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इक्कीसवीं सदी के हिंदी उपन्यासों में किसान विमर्श

प्रेमशंकर मीणा
भारत एक कृषि प्रधान देश है। भौगोलिक दृष्टि से भारत गाँवों में बसा हुआ है। लगभग 70 प्रतिशत लोग किसान है। किसानों को देश की अर्थव्यवस्था की हड्डी माना जाता है। अनेक योजनाएँ किसानों के हितों को ध्यान में रखकर बनाई गईं, लेकिन किसानों की दशा और दुर्दशा में कोई खास सुधार आज भी नजर नहीं आता है। किसानों और उनके बच्चों का भविष्य आज भी अंधकारमय दिखाई दे रहा है। किसान आज भी अनेक प्रकार के संघर्षो से जूझ रहा है। आज भारत के विभिन्न राज्यों में बडी संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे है। किसानों की इन आत्महत्याओं की मुख्य समस्या कर्ज है। किसान एक बार कर्ज में फँस जाता है, तो फिर बाहर नहीं निकल पाता है। और अन्त में आत्महत्या कर लेता है। महाजन व व्यापारी बदल गए हैं, लेकिन शोषण का रूप भी बदल गया है, पर शोषण की प्रवृत्ति वही है। आज भी किसान बैंक से कर्ज लेता है। समय पर किसी न किसी कारण से वह चुका नही पाता है। कर्ज धीरे-धीरे लगातार बढता जाता है। इस स्थिति में वह कर्ज नही चुका पाने के कारण आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है।
प्रेमचंद के बाद अनेक उपन्यासकारों ने किसानों की समस्याओं को लेकर उपन्यास लिखे हैं जिसमें इक्कीसवीं के उपन्यासकार शिवमूर्ति का उपन्यास आखिरी छलाँग, संजीव का फाँस, पंकज सुबीर का उपन्यास अकाल में उत्सव भीमसेन का उपन्यास जमीन तथा मिथिलेश्वर का तेरा संगी कोई नहीं प्रमुख उपन्यास है। आज का किसान कर्ज की समस्या से तो गिरा ही है, साथ ही साथ खाद-बीज, पानी तथा बिजली की समस्या भी उसे परेशान कर रही है, कभी प्राकृतिक आपदाएँ, तो कभी सरकार की नीतियों से किसान परेशान है। फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल पाना भी आज एक गंभीर समस्या हो चुकी है। सन् 2006 में राजू शर्मा का चर्चित उपन्यास हलफनामे में किसान आत्महत्या के साथ-साथ जल संकट की समस्या को भी बताया है। हलफमनामे उपन्यास किसान आत्महत्या पर लिखा गया प्रथम उपन्यास है जो आन्ध्रप्रदेश के किसान जीवन और उनके जल संकट की समस्या पर लिया गया है। सीमान्त किसान का आर्थिक उदारीकरण की नीतियों ने किस प्रकार बर्बाद किया है, उसका प्रभावशाली चित्रण शिवमूर्ति ने उपन्यास आखिरी छलाँग में किया है। विकास के नाम पर विनाश की कहानी कहता सुनील चतुर्वेदी का उपन्यास कालीचाट (2015) एक नई समस्या खेती का कम्पनीकरण और नकदी फसलों के अतिरिक्त गेहूँ और धान उपजाने वाले किसानों के कर्ज लेने और कर्ज न चुका पाने के स्थिति में किसानों की आत्महत्या करने की समस्याओं को उठाता है- युनुस सूखे कुएँ की तली को देखते हुए सोच रहा था। किसान की तो पूरी जिन्दगी काली चाट जैसी है। अँधियारी और कडक। क्या मालूम यह चाट कब टूटेगी। कब इसके पीछे से भरभरा के पानी का उकाया फूटेगा और किसान