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औपनिवेशिक विमर्श और गाँधी

अमित राय
उपनिवेशवाद एक ऐसी मनोवैज्ञानिक स्थिति है जिसकी जडें उपनिवेशक और उपनिवेशित की सामाजिक चेतनाओं के शुरुआती रूपों में मिलती हैं वहीं अस्मिता एक ऐसा दायरा है जिसके तहत व्यक्ति और समुदाय यह बताते हैं कि वे खुद को क्या समझते हैं। अस्मिता का यह दायरा अपने आप में एक बौद्धिक, ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक संरचना का रूप ले लेता है जिसकी रक्षा करने के लिए व्यक्ति और समुदाय किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। वे खुद की और दूसरे भी उनकी अस्मिता के उसी दायरे के मुताबिक शिनाख्त करते हैं (अभय कुमार दुबे, 2019)।
शुरुआत में चिन्तकों का खयाल था कि व्यक्ति का स्वायत्त वजूद अपने आप में एक असंदिग्ध तथ्य है और उसी से उसकी अस्मिता या पहचान प्रवाहित होती है । इसी विचार ने आगे चलकर उदारतावाद के केंद्र में व्यक्ति की इयत्ता को ला बैठाया । माक्र्सवाद अस्मिता की स्वायत्तत्ता को स्वीकार न करके सामाजिक प्रक्रिया के अधीन देखता है । लेकिन वह वर्गीय संरचनाओं को छोडकर बाकी सभी अस्मिताओं को भ्रान्त चेतना मानता है। भारतीय सन्दर्भ में इसकी मिसालें पिछले सौ सालों में बिखरी पडी हैं, दलित अस्मिता एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है, कभी तो दलित समुदाय स्वयं को आदि द्रविड के रूप में और कभी पतित हो चुके क्षत्रियों के रूप में और कभी नागरिक समाज के दलित के सदस्य के रूप में देखते हैं। इससे यह स्पष्ट है कि अन्य अस्मिताओं की तरह उसका कोई स्वायत्त, नैसर्गिक और स्थायी रूप नहीं है। इसी तरह राष्ट्रवादी अस्मिता भी किस्म-किस्म की होती है। बीसवीं सदी ने अस्मिता के इस विचार पर कई गम्भीर प्रश्न चिह्न लगाए। चिन्तकों ने पाया कि अस्मिताएँ सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक परिवर्तनों के मुताबिक बनती बिगडती रहती हैं, उन्होंने देखा कि एक समय में अस्मिता का कोई एक पहलू अधिक प्रमुखता प्राप्त करके उसकी राजनीतिक अभिव्यक्ति बन जाता है (अभय कुमार दुबे, 2002) ।
यहाँ देखने का प्रयास किया गया है कि एक खास समय में अस्मिता (राष्ट्र निर्माण और स्वतन्त्रता की अस्मिता) का पहलू किस तरह से एक राजनीतिक अभिव्यक्ति बन जाता है, इस अस्मिता के निर्माण में पहचान करने की आवश्यकता है कि किस तरह से औपनिवेशिक मानसिकता का प्रभाव भारतीय अभिजनों पर हुआ और उसके क्या कारण थे? क्या वे सचेत होकर पश्चिमी सभ्यता के उन बारीक पहलुओं के माध्यम से भारतीय पहचान को देख रहे थे जिनमें ब्रिटेन के कुछ लोग (साम्राज्यवाद के पैरोकार) के बरअक्स अपनी पहचान बना रहे थे या उन्हें उनके ब्रिटेन के उन लोगों के आधार पर पहचान निर्मिति का प्रयास करना चाहिए था जो औपनिवेशिक शासन के पक्ष में नहीं थे? क्या ये संरचनाएँ मनोवैज्ञानिक थीं या कुछ और थीं?
