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मानव मन : आकर्षण की खोज

निहार व्यास
साहित्यइतिहास में जासूसी कथानक
आदर्शलोक केवल बचपन के जीवन में ही मौजूद होता है।
-हायो मियाजाकि
हमारे बचपन में ऐसा क्या था कि वह समय हमारे जीवन का सबसे सुखद वक्त था? क्या वह बचपन की असीम ऊर्जा थी? या सामने फैली असीमित सम्भावनाएँ? लेकिन यह ऊर्जा या इन सम्भावनाओं को समझने की क्षमता हममें कहाँ से आई? हमारे बचपन की ये अद्भुत शक्तियाँ बेलगाम और अप्रतिबन्धित कल्पना से आईं; शायद इसलिए कि समाज ने उन दिनों हमारे पैरों पर जडता की बेडियाँ नहीं डाली थीं, हम जादुई और शानदार चीज़ों के सपने देख सकते थे। वास्तविकता केवल एक लचीली रचना थी जिसे हम हमारी आवश्यकताओं के अनुरूप पुनर्निर्मित कर सकते थे। हमारे इन अनखोजे और निराले विचारों और स्थानों में घूमने को भागना नहीं, बल्कि खेलना कहा जाता था।
परन्तु जैसे हम बडे होते जाते हैं, कुछ बदल जाता है; हम समाज, अपेक्षाओं और उन रास्तों के बारे में सीखते हैं जिन्हें हमें अपनाना चाहिए- रास्ते जो हमें मैदानों के बीच चलने और दूसरे, ज्यादा स्वतन्त्र, रास्तों और पगडण्डियों की यात्रा करने से रोकते हैं। ऐसी दुनिया में, जहाँ दरवाजों का बन्द होना उनके खुलने से ज्यादा आम है, अगर एक थका व्यक्ति उस सुकून देने वाली दुनिया में वापस जाने की उम्मीद करता है, जो हमें हमारे सामाजिक-शैशव में प्रसन्न किया करती थी, तो उसे कायर या पलायनवादी कह दिया जाता है।
एक बॉलीवुड फिल्म का उद्धरण ऐसी परिस्थिति में बहुत प्रासंगिक है-
कभी-कभी हम मुश्किल रास्ता सिर्फ इसलिए चुनते हैं, क्योकि हमें लगता हैं, महत्त्वपूर्ण चीजें पाने के लिए हमें मुश्किल रास्ता अपनाना चाहिए। अपने आप को सजा देना बहुत जरूरी समझते हैं। पर क्यों? आसान रास्ता क्यों नहीं चुन सकते? क्या बुराई है उसमें? खास करके जब उस मुश्किल का सामना करने के लिए हम तैयार ही नहीं हैं!
फिल्म डियर जिन्दगी की यह पंक्तियाँ काफी खूबसूरती और सरलता से हमें बताती हैं कि पलायनवाद की संकल्पना सदैव बुरी हो, यह जरूरी नहीं है। इसके विपरीत, यह आत्म-संरक्षण का एक साधन हो सकती है।
मनुष्य सदियों से वास्तविकता से भागता रहा है, ऐसी रचनाओं का निर्माण करता रहा है जो न केवल रचनाकारों के लिए, बल्कि पाठकों के लिए भी सान्त्वना एवं हौसले का स्रोत थीं। वास्तविक जीवन की बोरियत और इसमें मिलने वाले उत्पीडन ने हमारी शक्तिशाली कल्पनाओं को प्रेरित किया- हमने ऐसे संसार और स्थान बनाना शुरू किये, जहाँ हम स्वतन्त्र रूप से जी सकें, हमने ऐसे लोग और जीव रचित किये जिनमें हमें सच्चे साथी मिल सकें। इस प्रकार मानव जाति कपोल-कल्पित रचनाओं की ओर और उससे मिलने वाले मनोरंजन