की जिन्दगी में ठण्डे पानी के छींटे आएँगे। कब... कब....। किसान को लूटने के लिए बाजार में नए-नए तरह के बिचौलिए पैदा हुए हैं, इन बिचौलियों की घुसपैठ सरकार के अन्दर तक हो गई है। इक्कीसवीं सदी के हिंदी उपन्यासकार आज किसानों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति साथ ही उनकी समस्त समस्याओं को लेकर लगातार अपनी लेखनी के साथ उपस्थित हैं, लेकिन इस विषय पर चाहे बहुत अधिक उपन्यास नही लिख गए हो, लेकिन जो लिखे गए है वह महत्त्वपूर्ण है।
राजू शर्मा का उपन्यास हलफनामे किसान जीवन की पृष्ठभूमि पर लिखा हुआ उपन्यास है। स्वामी रामप्रसाद द्वारा एक छोटा किसान और उसका बेटा मकई राम एक बिजली साज है। बेटा अपने पिता को किसानी करने से मना कर देता है। एक दिन मकई राम को खबर मिलती है कि उसके पिता ने आत्महत्या कर ली है। आत्महत्या के एवज में मुआवजा के लिए हलफनामा दाखिल करता है। उसका यह कदम उसके जीवन में भूचाल ले आता है। धीरे-धीरे उसके जीवन का सुख सब चला जाता है। रामप्रसाद लगातार पानी की कमी की समस्या से जूझ रहा होता है। कर्ज लेकर तीन बोअर ट्यूवेल भी डलवाता है, लेकिन पानी की कमी दूर नहीं हो पाती है। लाला अपने स्वार्थ के लिए स्वामी रामप्रसाद की हत्य करवाता है और आत्महत्या की खबर फैला देता है। साहित्य समाज से ही विषय ग्रहण करता है। समाज में घट रही घटनाओं को ही वह अपनी रचनाओं में मुखर करता है। किस प्रकार राजनेता किसानों से सहानुभूति जताने के नाम पर राजनेता अपनी स्वार्थ सिद्धि का साधन बना लेते है इसका विस्तृत चित्रण उपन्यास में मिलता है।
संजीव का उपन्यास फाँस पिछले दो दशकों से बढ रही किसानों की आत्महत्या की समस्या को लेकर लिखा गया है। उपन्यास में महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के गाँव बनगाँव का चित्रण किया गया है। लेकिन इसमें आंध्रप्रदेश व कर्नाटक के किसानों सहित भारत के उन सभी किसानों की कहानियाँ शामिल हैं, जिन्हें पहले जी. एम. बीजों के इस्तेमाल करने के लिए फँसाया जा रहा था और कर्ज दिया गया। प्राकृतिक आपदाओं और सूखे की मार ने किसानों की जिन्दगी दूभर कर दी, कर्ज ने उन्हें आत्महत्या की ओर धकेल दिया। फाँस उपन्यास किसानों की समस्याओं की कथा है जिससे हम लगातार मुंह छुपाते आए है। फाँस खतरे की घंटी भी है और आत्महत्या के विरूद्ध आत्मबल प्रदान करने वाली एक नई चेतना के दर्शन भी कराता है। इस उपन्यास में किसानों की मूलभूत समस्याओं खाद, पानी, बिजली, कर्ज की समस्या, फसलों का उचित मूल्य मिलना, आत्महत्या जैसे गंभीर मुद्दे को बडी ईमानदारी और बेबाकी से विचार किया गया है जैसे-अगले महीने बैंक का 24 हजार का कर्ज अदा करना है। आज गुडी पडवा है- मराठी नव वर्ष। फर्स्ट क्लास डिनर है आई......