दरअसल किसी भी पहचान या अस्मिता के जन्म के पीछे एक लम्बी परम्परा का होना महत्त्वपूर्ण होता है। गाँधी से पूर्व पश्चिम द्वारा पूर्व को देखने की दृष्टि का विकास हो चुका था, जिसमें दूसरों के बरअक्स अपने को सभ्य बताने वाले पश्चिमी दर्शन ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, दूसरों के बरअक्स अपने को देखने को परिभाषित करने से ही किसी भी पहचान का जन्म होता है जिसे सापेक्षतावाद कहते हैं। या यूँ कहें कि अस्मिता या पहचान के निर्माण में अन्य (Other) की जरूरत होती है जिसके बरअक्स हम अपनी एक छवि गढते हैं या स्वयं को परिभाषित करते हैं ।
पश्चिम द्वारा पूर्व को नटों, सपेरों, अशिक्षितों के बतौर देखने की जो कोशिश की गयी उसमें भारत को एक ऐसे समुदाय के रूप में परिभाषित किया गया जो लगातार पराजित होता रहा है, जिसका न कोई इतिहास है न ही जिसकी कोई सभ्यता या संस्कृति, इस प्रकार पश्चिम की वर्चस्ववादी उत्पीडक अस्मिता के बरअक्स भारतीय अस्मिता एक नगण्य रूप में थी। इस मनःस्थिति को पश्चिमी विचारकों द्वारा भारत के सन्दर्भ में किये गए विचारों से समझ सकते हैं। माक्र्स दिनांक 25-06-1853 को न्यूयार्क के दैनिक डेली ट्रिब्यून में माक्र्स भारत को ईसाई मत की स्थापना के पूर्व से ही सदा के लिए दरिद्र और कंजूस देश बताते हैं,भारतीय समाज जीवन को सर्वथा निष्प्राण,गौरवहीन और गतिहीन बताता है। वे कहते हैं कि भारत के लोग प्रकृति के स्वामी मनुष्य को छोड क्रूर प्रकृति को ही भजते हैं। अंग्रेजों ने भारत में चाहे कैसे भी अत्याचार किये हों, किन्तु भारत के पाश्चात्यीकरण के लिए तो इंग्लैण्ड एक परोक्ष साधन ही है (धर्मपाल, 2000)।
इसी प्रकार जेम्स स्टुअर्ट मिल भी अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इण्डिया (1817) में भारतीय ज्ञान एवं साहित्य और संस्कृति की तीव्र आलोचना करते हैं । तीन खण्डों में इस पुस्तक का सन्दर्भ लेना मानो भारतीय इतिहास पर लिखी गयी पुस्तकों के लिए अनिवार्य हो गया है। यही नहीं मिल के अभिमत की उपेक्षा नहीं की जा सकती। इतना व्यापक प्रभाव इस पुस्तक का है । इस पुस्तक में मिल ने लिखा है काम करने में गम्भीरता की कमी, असत्य, छलकपट, औरों की संवेदनाओं की उपेक्षा, भ्रष्टाचार आदि हिन्दुओं और मुस्लिमों के सामान्य लक्षण हैं। मुस्लिम संपन्न होते हैं तो ये आनन्द प्रमोद में धन खर्च देते हैं, किन्तु हिन्दू तो हिजडों की तरह दरिद्र जीवन जीना ही पसन्द करते हैं। चीनी लोगों की तरह हिन्दू भी अन्य किसी असंस्कृत समाज की तरह बहुत ही लुच्चे, कपटी और झूठे हैं। हिन्दू और चीनी अपने आपको सदा बढा-चढाकर बताते हैं। वे कायर, संवेदनाहीन आत्मवंचना में डूबे हुए, हमेशा औरों की आलोचना करने वाले तथा जुगुप्सा की सीमा तक गन्दे होते हैं (धर्मपाल, 2000)।