और चमत्कार की ओर आकर्षित हुई। सामान्य जीवन की नीरसता ने रोमाँचकारी अनुभव की कामना को जन्म दिया, जिसमे हमारी धडकनें बढने लगे और जिसमें हममें कुछ साहसिक व साधारण से अलग भावों की उत्पत्ति हो। हालाँकि अलौकिक रहस्य और रोमांच वाले उपन्यास सभी उम्र के पाठकों के बीच काफी लोकप्रिय रहे हैं, किन्तु यथार्थवादी अपराध-कथा शैली ने लोगों की कल्पना और रुचि को कहीं ज्यादा कसकर बाँधा। इसके दो कारण रहे- एक, कहानी वास्तविकता में डूबी हुई थी और इसकी पूरी सम्भावना थी कि यह घटनाएँ पाठकों के साथ भी हो सकती हैं; और दूसरा, वह कुतूहल जो पाठकों को शुरू से अन्त तक रहस्य को सुलझाने का अनुमान लगाने और उत्तरों को खोजने पर मजबूर करता।
अपराध-कथा शैली की उत्पत्ति
हालाँकि अपराध-कथा चीन के मिंग राजवंश के समय से प्रचलन में है, इस शैली ने बडे पैमाने पर लोकप्रियता उन्नीसवीं, बीसवीं और इक्कीसवीं सदी में ही हासिल की। कई पात्रों और कहानियों ने इस शैली में जन्म लिया, जिनमें से बहुतों ने पूरे माध्यम पर एक चिरस्थायी छाप छोडी है।
एक नजर इतिहास पर करीब से डालें, तो यह साफ हो जाएगा कि क्राइम-फिक्शन की उत्पत्ति विक्टोरियन काल में नहीं हुई थी। रहस्य और अपराध के किस्से एक हजार एक अरेबियन रातें की कहानियों के समय से लिखे जा रहे हैं। इस प्रसिद्ध कहानी संग्रह की कहानी, तीन सेब, में एक मछुआरे को टुकडों में कटी युवती एक बक्से में मिलती है। खलीफ, हारून अल-रशीद, अपने वजीर जाफर को तीन दिनों में हत्यारे को खोजने का आदेश देता है, नहीं तो वजीर को फाँसी पर लटका दिया जाएगा।
यह कहानी स्पष्ट रूप से एक अपराध-कथा है, परन्तु इसे जासूसी कहानी नहीं माना जा सकता, क्योंकि वजीर का मुजरिम को पकडने का कोई इरादा नहीं है, न ही वह कभी उसे पकडने की कोशिश करता है। केवल स्वीकारोक्ति और संयोग से ही हत्यारे का खुलासा होता है, और तब भी खलीफ अन्त में सभी को माफ कर देता है।
जब यह पता चलता है कि युवती की हत्या में उसके अपने दास का हाथ था, वजीर फटकार के डर से अपने नौकर को छुपाने के विचार को खारिज कर देता है, और निम्नलिखित पँक्तियाँ कहता है-
यदि किसी दास के द्वारा स्वयं पर विपत्ति आ पडे, उसकी कीमत पर अपनी जान बचाने को झिझकना नहीं। उसका स्थान लेने बहुत सेवक मिल जाएँगे, पर जीवन एक बार खोया कभी वापस नहीं मिलेगा।
चीन के युआन राजवंश (1259-1368) के दौरान, नायक बाओ जेंग (जज बाओ) के नाटक काफी लोकप्रिय थे। ऐसा एक नाटक, चॉक चक्र वही पुरानी कहानी दर्शाता है जिसमें दो औरतें एक बच्चे के लिए लडती है, और जब यह आदेश दिया जाता है कि वे बच्चे को खींच कर आधा-आधा बाँट लें, तो उसकी सच्ची माँ खींचने से मना कर देती है। इस कहानी के चीनी संस्करण में दोनों महिलाओं की कहानियाँ विस्तृत रूप से बताई जाती हैं, और उनकी लडाई में ज्यादा भावनात्मक भार दिखता है। नाटक में उन्हें बच्चे को खींचने का अजीब आदेश देने वाला व्यक्ति बाओ जेंग ही होता है।