यह जो भात है न आई, इसमें यह जो बात है ना आई इसमें स्टार्च है इसका काड न फेंको, तो चावल की सारी ताकत बची रहती है फिर मावा है मावा! ताकत ही ताकत! मजबूती ही मजबूती..... शुभा सामने आकर खडी हो गई तो झेप गया पूरा परिवार। शुभा ने तरस खाती जुबान से कहा-आज तो कुछ कायदे की चीज बना लेती! चलो मैं देती पूरण पोली। नहीं वहिणी कोई तो दिन आएगा, हम भी पूरण पोली और ढेर सारे पकवान बनाएंगे। आज रहने दो। मगर क्यों वह सुनील काका ने कहा है कि जब तक कर्ज ना उतार लो...। समझी। अरे तुम मियां बीवी, तुम्हें तपस्या करनी है शोक से करो मगर मुलगियों को तो बख्श दो । पंकज सुबीर का उपन्यास अकाल में उत्सव कृषकों की पीडा को बडी बारीकी से चित्रित करता है। किसान जब तक लड सकता है सभी समस्याओं का सामना करता है और वे जब टूट जाता है, तो हार कर मजदूर बन जाता है। जब बीवी के शरीर से आखरी गहना उतर जाता है। जब भी फसल ओले और बेमौसम बरसात की भेंट चढ जाती है तब पेट की आग किसान को मजदूर बनने पर विवश कर देती है। बीवी का हर गहना किसान इस मंशा से गिरवी रखता है कि फसल कटने पर छूडा लिया जाएगा, पर अंततः साहूकार की तिजोरी का निवाला बन जाता है। उपन्यास का एक दृश्य है जब वह अपनी पत्नी का आखिरी जेवर उसके पाँव की तोडी वह सुनार के पास बैठा पिघलवा रहा है। चाँदी की हर रिसती बूँद के साथ जुडी मीठी यादें धुआं होती जा रही है, एक गरीब किसान की भावनाओं का ही गहना तुडवाता है। उसके आँसू भी उस से छिपे नहीं रहते हैं। पर क्रूर होना पडता है। कितना करूण है वह दृश्य। उपन्यास के पात्र रामप्रसाद के माध्यम से पंकज सुबीर बताते हैं कि आम किसान आज भी मौसम की मेहरबानी पर किस हद तक निर्भर है। मौसम का रूख पलटा नहीं कि किसान का जीवन तहस-नहस हो जाता है जैसे-कमला की तोडी बिक गई। बिकनी ही थी। छोटी जोत के किसान की पत्नी के शरीर पर जेवर क्रमशः घटने के लिए होते हैं। और हर घटाव का एक भौतिक अन्त शून्य होता है। जब परिवार की महिला के पास इन धातुओं का अन्त हो जाता है, तब तय हो जाता है कि किसानी करने वाली बस यह अन्तिम पीढी है, इसके बाद अब जो होंगे वह मजदूर होंगे। यह धातएँ बिक-बिक कर किसान को मजदूर बनने से रोकती है। किसान की सारी आर्थिक गतिविधियाँ कैसे उसकी छोटी जोत की फसल के चारों ओर केंद्रित रहती है और किन उम्मीदों के सहारे वह अपने आप को जीवित रखता है। उपन्यास ग्रामीण परिवेश और शहरी जीवन की झाँकी को एक साथ पेश करता है। एक ओर मुख्यमंत्री के अपने निर्वाचन क्षेत्र के एक गाँव सूखा पानी का एक आम किसान रामप्रसाद इस उपन्यास का प्रमुख पात्र है जिसकी आँखों में आने वाली फसल की उम्मीद होती है जीवन है, तो दूसरी तरफ सरकारी अमले का मुखिया जो शहर का कलेक्टर है जिसके इर्द-गिर्द कुछ अधिकारी समाजसेवी नेता पत्रकार लोग है जो इस दौरान शहर में नगर उत्सव के आयोजन को लेकर सक्रिय है। राम प्रसाद की उम्मीदें तो बेमौसम बरसात की वजह से उजड जाती हैं वहीं दूसरी ओर नगर उत्सव का आयोजन पूरी तैयारी के साथ किया जा रहा है। एक ओर भारत का किसान है जो दबा कुचला जा रहा है, तो दूसरी तरफ चमकता दमकता शहर है। जहाँ धन है, अवसर है, तकनीकी प्रगति है। उपन्यासकार ग्रामीण व्यवस्था को कितनी निकटता से जानता है, यह उपन्यास में स्पष्ट दिखाई देता है किसान हितैषी सरकार दावों के बाद भी क्यों एक किसान आत्महत्या कर रहा है, यह देश के लिए चिंता का विषय है।