बेल्लारी के समाहर्ता ए.डी.कैम्पबेल के अति प्रसिद्ध पत्र का आधार लेकर अंग्रेजों ने ऐसा रौब जताने का प्रयत्न किया था कि भारत में अक्षरज्ञान केवल व्यावसायिक व्यवहार चलाने के लिए दिया जाता है । अतः इस शिक्षा पद्धति में थोडा कुछ अक्षरज्ञान और कुछ अंकज्ञान के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । इससे भी आगे अंग्रेजों ने भारतीय शिक्षा पद्धति को खराब और उसके अन्त की ओर गतिमान पद्धति बताई थी (धर्मपाल, 2000)। जबकि गाँधीजी ने इस शिक्षा पद्धति को मूल से उखाड दिए गए वृक्ष के समान बताया था। 1813 तक विलियम विल्वरफोर्स ने अंग्रेजों के इस उपेक्षा भाव को खुलकर व्यक्त किया था। उसने कहा था कि भारतीय समाज तो धार्मिक मान्यताओं में जडतापूर्वक जकडा हुआ है और उसका सामाजिक तथा नैतिक अधःपतन हो गया है (धर्मपाल, 2000)। मैकोले ने भी यही बात भिन्न प्रकार से की। उसने कहा भारत का समस्त ज्ञान और विद्वत्ता यूरोप के किसी अच्छे पुस्तकालय के एक टांडे में ही समाया है। संस्कृत में लिखे गए ग्रन्थ इंग्लैण्ड के प्राथमिक विद्यालयों में पढाये जाने वाली अत्यन्त सामान्य स्तर की पुस्तकों से भी निम्न स्तर के हैं (धर्मपाल, 2000)।
हिन्दू केवल कपडे की बुनाई और रंगाई में, निम्न स्तर के आभूषण बनाने में, रत्न कला कौशल में, स्त्रियेन लक्षणों में और वाक छटा में यूरोपीय लोगों की तुलना में बढकर थे। चित्रकला, शिल्पकला व स्थापत्य कला में हिन्दू यूरोप के लोगों से जरा भी बढकर नहीं थे । जबकि बेढब साधनों का उपयोग करने में निपुणता इस विवेकहीन समाज का मौलिक लक्षण है (धर्मपाल, 2000)।
भारत के बारे में अपने अभिमत के अन्त में मिल लिखता है कि अत्यन्त अविवेकी होने पर भी हमारे पुरखे किसी भी काम को पूरी गम्भीरता से करते थे जबकि हिन्दुओं की बाहरी चमक-दमक के भीतर अत्यधिक छल प्रपंच और कपट छिपा होता है । मध्यकालीन राष्ट्रों में स्थिरता आने पर यूरोप के उन देशों के लोगों में हिन्दुओं से उत्कृष्ट प्रकार के चरित्र और शिष्टाचार दिखाई देते हैं ।
विल्वरफोर्स,मैकाले और माक्र्स की तरह मिल को भी भारत के शिष्टाचार-रीति-रिवाज तथा सभ्यता जँगली लगती थी और ऐसे भारत को सुधारकर उसे सभ्य और सुसंस्कृत बनाने के मार्ग उसने बताये थे। मिल के मतानुसार भारतीयता त्यागने से, विल्वरफोर्स के मतानुसार ईसाई मत अपनाने से, मैकाले के मतानुसार अंग्रेजियत अपनाने से और माक्र्स के मतानुसार पाश्चात्यीकरण का स्वागत करने से ही भारत एक सभ्य सुसंस्कृत देश बन सकता है (धर्मपाल, 2000)।
पश्चिमी विचारकों के भारत के सन्दर्भ में इस तरह के विचारों को भारतीय अभिजनों ने भी मनोवैज्ञानिक रूप से कहीं न कहीं इन्हें स्वीकार भी कर लिया था और इनमें वे सुधार की इच्छा से अपनी सभ्यता को उनकी नजर से देखने भी लगे थे, इसी मानसिकता का परिचय हमें उनके विचारों में देखने को मिलता है- 6 अप्रैल 1897 को विवेकानन्द अपने पत्र में भारती की विदुषी सम्पादिका सरला घोषाल को लिखते हैं- मैं सदा से यह मानता रहा हूँ कि हमारा उत्कर्ष तब तक नहीं हो सकता,जब तक पश्चिमी लोग हमारी सहायता के लिए आगे नहीं आते। हमारे इस देश में गुणों का सम्मान नहीं है,धन की शक्ति नहीं है और सर्वाधिक सोचनीय यह है कि तनिक सी भी व्यवहार बुद्धि नहीं है ।... मैंने अपने अल्प जीवन में भी यह अनुभव किया कि श्रेष्ठ अभिप्राय, संकल्प, निष्ठा और अगाध अनन्त प्रेम से विश्व विजय संभव है । इन गुणों से सम्पन्न एक अकेली आत्मा करोडों पाखण्डियों और जड क्रूर बुद्धियों के तमसावृत संकल्पों को विनष्ट कर सकती है। मैं यह कहना चाहता हूँ कि पश्चिम से व्यक्तियों और धन के आये बिना हमारा कल्याण नहीं है (धर्मपाल,1994)।