इन कहानियों को भी मूलतः अपराध-कथा के रूप में वर्गीकृत किया गया है, लेकिन नायक वास्तव में कोई जाँच-पडताल नहीं करता, और अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और अवलोकन शक्ति के माध्यम से ही झगडे या रहस्य को हल करता है। इसलिए इन्हें भी जासूसी कहानियाँ नहीं माना जा सकता।
जब हम उन्नीसवीं सदी में प्रवेश करते हैं, तो लेखन शैलियों के साथ प्रयोग बढ जाते हैं। ऐसे कई प्रयोग उस समय अपराध-कथा के साथ भी हो रहे थे - शुरुआती कहानियाँ डरावनी और भूतिया से लेकर प्रतिशोध लेने के बारे में थीं। आखिरकार, उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में, एड्गर एलन पो अपने निबन्धों, कविताओं और लघु-कथाओं के साथ प्रमुखता में आए। पो की कहानियाँ विज्ञान और मानव उप-चेतना के नकारात्मक प्रकृति एवं पहलू से सम्बन्धित थीं।
1841 में पो की लघु-कथा द मर्डर्स इन द : मॉर्ग (रू मुर्दाघर में खून) प्रकाशित हुई, जिसे अब पहली जासूसी कहानी माना जाता है। जैसा पहले भी व्याख्यायित है, एड्गर एलन पो की लिखी कहानी से पहले सक्रिय, छान-बीन करने वाले जासूस मुख्य पात्रों की कोई अन्य कहानी लिखी या प्रकाशित नहीं हुई थी। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि 1850 से पहले अंग्रेजी शब्द डिटेक्टिव उपयोग में नहीं आया था, जब चार्ल्स डिकेन्स ने अपनी पत्रिका हाउसहोल्ड वर्ड्स में इस शब्द को पहली बार इस्तेमाल किया। इस शब्द की उत्पत्ति अंग्रेजी शब्द डिटेक्ट से हुई, जिसे विशेषण रूप से डिटेक्टिव पुलिस में प्रयुक्त किया गया। इस प्रकार एड्गर एलन पो ने डिटेक्टिव शब्द की उत्पत्ति से लगभग एक दशक पहले ही दुनिया की पहली डिटेक्टिव स्टोरी या जासूसी कथा 1841 में लिखी।
द मर्डर्स इन द : मॉर्ग के कथा-तत्त्व
यह कहानी उस शैली में थी जिसे अब लॉक्ड-रूम मिस्ट्री (या बन्द कमरे में रहस्य) के रूप में जाना जाता है। एक बन्द कमरे में माँ-बेटी की निर्मम हत्या को अंजाम दिया जाता है, और कमरे में प्रवेश का कोई स्पष्ट या प्रत्यक्ष मार्ग नहीं मिलता। हत्याएँ अपने आप में काफी अमानवीय होती हैं - कमरे में माँ-बेटी के खींचे गए बालों के गुच्छे पाए गए, माँ का गला इस कदर कटा मिला कि शरीर को जरा सा हिलाने पर सिर धड से अलग हो गया, और बेटी चिमनी में उलटी ठूँसी हुई पायी गयी। कमरे में एक खून से सना उस्तरा भी मिलता है।