कालीचाट में कुँए की खुदाई के समय काली चाट उस पत्थर को कहते हैं जो इन्सान परिश्रम से तोडा नहीं जा सकता और यह मान्यता भी है कि इस पत्थर के नीचे पानी का अनन्त भण्डार होता है। यह कालीचाट कहीं जमीन के नीचे किसान को मिल जाती है, तो कहीं जमीन के ऊपर। सीताराम अपनी पाँच बीघा जमीन को सिंचित करने के लिए कुँआ खोदता है, लेकिन कालीचाट आ जाती है। उसे तोडने के लिए डायनामाइट की जरूरत होती है। जिसके लिए वह बैंक से लोन माँगता है बैंक मैनेजर उसे जमीन के कागज लाने के लिए कहता है। जब वह पटवारी से जमीन के कागज लेने जाता है तो पटवारी उससे 500 रूपये माँगता है। रूपयों के लिए वह मजदूरी करता है और पटवारी को रूपए देता है लेकिन बैंक मैंनेजर उस लोन देने से मना कर देता है। सीताराम हताश हो जाता है। सीताराम ट्यूवैल लगवाने के लिए साहूकार के यहाँ जमीन गिरवी रख देता है। जमीन में चार जगह ट्यूवेल खोदने के बाद भी पानी नही निकलता है तो वह दुखी होता है। पूरी तरह से टूट जाता है।
शिवमूर्ति के उपन्यास आखिरी छलाँग में किसान जीवन की समस्याओं का गम्भीर चित्रण मिलता है। शिवमूर्ति स्वयं एक छोटे किसान परिवार से सम्बन्ध रखते हैं अतः अपने अनुभवों ने इस उपन्यास को अत्यन्त प्रभावशाली बना दिया है। आखिरी छलाँग में शिवमूर्ति ने जिन दो प्रमुख समस्याओं को उजागर किया है वह एक तो अपने बेटे को इंजीनियर बनाने का बडा खर्च और दूसरी बेटी के शादी के लिए दहेज का प्रबन्ध। शिवमूर्ति पहलवान नामक पात्र के माध्यम से जागरूकता और साहस की छलाँगा दिखाना चाहते है, जो संघर्षशील है-कभी-कभी पहलवान सोचते हैं कि काश उन्हें सही समय पर किसी ने आगाह कर दिया होता कि खेतीबाडी से पेट भरने का आस छोड कर पढाई लिखाई का भरोसा करें। मामूली चपरासी की जिन्दगी औसत किसान की जिन्दगी से बेहतर होती है- यह वब पता चल गया होता तो मिडिल, हाईस्कूल और इंटरमीडिएट तीनों प्रथम श्रेणी में पास करने के बावजूद भी इस खानदानी दलदल में क्यों फँसते? इसी बात को लेकर पंकज सुबीर ने भी अकाल में उत्सव उपन्यास ने प्रश्न किया है कि-आपको किसने कहा है खेती करो? मत करो अगर नुकसान का इतना ही डर है तो। जब कहा ही जाता है कि खेती तो मौसम के भरोसे खेले जाने वाला जुआ है, तो क्यों खेलते हो इस जुए को? किसी ने कहा है क्या आपसे? मत करो खेती कोई दूसरा काम करो। इक्कीसवीं सदी के उपन्यासकारों ने केवल किसानों के जीवन के यथार्थ को ही प्रकट नहीं किया, परन्तु आत्महत्या के लिए किसानों को विवश करने वाली परिस्थितियों को भी समाज के सामने स्पष्ट किया है। कृषक समाज के लिए कृषि कोई धन्धा नहीं, बल्कि उनकी जीवनशैली है। उनकी रोजमर्रा की जिन्दगी का एक बडा हिस्सा है। किसान और धरती का रिश्ता अटूट है। वह अपनी जमीन से सबसे अधिक लगाव रखते हैं। किसान परिस्थितियों और चुनौतियों ने किसान के समक्ष अनेक सवाल खडे कर दिए है। न किसानों जीवन की समस्याएँ हल हुई है ना ही भूमिहीन मजदूरों को श्रम शोषण से मुक्ति मिली हैं।