भारतीयों की इस तरह की छवि गढने में बंगाल के नव प्रबुद्धों ने भी इसमें बहुत आगे बढकर भूमिका निभाई। संस्कृत तथा भारतीय भाषाओं के माध्यम से ही आधुनिक ज्ञान विज्ञान की भी पढाई हो, इसका राममोहन राय जैसों ने प्रचण्ड विरोध किया । उनका मत बन गया था कि ये भाषाएँ मात्र स्मृति की,अतीत के ज्ञान की वाहक हो सकती हैं । पश्चिम का ज्ञान तो पश्चिम की ही भाषा से प्राप्त हो सकता है (धर्मपाल, 1994)।
यह एक अनोखी मान्यता थी कि स्वयं पश्चिम तो, भारत का और पूर्व का ज्ञान अपनी भाषा में प्राप्त करे परन्तु भारत को पश्चिम का ज्ञान पश्चिम की ही भाषा में सीखना होगा। इस आग्रह के पीछे निश्चय ही भारतीय भाषा, भारतीय बुद्धि, भारतीय जन के प्रति एक हीनता का भाव रहा।
इसी तरह केशवचन्द्र सेन से भारत के बारे में ब्रिटेन में ही कहा - यदि आप आज भारत को देखें, तो आप पाएँगे, दूर-दूर तक फैली मूर्तिपूजा, एक ऐसी जाती व्यवस्था जैसी और कहीं नहीं मिलेगी, जिज्ञासारहित प्रकृति वाली सामाजिक और पारिवारिक संस्थाएँ तथा अत्यन्त जुगुप्सा जनक सीमा तक विद्यमान अज्ञान, पूर्वग्रह, दोष और अन्धविश्वास (धर्मपाल,1994)।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने सन् 1900 में लिखा- अस्तित्व के आंतरिक सत्य से सम्बन्ध विच्छिन्न कर हमारे देश ने अविवेक के प्रचण्ड भार से दबकर परिस्थितियों की भीषण दासता स्वीकार कर ली । सामाजिक व्यवहार, राजनीति, धर्म और कला के क्षेत्र में हम लोग सृजनात्मकता से रहित हो गए तथा एक क्षयशील परम्परा अपनाकर हमने अपनी मानवता की अभिव्यक्ति का ही अन्त कर दिया (धर्मपाल,1994) ।
भारत की यह छवि नई इंडोलोजी की रचना थी जिसे पश्चिम ने भारत की पहचान को राजनीति से गढा था जहाँ पश्चिमी सभ्यता एक सभ्य सभ्यता थी और भारत एक पिछडा एवं असभ्य सभ्यता वाला देश । यहाँ के प्रबुद्ध वर्ग ने भी इसे स्वीकार लिया था एवं इन्हीं स्मृतियों के बल पर यह पहचान अपना प्रवाह बनाए हुए थी एवं सांस्कृतिक रूप से साम्राज्यवाद को ज्ञानोदय का वाहक भी बता रही थी। अंग्रेजी राज मानता था कि भारतवासी प्रच्छन्न रूप से असभ्य हैं और उन्हें खुद को कुछ और सभ्य बनाना पडेगा। दूसरी तरफ अंग्रेजों को दोस्त समझने वाले हों या दुश्मन,बहुत से भारतीय भी खुद को उन्हीं जैसा बना लेने में ही अपनी मुक्ति देखते थे।
दरअसल किसी भी पहचान की निर्मिति के लिए जरूरी तीन चीजों होतीं हैं-किसी भी पहचान की निर्मिति बिना किसी अन्य की उपस्थिति के बगैर नहीं होती, जिस तरह सभ्य सभ्यता का निर्माण तब तक सम्भव नहीं है जब तक कि दूसरा कोई असभ्य जैसा तत्त्व न मौजूद हो। इस तरह एक अन्य के बरअक्स स्वयं की पहचान गढी जाती है और पश्चिम ने यही किया जिसका परिणाम भारतीय अभिजात्य वर्ग की मानसिकता पर भी स्पष्ट देखा जा सकता था ।
पहचान निर्मिति का दूसरा और महत्त्वपूर्ण तत्त्व है स्मृति । अपने इतिहास की गौरवपूर्ण बातों की स्मृति का लगातार जीवित यथार्थ के रूप में उपस्थित होना किसी भी पहचान के अस्तित्व के लिए खासा महत्त्वपूर्ण होता है और पश्चिम द्वारा अपने वर्चस्वशाली इतिहास की एवं सभ्यता की लगातार घोषणा की जाती रही है और ऐसे में ऐसा राज्य जिसमें सूरज कभी अस्त नहीं होता था जैसे वाक्य भी चरितार्थ हुए ।