कहानी में शुरुआत में ही दिए गए ये विवरण पाठकों के लिए जिज्ञासा बढाने का काम करते हैं, जिससे वे खुद अनुमान लगा सकें कि कत्ल कैसे और क्यों किये गए। इस लेखन तकनीक का इस्तेमाल पो के बाद आये दूसरे जासूसी लेखकों ने भी किया, जैसे सर आर्थर कॉनन डॉयल और अगाथा क्रिस्टी, एवं भारत के सारदेन्दु बन्दोपाध्याय और सत्यजीत रे। उदाहरणार्थ, डॉयल के शेर्लाक होल्म्स, क्रिस्टी के हरक्यूल प्वारो, बन्दोपाध्याय के ब्योमकेश बक्शी और रे के फलूदा की कहानियों में आपराधिक घटना या हत्या के प्रमुख विवरण बहुत जल्द ज्ञात हो जाते हैं, और बाकी की कहानी जासूस और उनके साथी रहस्य को सुलझाने की कोशिश में बिताते हैं। यह निष्कर्ष निस्सन्देह निकाला जा सकता है कि एड्गर एलन पो इस प्रथा को शुरू करने वाले पहले व्यक्ति थे।
जब हम कहानी के अन्त की जाँच करते हैं, कई ऐसे तथ्य ज्ञात होते हैं जो शुरुआत में असंभव या अजीब लगते थे। एक छूटे हुए ओरंगुटान ने माँ-बेटी की हत्या की, जिसे उसका मालिक, एक नाविक पुनः पकड लेता है और यह सत्य गिरफ्तारी के डर से छुपा लेता है। इस सत्य और आदमी की पहचान मिलने के बाद, कहानी का नायक, जासूस सी ऑगस्ट ड्यूपौं पुलिस को कुछ न बताने का वादा करता है, किन्तु इस शर्त पर कि नाविक उसे ओरांगुटान द्वारा हत्या का सम्पूर्ण ब्योरा दे। ड्यूपौं नाविक से कहता है-
तुम्हारे पास छिपाने को कुछ नहीं है। ना ही तुम्हारे पास छिपाने की कोई वजह है। वहीं दूसरी ओर, सैद्धान्तिक तौर पर, हत्या की पूरी जानकारी देने के लिए तुम बाध्य हो। एक निर्दोष व्यक्ति उस अपराध के लिए कैद में है जिसके असल मुजरिम को तुम इंगित कर सकते हो।
हालाँकि यह कहानी एक अजीबोगरीब और अनोखी घटना को दर्शाती है, परन्तु इसके चारों ओर बुना हुआ वास्तविकता का जाल यह सुनिश्चित करता है कि पाठक कहानी में वर्णित घटनाओं पर विश्वास करना न छोडें। साथ ही, नायक की प्रेरणा वास्तव में न्याय पाने या हत्यारे को पकडने की नहीं है। जैसा कि उपरोक्त उद्धरण में दिखाया गया है, उसकी दिलचस्पी केवल हत्या की विधि खोजने में है।
कहानी में दर्शाई हत्या की तहकीकात में ड्यूपौं का शामिल होने का तरीका भी उल्लेखनीय है। कथावाचक और ड्यूपौं पैरिस की सडकों पर घूम रहे होते हैं जब वो एक उत्तेजित भीड से मिलते हैं। जिज्ञासा उन्हें जाँच के लिए प्रेरित करती है, और इस प्रकार वे मामले में शामिल होते हैं। यह ध्यान देने योग्य बात है कि कथावाचक द्वारा कहानी की शुरुआत विश्लेषण, अवलोकन और सहज-बोध पर एक लम्बे निबन्ध से होती है, क्योंकि ड्यूपौं का अपराध को सुलझाने का तरीका इन तर्कों पर निर्भर करता है।
हत्यारे का खुलासा और हत्या का तरीका कहानी के अन्त में वर्णित होता है। यह एक और परम्परा है जिसका अनुसरण पो की कहानियों के बाद लिखी गयी काफी कहानियों ने किया। एक बार रहस्य सुलझने के बाद पाठक बहुत आसानी से कहानी को फिर से पढ कर लेखक की बुद्धिमत्ता पर आश्चर्य और उसकी सराहना कर सकते हैं।
