा नंगापन, सारा कंगलापन, सारा लेखा-जोखा सबके सामने हैं।
पर क्या फर्क है स्विट्जरलैंड की आत्महत्याओं में और यहाँ की आत्महत्याओं में। फर्क तो है। वहाँ रूह के मर जाने पर मौत रास्ता दिखाती है जबकि यहाँ अस्तित्व के ही मिट जाने की आशंका और चरम विवशता के पल या अस्तित्व के ही अर्थहीन हो जाने की चरम हताशा के पल मौत के रास्ते की ओर ले जाते हैं। वहाँ रंगीनियाँ शर्मिंदा हैं, यहाँ श्रम शर्मिंदा है। वहाँ आत्महत्या व्यक्ति का अपना वरण है। यहाँ यह व्यवस्था द्वारा दिया गया है, सोचते-सोचते अपने कारवाँ से थोडा पीछे छूट जाता है कि हॉर्न की तेज आवाज ध्यान खींचती है उसका।
शीघ्र प्रकाशय उपन्यास- ढलती साँझ का सूरज
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