पहचान निर्मिति का तीसरा तत्त्व होता है अस्मिता से सम्बन्धित आख्यानों का होना । यह किसी सभ्यता के लेखा-जोखा की ही तरह होता है जो हमारे इतिहास की गौरवशाली गाथाओं मिथकों आदि को अपने में समेटे होता है और इन सभी तत्त्वों से मिलकर गढी जाती है किसी भी तरह की वर्चस्ववादी अस्मिता । इस तरह पूर्व के बरअक्स पश्चिम की वर्चस्व परक उत्पीडक की अस्मिता का निर्माण हो चुका था और भारतीय मानस इसे उसी रूप में स्वीकार भी चुका था और अपनी सभ्यता से निराश भी हो चुका था। यह पश्चिम की पूर्व पर एक मानसिक वर्चस्वता थी।
महात्मा गाँधी ने भारतीय सभ्यता के इस मानस को समझा । महात्मा गाँधी में भी ऐसा हीनता भाव और ग्लानि भाव लेशमात्र भी नहीं था। देश के बारे में महात्मा गाँधी का विचार नव प्रबुद्धों के विचार से नितान्त भिन्न था। वे मानते थे कि इस देश के वृहत् समाज में भरपूर गुण हैं और इसमें पर्याप्त आन्तरिक सामर्थ्य है। गाँधीजी ने ऐसे समय में भारतीय मानस को एक कुशल राजनेता की भाँति जाँचा परखा और भारतीय अस्मिता की पहचान की निर्मिति का काम शुरू किया। यह अस्मिता पश्चिमी सभ्यता से इन अर्थों में भिन्न थी कि जहाँ पश्चिमी सभ्यता वर्चस्व परक और उत्पीडक अस्मिता थी वहीं भारतीय अस्मिता प्रतिरोध परक उत्पीडित अस्मिता के रूप में थी। जहाँ भारतीय सभ्यता के लिए अन्य थी पश्चिमी सभ्यता एवं स्मृति के लिए उन्होंने भारतीय समाज के उन तत्त्वों को मिथकों से उठाया जो हमारे गौरवशाली अतीत की याद दिलाते हैं।
गाँधीजी ने पश्चिमी सभ्यता के बरअक्स भारतीय अस्मिता की निर्मिति की जिसमंि उनकी एक-एक चीज़ का चुनाव महत्त्वपूर्ण था। जैसे महात्मा गाँधी ने सन् 1909 ईस्वी में हिन्द स्वराज लिखी थी, जिसमें भारत और यूरोप की टकराहट को दो सभ्यताओं की टकराहट के रूप में देखा बताया गया था ।

1920 और 1930 में गाँधीजी ने भारतीय समाज की दशा के बारे में और यूरोप विशेषतः इंग्लैण्ड से विभिन्न क्षेत्रों में उसकी तुलना के बारे में प्रभूत सामग्री लिखी ही थी। गाँधीजी ने स्मृति के बतौर गुप्तकालीन समाज व्यवस्था के गाँवों की तस्वीर को सामने रखा और स्वराज जैसी कल्पना की, दरअसल यह उनकी कल्पना नहीं थी बल्कि गुप्तकालीन कुछ गाँव ऐसे थे जिनमें स्वराज की ही भाँति समाज व्यवस्था थी।
अस्मिता की राजनीति को भारतीय मानसपटल पर लगातार अंकित करने की जरूरत थी और अस्मिता की राजनीति को लगातार जीवित यथार्थ बनाए रखने के लिए जरूरत होती है कि इन स्मृतियों का बार-बार दोहराव किया जाए और लगातार विस्तार दिया जाए। गाँधीजी ने यही किया। उन्होंने अपने मिथकों को गढा और लगातार नरसी मेहता के लिखे भजन वैष्णव जन ...या राम राज्य, स्वराज जैसे भजनों और नारों को गढा जो भारत की स्वतन्त्रता जैसे लक्ष्य की पूर्ति के लिए जरूरी थे। इसमें रघुपति राघव राजाराम जैसे भजन भी शामिल थे ।
इसके साथ ही साथ 19वीं शती के प्रारम्भ काल में स्वदेशी भारतीयों की दशा,अंग्रेजों के आने से पूर्व की भारतीय सामाजिक जीवन दशाएँ और उनके प्रभुत्व काल में बढी भारतीय समाज की दरिद्रता और दुर्दशा,1800 ईस्वी तक दक्षिण भारत में तथाकथित अन्त्यज लोगों (जिसमें दो चार जातियाँ ही आती थीं) की अथवा महाराष्ट्र में महारों की अपेक्षाकृत अधिक अच्छी स्थिति जो ब्रिटिश आधिपत्य होने पर बिगडती चली गयी तथा ऐसे ही विषयों पर लेख लिखे ।