द मिस्ट्री ऑफ मारी रोजे के कथा तत्त्व
1842 में प्रकाशित मारी रोजे का रहस्य नाम की इस लघुकथा को कई शोधकर्ता एक वास्तविक अपराध पर आधारित पहली मर्डर मिस्ट्री मानते हैं। एक बार फिर, सी ऑगस्ट ड्यूपौं कहानी का नायक है और उसका अनाम मित्र कहानी का वर्णनकर्ता है। ड्यूपौं के घटना की तहकीकात का इरादा और सम्बद्धता पिछली कहानी से काफी अलग है।
मारी ससीलिया रोजर्स की वास्तविक अनसुलझी हत्या पर आधारित यह कथा पो की ओर से इस प्रकरण के विस्तृत विश्लेषण और अनुमानित समाधान का प्रयास है। द मिस्ट्री ऑफ मारी रोजे का वर्णन करते हुए एक पत्र में पो जोर देकर कहते हैं- ड्यूपौं के द्वारा मारी की हत्या को सुलझाने के बहाने मैंने न्यूयॉर्क में घटी इस दुखद घटना का बहुत कठोर विश्लेषण किया है।
ड्यूपौं असल में घर से बाहर जाकर मामले की जाँच-पडताल नहीं करता। वह बस विभिन्न समाचार पत्रों के अनुच्छेदों और लेखों का विश्लेषण करता है, और फिर हत्या का मकसद और हत्यारे को पकडने का एक तरीका निकालता है, हालाँकि असली हत्यारे का कभी खुलासा नहीं होता।
इस मामले पर ड्यूपौं के विचार, लडकी के लापता होने की परिस्थितियाँ, तीन दिन बाद नदी में उसकी लाश मिलने एवं नए निष्कर्षों का वर्णन करने वाले कई समाचार पत्रों के लेख - इन्हीं की तर्ज पर पूरी कहानी लिखी गई है। क्योंकि कोई ठोस समाधान नहीं मिलता, कहानी का अन्त थोडा निराशाजनक है। परन्तु कुल मिलाकर कहानी अच्छा उदाहरण है पो की उस तकनीक का, जिसे वे रेटिओसिनेशन यानी विवेकात्मक निष्कर्षण कहते थे।
द परलोइण्ड लेटर के कथा तत्त्व
नायक के रूप में सी ऑगस्ट ड्यूपौं की यह आखिरी कहानी 1844 में प्रकाशित हुई, और यह तीनों कहानियों में सबसे छोटी भी थी। कहानी इंग्लैंड की रानी के प्रेमी द्वारा लिखे गए ऐसे गोपनीय पत्र की है, जो एक मंत्री चुरा कर नकली पत्र से बदल देता है, और फिर रानी का भयादोहन करता है। क्योंकि पैरिस की पुलिस खुद भी कुछ नहीं कर पाती, एक अधिकारी ड्यूपौं को इस पत्र को खोजने का काम सौंपता है।
छोटी और सरल होने के बावजूद पो इसे रेटिओसिनेशन की अपनी सबसे श्रेष्ठ कथा मानते थे। धमकाने वाले मंत्री द्वारा पत्र का लिफाफा बदल दिया गया था और पत्र को एक बहुत ही प्रत्यक्ष स्थान पर रखा गया था। इसलिए मंत्री के आवास की अच्छी तरह तलाशी लेने के बाद भी पुलिस उसका पता नहीं लगा पाई, क्योंकि वे पत्र की दिखावट और उसकी गहरे रूप से छुपे होने की उम्मीद से खुद की सोच में ही सीमित रह गए। दूसरी ओर ड्यूपौं जल्द ही पता लगा लेता है कि मंत्री एक बुद्धिमान व्यक्ति है जो मानव मन को मूल रूप से समझता है। मामले को सुनकर ड्यूपौं टिप्पणी करता है-