तेरा संगी कोई नहीं मिथिलेश्वर द्वारा रचित एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास है। यह उपन्यास किसान की त्रासदी का जीवन्त उदाहरण है। यह उपन्यास खेतों में किसानों से भावनात्मक जुडाव को प्रस्तुत करता है। यह उपन्यास नई पीडी के पलायन, किसान के अकेलेपन और किसान की अनिच्छा के बावजूद खेती की जमीन को बेचने की विवशता से उत्पन्न संत्रास के कारण आत्महत्या करने की कथा को पाठकों के समक्ष रखता है। मिथिलेश्वर ने यही दिखाया है कि समाज में कितना भी बदलाव क्यों न आ गया हो लेकिन किसान का अपनी मिट्टी और खेती से मोह आज भी बरकरार है। खेतों को वह अपने अस्तित्व और अस्मिता से जोडकर देखता है। खेतों को वह मिट्टी किसान को जीवनी शक्ति देती है। यह हमारे देश का दुर्भाग्य ही है कि स्वतन्त्रता भारत की सरकारों ने ऐसी कोई नीतियाँ नही बनाई जिससे कृषि को एक लाभकारी व्यवसाय बनाया जा सके। कृषि के माध्यम से किसान सम्मानपूर्वक अपना जीवन जी सके। यही कारण है कि युवा पीढी किसान का जीवन जीना नहीं चाहती। युवा पीढी मानती ह कि किसान होना जीवन को नष्ट करने जैसा है। यही कारण है कि उपन्यास के प्रमुख पात्र बलेसर के लाख चाहने के बावजूद उसकी एक भी संतान खेती से नहीं जुडती। बलेसर के तीनों बेटे पढाई के लिए शहर जाते हैं। जिसे बलेसर स्वीकार नहीं करता है। अंत में लेखक देखते है कि जब बलेसर अपना खेत बेच देता है, तो उसी बिके हुए बत्तीस बीघा खेत में वह मृत पाया जाता है, बलेसर को अपने बत्तीस बीघा से इतना मोह हैं, जुडाव है कि वह उससे अलगाव सहन नहीं कर पाता। कृषि क्षेत्र पर गहरा संकट है। कृषि पर संकट का अर्थ है किसान की आजीविका पर संकट। नई पीढी शिक्ष और रोजगार के कारण शहरों की ओर बढ रही है और किसानों को गाँव में अकेला करती जा रही है। इस उपन्या समें बलेसर किसान का प्रतिनिधि पात्र बनकर हमारे सामने आता है। बलेसर की चुनौतियाँ और चिन्ता समूचे भारत के किसानों की समस्या है। उपन्यासकार ने दिखाया है कि किस प्रकार अपनों द्वारा दिए गए दुख, लकवा ग्रस्त पत्नी की विवशता से उत्पन्न वेदना, एकसरता और अजनबीपन बलेसर को मृत्यु की शरण में जाने को बाध्य करता है।
संदर्भ
1. सुनील चतुर्वेदीः कालीचाट,अतिका प्रकाशन, गाजियाबाद, 2015 पृ 57
2. संजीवः फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2015, पृ. 62
3. पंकज सुबीरः अकाल में उत्सव, शिवना प्रकाशन, सीहोर, 2016, पृ 78
4. शिवमूर्ति : आखिरी छलांग, रालकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,2008, पृ 94
5. पंकज सुबीरः अकाल में उत्सव, शिवना प्रकाशन, सीहोर, 2016 पृ 94

सम्पर्क - शोधार्थी,
मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय,
उदयपुर
मो. नं.09782031801