सर शंकर नायर ने ईस्वी 1919 में लिखा था कि अन्त्यज आदि की सामाजिक आर्थिक दशा में मुख्य गिरावट विगत डेढ सौ वर्षों में ही हुई है तथा भारतीय समाज के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में भी उल्लेखनीय ह्रास इसी अवधि में हुआ है। गाँधी जी ने इस तरह अतीत की इन स्मृतियों को चुनकर पुनः जीवन्त किया और गीता, रामचरित मानस जैसे पुराणों, आख्यानों का सहारा लिया और भारतीय सभ्यता की पहचान के महत्त्वपूर्ण तत्त्वों को तरजीह दी ।
इन दोनों अस्मिताओं का मुख्य अन्तर था कि जहाँ एक ओर पश्चिमी सभ्यता (शैतानी सभ्यता) वर्चस्वपरक उत्पीडक अस्मिता थी तो वहीं दूसरी ओर भारतीय सभ्यता प्रतिरोधपरक और उत्पीडित अस्मिता थी। यहाँ एक उत्पीडक की भूमिका थी तो दूसरी उत्पीडित की भूमिका में थी ।
भारतीय अस्मिता का उत्पीडन का इतिहास बहुत पुराना इतिहास रहा है, जिसके परिणाम ब्रिटिश शासनकाल के शोषण में देखे जा सकते हैं,लेकिन भारतीय मानस था कि इस उत्पीडन के खिलाफ प्रतिरोध को तैयार नहीं था,गाँधी जी ने इस बिगाड करने वाली शैतानी सभ्यता के इतिहास को कुरेदा और इसमें महत्त्वपूर्ण है कि उन्होंने उसके खिलाफ एक वैकल्पिक मॉडल भी प्रस्तुत किया।
एक तथ्य पर ध्यान देना आवश्यक है कि दरअसल गाँधी जी की इस भारतीय सभ्यता के पहचान के तत्त्व वर्तमान अस्मिता की राजनीति से भिन्न थे, ऐसा कतई नहीं था कि इसमें पश्चिमी सभ्यता को केवल भारतीय सभ्यता के विरोध के तौर पर देखा हो बल्कि उन्होंने पश्चिमी सभ्यता के उन तत्त्वों को उभार दिया जो पश्चिमी सभ्यता में औपनिवेशिक काल से पूर्व से मौजूद थे और इसका परिणाम भी यह हुआ कि पश्चिमी सभ्यता के वे लोग जो स्वयं के औपनिवेशिक शासन से सन्तुष्ट नहीं थे और जो स्वयं उपनिवेशवाद के खिलाफ थे वे गाँधी जी के साथ समर्थन में आये और उन्होंने मशीनी सभ्यता का विरोध भी किया ।
गाँधीजी की सोच में विचार निर्माण की प्रक्रिया में पश्चिम किस तरह रहा और पश्चिम ने उन पर क्या प्रभाव डाला जिससे पूरी पश्चिमी सभ्यता को वे शैतानी सभ्यता की तरह देखने लगे, यह जानना दिलचस्प है। गाँधी एक तरफ पश्चिमी सभ्यता को शैतानी सभ्यता कहते हैं वहीं दूसरी तरफ पश्चिमी बौद्धिकों टॉलस्टॉय, हेनरी डेविड थोरो और रस्किन के उन पर पडे प्रभावों को भी मानते हैं। जब उनसे ब्रिटेन की अन्तिम यात्रा पर पश्चिमी सभ्यता के बारे में पूछा जाता है तो वह चुटकी लेते हैं- मैं सोचता हूँ कि यह बहुत बढिया विचार होगा (विनय लाल,2009)। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि अपने वयस्क जीवन में पश्चिमी सभ्यता की आलोचना के बावजूद उनके ब्रिटिश यूरोपीय और अमरीकी दोस्त थे। एक बार लंकाशायर में कपडा मिल की यात्रा के दौरान विपरीत परिस्थितियों जिनमें मिलों में उत्पादित कपडे के बहिष्कार की शुरुआत के बावजूद अंग्रेज श्रमिकों ने उनकी खूब आवभगत की। उनका जीवन कईयों के लिए पश्चिम में उदाहरणस्वरूप था- कई लोग तो उन्हें पूरे जीवनभर क्रिश्चियन मानते रहे उन्हें उनके बारे में कोई कष्ट नहीं था कि वे बेहतर ईसाई थे, उन ईसाईयों से भी बेहतर जो अपनी शैली के ईसाई थे। गाँधीजी ईसाइयत के कई पहलुओं को व्याख्यायित करने वाले पहले भारतीय थे। गाँधी ने पश्चिम को पश्चिमी नजरीये से न देखकर अपने नजरीये से देखा जिसमें वे न केवल ईसाइयत की आध्यात्मिकता को सामने लाते हैं वरन् हाशिये पर पडी उनकी परम्परा को भी सामने लाते हैं।