शायद इस बात की सरलता न समझ पाना ही आपकी त्रुटि है।
ड्यूपौं मंत्री के घर जाता है, और मंत्री का ध्यान बँटा कर पत्र को मंत्री की शेल्फ से चुरा लेता है। इस प्रकार वह रहस्य सुलझा कर 50,000 फ्रैंक का इनाम भी जीत लेता है।
इस कहानी का मूल ढाँचा, जहाँ एक अनाम लेकिन महत्त्वपूर्ण व्यक्ति को नायक की मदद की जरूरत पडती है, और भी कई कहानियों में सामने आता है, जैसे कि उदाहरण के तौर पर सर आर्थर कॉनन डॉयल की द इलस्ट्रीयस क्लाइंट।
चरित्र विश्लेषण : सी ऑगस्ट ड्यूपौं
नियमों की सीमाओं से परे के मामलों में ही विश्लेषक के कौशल का प्रदर्शन होता है। वह मौन रहकर न जानें कितने निष्कर्षों और अनुमानों की गणना कर लेता है।
सी ऑगस्ट ड्यूपौं पेशेवर जासूस नहीं है, और अपराधों को सुलझाने की उसकी मंशा हर कहानी में बदलती है। उसके बोल-चाल का ढँग और रहस्य को सुलझाने का तरीका साहित्य के कई जासूसों के लिए मानक बन गया है।
यदि पहली कहानी : मुर्दाघर में खून में रहस्य सुलझाने की ड्यूपौं की प्रेरणा को देखें, तो यह सामने आएगा कि वह घटना में दिलचस्पी के कारण शामिल हुआ, और कत्ल को सिर्फ मनोरंजन और जिज्ञासा के लिए हल करता है। वहीं दूसरी ओर मारी रोजे का रहस्य में ड्यूपौं यह राय रखता है कि समाचार पत्र सच्चाई खोजने की कोशिश करने के बजाय मामले को केवल सनसनीखेज बनाते हैं। वह हत्यारे के नजरिये से देखने के लिए अखबारों की रिपोर्ट और लेखों का इस्तेमाल करता है, और फिर तार्किक निष्कर्ष देता है कि नाव मिलने से हत्यारा भी मिल जाएगा। आखिर में, द परलोइंड लेटर में ड्यूपौं बदला लेने की इच्छा से प्रेरित होता है, और अपनी सेवाओं के लिए इनाम भी स्वीकार करता है।
आधुनिक जासूस के मानकों पर विचार करने पर यह जाहिर होगा कि वह एक ऐसा व्यक्ति है जिसे भावनात्मक दृष्टिकोण के बजाय विश्लेषणात्मक और व्यावहारिक दृष्टिकोण वाला माना जाता है। यह व्यक्ति अपराधी के मनोविज्ञान को समझने की कोशिश करता है और फिर मामले को सुलझाता है। इसके अलावा, जासूस के पास अपने शहर और आसपास के क्षेत्र से सम्बन्धित सूचनाओं और तथ्यों की एक बुनियादी लेकिन विस्तृत सूची होती है, और साथ ही अवलोकन के लिए एक गहरी दृष्टि।
ये सभी विशेषताएँ शायद पाठक को साहित्यिक इतिहास के सबसे प्रसिद्ध जासूस शेलॉक होल्म्स की याद दिलाते हैं, लेकिन सी ऑगस्ट ड्यूपौं का जन्म होल्म्स से लगभग आधी सदी पहले ही हो चुका था। पूर्व तर्क को साबित करते हुए सर आर्थर कॉनन डॉयल ने कहा है कि ड्यूपौं ही आधुनिक जासूसी शैली के लिए प्रेरणा थे।
पो की प्रत्येक जासूसी कहानी ऐसी जड है जिससे एक सम्पूर्ण साहित्य शैली विकसित हुई है। जासूसी कहानी का अस्तित्व ही कहाँ था जब तक पो ने उसमें प्राण नहीं फूँके?