दक्षिण अफ्रीका में गाँधी के मित्र और सहयोगी यूरोपियन यहूदी थे। पाँच दशक तक उनकी निकट मित्रों की बडी संख्या अमरीकियों, ब्रिटेन और अन्य यूरोपियों की थी- इनमें से कई कला, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में प्रबुद्ध थे । उन्होंने अपना चित्र फ्रेंच उपन्यासकार और बीथोवन के जीवनीकार रोम्या रोला की तरह खींचा; मैडलीन स्लेड उनकी पुत्री की तरह थीं; चार्ल्स एंड्रयू जो अंग्रेज पादरी थे और गाँधी के निकटस्थ थे उन्हें मोहन नाम दिया; लांजा डेल वास्टो एक इटालियन रईस थे जिन्होंने भारत की यात्रा की और वे गाँधी से 1936 में मिले थे, वे फ्रांस शांतिदास होकर लौटे। गाँधी कई हजार विदेशियों को पत्र लिखते थे और भारत की यात्रा करने वालों का स्वागत भी करते थे। उनमें माग्रेट सेंगर एक नाम है जो जनसंख्या नियंत्रण की वकालत करने वाली थीं (विनय लाल, 2009) ।
गाँधीजी 1891 की अपनी इंग्लैण्ड यात्रा के बारे में लिखते हैं कि यदि मैं इंग्लैण्ड जाता हूँ तो न केवल बैरिस्टर बनूँगा बल्कि मैं दार्शनिकों कवियों की भूमि और सभ्यता के विशिष्ट केन्द्र को भी देखूँगा (CW1: 42) इंग्लैण्ड में गाँधीजी जेंटलमैन अंग्रेज की तरह बने, वायलिन, नृत्य और वक्तव्य कला पाठ पढा, चिमनी पॉट टोपी पहनना सीखी और साथ ही उनके कपडे नेवी और आर्मी स्टोर्स से सिलते थे । गाँधी जी स्वयं ने व्याख्यायित किया कि समय पर काम करना, मौन रखना, सार्वजनिक सफाई, स्वतन्त्र सोच निर्णय का अभ्यास और भी कई चीजों उन्होंने अंग्रेजों से सीखीं। (CW48 : 375)
गुजरात में कुमारावस्था में अपने दोस्त के साथ याद करते थे कि अंग्रेज इसलिए भारत पर राज करते हैं क्योंकि वे माँस खाते हैं। उन्होंने एडविन अर्नाल्ड के भगवद्गीता के अनुवाद को पढा। यह महत्त्वपूर्ण है कि भारत से जितने भी लोग लंदन या अन्य यूरोपीय देश गए उन्होंने सीखा कि कैसे आधुनिक बनें कैसे तार्किक और वैज्ञानिक सोच रखें, गाँधीजी ऐसे लोगों से जुडे जो ब्रिटिश समाज में हाशिये पर थे जिन्हें सनकी कहकर उपहास उडाया जाता था। उन्हें उन विचारों के प्रतिपादक के रूप में देखा जाता है जो उस समय के प्रमुख स्वभाव के साथ अजीब थे ।
गाँधीजी कहते हैं कि मैं यह कभी नहीं कहूँगा कि सभी अंग्रेज बुरे हैं। कई अंग्रेजों की इच्छा भारत के लिए होम रूल की है, यह अत्यावश्यक है कि लक्ष्य बनाकर सभी अंग्रेजों को बाहर किया जाए, यदि अंग्रेज भारतीयकरण कर लेते हैं तो हम उन्हें यहाँ रख सकते हैं और यदि वे उनकी सभ्यता के साथ यहाँ रहना चाहते हैं तो उनके लिए यहाँ कोई स्थान नहीं है (विनय लाल, 2009) ।