डॉयल ने अपनी कहानी ए स्टडी इन स्कारलेट में ड्यूपौं का जिक्र तक किया था, जिसमें होल्म्स ने ड्यूपौं को हीन बताया और दिमाग को पढने के उसके तरीके को खारिज कर दिया, हालाँकि बाद में होल्म्स ने स्वयं डॉ. वाटसन पर उसी तकनीक का प्रयोग किया।
एक और अनोखी विशेषता यह है कि जासूस पहले रहस्य का हल बताता है और फिर इस समाधान की ओर ले जाने वाले कदमों का वर्णन करता है। द परलोइण्ड लेटर में ड्यूपौं ठीक यही करता है- वह पुलिस अधिकारी को चुराया पत्र सौंप देता है और फिर बताता है कि उसने इसे मंत्री से कैसे हासिल किया। इन कहानियों की प्रासंगिकता और लोकप्रियता का आकलन करते समय यह बात साबित हो जाती है कि पाठक के आश्चर्य और विस्मय को बढाने का यह तरीका सफलतापूर्वक काम करता है।
कई आलोचक इस बात से सहमत हैं कि पो ने अपनी कहानियों से जासूसी कथा शैली के लिए तीन अलग-अलग ढाँचे बनाए - भौतिक प्रकार, जिसमें जासूस सभी सबूतों की जाँच करके अपराध के रहस्य को स्वयं अवलोकन द्वारा उजागर करता है (रू मुर्दाघर में खून); मानसिक प्रकार, जिसमें जासूस बिना अधिक शारीरिक परिश्रम के अपराध को सुलझाने के लिए अपनी विश्लेषणात्मक क्षमताओं का उपयोग करता है (मारी रोजे का रहस्य); और सन्तुलित प्रकार, जिसमें समान मात्रा में मानसिक विश्लेषण और शारीरिक अवलोकन का उपयोग किया जाता है (द परलोइण्ड लेटर)।
कहानी के अप्रधान पात्रों को देखा जाए, तो कहानी जासूस के एक अच्छे दोस्त के नज़रीये से बताई जा रही है। साथ ही, पुलिस का अनाडी और मूर्ख चित्रलेखन भी इन कहानियों में निर्धारित हुआ था। ये कथा तत्त्व, जो बाद की कहानियों में काफी प्रचलित हुए, पहली बार पो ने ही इस्तेमाल किये थे।
उपरोक्त विश्लेषणों और व्याख्या से यह निष्कर्ष निकलता है कि एड्गर एलन पो अपनी जासूसी कहानियों में लेखन तकनीकों को सतर्कतापूर्वक प्रयोग करने वाले पहले व्यक्ति थे। उनकी तकनीकें और प्रतिरूप अब अपराध-कथा शैली के मानक और परम्पराएँ बन गए हैं। हालाँकि अपराध-कथा शैली बहुत पहले से अस्तित्व में थी, वह पो ही थे जिन्होंने वास्तव में जासूसी-कथा उप-शैली के उद्भव और लोकप्रियता का नेतृत्व किया। पो द्वारा कृत ड्यूपौं ही आधुनिक जासूस का मूलरूप है, और आज के सभी बुद्धिमान परन्तु सनकी जासूस उसी के आधार पर साहित्य में लिखे जाते हैं।
इन कहानियों में दर्शाया गया यथार्थवाद हमारे जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया है। हमारा दिमाग हमारे दैनिक जीवन की ऊब को दूर करने के लिए सुराग और रहस्यों की तलाश करता है, और ये कहानियाँ हमें जीवन और मानव-मन दोनों के प्रति आकर्षण खोजने और इनकी विलक्षणता की सराहना करने में मदद करती हैं। पलायनवाद मानव मनोविज्ञान का एक महत्त्व-पूर्ण हिस्सा है, और इसकी महत्ता को स्वीकारना ही हमारे मस्तिष्क के स्वयं की मदद करने के प्रयासों को सकारना है।
सन्दर्भ
- अनाम और पैन, जॉन. द थ्री एपल्स द बुक ऑफ वन थाउजेंड एँड वन नाइट्स, प्रथम भाग. स्टार्ट पब्लिशिंग, 2017.
- डीयर जिन्दगी, निदेशक, गौरी शिंदे. 2016.
- नोल्स, क्रिस्टोफर, आर गॉड्स वियर स्पैन्डेक्स- द सीक्रेट हिस्ट्री ऑफ कॉमिक बुक हीरोज. वेइसर बुक्स. 2007.
- पो, एड्गर एलन. द मर्डर्स इन द रू मॉर्ग- द कम्पलीट एड्गर एलन पो. प्रजापति बुक्स, 2000.
- पो, एड्गर एलन- द परलोइंड लेटर. द कम्पलीट एड्गर एलन पो. प्रजापति बुक्स, 2000.
- पो, एड्गर एलन. द मिस्ट्री ऑफ मारी रोजे. द कम्पलीट एड्गर एलन पो. प्रजापति बुक्स, 2000.
- रोसनहाइम, शॉन जेम्स. द क्रिप्टोग्राफिक इमेजिनेशनः सीक्रेट राइटिंग फ्राॅम एड्गर पो टू द इंटरनेट. जोन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी प्रेस, 1997.
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