वर्तमान अस्मिता की राजनीति से इतर गाँधीजी की भारतीय पहचान में दोनों सभ्यताओं के बीच मूल अन्तर वर्तमान में आये प्रभावों से मुक्त था, जहाँ एक सभ्यता को दूसरी के बरअक्स देखने की प्रवृत्ति में एक शत्रुता भाव था वहीं गाँधीजी के लिए यह सार्वभौमिक मानवीय गुणों को पूरी सभ्यता पर लागू करने के भाव के रूप में रहा, गाँधीजी उस पश्चिम को देख रहे थे जो उन लोगों का पश्चिम था जो भारतीयों की तरह सभ्यता दृष्टि रखने वाले थे, हालाँकि ये उन लोगों से अलग थे जो साम्राज्यवाद के विचार को लेकर व्यापार करने विदेशों में गए और जिन्होंने उपभोक्तावादी संस्कृति के प्रसार और साम्राज्य विस्तार के चलते पश्चिमी सभ्यता का भी नुकसान किया, 1837 में इंग्लैण्ड को साम्राज्य की कोई जरूरत नहीं लग रही थी और कुल मिलाकर ब्रिटिश लोगों की उपनिवेशों में कोई रुचि नहीं थी। ईस्ट इंडिया कम्पनी के सरबराहों का मकसद भारत पर हुकूमत करना नहीं बल्कि माल कमाना था । इसलिए चाँदी काटने में उन्होंने किसी तरह की मुरव्वत नहीं दिखाई। लेकिन उपनिवेशवाद की बाकायदा शुरुआत तो तब हुई जब राजनीति की ब्रिटिश भारतीय संस्कृति के दोनों पक्षों ने ब्रिटिश मध्य वर्ग की इंजीली भावना का पालन करते हुए अंग्रेज प्रभुत्व को सांस्कृतिक तात्पर्यों के आईने में देखना शुरू कर दिया (अभय कुमार दुबे, 2019)।
गाँधी इस बात को बखूबी पहचानते थे और इसके दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए उनके समक्ष यहाँ पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव में आये भारतीय अभिजात वर्गों के.के मनोविज्ञान को बदलने की चुनौती के साथ- साथ जनता में भारत की छवि को बदलने की चुनौती भी थी। इस कार्य में उन्होंने भारतीय सभ्यता उन गुणों को उजागर किया जो पूरे विश्व में व्यवस्थित नैतिक शासन और मानवीय सभ्यता के विकास के लिए जरूरी थे। गाँधीजी ने पश्चिम वासियों को भी उनकी उस सभ्यता के बारे में समझाया जो औपनिवेशिक सभ्यता से इतर उनकी मूल सभ्यता थी जो प्रेम,अहिंसा,सहअस्तित्व पर आधारित थी न कि शोषण पर। ऐसा करके वे उनकी सभ्यता के बरअक्स भारतीय सभ्यता को विरोध में खडा नहीं कर रहे थे बल्कि वे वैश्विक स्तर पर एक ऐसी सभ्यता का निर्माण करना चाह रहे थे जो विश्व का व्यवस्थित नैतिक शासन कर सके और निश्चित रूप से उनकी निगाह में यह सभ्यता भारतीय सभ्यता ही थी जो ऐसा कर सकती थी ।
सन्दर्भ
1. नन्दी, आशीष (2019), इन्टीमेट एनेमी,जिगरी दुश्मन, उपनिवेशवाद के साए में आत्मक्षय और आत्मोद्वार (अनुवाद अभय कुमार दुबे), वाणी प्रकाशन, पेज-19.
2. दुबे अभय कुमार (2002), लोकतन्न्त्र के सात अध्याय, वाणी प्रकाशन,नई दिल्ली
3. धर्मपाल (2000),रमणीय वृक्ष, 18वीं शताब्दी में भारतीय शिक्षा (अनुवाद रजनीकांत जोशी कृष्णपाल सिंह भदौरिया),पुनरुत्थान ट्रस्ट, पेज-98
4. धर्मपाल (1994),भारत का स्वधर्म, वाग्देवी प्रकाशन बीकानेर पेज-23
5. लाल विनय (2009),गाँधीज वेस्ट द वेस्ट्स गाँधी इन न्यू लिटररी हिस्ट्री, संस्करण 40, नंबर-2, इण्डिया एंड वेस्ट द जॉन होपकिन यूनिवर्सिटी प्रेस, पेज 281-313. URL//www.jstor.org/stable/27760259
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सम्पर्क - एसोसियेट प्रोफेसर,
क्षेत्रीय केंद्र,महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय,
वर्धा। IA-290, साल्ट लेक सेक्टर 3, कोलकाता- 97